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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

षष्टितमोऽध्यायः ५२७ तुल्यजातिवयोरूपान् हृतान्पश्यसि मृत्युना । न च नामास्ति निर्वेदो लोहं हि हृदयं तव ॥७३॥ रूपकूलां मनःस्रोतां स्पर्शद्वीपां रसावहाम् । गंधपंकां शब्दजलां स्वर्गमार्गदुराग्रहाम् ॥७४॥ क्षमारित्रां सत्यमयीं धर्मस्थैर्यकराकराम । त्यागवाताध्वगां शीघ्रां बुद्धिनावं नदीं तरेत् ॥७५॥ त्यक्त्वा धर्ममधर्मं च ह्युभे सत्यानृते त्यज । त्यज धर्ममसंकल्पादधर्मं चाप्यहिंसया ॥७६॥ उभे सत्यानृते बुद्ध्वा बुद्धिं परमनिश्चयात् । अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् ॥७७॥ धर्मावनद्धं दुर्गन्धि पूर्णं मूत्रपुरीषयोः । जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमस्थिरम् ॥७८॥ रजस्वलमनित्यं च भूतावासं समुत्सृज । इदं विश्वं जगत्सर्वमजगच्चापि यद्भवेत् ॥७६॥ महाभूतात्मकं सर्वमस्माद्यत्परमाणुमत् । इंद्रियाणि च पंचैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥८०॥ इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञकः । सर्वैरिरिन्द्रियार्थैश्च व्यक्ताव्यक्तैर्हि बृंहितम् ॥८१॥ पंचविंशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमयो गणः । एतैः सर्वैः समायुक्तमनित्यमभिधीयते ॥८२॥ त्रिवर्गोऽथ सुखं दुःखं जीवितं मरणं तथा । य इदं वेद तत्त्वेन स वेद प्रभवाप्ययौ ॥८३॥ इन्द्रियैर्गृह्यते यद्यत्तद्वयक्तमभिधीयते । अव्यक्तमथ तज्ज्ञेयं लिंगग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥८४॥ इन्द्रियैर्नियतैर्देही धाराभिरिव तर्प्यते । लोके विहितमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति ॥८५॥ परावरदृशः शक्तिर्ज्ञानवेलां न पश्यति । पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा ॥८६॥


और वायु वाले साथियों को मृत्य मुख में जाते हुए देखते हैं । परन्तु शोक है कि तुम्हारे सदृश जीवों की आंखें यह देखकर भी नहीं खुलतीं और कुछ भी निर्वेद नहीं होता । सचमुच तुम्हारा हृदय लोहे का है, ॥७३॥ रूप रूपी तट, मन रूपी स्रोत, स्पर्श रूपी द्वीप, रस रूपी वेग, गंधरूपी पंक, शब्द रूपी जल और स्वर्ग मार्ग की ओर कभी भी न ले जाने वाली संसार रूपी नदी को क्षमा रूपी पतवार वाली, सत्यमयी, धर्म रूपी लंगर वाली और त्याग रूपी वायु के सहारे लेई जाने वाली शीघ्रगामिनी बुद्धि रूपी नाव से पार करना चाहिए ॥७४-७५॥ धर्म और अधर्म की भावना को छोड़कर सत्य और असत्यद्वन्द्व का त्याग करो । धर्म को असंकल्प द्वारा और अहिंसा से अधर्म का नाश करो ॥७६॥ और सत्य तथा अनृत को भली भाँति समझकर अपनी निश्चयात्मिका बुद्धि द्वारा हड्डियों के ढाँचे और नसों से युक्त मांस और रक्त के लेप से लिप्त, धर्म से बँधी, दुर्गन्धपूर्ण, मलमूत्र से भरी, जरा और शोक से घिरी, रोग का घर, अस्थिर, धूलि से भरी इस अनित्य देह में आसक्ति न रखो ॥७७-७८१/२॥ यह सारा जगत् (चर) और अजगत् (अचर) रूपात्मक विश्व तथा महाभूतात्मक पदार्थ इसके अतिरिक्त परमाणु वाले पदार्थ पाँचों इन्द्रियाँ, तम, सत्त्व, और रज ये सत्रह प्रकार के पदार्थ अव्यक्त कहलाते हैं। ॥७६-८०१/२॥ इस संसार में सब इन्द्रिय-विषय व्यक्त और अव्यक्त का समूह, पचीस प्रकार के पदार्थ व्यक्ताव्यक्त हैं। इन सबसे युक्त पदार्थ अनित्य कहे जाते हैं ॥८१-८२॥ त्रिवर्ग, सुखदुःख, जीवन और मरण इन सबको जो यथार्थरूप से समझता है वह उत्पत्ति और विनाश दोनों को जानता है ॥८३॥ इन्द्रियों से जिसको ग्रहण किया जाता है, उसको व्यक्त और जो इन्द्रियों से ग्रहण करने योग्य नहीं है और जिसका अनुमान आदि से ग्रहण होता है, उसको अव्यक्त कहते हैं ॥८४॥ नियत इन्द्रियों से जल धारा के समान आत्मा की तृप्ति होती है । संसार में अपने को और अपने में संसार को देखता है, जो आत्म दर्शन की शक्ति से सम्पन्न है, वह ज्ञान वेला को नहीं देखता है ॥८५१/२॥ जो सर्वदा सब अवस्थाओं में सब प्राणियों को देखता है । और जो ब्रह्म स्वरूप है उसका अशुभ कभी नहीं होता है ॥८६१/२॥ ज्ञान के द्वारा ही कायिक विविध क्लेशों से छुट-

५२८ नारदीयपुराणम् ब्रह्मभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते । ज्ञानेन विविधांक्लेशान् निवृत्तिश्च देहजात् ॥८७॥ लोकबुद्धिप्रकाशेन लोकमार्गो न रिष्यति । अनादिनिधनं जंतुमात्मनि स्थितमव्ययम् ॥८८॥ अकर्तारममूढं च भगवानाह तीर्थवित् । यो जन्तुः स्वकृतैस्तैस्तैः कर्मभिर्नित्यदुःखितः ॥८९॥ स्वदुःखप्रतिघातार्थं हंति जंतुरनेकधा । ततः कर्म समादत्ते पुनरन्यन्नवं बहु ॥९०॥ तप्यतेऽथ पुनस्तेन भुक्त्वाऽपथ्यमिवातुरः । अजस्रमेव मोहांतो दुःखेषु सुखसंज्ञितः ॥९१॥ बध्यते तप्यते चैव भयोत्पतकर्मभिः सदा । ततो निवृत्तो बंधात्स्वात्कर्मणामुदयादिह ॥९२॥ परिभ्रमति संसारे चक्रवद्द्बाहुवर्जितः । संयमेन च संबंधान्निवृत्त्या तपसो बलात् ॥९३॥ सम्प्राप्ता बहवः सिद्धि अव्याबाधां सुखोदयाम् । ॥९४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे बृहदुपाख्याने षष्टितमोऽध्यायः ॥६०॥

अथैकषष्टितमोऽध्यायः

सनत्कुमार उवाच अशोकं शोकनाशार्थं शास्त्रं शांतिकरं शिवम् । निशम्य लभ्यते बुद्धिलंब्धायां सुखमेधते ॥१॥ हर्षस्थानसहस्राणि शोकस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशंति न पंडितम् ॥२॥

कारा नहीं होता है। केवल लौकिक ज्ञान के प्रकाश से लोक मार्ग पर नहीं चला जाता है अर्थात् लोक यात्रा सफल नहीं होती है। इसके लिए अध्यात्म ज्ञान की भी आवश्यकता है ॥८७॥ आत्म-सन्तुष्ट, अव्यय, जन्म-मरण से रहित, अकर्ता और अविवेकी जीव को भगवान् और तीर्थज्ञ कहा जाता है ॥८८॥ जो जीव अपने किये हुए कर्मों के कारण नित्य दुःखी रहता है और अपने दुःखों के विनाश के लिए अनेक प्रकार के जीवों की हत्या करता है, फिर अनेक कर्मों में अपने को फंसाता है, वह उन कर्मों से उसी प्रकार संतप्त होता है, जिस प्रकार अपथ्य भोजन से रोगी ॥८९-९०॥ वह सर्वदा सुख के भ्रम से दुःखों में फंसकर कष्ट पाता और उन भयोत्पादक कर्मों के कारण मृत्यु-कष्ट में पड़ता है ॥९१॥ पुनः अपने शुभ कर्मों के उदय से दुष्कर्मों के बन्धन से छूटकर इस संसार में चक्र की भाँति परवश होकर भ्रमण करता है। इसके विपरीत संयम, निवृत्ति, भक्ति और तपस्या के बल से सुखप्रद, शुभ सिद्धियों को मनुष्य प्राप्त करते हैं ॥९२-९४॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वभाग के द्वितीयपाद में साठवां अध्याय समाप्त ॥६०॥

अध्याय ६१

सनत्कुमार बोले - शोक नाश के लिये शान्तिप्रद, शुभ, शोक-विनाशक शास्त्र का अध्ययन या श्रवण करने से ज्ञान और ज्ञान से सुख की प्राप्ति होती है ॥१॥ प्रति दिन मूढ़ मानव सैकड़ों प्रकार के दुःख और सुखों

५२६ एकषष्टितमोऽध्यायः अनिष्टसंप्रयोगाच्च विप्रयोगात्प्रियस्य च । मनुष्या मान सैर्दुःखैर्युज्यन्ते येऽल्पबुद्धयः ॥३॥ द्रव्येषु समतीतेषु ये गुणास्तान्न चिंतयेत् । ताननाद्रियमाणश्च स्नेहबन्धाद्विमुच्यते ॥४॥ दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र रागः प्रवर्त्तते । अनिष्टबुद्धितां यच्छेत्ततः क्षिप्रं विरज्यते ॥५॥ नार्थो न धर्मो न यशो योऽतीतमनुशोचति । अस्याभावेन युज्येत तच्चास्य तु निवर्तते ॥६॥ गुणैर्भूतानि युज्यंते तथैव च न युज्यते । सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ॥७॥ मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति । दुःखेन लभते दुःखं महानर्थे प्रपद्यते ॥८॥ दुःखोपघाते शारीरे मानसे चाप्युपस्थिते । यस्मिन्न शक्यते कर्तुं यत्नस्तन्नानुचिंतयेत् ॥६॥ भेषज्यमेतद्दुःखस्य यदेतन्नानुचिंतयेत् । चिंत्यमानं हि न व्येति भूयश्चाभिव्रवर्द्धते ॥१०॥ प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः । एतद्विज्ञाय सामर्थ्यं न वान्यैः समतामियात् ॥११॥ अनित्यं जीवितं रूपं यौवनं द्रव्यसञ्चयः । आरोग्यं प्रियसंवासं न गृध्येत्पंडितः क्वचित् ॥१२॥ नाज्ञानप्रभवं दुःखमेकं शोचितुमर्हति । अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥१३॥ सुखात्प्रियतरं दुःखं जीविते नात्र संशयः । जरामरणदुःखैभ्यः प्रियमात्मानमुद्धरेत् ॥१४॥ मजंति हि शरीराणि रोगाः शारीरमानसाः । सायका इव तीक्ष्णाग्राः प्रयुक्ता दृढधन्विभिः ॥१५॥ व्याधितस्य चिकित्साभिस्त्रस्यतो जीवितेषिणः । आमयस्य विनाशाय शरीरमनुकृष्यते ॥१६॥ में फंसता है परन्तु पंडित नहीं ॥२॥ अवांछित वस्तु के संयोग और प्रिय वस्तु के वियोग से अल्प बुद्धि मनुष्यों को मानसिक कष्ट प्राप्त होता है ॥३॥ अतीत वस्तुओं के गुणों का चिन्तन नहीं करना चाहिए । ऐसी वस्तुओं और उनके गुणों की चिन्ता न करने वाला व्यक्ति स्नेह-बन्धन (आसक्ति) से मुक्त हो जाता है ॥४॥ जिस विषय की ओर अनुरक्ति हो उस विषय के दोषों को ही देखना चाहिए । इस प्रकार उसको अपना अनिष्टकारक समझने से मनुष्यों को उस विषय से विराग हो जाता है ॥५॥ जो अतीत विषयों का चिन्तन करता है उससे न तो उसका कुछ प्रयोजन ही सिद्ध होता है और न धर्म या यश ही मिलता है। जो इस भाव से विचार करता है, वह कष्टों से निवृत्त हो जाता है ॥६॥ प्राणी कभी विषय-गुणों में आसक्त होते हैं और कभी उससे विरक्त क्योंकि सब पदार्थ एक ही व्यक्ति के लिये शोक के कारण नहीं होते हैं। ॥७॥ जो मृत, नष्ट अथवा बीती हुई घटनाओं के लिए शोक करता है, वह अपनी इस दुःखजनक प्रवृत्ति के कारण दुःख पाता है और महान् अनर्थों के जाल में फंस जाता है ॥८॥ यदि शारीरिक या मानसिक दुःख में पड़ जाने पर उस दुःख को दूर नहीं किया जा सकता तो फिर उसके विषय में कुछ शोक करना ही व्यर्थ है ॥९॥ दुःख दूर करने की सबसे बड़ी ओषधि यह है कि उसकी चिन्ता ही न करे, क्योंकि चिन्ता करने से दुःख बढ़ते ही हैं, घटते नहीं ॥१०॥ प्रज्ञा से मानस रोगों को और ओषधि से शरीर के रोगों को नष्ट करना चाहिए, इस सिद्धान्त को समझकर अपनी शक्ति से दुःखों को नष्ट करना चाहिए, इसके अतिरिक्त अन्य साधनों को अपनाने से समभाव को प्राप्ति नहीं होती ॥११॥ कभी और कहीं पर भी पंडित जीवन, रूप, यौवन, धन-संग्रह, आरोग्य, प्रिय साहचर्य आदि अनित्य वस्तुओं की इच्छा न करे ॥१२॥ अज्ञान के कारण उत्पन्न होने वाले एक दुःख की भी चिन्ता करना उचित नहीं, क्योंकि यदि मनुष्य किसी प्रकार की चिन्ता न कर उसके मूल कारणों पर विचार करे तो वह अवश्य उन दुःखों को दूर कर सकता है ॥१३॥ इस जीवन में निस्सन्देह सुख की अपेक्षा दुःख ही अधिक होता है। इसलिये बुढ़ापा, मृत्यु और दुःखों से अपने प्रिय आत्मा का उद्धार करना चाहिए ॥१४॥ वीर धनुर्धारी के फेंके हुए नुकीले बाणों की भाँति शारीरिक और मानसिक रोग मनुष्य के शरीर और मन में प्रवेश कर जाते हैं ॥१५॥ चिकित्साओं से भयभीत तथा जीने के इच्छुक रोगी के रोग को दूर करने में उसके शरीर का ही नाश होता है ॥१६॥ परन्तु वस्तुतः नदी की धारा ६७ ना० पु०

