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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 564, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 564

त्रिषष्टितमोऽध्यायः ५४५ तच्चेष्टाफलयोगाच्च संसिद्धा कर्तृतास्य तु । अकर्तृत्वम्युपगमे भोक्तृत्वाख्या वृथास्य तु ॥५८॥ किं च प्रधानचरितं व्यर्थं सर्वं भवेत्ततः । कर्तृ त्वरहिते पुंसि करणाद्यप्रयोजके ॥५६॥ भोगस्यासंभवस्तस्मात्स एवात्र प्रवर्तकः । करणादिप्रयोक्तृत्वं विद्ययैवास्य संमतम् ॥६०॥ अनन्तरं कलारागं सूते भिद्यंगरुपकम् । येन भोग्याय जनिता भिद्यंगे पुरुषे पुनः ॥६१॥ क्रियाप्रवृत्तिर्भवति तेनेदं रागसंज्ञिकम् । एभिस्तत्त्वैश्च भोक्तृत्वदशायां कलितो यदा ॥६२॥ नित्यस्तदायमात्मा तु लभते पुरुषाभिधाम् । कलैव पश्चादव्यक्तं सूते भोग्याय चास्य तु ॥६३॥ सप्तग्रंथिविधानस्य यत्तद्गौणस्य कारणम् । गुणानामविभागोऽत्र ह्याधारे क्ष्मादिभागवत् ॥६४॥ आधारोऽपि च यस्तेषां तदव्यक्तं च गीयते । त्रय एव गुणा ह्येषामव्यक्तादेव संभवः ॥६५॥ सत्त्वं रजस्तमःप्रख्या व्यापारनियमात्मिका । गुणतो धीश्च विषयाध्यवसायस्वरूपिणी ॥६६॥ गुणतस्त्रिविधा सापि प्रोक्ता कर्मानुसारतः । महत्त्वादहंकारो जातः संरंभवृत्तिमान् ॥६७॥ संभेदादस्य विषयः प्राप्नोति व्यवहार्यताम् । सत्त्वादिगुणभेदेन स पुनस्त्रिविधो भवेत् ॥ ६८॥ तैजसो राजसश्चैव तामसश्चेति नामतः । तत्र तैजसतो ज्ञानेन्द्रियाणि मनसा सह ॥६६॥ प्रकाशान्वयतस्तस्मान्प्रद्योतकानि भवन्ति हि । राजसाच्च क्रियाहेतोस्तथा कर्मेन्द्रियाणि तु ॥७०॥ तामसाच्चैव जायन्ते तन्मात्रा भूतयोनयः । इच्छारूपं च संकल्पव्यापारं तत्र वै मनः ॥७१॥ द्विधाधिकारि तच्चित्तं भोक्तृभोगोपपादकम् । बहिःकरणभावेन स्वोचितेन यतः सदा ॥७२॥ कर्म है । कर्म साधनापेक्ष होते ही हैं । कारण आदि के संयोग से और प्रेरणा से जीव को कर्म-भोग के प्रति उत्सुकता रहती है और उसकी चेष्टाओं के फल योग के कारण ही जीव का कर्तृत्व सिद्ध होता है । क्योंकि यदि जीव का कर्तृत्व सिद्ध न होगा अर्थात् यदि जीव को कर्त्ता न माना जायगा तो उसको भोक्ता कैसे माना जायगा, उसकी भोक्तृता सिद्ध न होगी । और यदि जीव को करण आदि का प्रयोजक न माना जायगा, उसको कर्त्ता न माना जायगा तो उसकी प्रधानता भी व्यर्थ हो जायगी । भोग भी उसके लिये संभव न होगा अर्थात् वह भोक्ता संभव न होगा अतएव विषय भोग या कर्म का प्रवर्तक स्वयं जीव ही है । और जो यह करण आदि (साधन या इन्द्रिय आदि) का प्रयोक्ता माना जाता है वह विद्या के कारण ही सम्भव है ॥५६-६०॥ इसके अनन्तर कला दृढ़ वज्रलेप के सदृश राग को उत्पन्न करती है, जिससे उस वज्रलेप-रागयुक्त पुरुष में भोग के लिये फिर शक्ति उत्पन्न होती है । यतः इसके द्वारा क्रिया-प्रवृत्ति (कार्य करने की इच्छा) होती है अतः इसका नाम राग कहा जाता है । इन तत्त्वों से युक्त होकर आत्मा जब भोक्तृत्व दशा को प्राप्त होता है तब यह नित्य आत्मा पुरुष संज्ञाको प्राप्त करता है अर्थात् पुरुष कहलाता है । इस आत्मा के भोग के लिए कला ही अव्यक्त को उत्पन्न करती है । सप्त ग्रन्थि विधानों से युक्त अव्यक्त के कारण गुण हैं । इसके आधार में भी क्ष्मा (पृथ्वी) के समान गुणों का अविभाग (एकता) है। गुणों का जो आधार है उसको अव्यक्त ही कहते हैं। गुण तीन ही हैं। इनकी उत्पत्ति अव्यक्त से हो होती है । सत्त्व, रज और तम रूप तीन गुण क्रिया के नियम रूप हैं । गुणों से ही विषयों में प्रवृत्त होने वाली धी उत्पन्न होती है । कर्मों के अनुसार गुण भेद से बुद्धि भी तीन प्रकार की होती है तैजस, राजस और तामस । तैजस धी से मन के साथ ज्ञानेन्द्रियाँ प्रकाश के संयोग से विषयों का ज्ञान कराने वाली होती हैं। क्रिया हेतु राजस से कर्मेन्द्रियाँ और तामस से रूप, रस आदि पंच तन्मात्रायें और पंच महाभूत के कारण उत्पन्न होते हैं। उनमें इच्छा स्वरूप और संकल्प करने वाला मन भी हैं । भोक्तृत्व और भोग को उत्पन्न करने वाला वह चित्त दो प्रकार का है । क्योंकि वह सदा अपने अनुकूल बाह्य करणों (साधनों) के द्वारा और आत्मवृत्ति संकल्प ६१ ना० पु०