५३० नारदीयपुराणम् त्रंसंति न निवर्तंते स्रोतांसि सरितामिव । आयुरादाय मर्त्यानां राज्यहानिः पुनःपुनः ॥१७॥ अपयंत्ययमप्यंतं पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः । जातं मत्यं जरयति निमिषं नावतिष्ठते ॥१८॥ सुखदुःखामिभूतानामजरो जरयत्यसून् । आदित्यो ह्यस्तमभ्येति पुनःपुनरुदेति च ॥१९॥ अदृष्टपूर्वानादाय भावा नपरिशंकितान् । इष्टानिष्टा मनुष्याणां मतं गच्छन्ति रात्रयः ॥२०॥ यो यदिच्छेद्यथाकामं कामानां तत्तदाप्नुयात् । यदि स्यान्न पराधीनं पुरुषस्य क्रियाफलम् ॥२१॥ संयताश्चैव दक्षाश्च मतिमंतश्च मानवाः । दृश्यंते निष्फलाः संतः प्रहीनाश्च स्वकर्मभिः ॥२२॥ अपरे निष्फलाः संतो निर्गुणाः पुरुषाधमाः । आशाभिरप्यसंयुक्ता दृश्यन्ते सर्वकामिनः ॥२३॥ भूतानामपरः कश्चिद्धिंसाया सततोत्थितः । वंचनायां च लोकेषु ससुखेष्वेव जीर्यते ॥२४॥ अचेष्टमानमासीनं श्रीः कंचिदुपतिष्ठति । कश्चित्कर्माणि कुरुते न प्राप्यमधिगच्छति ॥२५॥ प्रारब्धानि समाचक्षु पुरुष्य प्रधानतः । शुक्रमन्यत्र संभूतं पुनरन्यत्र गच्छति ॥२६॥ तस्य योनौ प्रसक्तस्य गर्भो भवति मानवः । आम्रपुष्पोपमा यस्य निवृत्तिरुपलभ्यते ॥२७॥ केषांचित्पुत्रकामानामनुसन्तानमिच्छताम् । सिद्धौ प्रयतमानानां नैवांडमुपजायते ॥२८॥ गर्भादुद्विजमानानां क्रुद्धादाशीविषादिव । आयुष्मान् जायते पुत्रः कथं प्रेतः पितेव सः ॥२९॥ देवानिष्ट्वा तपस्तप्त्वा कृपणेः पुत्रहेतुभिः । दशमासान्परिवृता जायन्ते कुलपांसनाः ॥३०॥


की भाँति रात और दिन मनुष्य की आयु को लेकर भागते ही जाते हैं और पीछे नहीं लौटते ॥१७॥ समय शुक्ल और कृष्ण पक्ष के रूप में दूर होता जाता है और जन्मे हुए मनुष्य को बूढ़ा बना देता है । वह एक क्षण भी रुकता नहीं ॥१८॥ अमर सूर्य प्रति दिन बारबार उदित होता और अस्त होता है, और सुख-दुःख से घिरे प्राणियों को बूढ़ा बना देता है ॥१९॥ अनुकूल या प्रतिकूल रात्रियां मनुष्यों के समीप आशा के विपरीत अभूत-पूर्व भाव (घटना) प्रस्तुत कर देती हैं ॥२०॥ मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार अवश्य अपने मनोरथों को प्राप्त कर लेता यदि इसके कार्यों का फल दूसरे के अधीन न होता ॥२१॥ प्रायः संयमी-मतिमान् और कर्मकुशल मानव किसी अपने कार्य का फल न पाने पर उस कार्य को छोड़ देते हैं । परन्तु दूसरे अधम और अज्ञानी मानव कर्मफल न पाने पर भी और अपनी आशाओं की असफलता होने पर भी सब प्रकार की कामनाओं के पीछे मरते हुए देखे जाते हैं ॥२२-२३॥ इस संसार में प्राणियों में तीसरे प्रकार के लोग हैं जो सर्वदा हिंसा, वंचना आदि में ही लगे रहते हैं परन्तु वे सुखपूर्वक अपने में बुढ़ापा को देखते हैं ॥२४॥ कोई किसी प्रकार की चेष्टा नहीं करता, यों ही बैठा रहता है, परन्तु लक्ष्मी स्वयं उसके पास चली आती है। फिर कोई कर्म करता हुआ भी अपने प्राप्य फल को नहीं पाता है ॥२५॥ इसमें पुरुष का प्रारब्ध ही प्रधान है। देखो, वीर्य अन्यत्र पैदा होता है और अन्यत्र जाकर संतान उत्पन्न करता है। आम्रपुष्प के समान जिसको निवृत्ति प्राप्त होती है वह कभी तो योनि में पहुँचकर गर्भ धारण करने में समर्थ होता है और कभी नहीं होता । कितने ही लोग पुत्र-पौत्र की इच्छा रखकर उसकी सिद्धि के लिए यत्न करते रहते हैं, तो भी उनके संतान नहीं होती ॥२६-२८॥ और कितने ही मनुष्य संतान को क्रोध में भरा हुआ सांप समझकर सदा उससे डरते हैं, तो भी उनके यहाँ दीर्घजीवी पुत्र उत्पन्न हो जाता है; मानो वह स्वयं किसी प्रकार परलोक से आकर प्रकट हो गया हो ॥२९॥ कितने ही गर्भ ऐसे हैं, जो पुत्र की अभिलाषा रखने वाले दीन स्त्री-पुरुषों द्वारा देवताओं की पूजा और तपस्या करके प्राप्त किये जाने हैं और दस मास तक माता के उदर में धारण किये जाने के बाद जन्म लेने पर कुलांगार निकल जाते हैं ॥३०॥

५३१ एकषष्टितमोऽध्यायः अपरे धनधान्यानि भोगांश्च पितृसंचितान् । विमलानभिजायन्ते लब्ध्वा तैरेव मङ्गलैः ॥३१॥ अन्योन्यं समभिप्रेत्य मैथुनस्य समागमे । उपद्रव इवादृष्टो योनौ गर्भः प्रपद्यते ॥३२॥ स्निग्धत्वाद्विद्रियार्थेषु मोहान्मरणमप्रियम् । परित्यजति यो दुःखं सुखमप्युभयं नरः ॥३३॥ अत्येति ब्रह्मसोऽत्यन्तं सुखमव्यश्नुते परम् । दुःखमर्था हि त्यज्यंते पालने च न ते सुखाः ॥३४॥ श्रुतैवै नाधिगमनं नाशमेषां न चिंतयेत् । अन्यामन्यां धनावस्थां प्राप्य वैशेषिका नराः ॥३५॥ अतृप्ता यांति विध्वंसं सन्तोषं यांति पंडिताः । सर्वे क्षयांता निचयाः पतनांताः समुच्छ्रयाः ॥३६॥ संयोगा विप्रयोगांता मरणांतं हि जीवितम् । अन्तो नास्ति पिपासायास्तुष्टिस्तु परमं सुखम् ॥३७॥ तस्मात्संतोषमेवेह धनं शंसन्ति पंडिताः । निमेषमात्रमपि हि योऽधिगच्छन्न तिष्ठति ॥३८॥ सशरीरेऽवनित्येषु नित्यं किमनुचिंतयेत् । भूतेषु भावं संचित्य ये बुद्ध्या तमसः परम् ॥३९॥ न शोचंन्ति गताध्वानः पश्यंति परमां गतिम् । संचिन्वन्तनेकमेवैनं कामानां वितृप्तकम् ॥४०॥ व्याघ्रपशुमिवासाद्य मृत्युरादाय गच्छति । अथाप्युपायं संपश्येद्दुःखस्यास्य विमोक्षणे ॥४१॥ अशोचन्नारभेन्नैव युक्तश्चाव्यसनी भवेत् । शब्दे स्पर्शे रसे रूपे गंधे च परमं तथा ॥४२॥

उन्हीं मांगलिक कृत्यों से प्राप्त हुए बहुत-से ऐसे पुत्र हैं, जो जन्म लेने के साथ ही पिता के संचित किये हुए अपार धन-धान्य और विपुल भोगों के अधिकारी होते हैं ॥३१॥ फिर वही जीव विषयों में आसक्त होने के कारण अप्रिय मृत्यु को प्राप्त कर किसी दम्पति के मैथुन-रत होने पर उसके गर्भ में प्रविष्ट हो जाता है ॥३२॥

जो सुख और दुःख दोनों की चिन्ता छोड़ देता है, वह अविनाशी ब्रह्म को प्राप्त होता है और परमानन्द का अनुभव करता है ॥३३॥ धन के उपार्जन में बड़ा कष्ट होता है, उसकी रक्षा में भी सुख नहीं है तथा उसके खर्च करने में भी क्लेश ही होता है, अतः धन को प्रत्येक दशा में दुःखदायक समझकर उसके नष्ट होने पर चिन्ता नहीं करनी चाहिए ॥३४॥ मनुष्य धन का संचय करते-करते पहले की अपेक्षा ऊँची स्थिति को प्राप्त करके भी कभी तृप्त नहीं होते । वे और अधिक धन कमाने की आशा लिये हुए ही मर जाते हैं, और विद्वान् पुरुष सदा सन्तुष्ट रहते हैं। संग्रह का अन्त है विनाश, सांसारिक ऐश्वर्य की उन्नति का अन्त है उस ऐश्वर्य की अवनति । संयोग का अन्त है वियोग और जीवन का अन्त है मरण । तृष्णा का कभी अन्त नहीं होता । सन्तोष ही परम सुख है ॥३५-३७॥ अतः पण्डित जन इस लोक में सन्तोष को ही उत्तम धन कहते हैं। आयु निरन्तर बीती जा रही है। वह पल भर भी विश्राम नहीं लेती। जब अपना शरीर ही अनित्य है, तब इस संसार की दूसरी किस वस्तु को नित्य समझा जाय ? ॥३८॥ जो मनुष्य सब प्राणियों के भीतर मन से परे परमात्मा की स्थिति मानकर उन्हीं का चिन्तन करते हैं, वे संसार यात्रा समाप्त होने पर परमपद का साक्षात्कार करते हुए शोक के पार हो जाते हैं ॥३९-४०॥

जैसे वन में नई-नई घास की खोज में विचरते हुए अतृप्त पशु को सहसा व्याघ्र आकर दबोच लेता है; उसी प्रकार भोगों की खोज में लगे हुए अतृप्त मनुष्य को मृत्यु उठा ले जाती है । इसलिए छुटकारा पाने का उपाय अवश्य सोचना चाहिए ॥४१॥ जो शोक छोड़कर साधन आरंभ करता है और किसी व्यसन में आसक्त नहीं होता, उसकी मुक्ति हो जाती है। धनी हो या निर्धन, सबको उपभोगकाल में ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और उत्तम गन्ध आदि विषयों में किञ्चित् सुख का अनुभव होता है। उपभोग के पश्चात् उनमें कुछ नहीं रहता

५३२ नारदीयपुराणम्

नोपभोगात्परं किंचिद्धनिनो वाऽधनस्य वा । प्राक्सं प्रयोगाद्भूतानां नास्ति दुःखमनामयम् ॥४३॥ विप्रयोगश्च सर्वस्य न वाचा न च विद्यया । प्रणयं परिसंहृत्य संस्तुतेष्वितरेषु च ॥४४॥ विचरेदसमुन्नद्ध स सुखी स च पंडितः । अध्यात्मगतमालीनो निरपेक्षो निरामिषः ॥४५॥ आत्मनैव सहायेन यश्चरेत्स सुखी भवेत् । सुखदुःखविपर्यासो यदा समुपपद्यते ॥४६॥ चैनं प्रज्ञा सुनियतं त्रायते नापि पौरुषम् । स्वभावाद्यस्तमातिष्ठेद्यत्नवान्नावसीदति ॥४७॥ उपद्रव इवानिष्टो योनि गर्भः प्रपद्यते । तानि पूर्वशरीराणि नित्यमेकं शरीरिणम् ॥४८॥ प्राणिनां प्राणसंरोधे मांसश्लेष्मविचेष्टितम् । निर्दग्धं परदेहेन परदेहं बलाबलम् ॥४९॥ विनश्यति विनाशांते नावि नावमिवाचलाम् । संगत्या जठरे न्यस्तं रेतोविंदुमचेतनम् ॥५०॥ केन यत्नेन जीवंतं गर्भं त्वमिह पश्यसि । अन्नपानानि जीर्यंते यत्र भक्ष्याश्च भक्षिताः ॥५१॥ तस्मिन्नेवोदरे गर्भः किं नान्नभिव जीर्यति । गर्भे मूत्रपुरीषाणां स्वभावनियता गतिः ॥५२॥ धारणे वा विसर्गं च न कर्तुं विद्यतेऽवशः । प्रभवंत्युदरे गर्भा जायमानास्तथापरे ॥५३॥ आगमेन सहान्येषां विनाश उपपद्यते । एतस्माद्योनिसंबंधाद्यो जीवनपरिमुच्यते ॥५४॥ पूजां न लभते कांचिद्द्वन्द्वेषु मज्जति । गर्भस्थ सह जातस्य सप्तमीमीदृशों दशाम् ॥५५॥ प्राप्नुवंति ततः पंच न भवंति शतायुषः । नाभ्युत्थाने मनुष्याणां योगाः स्युर्नात्र संशयः ॥५६॥ व्याधिभिश्च विवर्ध्यंते व्याघ्रैः क्षुद्रमृगा इव । व्याधिभिर्भक्ष्यमाणानां त्यजतां विपुलं धनम् ॥५७॥ वेदना नापकर्षन्ति यतमानाश्चिकित्सकाः । ॥५८॥


॥४२॥ प्राणियों को एक-दूसरे से संयोग होने के पहले कोई दुःख नहीं होता । जब संयोग के बाद प्रिय का वियोग होता है तभी सब को दुःख हुआ करता है । अतः परिचित और अपरिचित सभी के प्रति आसक्ति का त्याग कर निरभिमानपूर्वक जो विचरण करता है, वही सुखी और पण्डित है ॥४३-४४॥ जो अपने स्वरूप में स्थित, निरपेक्ष, निर्द्वन्द्व तथा अकेला होकर विचरण करता है, वही सुखी है ॥४५॥ जब सुख और दुःख में वैपरीत्य दिखाई पड़ता है तब न तो प्रज्ञा और न पुरुषार्थ हो उसको बचा पाता है जो स्वाभाविक रूप से सुख-दुःख का उपभोग करता है तथा प्रयत्नशील रहता है, वह दुःखी नहीं होता ॥४६-४७॥ शरीर छूटने पर वही फिर दूसरे प्राणी के गर्भ में प्रवेश करता है । तब उसको पूर्व शरीर का स्मरण नहीं रहता है । पुनः प्राण वायु के अवरुद्ध हो जाने पर मांस, कफ आदि से युक्त इस शरीर को जला दिया जाता है । विनाश के बाद फिर यह जीव किसी स्त्री-पुरुष के समागम द्वारा अचेतन शुक्र-बिन्दु के रूप में उदर में पहुँचा दिया जाता है तथा वहां वह उसी प्रकार अचल हो जाता है, जैसे एक अचल नाव में बंधी हुई दूसरी नाव ॥४८-५०॥ गर्भ में वह कैसे जीवन धारण कर लेता है? जब उदर में अन्न, पान तथा भक्षित सभी पदार्थ जीर्ण हो जाते हैं तब यह गर्भ अन्न की ही तरह क्यों नहीं जीर्ण होता है ? ॥५१॥ गर्भ में मूत्र और विष्ठा की गति स्वाभाविक है । उनके धारण और त्याग करने में कोई स्वतन्त्र नहीं हो सकता ॥५२॥ कुछ गर्भ उदर में रहते हैं और कुछ उत्पन्न होते हैं जो आगमन के साथ ही विनाश भो लिये रहते हैं ॥५३॥ जो व्यक्ति इस योनि-से मुक्त हो जाता है, वह किसी प्रकार की प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त करता है, वह पुनः (सुख दुःख आदि) द्वन्द्वों में निमग्न हो जाता है ॥५४॥ गर्भ से निकलने पर जीव १२५ वर्ष की परमायु प्राप्त करता है । मनुष्यों के उत्थान में योग उतने साधक नहीं होंगे जितना ज्ञानमार्ग, यह निश्चित है। जिस प्रकार बाघ क्षुद्र जीवों का वध कर देता है उसी प्रकार रोग व्याधि उन मनुष्यों को पीड़ित कर देते हैं ॥५५-५६॥ मनुष्यों के रोगी हो जाने पर अत्यधिक धन खर्च करने पर भी उनकी वेदना को चिकित्सक प्रयत्न करने पर दूर नहीं कर पाते हैं ॥५७-५८॥ यहाँ तक कि

एकषष्टितमोऽध्यायः ५३३ ते चापि विविधा वैद्याः कुशला संमतौषधाः । व्याधिभिः परिकृष्यंते मृगा व्याघ्रै रिवादिताः ॥५९॥ ते पिबंति कषायांश्च सर्पींषि विविधानि च । दृश्यंते जरया भग्ना नागैर्नागा इवोत्समाः ॥६०॥ कैर्वा भुवि चिकित्स्यंते रोगार्ता मृगपक्षिणः । श्वापदाश्च दरिद्राश्च प्रायो नार्ता भवंति ते ॥६१॥ घोरानपि दुराधर्षान्नृपतीनुग्रतेजसः । आक्रम्य रोग आदत्ते पशून्पशुपचो यथा ॥६२॥ इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् । स्रोतसा महता क्षिप्र ह्रियमाणं बलीयसा ॥६३॥ न धनेन न राज्येन नोग्रेण तपसा तथा । स्वभावा ह्यतिवर्तन्ते ये निर्मुक्ताः शरीरिषु ॥६४॥ उपर्युपरि लोकस्य सर्वो भवितुमिच्छति । यतते च यथाशक्ति न च तद्वर्तते तथा ॥६५॥ न म्रियेरन्नजीर्येरन्सर्वे स्युः सार्वकामिकाः । नाप्रियं प्रतिपद्येरन्नुत्थानस्य फलं प्रति ॥६६॥ ऐश्वर्यमदमत्ताश्च मानान्मथमदेन च । अप्रमत्ताः शठाः क्रूरा विक्रांताः पर्युपासते ॥६७॥ शोकाः प्रतिनिवर्तंते केषांचिदसमीक्षताम् । स्वं स्वं च पुनरन्येषां न कंचिदतिगच्छति ॥६८॥ महच्च फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसंधिषु । वहंति शिविकामन्ये यांत्यन्ये शिविकारुहाः ॥६९॥ सर्वैषामृद्धिकामानामन्ये रथपुरःसराः । मनुजाश्च गतश्रीकाः शतशो विविधाः स्त्रियः ॥७०॥ द्वंद्वा रामेषु भूतेषु गच्छन्त्येकैकशो नराः । इदमन्यत्परं पश्य नात्र मोहं करिष्यसि ॥७१॥ धर्मं चापि त्यजाधर्मं त्यज सत्यानृतां धियम् । सर्वं त्यक्त्वा स्वरूपस्थः सुखी भव निरामयः ॥७२॥

वे वैद्य भी जो ओषधि प्रयोग में अत्यन्त कुशल होते हैं—रोगों के उसी प्रकार शिकार बन जाते हैं जिस प्रकार मृग बाघ के शिकार बनते हैं । वे विभिन्न प्रकार की कसैली ओषधियाँ, घी आदि पीते हैं परन्तु बुढ़ापे के द्वारा उसी प्रकार मरोड़ दिये जाते हैं जिस प्रकार बली हाथी निर्बल हाथी को मरोड़ देता है ॥५९-६०॥ इस लोक में रोगपीड़ित मृग, पक्षी, कुत्ते आदि हिंसक जीव और दरिद्रों की कौन चिकित्सा करता है, परन्तु वे दुःखी नहीं होते ॥६१॥ घोर, प्रचण्ड तेजस्वी राजाओं पर भी रोग आक्रमण कर (उन्हें) इस प्रकार मार डालते हैं जिस प्रकार बधिक पशुओं को ॥६२॥ इस प्रकार मोह-शोक से व्याप्त, अपने शीघ्रगामी, शक्तिशाली प्रवाह में हठात् सब को बहा ले जाने वाले और पार न पाने योग्य संसार से कोई धन, राज्य या उग्र तपस्या के द्वारा पार नहीं जा सकता; परन्तु जो मुक्त पुरुष हैं वे सहज ही में उसको पार कर जाते हैं ॥६३-६४॥ सभी इस संसार में अपने को सर्वोपरि बनाने के लिये इच्छुक रहते हैं और यथाशक्ति प्रयत्न भी करते हैं, परन्तु वे उस स्थिति में पहुँच नहीं पाते ॥६५॥ सब अपनी मृत्यु और बुढ़ापे की संभावना नहीं करते, वे अपने को अमर और चिर युवक समझ कर सब प्रकार की इच्छायें करते रहते हैं और अपने प्रारम्भ किये हुए कर्म फल के प्रति अप्रिय भावना नहीं रखते ॥६६॥ जो ऐश्वर्य के मद से मत्त, गर्वी, प्रमादी, शठ, क्रूर और पराक्रमी पुरुष कर्म की उपासना करते हैं, उन्हें शोक प्राप्त होते हैं; किन्तु ज्ञानमार्गियों को शोक नहीं होते फिर इस लोक में कर्म संधियों (अर्थात् कर्म के मार्गों) में फल के विषयों में बहुत बड़ी विषमता देखी जाती है। कोई तो पालकी को कन्धे पर रखकर ढोता है और कोई उस पर चढ़कर चलता है ॥६७-६९॥ विभव चाहने वाले सब पुरुषों में कोई-कोई तो रथ आदि पर चढ़ कर चलते हैं और अधिक संख्या में दरिद्र होते हैं, इसी प्रकार अधिकांश स्त्रियों की भी यही दशा है ॥७०॥ प्रायः प्राणी सुख-दुःख के चक्कर में एक-एक कर के पड़ ही जाते हैं। तुम इनसे अतिरिक्त विषयों को ही देखो अर्थात् सुखःदुख की भावना से अपने को ऊपर उठाओ । इस प्रकार तुम मोह में नहीं पड़ोगे ॥७१॥ तुम धर्म, अधर्म, सत्य और असत्य की भावना को छोड़ो इस प्रकार सब प्रकार को द्वन्द्व भावना का परित्याग कर अपने स्वरूप

५६४ नारदीयपुराणम् एतत्ते परमं गुह्यमाख्यातम्ऋषिसत्तम । येन देवाः परित्यज्य मर्त्यलोकं दिवं गताः ॥७३॥ सनंदन उवाच इत्युक्त्वा व्यासतनयं समापृच्छ्य महामुनिः । सनत्कुमारः प्रययौ पूजितस्तेन सादरम् ॥७४॥ शुकोऽपि योगिनां श्रेष्ठः सम्यग्ज्ञात्वा ह्यवस्थितिम् । ब्रह्मणः पदमन्वेष्टुमुत्सुकः पितरं ययौ ॥७५॥ ततः पित्रा समागम्य प्रणम्य च महामुनिः । शुकः प्रदक्षिणीकृत्य ययौ कैलाशपर्वतम् ॥७६॥ व्यासस्तद्विरहाद्दनः पुत्रस्नेहसमावृतः । क्षणैकं स्थीयतां पुत्र इति चुक्रोश दुर्मनाः ॥७७॥ निरपेक्षः शुको भूत्वा निःस्नेहो मुक्तबन्धनः । मोक्षमेवानुसंचिन्त्य गत एव परं पदम् ॥७८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे एकषष्टितमोऽध्यायः ॥६१॥

अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः सूत उवाच एतच्छ्रुत्वा तु वचनं नारदो भगवानृषिः । पुनः पप्रच्छ तं विप्र शुकाभिगमनं मुनिम् ॥१॥

में स्थित हो सुखी और निर्द्वन्द्व हो जाओ ॥७२॥ ऋषिवर ! इस परमगुप्त आख्यान को मैंने तुमसे कह दिया जिसके प्रभाव से देवताओं ने इस मृत्युलोक को छोड़कर स्वर्ग में स्थान प्राप्त किया ॥७३॥ सनन्दन जी बोले--महामुनि ब्रह्मतनय ने व्यासपुत्र के पूछे हुए प्रश्नों का इस प्रकार उत्तर देकर उनसे आदर पूर्वक पूजित होने के पश्चात् अपने स्थान को चले गए ॥७४॥ योगिवर शुक भी लोकस्थिति का भली भांति ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्मपद को ढूंढ़ने के लिये उत्सुक हो अपने पिता के पास गये ॥७५॥ महामुनि शुक पिता से मिलकर प्रदक्षिणापूर्वक उन्हें प्रणाम करके कैलाश पर्वत को चले गये ॥७६॥ व्यास जी पुत्र विरह से व्याकुल होकर पुत्र स्नेह के कारण दुःखी हो गए और पुत्र ! एक क्षण भी तो ठहरो, कह कर चिल्ला पड़े ॥७७॥ परन्तु शुक ने निरपेक्ष और निर्मोही होकर सारे सांसारिक बन्धनों को छिन्न-भिन्न करके मोक्ष की ही चिन्ता करते हुए परमपद प्राप्त कर लिया ॥७८॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग के द्वितीय पाद में इकसठवां अध्याय समाप्त ॥६१॥

अध्याय ६२ मोक्ष-धर्म का निरूपण सूत ने कहा--भगवान् नारद ऋषि ने इतने आख्यान को सुन लेने के बाद फिर शुकदेव जी को ही लक्ष्य करके मुनि से पूछा ॥१॥

द्विषष्टितमोऽध्यायः ५३५ नारद उवाच भगवन्सर्वमाख्यातं त्वयाऽतिकरुणात्मना । यच्छ्रुत्वा मानसं मेऽद्य शांतिमग्र्यामुपागतम् ॥२॥ पुनश्च मोक्षशास्त्रं मे त्वमादिश महामुने । नहि सम्पूर्णतामेति तृष्णा कृष्णगुणार्णवे ॥३॥ ये तु संसारनिर्मुक्ता मोक्षशास्त्रपरायणाः । कुत्र ते निवसंतीह संशयो मे महानयम् ॥ तं छिन्धि सुमहाभाग त्वत्तो नान्यो विदांवरः । ॥४॥ सनंदन उवाच ॥५॥ धारयामास चात्मानं यथाशास्त्रं महामुनिः । पादात्प्रभृति गात्रेषु क्रमेण क्रमयोगवित् । ततः स प्राङ्मुखो विद्वानादित्येन विरोचिते ॥६॥ पाणिपादं समाधाय विनीतवदुपाविशत् । न तत्र पक्षिसंघातो न शब्दो न च दर्शनम् ॥७॥ यत्र वैयासकिर्द्धाग्नि योक्तुं समुपचक्रमे । स ददर्श तदात्मानं सर्वसंगविनिःसृतः ॥८॥ प्रजहास ततो हासं शुकः सम्प्रेक्ष्य भास्करम् । स पुनर्योगमास्थाय मोक्षमार्गोपलब्धये ॥९॥ महायोगेश्वरो भूत्वा सोऽत्यक्रामद्विहायसम् । अंतरिक्षचरः श्रीमान्व्यासपुत्रः सुनिश्चितः ॥१०॥ तमुद्यंतं द्विजश्रेष्ठं वैनतेयसमद्युतिम् । ददृशुः सर्वभूतानि मनोमारुतरंहसम् ॥११॥ यथाशक्ति यथान्यायं पूजयांचक्रिरे तथा । पुष्पवर्षैश्च दिव्यैस्तमवचक्रु र्दिवौकसः ॥१२॥ तं दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे गंधर्वाप्सरसां गणाः । ऋषयश्चैव संसिद्धाः कोऽयं सिद्धिमूपागतः ॥१३॥ नारद बोले—अत्यन्त करुण हृदय आपने उन सब रहस्यों को बता दिया जिसको सुनकर आज मेरे मन ने अत्यन्त श्रेष्ठ शान्ति प्राप्त की ॥२॥ मुने ! अब आप पुनः मोक्ष शास्त्र के विषय में मुझको कुछ उपदेश दीजिए । मेरी पुण्य श्रवण की तृष्णा कृष्ण गुण गान रूपी सागर में निमग्न होकर भी शान्त नहीं हो रही है ॥३॥ जो संसार से मुक्त और मोक्षशास्त्र के पारगामी विद्वान् हैं वे इस लोक में कहाँ निवास करते हैं, यह मुझे बहुत बड़ा सन्देह है । महाभाग ! आप इस सन्देह को दूर कीजिये क्योंकि आपसे बढ़कर ज्ञानी इस लोक में अन्य कौन है ? ॥४॥॥ सनन्दन बोले-उस क्रमयोग को जानने वाले महामुनि ने शास्त्रानुसार पैर से लेकर सर्वाङ्ग तक धारणा (मन्त्रों द्वारा अंग स्पर्श) की । तदनन्तर वह विद्वान् पूर्वाभिमुख होकर सूर्य की किरणों से शोभित स्थान पर हाथ और पैर जोड़कर विनीत मुद्रा में बैठ गया ॥५-६३॥ व्यासपुत्र शुक जिस स्थान पर योग साधना के लिए आसीन हुए वहाँ न तो पक्षियों का कलरव होता था और न किसी प्रकार का शब्द सुनाई पड़ता था । यहाँ तक कि किसी अन्य प्राणी का दर्शन तक दुर्लभ था । वहाँ पर उन्होंने अपने को सब प्रकार के संग से मुक्त देखा ॥७-८॥ उस समय सूर्य देव को देख कर वे हंस पड़े और पुनः मोक्ष मार्ग को पाने के लिये योगस्थ हो कर आकाश में उड़ने लगे । श्रीमान् व्यासपुत्र निश्चित रूप से अन्तरिक्षचारी हो गए ॥९-१०॥ उस गरुड़ के समान द्युति वाले, मन और वायु के समान तीव्र गति वाले द्विजवर को सब लोगों ने देखा और अपनी शक्ति के अनुसार यथोचित पूजा की । देवताओं ने भी स्वर्गीय पुष्पों की वर्षा कर उनका सत्कार किया ॥११-१२॥ उनको इस प्रकार लोकपूजित देखकर सब गन्धर्व, अप्सरोगण, ऋषि और सिद्ध विस्मित हो कहने लगे कि यह कौन महापुरुष

५३६ नारदीयपुराणम्

ततोऽसौ स्वाह्वयं तेभ्यः कथयामास नारद । उवाच च महातेजास्तानृषीन्संप्रहर्षितः ॥१४॥ पिता यद्यनुगच्छन्मां क्रोशमानः शुकेति वै । तस्मै प्रतिवचो देयं भवद्भिस्तु समाहितैः ॥१५॥ बाढमुक्तस्ततस्तैस्तु लोकान्हित्वा चतुर्विधाम् । तमो ह्यष्टविधं त्यक्त्वा जहौ पञ्चविधं रजः ॥१६॥ ततः सत्त्वं जहौ धीमांस्तदद्भुतमिवाभवत् । ततस्तस्मिन्पदे नित्ये निर्गुणे लिगपूजिते ॥१७॥ ततः स भृङ्गेऽप्रतिमे हिमवन्मेरुसन्निभे । संश्लिष्टे श्वेतपीते च रुक्मरूप्यमये शुभे ॥१८॥ शतयोजनविस्तारे तिर्यगूर्ध्वंच नारद । सोऽविशंकेन मनसा तथैवाभ्यपतच्छुकः ॥१९॥ ते शृङ्गेऽत्यंतसंश्लिष्टे सहसैव द्विधाकृते । अदृश्येत द्विजश्रेष्ठ तदद्भुतमिवाभवत् ॥२०॥ ततः पर्वतशृंगाभ्यां सहसैव विनिःसृतः । न च प्रतिजघानास्य स गतिं पर्वतोत्तमः ॥२१॥ ततो मंदाकिनीं दिव्यामूपरिष्टादभिव्रजन् । शुको ददर्श धर्मात्मा पुष्पितद्रुमकाननम् ॥२२॥ तस्यां क्रीडासु निरताः स्नांति चैवाप्सरोगणाः । निराकारं तु साकारा ददृशुस्तं विवाससः ॥२३॥ तं प्रक्रमंतमाज्ञाय पिता स्नेहसमन्वितः । उत्तमां गतिमास्थाय पृष्ठतोऽनुससार ह ॥२४॥ शुकस्तु मारुतादूर्ध्वं गतिं कृत्वाऽन्तरिक्षगाम् । दर्शयित्वा प्रभावं स्वं सर्वभूतोऽभवत्तदा ॥२५॥ अथ योगगतिं व्यासः समास्थाय महातपाः । निमेषांतरमात्रेण शुकाभिपतनं ययौ ॥२६॥ स ददर्श द्विधा कृत्वा पर्वताग्रं गतं शुकम् । शशंसुर्मुनयः सिद्धा गतिं तस्मै सुतस्य ताम् ॥२७॥ ततः शुकेतिशब्देन दीर्घेण क्रंदितं तदा । स्वयं पित्रा स्वरेणोच्चैस्त्रैलोकाननुनाद्य वै ॥२८॥

है, जिसने सिद्धि प्राप्त कर ली है ॥१३॥ नारद ! तदनन्तर उस महातेजस्वी ने अपना नाम बताया और प्रसन्न होकर ऋषियों से कहा कि यदि मेरे पिता जो शुक ! शुक ! चिल्लाते हुए मेरी खोज में इधर आयें तो आप लोग सावधानी से उत्तर देने की कृपा करें ॥१४-१५॥ उन लोगों का स्वीकारात्मक उत्तर पाकर वे चार प्रकार के लोकों और आठ प्रकार के अन्धकार का त्याग कर पांच प्रकार के रजोगुण से भी मुक्ति प्राप्त कर ली ॥१६॥ तत्पश्चात् जब उस धीमान् ने सत्त्वगुण का भी परित्याग किया तब तो वहाँ एक अद्भुत सी घटना हो गई। उस समय वे उस नित्य, निर्गुण और शिव लिंग पूजित, सशृंग, प्रतिमामय और मेरु के समान प्रकाशित, एक में एक गुथे हुए, श्वेत पीतवर्ण वाले, शुभ, सुनहले और रुपहले, ऊर्ध्व और तिरछे, सौ योजन विस्तृत लोक में निःशंक मन से उतरे ॥१७-१९॥ द्विजश्रेष्ठ ! वहाँ पर अत्यन्त एक में सटे हुए और सहसा दो भागों में विभक्त दो शिखर दिखाई दिये । यह एक अद्भुत सी घटना हुई ॥२०॥ उन पर्वत शृंगों से भी वे सहसा आगे बढ़ गए परन्तु उनकी प्रतिज्ञा के कारण वह पर्वतोत्तम उनकी (शुक की) गति को न बाधित कर सका ॥२१॥ वहाँ से आकाश मार्ग से आगे बढ़कर दिव्य मन्दाकिनी को उस धर्मात्मा ने देखा जिसके तट पर एक अत्यन्त खिले हुए फूलों से सुशोभित कानन को देखा । उस देव नदी में कितनी ही अप्सरायें जलकेलि में मग्न होकर नहा रही थीं। उन वस्त्ररहित होकर नहाने वाली साकार अप्सराओं ने उस निर्गुण शुक को देखा । ॥२२-२३॥ उसी समय पुत्र को इस प्रकार की गतिविधि को जानकर व्यास जी पुत्र स्नेह से व्याकुल होकर उत्तम गति प्राप्तकर शुक जी के पीछे-पीछे चले ॥२४॥ यह देखकर शुक देव अपनी उस अन्तरिक्षगामी गति को वायु से तीव्रतर बनाकर सर्वभूत मय हो गए और अपने प्रभाव की व्यापकता को दिखलाने लगे । महात्मा व्यास भी योग क्रिया के बल से एक पल में ही शुक के पीछे दौड़ पड़े ॥२५-२६॥ मार्ग में व्यास ने पर्वत शिखर को दो भागों में विभक्त करके आगे जाते हुए शुक को देखा ॥२७॥ मुनियों और सिद्धों ने भी व्यास के पुत्र शुक देव की इस प्रकार की सिद्धि का वर्णन किया । तदनन्तर व्यास जी बड़े जोर से 'शुक' कह कर चिल्ला पड़े जिससे तीनों लोक भी

द्विषष्टितमोऽध्यायः ५३७ शुकः सर्वगतिर्भूत्वा सर्वात्मा सर्वतोमुखः । प्रत्यभाषत धर्मात्मा भो शब्देनानुनादयन् ॥२६॥ तत एकाक्षरं नादं भोरित्येवमुदीरयन् । प्रत्याहरज्जगत्सर्वमुच्चैः स्थावरजंगमम् ॥३०॥ ततःप्रभृति वाद्यापि शब्दानुच्चारितान्पृथक् । गिरिगह्वरपृष्ठेषु व्याजहार शुकं प्रति ॥३१॥ अंतर्हितप्रभावं तं दर्शयित्वा शुकस्तदा । गुणान्संत्यज्य सत्त्वादीन्पदमध्यगमत्परम् ॥३२॥ महिमानं तु तं दृष्ट्वा पुत्रस्यामिततेजसः । सोऽनुनीतो भगवता व्यासो रुद्रेण नारद ॥३३॥ किमु त्वं ताम्यसि मुने पुत्रं प्रति समाकुलः । पश्यसि विप्र नायांतं ब्रह्मभूतं निजांतिके ॥३४॥ इत्येवमनुनीतोऽसौ व्यासः पुनरुपाव्रजत् । स्वाश्रमं स शुको ब्रह्मभूतो लोकांश्चचार ह ॥३५॥ तत कालांतरे ब्रह्मन्व्यासः सत्यवतीसुतः । नरनारायणौ द्रष्टुं ययौ बदरिकाश्रमम् ॥३६॥ तत्र दृष्ट्वा तु तौ देवौ तप्यमानो महत्तपः । स्वयं च तत्र तपसि स्थितः शुकमनुस्मरन् ॥३७॥ यावत्तत्र स्थितो व्यासःशुकःपरमयोगवित् । श्वेतद्वीपं गतस्तात यत्र त्वमगमः पुरा ॥३८॥ तत्र दृष्टप्रभावस्तु श्रीमन्नारायणः प्रभुः । दृष्टः श्रुतिविमृग्यो हि देवदेवो जनार्दनः ॥३६॥ स्तुतश्च शुकदेवेन प्रसन्नः प्राह नारद । त्वया दृष्टोऽस्मि योगीन्द्र सर्वदेवरहःस्थितः ॥४०॥ श्रीभगवानुवाच सनत्कुमारादिष्टेन सिद्धो योगेन वाडव । त्वं सदागतिमार्गस्थो लोकान्पश्य यथेच्छया ॥४१॥ इत्युक्तो वासुदेवेन तं नत्वारणिसंभवः । वैकुंठं प्रययौ विप्र सर्वलोकनमसकृतम् ॥४२॥ प्रतिध्वनित हो उठे । सर्वात्मा, सर्वतोमुख (चारों ओर मुख वाले) धर्मात्मा शुक ने सर्वत्र गति होकर 'भोः' शब्द का उच्चारण किया उनकी इस 'भोः' एकाक्षर ध्वनि के अनन्तर ही सारे स्थावर जंगमात्मक जगत् ने उच्च स्वर से ऐसी ही प्रतिध्वनि को ।।२८-३०।। उसी समय से आज तक शुक की ध्वनि के प्रतिध्वनि करने के कारण पर्वतों की गुफाओं में शब्द ध्वनि करने पर पृथक्-पृथक् प्रतिध्वनि निकलती है ।।३१।। उस समय अपने योग के गुप्त प्रभाव को दिखाकर शुक देव ने सत्त्व आदि गुणों का परित्याग कर परम पद को प्राप्त कर लिया ।।३२।। नारद ! अमित तेजस्वी अपने पुत्र की योग महिमा को देख कर व्यास जी आश्चर्यचकित हो गए। यह देखकर भगवान् रुद्र ने व्यास को समझाया ।।३३।। कि मुने ! तुम क्यों पुत्र स्नेह से आकुल होकर इस प्रकार खेद कर रहे हो ? विप्र ! क्या तुम अपने पुत्र को ब्रह्म रूप में अपने पास आते हुए नहीं देख रहे हो ।।३४।। इस प्रकार रुद्र से समझाये जाने पर व्यास जी पुनः अपने आश्रम को लौट आये । वह शुक देव भी ब्रह्ममय होकर लोक में विचरण करने लगे ।।३५।। कुछ समय बीत जाने पर सत्यवती-सुत व्यास जी नर नारायण का दर्शन करने के लिये बदरिकाश्रम को गए ।।३६।। वहाँ उन दोनों देवों को महान् तपस्या में लीन देखकर स्वयं व्यास भी शुक का स्मरण करते हुए वहीं पर तप करने लगे ।।३७।। तात ! जितनी देर तक व्यास जी वहाँ तपस्या करते रहे उतने समय में शुकदेव जी श्वेत द्वीप को चले गये जहाँ पर आज से बहुत पहले तुम गये थे ।।३८।। वहाँ दृष्ट प्रभाव वाले श्रुतियों के वन्द्य और उनके द्वारा खोजने योग्य देवदेव जनार्दन नारायण प्रभु ने शुकदेव को दर्शन दिये और शुकदेव की स्तुति से प्रसन्न होकर बोले ।।३९३॥ योगीन्द्र ! तुमने सब देवताओं से एकान्त में रहने वाले मेरा दर्शन प्राप्त कर लिया ।।४०।। ब्राह्मण ! तुमने सनत्कुमार द्वारा दिखाये गये योगपथ से सिद्धि भी प्राप्त कर ली। अब तुम वायु मार्ग पर स्थित होकर इच्छानुकूल लोकों का अवलोकन करो ।।४१।। वासुदेव ने अरणिसंभव शुक को इस प्रकार का वरदान दिया । विप्र ! शुक भी उन्हें प्रणाम करके सब लोकों में श्रेष्ठ वैकुण्ठ लोक में गये ।।४२।। नारद ! जो विमान विहारी ६८ ना० पु०

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५३८ नारदीयपुराणम् वैमानिकैः सुरैर्जुष्टं विरजापरिवेष्टितम् । यं भांतमनुभांत्येते लोकाः सर्वेऽपि नारद ॥४३॥ यत्र विद्रुमसोपानाः स्वर्णरत्नविचित्रिताः । वाप्य उत्पलसंछन्नाः सुरस्त्रीक्रीडनाकुलाः ॥४४॥ दिव्यैर्हंसकुलैर्घृष्टाः स्वच्छाम्बुनिभृताः सदा । तत्र द्वाःस्थैश्चतुर्हस्तैर्नानाभरणभूषितैः ॥४५॥ विष्वक्सेनानुगैः सिद्धैः कुमुदाद्यैरवारितः । प्रविश्याभ्यंतरं तत्र देवदेवं चतुर्भुजम् ॥४६॥ शांतं प्रसन्नवदनं पीतकौशेयवाससम् । शंखचक्रगदापद्ममूर्तिमद्भिरुपासितम् ॥४७॥ वक्षःस्थलस्थया लक्ष्म्या कौस्तुभेन विराजितम् । कटिसूत्रब्रह्मसूत्रकटकांगदभूषितम् ॥४८॥ भ्राजत्किरीटवलयं मणिनूपुरशोभितम् । ददर्श सिद्धनिकरैः सेव्यमानमहर्निशम् ॥४६॥ तं दृष्ट्वा भक्तिभावेन तुष्टाव मधुसूदनम् । नमस्ते वासुदेवाय सर्वलोकैकसाक्षिणे ॥५०॥ शुक उवाच जगद्बीजस्वरूपाय पूर्णाय निभृतात्मने । हरये वासुकिस्थाय श्वेतद्वीपनिवासिने ॥५१॥ हंसाय मत्स्यरूपाय वाराहतनुधारिणे । नृसिंहाय ध्रुवेज्याय सांख्ययोगेश्वराय च ॥५२॥ चतुःसनाय कूर्माय पृथवे स्वसुखात्मने । नाभेयाय जगद्धात्रे विधात्रेऽन्तकराय च ॥५३॥ भार्गवेन्द्राय रामाय राघवाय पराय च । कृष्णाय वेदकर्त्रे च बुद्धकलिकस्वरूपिणे ॥५४॥ चतुर्व्यूहाय वेद्याय ध्येयाय परमात्मने । नरनारायणाख्याय शिपिविष्टाय विष्णवे ॥५५॥ ऋतधाम्ने विधाम्ने च सुपर्णाय स्वरोचिषे । ऋषभवे सुव्रताख्याय सुधाम्ने चाजिताय च ॥५६॥ विश्वरूपाय विश्वाय सृष्टिस्थित्यंतकारिणे । यज्ञाय यज्ञभोक्त्रे च स्थविष्ठायानवेऽर्थिने ॥५७॥ आदित्यसोमनेत्राय सहस्रोजोबलाय च । ईज्याय साक्षिणेऽजाय बहुशीर्षांघ्रिबाहवे ॥५८॥ देवों द्वारा वन्दित और विरजा का प्रिय लोक है, जिसके प्रकाश से सब लोक प्रकाशित होते हैं । ॥४३॥ जहाँ की बावलियों की सीढ़ियाँ विद्रुम की बनी हैं जिनमें स्वर्ण और रत्न जड़े हुए हैं, जिनका जल देवाङ्गनाओं की जल- क्रीड़ा के कारण क्षुब्ध रहता है ॥४४॥ जो दिव्य कलहंसों के कलरव से मुखरित और निर्मल जल से सदा परि- पूर्ण रहती हैं। वहाँ जाने पर द्वार पर स्थित नाना आभूषणों से आभूषित, चतुर्भुज, विष्वक्सेन के अनुचर कुमुद आदि सिद्धों ने सम्मानपूर्वक भीतर जाने दिया । भीतर जाकर उन्होंने शान्त, प्रसन्न वदन, पीत-कौशेय-वस्त्र- धारी, मूर्तिमान् शंख चक्र गदा पद्म से सेवित, वक्षःस्थल पर स्थित लक्ष्मी और कौस्तुभ मणि से सुशोभित, कटि सूत्र, ब्रह्मसूत्र, वलय, अंगद से आभूषित, किरीट वलय और मणि के बने नूपुरों से अलङ्कृत मधुसूदन को देखा जिनकी सेवा में सिद्धगण अहर्निश लगे हुए थे । उस भगवान् को देखकर शुक ने भक्तिपूर्वक स्तुति प्रारम्भ की । ॥४५-४९॥ शुक बोले—सब लोकों के एक मात्रसाक्षी वासुदेव को नमस्कार है ॥५०॥ जगत् के बीजस्वरूप, पूर्ण, अन्तरातमा, हरि, वासुकि के ऊपर स्थित, श्वेतद्वीप-निवासी, हंस, मत्स्यरूप, वाराह शरीर धारण करने वाले नृसिंह, ध्रुव के पूज्य, सांख्य योग के ईश्वर ॥५१-५२॥ सनकादि चार रूप वाले (१) कूर्म, पृथु, आत्माराम, नाभेय, जगद्धाता, विधाता, अन्तकर, भार्गव, इन्द्र, राम, राघव, परात्पर कृष्ण, वेदव्यास, बुद्ध, कलिकरूपधारी ॥५३-५४॥ चतुर्व्यूह, वेद्य, ध्येय, परमात्मा, नर-नारायण, शिपिविष्ट, विष्णु, ऋतुधाम, विधाम, सुपर्ण, स्वयं प्रकाश, ऋषभ, सुव्रत, सुधामा, अजित ॥५५-५६॥ विश्वरूप, विश्व, सृष्टि-स्थिति-संहारकारी, यज्ञ, यज्ञभोक्ता, स्थविष्ठ, अणु अर्थी, आदित्य और सोमरूपी नेत्र वाले, साहस, ओज और बल वाले, पूज्य, साक्षी, अज, अनन्त शिव, चरण

द्विषष्टितमोऽध्यायः ५३६ श्रीशाय श्रीनिवासाय भक्तवश्याय शार्ङ्गिणे । अष्टप्रकृत्यधीशाय ब्रह्मणेऽनंतशक्तये ॥५८॥ बृहदारण्यवेद्याय हृषीकेशाय वेधसे । पुंडरीकनिभाक्षाय क्षेत्रज्ञाय विभासिने ॥६०॥ गोविन्दाय जगत्कर्त्रे जगन्नाथाय योगिने । सत्याय सत्यसंधाय वैकुंठायाच्युताय च ॥६१॥ अधोक्षजाय धर्माय वामनाय त्रिधातवे । धृतार्चिषे विष्णवे तेऽनंताय कपिलाय च ॥६२॥ विरिंचये त्रिककुदे ऋग्यजुःसामरूपिणे । एकशृंगाय च शुचिश्रवसे शास्त्रयोनये ॥६३॥ वृषाकपय ऋद्धाय प्रभवे विश्वकर्मणे । भूर्भुवःस्वःस्वरूपाय दैत्यघ्ने निर्गुणाय च ॥६४॥ निरंजनाय नित्याय ह्यव्ययायाक्षराय च । नमस्ते पाहि मामीश शरणागतवत्सल ॥६५॥ इति स्तुतःस भगवान्छंखचक्रगदाधरः । आरणेयमुवाचेदं भृशं प्रणतवत्सलः ॥६६॥ व्यासपुत्र महाभाग प्रीतोऽस्मि तव सुव्रत । विद्यामाप्नुहि भक्तिं च ज्ञानी त्वं मम रूपधृक् ॥६७॥ श्रीभगवानुवाच यद्रूपं मम दृष्टं प्राक् श्वेतद्वीपे त्वया द्विज । सोऽहमेवावतारार्थं स्थितो विश्वंभरात्मकः ॥६८॥ सिद्धोऽसि त्वं महाभाग मोक्षधर्मानुचिंतया । वरलोकान्यथा वायुर्यथा खं सविता तथा ॥६९॥ नित्यमुक्तस्वरूपस्त्वं पूज्यमानः सुरैर्नरैः । न। भक्तिर्हि दुर्लभा लोके मयि सर्वपरापणे ॥७०॥ तां लब्ध्वा नापरं किंचिल्लभध्यमवशिष्यते । आकल्पांतः तपः संस्थो नरनारायणावृषी ॥७१॥ तयोर्निदेशतो व्यासो जनकस्तव सुव्रतः । कर्ता भागवतं शास्त्रं तवधीष्व भुवं व्रज ॥७२॥ स तप्यति तपस्त्वद्य पर्वते गंधमादने । त्वद्वियोगेन खिन्नात्मा तं प्रसादय मत्प्रियम् ॥७३॥ और बाहु वाले ॥५७-५८॥ श्रीश, श्रीनिवास, भक्तवश्य, शाङ्ग धारी, अष्ट प्रकृति के अधीश, ब्रह्मा, अनन्त शक्ति, बृहदारण्य के द्वारा जानने योग्य, हृषीकेश, बेधा, पुण्डरीक के समान नेत्र वाले, क्षेत्रज्ञ, विशिष्ट कान्ति वाले ॥५९- ६०॥ गोविन्द, जगत्कर्ता, जगन्नाथ, योगी, सत्य, सत्यप्रतिज्ञ, वैकुण्ठरूप, अच्युत, अधोक्षज, धर्म, वामन, त्रिधातु, तेज धारण करने वाले, विष्णु, अनन्त, कपिल ॥६१-६२॥ विरिंचि, त्रिककुद्, ऋग्, यजु ओर साम स्वरूप, एक शृंग (शृंगीरूप) शुचिश्रवा, शास्त्रयोनि, वृषाकपि, ऋद्ध, प्रभु, विश्वकर्मा, भूः भुवःस्वः स्वरूप, दैत्यहन्ता, निर्गुण ॥६३- ६४॥ निरञ्जन, नित्य, अव्यय और अक्षर को नमस्कार है। ईश ! शरणागत-वत्सल ! मेरी रक्षा करें ॥६५॥ शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् की इस प्रकार स्तुति करने पर अत्यन्त भक्तवत्सल भगवान् ने शुक से कहा-॥६६॥ श्री भगवान् बोले- व्यासपुत्र ! महाभाग ! सुव्रत ! तुम पर मैं प्रसन्न हूँ। ज्ञानी, तुम मेरे रूप को धारण कर विद्या और भक्ति को प्राप्त करो ॥६७॥ द्विज ! तुमने पूर्वकाल में श्वेत द्वीप में मेरे जिस रूप का दर्शन किया था, वही विश्वम्भर रूप में अवतार धारण करने के लिए स्थित हूँ ॥६८॥ महाभाग ! तुम मोक्ष धर्म की चिन्ता के द्वारा अब सिद्ध हो गए हो । जिस प्रकार वायु ने श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त किया, सविता (सूर्य) ने आकाश को उसी प्रकार सुर और नरों के पूज्य तुम भी नित्य मुक्त स्वरूप हो जाओ । ॥६९३॥ इस लोक में मुझमें सर्वात्मना लीन रहने वाले व्यक्तियों के लिए भी भक्ति दुर्लभ है। भक्ति को पा जाने पर इस लोक में दूसरी किसी भी वस्तु की कामना शेष नहीं रह जाती है अर्थात् सब पदार्थ मिल जाते हैं ॥७०३॥ ऋषि नर और नारायण कल्पान्त तक तपस्या करने के उद्देश्य से तप कर रहे हैं। उनके ही आदेश से तुम्हारे सुव्रती पिता व्यास भागवत शास्त्र का निर्माण करेंगे । भूलोक में जाओ और उसी का अध्ययन करो ॥७१-७२॥ इस समय व्यास जी गंध- मादन पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं, तुम्हारे वियोग से खिन्न, मेरे प्रिय व्यास को प्रसन्न करो । ॥७३॥ विप्र !

५४० नारदीयपुराणम् एवमुक्तः शुको विप्र नमस्कृत्य चतुर्भुजम् । यथागतं निवृत्तोऽसौ पितुरंतिकमागमत् ॥७४॥ अथ तं स्वांतिके दृष्ट्वा पाराशर्य्यः प्रतापवान् । पुत्रं प्राप्य प्रहृष्टात्मा तपसो निववर्त्त ह ॥७५॥ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । आरणेयसमायुक्तः स्वाश्रमं समुपागमत् ॥७६॥ नारायणनियोगात्तु त्वन्मुखेन मुनीश्वर । चकार संहितां दिव्यां नानाख्यानसमन्विताम् ॥७७॥ वेदतुल्यां भागवतीं हरिभक्तिविवर्द्धिनीम् । निवृत्तिनिरतं पुत्रं शुकमध्यापयच्च ताम् ॥७८॥ आत्मारामोऽपि भगवान्पाराशर्यात्मजः शुकः । अधीतवांसंहितां वै नित्यं विष्णुजनप्रियाम् ॥७९॥ एवमेते समाख्याता मोक्षधर्मास्तवानघ । पठतां शृण्वतां चापि हरिभक्तिविवर्द्धनाः ॥८०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे बृहदुपाख्याने मोक्षधर्मनिरूपणं नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥६२॥ ॥ समाप्तश्चायं द्वितीयः पादः ॥ ॥ अथ तृतीयः पादः ॥ अथ त्रिषष्टितमोऽध्यायः शौनक उवाच सूत साधो चिरंजीव सर्वशास्त्रविशारद । यत्त्वया पायिता विद्वन्वयं कृष्णकथामृतम् ॥१॥ श्रुत्वा तु मोक्षधर्मान्वै नारदो भगवत्प्रियः । सनंदनमुखोद्गीतान्किं पप्रच्छ ततः परम् ॥२॥

भगवान् विष्णु की इन बातों को सुनकर शुक ने चतुर्भुज वासुदेव को नमस्कार किया और जिस मार्ग से आये थे उसी मार्ग से लौट कर अपने पिता के समीप गये ॥७४॥ प्रतापी पराशर-पुत्र व्यास अपने पुत्र को अपने समीप देखकर प्रफुल्लित होगए और तपस्या से विरत हो गए। अनन्तर नारायण और नरोत्तम नर को नमस्कार कर अरणि-पुत्र शुक के सहित अपने आश्रम पर लौट आये ॥७५-७६॥ मुनीश्वर ! तुम्हारे द्वारा नारायण की आज्ञा प्राप्त कर व्यास ने नाना आख्यानों से युक्त, वेदतुल्य हरि भक्ति की वृद्धि या प्रचार करने वाली भागवती संहिता बनाई, और निवृत्तिप्रेमी अपने पुत्र शुक को पढ़ाया ॥७७-७८॥ पाराशर्य (व्यास)-पुत्र शुक ने आत्माराम होते हुए भी भक्तप्रिय उस संहिता का नित्य प्रति अध्ययन किया। अनघ ! इस भांति आज तुमको मोक्ष धर्म की व्याख्या सुनाई जिसके अध्ययन और श्रवण से हरि भक्ति की प्राप्ति या वृद्धि होती है । ॥७९-८०॥ श्री नारदीय महापुराण के पूर्वभाग के द्वितीयपाद में मोक्ष धर्म निरूपण नामक बासठवां अध्याय समाप्त ॥६२॥

अध्याय ६३ तृतीयपाद में पाशुपतदर्शनतत्त्व निरूपण शौनक ने कहा--सूत ! साधो ! सर्वशास्त्रविशारद ! चिरंजीवी होओ, क्योंकि हे विद्वन् ! आज तुमने हम लोगों को कृष्ण-कथामृत का पान कराया ॥१॥ सनन्दन के मुख से मोक्ष धर्म सुनने के अनन्तर भगवत्प्रिय नारद ने फिर क्या पूछा ॥२॥ ब्रह्मा के मानस पुत्र सिद्ध मुनीश्वर सनक आदि लोकोद्धार में लीन होकर लोकों में

त्रिवष्टितमोऽध्यायः ५४१ मानसा ब्रह्मणः पुत्राः सनकाद्या मुनीश्वराः । चरंति लोकान्संसिद्धा लोकोद्धरणतत्पराः ॥३॥ नारदोऽपि महाभाग नित्यं कृष्णपरायणः । तेषां समागमे भद्रा का कथा लोकपावनी ॥४॥ सूत उवाच साधु पृष्टं महाभाग त्वया लोकोपकारिणा । कथयिष्यामि तत्सर्वं यत्पृष्टं नारदर्षिणा ॥५॥ श्रुत्वा सनंदनप्रोक्तान्मोक्षधर्मान्सनातनान् । नारदो भार्गवश्रेष्ठ पुनः पप्रच्छ तान्मुनीन् ॥६॥ नारद उवाच सर्वदेवेश्वरो विष्णुर्वेदे तंत्रे च कीर्तितः । समाराध्यः स एवात्र सर्वैः सर्वार्थकांक्षिभिः ॥७॥ कैर्मंत्रैर्भगवान्विष्णुः समाराध्यो मुनीश्वराः । के देवाः पुजनीयाश्च विष्णुपादपरायणैः ॥८॥ तंत्रं भागवतं विप्रा गुरुशिष्यप्रयोजकम् । दीक्षणं प्रातराद्यं च कृत्यं स्याद्यत्तदुच्यताम् ॥९॥ यैर्मासैः कर्मभिर्यैर्वा जप्यैर्होमादिभिस्तथा । प्रीयेत परमात्मा वै तद्ब्रूत मम मानदाः ॥१०॥ सूत उवाच एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य नारदस्य महात्मनः । सनत्कुमारो भगवानुवाचार्कसमद्युतिः ॥११॥ सनत्कुमार उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि तंत्रं भागवतं तव । यज्ज्ञात्वाऽमलया भक्त्या साधयेद्विष्णुमव्ययम् ॥१२॥ त्रिपदार्थं चतुष्पादं महातंत्रं प्रचक्षते । भोगमोक्षक्रियाचर्याद्विया पादाः प्रकीर्तिताः ॥१३॥


भ्रमण करते हैं ॥३॥ महाभाग, नारद भी नित्य कृष्ण प्रेम में मस्त रहने वाले भक्त हैं । तो उन लोगों की गोष्ठी में कौन मंगलमयी लोक-पावनी कथा हुई, उसको कहिये । ॥३-४॥ सूत बोले--महाभाग ! लोकोपकारी तुमने अति उत्तम प्रश्न पूछा, ऋषि नारद ने जो कुछ पूछा वह सब अवश्यमेव कहूँगा ॥५॥ सनन्दन के मुख से कहे गये सनातन मोक्षधर्म को सुनकर नारद ने पुनः उन मुनियों से पूछा ॥६॥ नारद बोले--वेद और तन्त्र (शास्त्र) में विष्णु को सब देवों का ईश्वर कहा गया है, और यह भी कहा गया है कि इस लोक में सब प्रकार के मनोरथों की इच्छा करने वाले सब व्यक्ति उनकी ही आराधना करें । ॥७॥ मुनीश्वर ! अब आप लोग यह बतायें कि किन मन्त्रों से भगवान् की आराधना करनी चाहिये । विष्णु चरणानुरागी किन देवों की पूजा करें ॥८॥ विप्रवर्य ! भागवत तन्त्र, गुरु-शिष्य भाव को दृढ़ करने वाली दीक्षा, प्रातःकाल आदि के अनुष्ठान कार्य आदि जो कुछ हों उनको कहिये ॥९॥ जिन कर्मों, जप या हवन से जिस मास में परमात्मा प्रसन्न होते हैं, उनको हे मानद, आपलोग अवश्य कहें ॥१०॥ सूत बोले--महात्मा नारद की इन बातों को सुनकर सूर्य के समान तेजस्वी सनत्कुमार बोले ॥११॥ नारद ! सुनो, मैं तुमको भागवत तन्त्र सुना रहा हूँ जिसको जानकर अपनी विमल भक्ति के द्वारा अव्यय विष्णु को प्रसन्न किया जा सकता है । ॥१२॥ महातंत्र को त्रिपदार्थ वाला और चतुष्पाद कहा जाता है, भोग मोक्ष, क्रिया और आचार्या ये चार पाद हैं । पदार्थ पशुपति, पशु और पाश तीन ही हैं । ॥१३॥ शिव को एकमात्र

५४२ नारदीयपुराणम् पदार्थांस्तु पशुपतिः पशुपाशास्त्रय एव हि । पतिस्तत्र शिवोह्येको जीवास्तु पशवः स्मृताः ॥१४॥ यावन्मोहादिसंयोगाः स्वरूपाबोधलक्षणाः । तावत्पशुत्वमेतेषां द्वैतवत्पश्य नारद ॥१५॥ पाशाः पंचविधास्तेषां प्रत्येकं तेषु लक्षणम् । पशवस्त्रिविधाश्चापि विज्ञाताः कलसंज्ञिकाः ॥१६॥ तलपाकलसंज्ञश्च सकलश्चेति नामतः । तत्राद्यो मलसंयुक्तो मलकर्मयुतः परः ॥१७॥ मलमायाकर्मयुतस्तृतीयः परिकीर्तितः । आद्यस्तु द्विविधस्तत्र समासकलुषस्तथा ॥१८॥ असमासमलश्चेति द्वितीयोऽपि पुनस्तथा । पक्वापक्वमलेनैव द्विविधः परिकीर्तितः ॥१९॥ शुद्धेऽध्वनि गतावेतो विज्ञानप्रलयाकलौ । कलादितत्त्वनियततः सकलः पर्यटत्ययम् ॥२०॥ कर्मानुगशरीरेषु तत्तद्भुवनगेषु च । पाशाः पंच तथा तत्र प्रथमौ मलकर्मजौ ॥२१॥ मायेयश्च तिरोधानशक्तिजो बिंदुजः परः । एकोऽप्यनेक शक्तिदृग्विक्रियाच्छादनकोमलः ॥२२॥ तुषकंचुकवद्देहनिमित्तं चात्मनामिह । धर्माधर्मात्मकं कर्म विचित्रफलभोगदम् ॥२३॥ प्रवाइनित्यं तद्बीजांकुरन्यायेन संस्थितम् । इत्येतौ प्रथमौ चाथ मायेयाद्यान् शृणु द्विज ॥२४॥ सच्चिदानंदविभवः परमात्मा सनातनः । पतिर्जयति सर्वेषामेको बीजं विभुः परम् ॥२५॥ मनस्यति न चोदेति निवृत्तिं च प्रयच्छति । वर्वत्ति दृक्क्रियारूपं तत्तेजः शांभवं परम् ॥२६॥ शक्तो मया हरौ भक्तो मुक्तो पशुगणस्थ हि । तच्छक्तिमाद्यामेकांतां विद्रूपाख्यां वदंति हि ॥२७॥ तया चोज्जृंभितो बिंदुर्द्विविक्रियात्मा शिवाभिधः । अशेषतत्त्वजातस्य कारणं विभुरव्ययम् ॥२८॥ पशु-पति और जीव को आचार्यों ने पशु कहा है ॥१४॥ नारद ! जब तक स्वरूप बोध में बाधा पहुँचाने वाले मोह आदि से जीव बद्ध हैं, तब तक इन जीवों में पशुभाव द्वैतभाव की भांति बना ही रहता है, इसको तुम भी विचारो । ॥१५॥ उन पशुओं (जीवों) के पाश भी पांच प्रकार के हैं जिनमें प्रत्येक के लक्षण भिन्न हैं। पशु भी तीन प्रकार के माने गये हैं जिनकी कल संज्ञा है ॥१६॥ तल, पाकल और सकल इनकी संज्ञायें (नाम) हैं। इनमें प्रथम मल से युक्त रहता है, दूसरा मल और कर्म से और तीसरा मल, माया और कर्म से । इनमें पहला समास कलुष और असमास कलुष भेद से दो प्रकार का है। दूसरे के भी दो भेद हैं असमास और मल । सकल के भी दो भेद हैं पक्व मल और अपक्व मल । ये विज्ञान और प्रलयकल शुद्ध मार्ग पर चले गये । कला आदि तत्वों पर अटल रहने वाले सकल जीव अपने कर्मानुकूल शरीरों में भिन्न-भिन्न लोकों में कर्म भोग के लिये जाते हैं । पाश पांच प्रकार के हैं, उनमें पहले दो मल और कर्म से उत्पन्न मायेय, तिरोधान शक्तिज और पर विन्दुज हैं। एक होते हुए भी अनेक शक्ति वाला है और नेत्र, क्रिया और आच्छादन के कारण कोमल है। ये पाश आत्मा (जीव) के अन्न के छिलके और कंचुक (खोल या आवरण) शरीर की रक्षा के लिए हैं या आवरण के लिए हैं। धर्म और अधर्म से संबन्ध रखने वाले कर्म विचित्र फल भोग देने वाले हैं। ये प्रवाह नित्य और बीजांकुर न्याय के समान अनिर्णय हैं। द्विज ! ये प्रथम पाश जिनके समीप नहीं जाते उनको सुनो। सच्चिदानन्द, परमात्मा सनातन, व्यापक, पर और सबका एक मात्र कारण पति (शंकर) हो इन पर विजय प्राप्त करता है। वह न तो किसी वस्तु की कामना करता है, न तो वृद्धि ही प्राप्त करता है प्रत्युत उसकी सेवा करने पर निवृत्ति (सुख) की प्राप्ति होती है। ऐसा शम्भु का उत्कृष्ट तेज है जो कि दृक् क्रिया रूप में वर्त्तमान है ॥१७-२६॥ उस शम्भु की अद्वितीय, आद्य और चिद्रूपा नाम की शक्ति है ऐसा आचार्य कहते हैं। उस शक्ति की प्रेरणा से दृक् (ज्ञान) और क्रिया स्वरूप विभु और अव्यय बिन्दु, जिसकी संज्ञा है शक्तिशाली होकर सम्पूर्ण तत्त्वों

त्रिषष्टितमोऽध्यायः ५४३ अस्मिन्निलीना निखिला इच्छायाः शक्तयः स्वकम् । कृत्यं कुर्वन्ति तेनेदं सर्वानुग्राहकं मुने ॥२८॥ चिज्जडानुपग्रहार्थाय यस्य विश्वं सिसृक्षतः । आद्योन्मेषोऽस्य नादात्मा शांत्यादिभुवनात्मकः ॥३०॥ तच्छक्तितत्त्वं विप्रेन्द्र प्रोक्तं सावयवं परम् । ततो ज्ञानक्रियाशक्त्योस्तथोत्कर्षोपकर्षयोः ॥३१॥ प्रसरश्चाप्यभावेन तत्त्वं चैतत्सदाशिवम् । दृक्शक्तियंत्र न्यूनता क्रियाशक्तिर्विशिष्यते ॥३२॥ ईश्वराख्यं तु तत्तत्त्वं प्रोक्तं सर्वार्थकत्कृकम् । यत्र क्रिया हि न्यूनाता ज्ञानाख्योद्रेकमश्नुते ॥३३॥ तत्तत्त्वं चैव विद्याख्यं ज्ञानरूपं प्रकाशकम् । नादो बिंदुश्च सकलः सदाख्यं तत्त्वमाश्रितौ ॥३४॥ विद्येशाः पुनरैशं तु मंत्रा विद्याभिधं पुनः । इमानि चैव तत्त्वानि शुद्धाध्वेति प्रकीर्तितम् ॥३५॥ साक्षान्निमित्तमीशोऽत्रेत्युपादानसंर्बिदुराट् । पंचानां कालरहित्यात्क्रमो नास्तीति निश्चितम् ॥३६॥ व्यापारवसतो ह्येषां विहिता खलु कल्पना । तत्त्वं वस्तुत एकं तु शिवाख्यं चित्तशक्तिकम् ॥३७॥ शक्तं यां वृत्तिभेदात्तु विहिताः खलु कल्पनाः । चिज्जडानुग्रहार्थाय कृत्वा रूपाणि वै प्रभुः ॥३८॥ अनादिमलरुद्धानां कुरुतेऽनुग्रहं चिताम् । मुक्तिं भुक्तिं च विश्वेषां स्वव्यापारे समर्थताम् ॥३९॥ विधत्ते जडवर्गस्य सर्वानुग्राहकः शिवः । शिवसामान्यरूपो हि मोक्षस्तु चिदनुग्रहः ॥४०॥ सोऽनादित्वात्कर्मणो हि तत्तद्भोगं विना भवेत् । तेनानुग्राहकः शम्भुस्तद्मुक्त्यै प्रभुरव्ययः ॥४१॥ कुरुते सूक्ष्मकरणभुवनोत्पत्तिमंजसा । कर्त्तोपादानकरणैर्विना कार्यं न दृश्यते ॥४२॥ शक्तयः करणं चात्र मायोपादानमिष्यते । नित्यैका च शिवा शक्त्या ह्यनादिनिधना सती ॥४३॥ का कारण अर्थात् उत्पादक होता है। इस शिव में लीन सम्पूर्ण इच्छा शक्तियां अपने-अपने कार्य को करती हैं इसलिए यह सब पर अनुग्रह करने वाला है ॥२७-२९॥ विश्व सृष्टि की इच्छा करने वाले जिस शिव का जड़ और चेतन पर अनुग्रह करने के अभिप्राय से नाद रूप में शान्ति, सुख और भुवन के रूप में सर्व प्रथम उद्भव हुआ, विप्रेंद्र ! उस शिव का पर शक्तितत्त्व सावयव है। उसे शक्तितत्त्व से ज्ञान और क्रिया शक्ति तथा उत्कर्ष एवं अपकर्ष का विस्तार हुआ । वह मूलभूत तत्त्व सदाशिव है जिसमें दृक् शक्ति के दुर्बल होने पर क्रिया शक्ति प्रबल हो जाती है ॥३०-३२॥ वह ईश्वर तत्त्व सब पदार्थों का कर्ता है। जिसमें क्रिया शक्ति के दुर्बल होने पर ज्ञान शक्ति की प्रभा- नता होती है। वह तत्त्व विद्या रूप, ज्ञान रूप और प्रकाशक है। नाद, बिन्दु और सकल, सत् नामक तत्त्व के आश्रय में रहते हैं और विद्येश मन्त्र विद्यानामक ऐश तत्त्व के आश्रित हैं। ये ही तत्त्व शुद्ध अध्वा (पथ) कहे गये हैं ॥३३-३५॥ इस शुद्ध पंथ का साक्षात् कारण ईश (शिव) है और वह बिन्दुराट् उपादान कारण है । इन पाँचों का काल से कुछ भी संबन्ध न होने के कारण कोई क्रम नहीं है ऐसा निश्चित है । इनकी क्रिया के कारण इनके विषय में कल्पना की गई है । वस्तुतः तत्त्व एक ही है जिसकी शक्तियां भिन्न-भिन्न हैं। जिस शक्तिशाली तत्त्व के विषय में वृत्तिभेद के कारण कल्पनायें की गई हैं, वह प्रभु जड़ और चेतन पर अनुग्रह करने के लिए विभिन्न रूप धारण कर अनादि मल से रुद्ध चेतन जीव पर अनुग्रह करता है। सब पर अनुग्रह करने वाला शिव सब को भुक्ति और मुक्ति प्रदान करता है और जड़ समूह को अपने कार्य में समर्थ बनाता है। अर्थात् जड़ पदार्थ पर भी अनुग्रह कर उनको कार्य योग्य बनाता है । शिव का सामान्य रूप प्राप्त करना हो मोक्ष है, वह मोक्ष क्या है, चेतन पर शिव का अनुग्रह ॥३६-४०॥ वह मोक्ष कर्मों के अनादि होने के कारण कर्म भोग के बिना भी भगवत कृपा से होता है । [तात्पर्य यह है कि जब तक कर्म भोग रहेगा तब तक मोक्ष असम्भव है।] जब शिव के अनुग्रह से कर्म भोग का संबन्ध छूट जाता है तब मोक्ष प्राप्त होता है ।] इसलिए अनुग्रहकर्त्ता, प्रभु, अव्यय शिव कर्म भोग के लिए सम्पूर्ण रूप से सूक्ष्म करणों के द्वारा भुवनों की सृष्टि करता है। बिना कर्त्ता और उपादान कारण के कार्य की उत्पत्ति नहीं देखी गई है ॥४१-४२॥ शक्तियां करण और

५४४ नारदीयपुराणम् साधारणीनराणां वै भुवनानां च कारणम् । स्वभावान्मोहजननी स्वचित्तानजनकर्मभिः ॥४४॥ विभ्वी सूक्ष्मा परा माया विकृतेः परतस्तु सा । कर्माण्यावेक्ष्य विद्येशो मायां विक्षोभ्य शक्तिभिः ॥४५॥ विधत्ते जीवभोगार्थं वपूंषि करणानि च । सृजत्यादौ कालतत्त्वं नानाशक्तिमयी च सा ॥४६॥ भावि भूतं भवच्चैदं जगत्कलयते लयम् । सूते ह्यनन्तरं माया शक्ति नियमतात्मिकाम् ॥४७॥ सर्वं नियमयत्येषा तेनेयं नियतिः स्मृता । अनन्तरं हि सा माया नित्या विश्वविमोहिनी ॥४८॥ अनादिनिधना तत्त्वं कलाख्यं जनयत्यपि । एकतस्तु नृणां येन कलयित्वा मलं ततः ॥४६॥ कर्तृशक्तिं व्यंजयति तेनेदं तु कलाभिधम् । कालेन च नियत्योपसर् गतां समुपेतया ॥५०॥ व्यापारं विदधात्येषा भूपर्यंतं स्वकीयकम् । प्रदर्शनाय वै पुंसो विषयाणां च सा पुनः ॥५१॥ प्रकाशरूपं विद्याख्यं तत्त्वं सूते कलैव हि । विद्या त्वावरणं भित्त्वा ज्ञानशक्तेःस्वकर्मणा ॥५२॥ विषयान्दर्शयत्येषात्मनांशाकारणं ह्यतः । करोति भोग्यं येनासौ करणेन परेण वै ॥५३॥ उद्बुद्धशक्तिः पुरुषः प्रचोद्य महदादिकान् । भोग्ये भोगं च भोक्तारं तत्परं करणं तु सा ॥५४॥ भोग्यस्य भोग्यतिर्मासाच्चिद्व्यक्तिर्भोग उच्यते । सुखादिरूपा विषयाकारा बुद्धिः समासतः ॥५५॥ भोग्यं भोक्तुश्च स्वेनैव विद्याख्यं करणं तु तत् । यद्यर्कवत्प्रकाशा धीः कर्तृत्वाच्च तथापि हि ॥५६॥ करणान्तरसापेक्षा शक्ता ग्राहयितुं च तम् । संबन्धात्कारणाद्यैस्तद्द्मगोत्सुक्येन चोदनात् ॥५७॥ माया उपादान कारण हैं। वह माया अपनी शक्ति के कारण नित्य, एक, अनादि, अनन्त है। वह साधारणी शक्ति नर और सम्पूर्ण भुवनों की जननी (कारण है।) वह अपने स्वभाव के कारण अपनी बुद्धि से और जनों के कृत कर्म से मोह को उत्पन्न करने वाली है। स्वयं वह व्यापक, सूक्ष्म परा, माया और विकारग्रस्त वस्तुओं से परे रहने वाली है। अर्थात् स्वयं वह विकृत नहीं होती । विद्येश शिव कर्मों को देखकर अपनी शक्ति से माया को क्षुब्ध कर (जाग्रत) कर जीवों के कर्म भोग के लिये शरीर और करण (इन्द्रियों) को उत्पन्न करते हैं। वह नाना शक्ति से सम्पन्न माया प्रारम्भ में कालतत्त्व को उत्पन्न करती है। वह भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान के रूप में विभक्त होकर इस संसार का लय करता है। तदनन्तर वह माया नियमनात्मिका शक्ति को उत्पन्न करती है। यह सब को अनुशासन में रखती है इसीलिये इसका नाम नियति भी है। पुनः वह नित्य विश्वविमोहिनी माया और अनादि निधना माया कला नामक तत्त्व को जनती है। वह जिस कारण मनुष्यों के मलों (कर्मों) की गणना करके कर्तृशक्ति को व्यक्त (प्रकट) करती है अतः उसका नाम कला है।॥४३-४९३॥ काल, सृष्टि करने वाली कर्तृ शक्ति और नियति के द्वारा कला भूतल तक अपने व्यापार को फैलाती है। [तात्पर्य यह है कि माया भू पर्यन्त सृष्टि कर सर्वत्र अपनी धाक जमा लेती है ।] तदनन्तर वही कला मनुष्यों को विषयों का ज्ञान कराने के लिए प्रकाश रूप विद्या तत्त्व को उत्पन्न करती है। विद्या अपने कर्म के ज्ञान शक्ति से आवरण का भेदन कर जीवात्माओं के विषयों का दर्शन कराती है, इसलिए वह कारज मानी गई है, क्योंकि वह पर करणों से भोग्य वस्तु का निर्माण करती है। पुरुष की शक्ति जब जाग्रत हो जाती है तब वह महत् आदि तत्त्वों को प्रेरित कर भोग्य, भोग और इसके अनन्तर करणों (इन्द्रियों), को बनाता है। जिसका उपभोग किया जाता उसको भोग्य और चिद्व्यक्ति को भोग कहते हैं। संक्षेप से विषयाकारा बुद्धि ही सुख-दुःख आदि के रूप में परिणत होती है ॥५०-५५॥ भोक्ता को भोग्य अपने ही कर्म से प्राप्त होता है, विद्या उसमें सहायक मात्र होती । यद्यपि प्रकाश सूर्य के समान स्वयं प्रकाश है तथापि धीः उस प्रकाश ग्रहण करने में अन्य कारणों के सहयोग से ही ग्रहण करने में समर्थ होती है क्योंकि प्रकाश को ग्रहण करना एक

त्रिषष्टितमोऽध्यायः ५४५ तच्चेष्टाफलयोगाच्च संसिद्धा कर्तृतास्य तु । अकर्तृत्वम्युपगमे भोक्तृत्वाख्या वृथास्य तु ॥५८॥ किं च प्रधानचरितं व्यर्थं सर्वं भवेत्ततः । कर्तृ त्वरहिते पुंसि करणाद्यप्रयोजके ॥५६॥ भोगस्यासंभवस्तस्मात्स एवात्र प्रवर्तकः । करणादिप्रयोक्तृत्वं विद्ययैवास्य संमतम् ॥६०॥ अनन्तरं कलारागं सूते भिद्यंगरुपकम् । येन भोग्याय जनिता भिद्यंगे पुरुषे पुनः ॥६१॥ क्रियाप्रवृत्तिर्भवति तेनेदं रागसंज्ञिकम् । एभिस्तत्त्वैश्च भोक्तृत्वदशायां कलितो यदा ॥६२॥ नित्यस्तदायमात्मा तु लभते पुरुषाभिधाम् । कलैव पश्चादव्यक्तं सूते भोग्याय चास्य तु ॥६३॥ सप्तग्रंथिविधानस्य यत्तद्गौणस्य कारणम् । गुणानामविभागोऽत्र ह्याधारे क्ष्मादिभागवत् ॥६४॥ आधारोऽपि च यस्तेषां तदव्यक्तं च गीयते । त्रय एव गुणा ह्येषामव्यक्तादेव संभवः ॥६५॥ सत्त्वं रजस्तमःप्रख्या व्यापारनियमात्मिका । गुणतो धीश्च विषयाध्यवसायस्वरूपिणी ॥६६॥ गुणतस्त्रिविधा सापि प्रोक्ता कर्मानुसारतः । महत्त्वादहंकारो जातः संरंभवृत्तिमान् ॥६७॥ संभेदादस्य विषयः प्राप्नोति व्यवहार्यताम् । सत्त्वादिगुणभेदेन स पुनस्त्रिविधो भवेत् ॥ ६८॥ तैजसो राजसश्चैव तामसश्चेति नामतः । तत्र तैजसतो ज्ञानेन्द्रियाणि मनसा सह ॥६६॥ प्रकाशान्वयतस्तस्मान्प्रद्योतकानि भवन्ति हि । राजसाच्च क्रियाहेतोस्तथा कर्मेन्द्रियाणि तु ॥७०॥ तामसाच्चैव जायन्ते तन्मात्रा भूतयोनयः । इच्छारूपं च संकल्पव्यापारं तत्र वै मनः ॥७१॥ द्विधाधिकारि तच्चित्तं भोक्तृभोगोपपादकम् । बहिःकरणभावेन स्वोचितेन यतः सदा ॥७२॥ कर्म है । कर्म साधनापेक्ष होते ही हैं । कारण आदि के संयोग से और प्रेरणा से जीव को कर्म-भोग के प्रति उत्सुकता रहती है और उसकी चेष्टाओं के फल योग के कारण ही जीव का कर्तृत्व सिद्ध होता है । क्योंकि यदि जीव का कर्तृत्व सिद्ध न होगा अर्थात् यदि जीव को कर्त्ता न माना जायगा तो उसको भोक्ता कैसे माना जायगा, उसकी भोक्तृता सिद्ध न होगी । और यदि जीव को करण आदि का प्रयोजक न माना जायगा, उसको कर्त्ता न माना जायगा तो उसकी प्रधानता भी व्यर्थ हो जायगी । भोग भी उसके लिये संभव न होगा अर्थात् वह भोक्ता संभव न होगा अतएव विषय भोग या कर्म का प्रवर्तक स्वयं जीव ही है । और जो यह करण आदि (साधन या इन्द्रिय आदि) का प्रयोक्ता माना जाता है वह विद्या के कारण ही सम्भव है ॥५६-६०॥ इसके अनन्तर कला दृढ़ वज्रलेप के सदृश राग को उत्पन्न करती है, जिससे उस वज्रलेप-रागयुक्त पुरुष में भोग के लिये फिर शक्ति उत्पन्न होती है । यतः इसके द्वारा क्रिया-प्रवृत्ति (कार्य करने की इच्छा) होती है अतः इसका नाम राग कहा जाता है । इन तत्त्वों से युक्त होकर आत्मा जब भोक्तृत्व दशा को प्राप्त होता है तब यह नित्य आत्मा पुरुष संज्ञाको प्राप्त करता है अर्थात् पुरुष कहलाता है । इस आत्मा के भोग के लिए कला ही अव्यक्त को उत्पन्न करती है । सप्त ग्रन्थि विधानों से युक्त अव्यक्त के कारण गुण हैं । इसके आधार में भी क्ष्मा (पृथ्वी) के समान गुणों का अविभाग (एकता) है। गुणों का जो आधार है उसको अव्यक्त ही कहते हैं। गुण तीन ही हैं। इनकी उत्पत्ति अव्यक्त से हो होती है । सत्त्व, रज और तम रूप तीन गुण क्रिया के नियम रूप हैं । गुणों से ही विषयों में प्रवृत्त होने वाली धी उत्पन्न होती है । कर्मों के अनुसार गुण भेद से बुद्धि भी तीन प्रकार की होती है तैजस, राजस और तामस । तैजस धी से मन के साथ ज्ञानेन्द्रियाँ प्रकाश के संयोग से विषयों का ज्ञान कराने वाली होती हैं। क्रिया हेतु राजस से कर्मेन्द्रियाँ और तामस से रूप, रस आदि पंच तन्मात्रायें और पंच महाभूत के कारण उत्पन्न होते हैं। उनमें इच्छा स्वरूप और संकल्प करने वाला मन भी हैं । भोक्तृत्व और भोग को उत्पन्न करने वाला वह चित्त दो प्रकार का है । क्योंकि वह सदा अपने अनुकूल बाह्य करणों (साधनों) के द्वारा और आत्मवृत्ति संकल्प ६१ ना० पु०

५४६ नारदीयपुराणम् इन्द्रियाणां च सामर्थ्यं संकल्पेनात्मवृत्तिना । करोत्यंतःस्थितं भूयस्ततोऽन्तःकरणं मनः ॥७३॥ मनोऽहंकारबुद्धयाख्यमस्त्यन्तःकरणं त्रिधा । इच्छासंरंभबोधाख्या वृत्तयःक्रमतोऽस्य तु ॥७४॥ ज्ञानेंद्रियाणि श्रोत्रं त्वक् चक्षुर्जिह्वा च नासिका । ग्राह्याश्च विषया ह्येषां ज्ञेयाःशब्दादयो मुने ॥७५॥ शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः शब्दादयो मताः । वाक्पाणिपादपायूपस्थास्तु कर्मेन्द्रियाण्यपि ॥७६॥ वचनादानगमनोत्सर्गानंदेषु कर्मसु । करणानि च सिद्धिर्ना न कृतिः करणैर्विना ॥७७॥ दशधा करणैश्चेष्टां कार्यमाविश्य कार्यान्ये । चेष्टंते कार्यमालंब्य विभुत्वात्करणानि तु ॥७८॥ तन्मात्राणि तु खंवायुस्तेजोऽम्भः क्ष्मेति पञ्च वै । तेभ्यो भूतान्येकगुणान्याख्यातानि भवंति हि ॥७६॥ इति पञ्चसु शब्दोऽयं स्पर्शो भूतचतुष्टये । रूपं त्रिषु रसश्चैव द्वयोर्गंधः क्षितौ तथा ॥८०॥ कार्याण्येषां क्रमेणैवावकाशो व्यूहकल्पनम् । पाकश्च संग्रहश्चैव धारणं चेति कथ्यते ॥८१॥ आशीतोष्णौ महावायौ शीतोष्णौ वारितेजसोः । भास्वदग्नौ जले शुक्लं क्षितौ शुक्लाद्यनेकधा ॥८२॥ रूपं त्रिषु रसोऽम्भःसु मधुरः षड्विधः क्षितौ । गन्धः क्षितावसुरभिः सुरभिश्च प्रकीर्तितः ॥८३॥ तन्मात्रं तद्भूतगुणं करणं पोषणं तथा । भूतस्य तु विशेषोऽयं विशेषरहितं तु तत् ॥८४॥ इमानि पञ्चभूतानि संनिविष्टानि सर्वतः । पञ्चभूतात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥८५॥ शरीरसंनिविष्टत्वमेषां तावन्निरूप्यते । देहेऽस्थिमांसकेशत्वङ्नखदन्ताश्च पार्थिवाः ॥८६॥ मूत्ररक्तकफस्वेदशुक्रादिषु जलस्थितिः । हृदि पंक्तौ दृशोः पित्ते तेजस्तद्धर्मदर्शनात् ॥८७॥ प्राणादिवृत्तिभेदेन वायुश्चैवात्र संस्थितः । वियत्सर्वासु नाडीषु गर्भवृत्त्यनुषंगतः ॥८८॥ के द्वारा इन्द्रियों में कार्य क्षमता उत्पन्न करता है। पुनः अन्तः स्थित हो जाता और उसकी संज्ञा अन्तःकरण हो जाती है। अन्तःकरण के मन, अहंकार और बुद्धि नामक तीन भेद हैं और इनकी वृत्तियां क्रमशः इच्छा, संरंभ (कोप) और बोध हैं। मुने ! श्रोत्र (कान), त्वक्, चक्षु, जिह्वा और नासिका ज्ञानेन्द्रियां हैं और इनके शब्द आदि ग्राह्य विषय हैं ॥६१-७५॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध की शब्द आदि में गणना होती है। वाक्, पाणि (हाथ) पाद, गुदा और लिङ्ग कर्मेन्द्रियां हैं। ये वचन, ग्रहण, गमन (चलना), मल त्याग और आनन्दानुभूति कर्मों के असाधारण कारण हैं, क्योंकि असाधारण कारणों के बिना कार्योत्पत्ति नहीं होती। इन दश कारणों से इच्छायें उत्पन्न होतीं और तब कार्य सम्पन्न होते हैं। इन्द्रियों के व्यापक होने के कारण कार्य का आलम्बन कर (लक्षित कर) चेष्टायें उत्पन्न होती हैं। पंच तन्मात्राओं से आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी-ये पंच महाभूत उत्पन्न होते हैं और इन पंच महाभूतों से अनेक गुणों वाले अनगिनत जीव उत्पन्न होते हैं। इन पांचों महाभूतों में शब्द और स्पर्श गुण चार में होते हैं, रूप तीन में, रस दो में और गन्ध केवल पृथ्वी में होता है ॥७६-८०॥ इन पंच महाभूतों के कार्य भी क्रमशः अवकाश, व्यूह कल्पन, पाक, संग्रह और धारण हैं। अशीत, उष्ण; महावाय, शीत उष्ण जन और तेज में होते हैं। अग्नि में भास्वर शुक्ल, तेज में अभास्वर शुक्ल और पृथ्वी में शुक्ल आदि अनेक रूप हैं। रूप तीन भूतों (जल, तेज और क्षिति) में, मधुर रस जल में और पृथ्वी में छः प्रकार के रस हैं। गन्ध पृथ्वी में होता है, जिसके दो भेद हैं सुरभि और असुरभि । तन्मात्राओं में उनके भूतों के ही गुण हैं। करण और पोषण यह भूत समुदाय की विशेषता है। परमात्मतत्त्व निर्विशेष है। ये पांच महाभूत सर्वत्र और सब में सन्निविष्ट हैं, यह सम्पूर्ण स्थावर जंगमात्मक जगत् पंचभूतात्मक है। पांच महाभूत शरीर में कहाँ-कहाँ रहते हैं इसका निरूपण किया जा रहा है। इस देह में हड्डी, मांस, केश, चमड़ा, नख और दाँत पृथ्वी तत्त्व से बने हैं। मूत्र, रक्त, कफ, पसीना और वीर्य आदि में जल तत्त्व है। हृदय, पंक्ति, नेत्र और पित्त में तेज तत्त्व है। क्योंकि इनमें तेज के गुण दृष्टिगोचर होते हैं। और वायु प्राण, अपान आदि के रूप में इस देह में स्थित है। सब नाड़ियों तथा गर्भा-