बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४४ नारदीयपुराणम् साधारणीनराणां वै भुवनानां च कारणम् । स्वभावान्मोहजननी स्वचित्तानजनकर्मभिः ॥४४॥ विभ्वी सूक्ष्मा परा माया विकृतेः परतस्तु सा । कर्माण्यावेक्ष्य विद्येशो मायां विक्षोभ्य शक्तिभिः ॥४५॥ विधत्ते जीवभोगार्थं वपूंषि करणानि च । सृजत्यादौ कालतत्त्वं नानाशक्तिमयी च सा ॥४६॥ भावि भूतं भवच्चैदं जगत्कलयते लयम् । सूते ह्यनन्तरं माया शक्ति नियमतात्मिकाम् ॥४७॥ सर्वं नियमयत्येषा तेनेयं नियतिः स्मृता । अनन्तरं हि सा माया नित्या विश्वविमोहिनी ॥४८॥ अनादिनिधना तत्त्वं कलाख्यं जनयत्यपि । एकतस्तु नृणां येन कलयित्वा मलं ततः ॥४६॥ कर्तृशक्तिं व्यंजयति तेनेदं तु कलाभिधम् । कालेन च नियत्योपसर् गतां समुपेतया ॥५०॥ व्यापारं विदधात्येषा भूपर्यंतं स्वकीयकम् । प्रदर्शनाय वै पुंसो विषयाणां च सा पुनः ॥५१॥ प्रकाशरूपं विद्याख्यं तत्त्वं सूते कलैव हि । विद्या त्वावरणं भित्त्वा ज्ञानशक्तेःस्वकर्मणा ॥५२॥ विषयान्दर्शयत्येषात्मनांशाकारणं ह्यतः । करोति भोग्यं येनासौ करणेन परेण वै ॥५३॥ उद्बुद्धशक्तिः पुरुषः प्रचोद्य महदादिकान् । भोग्ये भोगं च भोक्तारं तत्परं करणं तु सा ॥५४॥ भोग्यस्य भोग्यतिर्मासाच्चिद्व्यक्तिर्भोग उच्यते । सुखादिरूपा विषयाकारा बुद्धिः समासतः ॥५५॥ भोग्यं भोक्तुश्च स्वेनैव विद्याख्यं करणं तु तत् । यद्यर्कवत्प्रकाशा धीः कर्तृत्वाच्च तथापि हि ॥५६॥ करणान्तरसापेक्षा शक्ता ग्राहयितुं च तम् । संबन्धात्कारणाद्यैस्तद्द्मगोत्सुक्येन चोदनात् ॥५७॥ माया उपादान कारण हैं। वह माया अपनी शक्ति के कारण नित्य, एक, अनादि, अनन्त है। वह साधारणी शक्ति नर और सम्पूर्ण भुवनों की जननी (कारण है।) वह अपने स्वभाव के कारण अपनी बुद्धि से और जनों के कृत कर्म से मोह को उत्पन्न करने वाली है। स्वयं वह व्यापक, सूक्ष्म परा, माया और विकारग्रस्त वस्तुओं से परे रहने वाली है। अर्थात् स्वयं वह विकृत नहीं होती । विद्येश शिव कर्मों को देखकर अपनी शक्ति से माया को क्षुब्ध कर (जाग्रत) कर जीवों के कर्म भोग के लिये शरीर और करण (इन्द्रियों) को उत्पन्न करते हैं। वह नाना शक्ति से सम्पन्न माया प्रारम्भ में कालतत्त्व को उत्पन्न करती है। वह भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान के रूप में विभक्त होकर इस संसार का लय करता है। तदनन्तर वह माया नियमनात्मिका शक्ति को उत्पन्न करती है। यह सब को अनुशासन में रखती है इसीलिये इसका नाम नियति भी है। पुनः वह नित्य विश्वविमोहिनी माया और अनादि निधना माया कला नामक तत्त्व को जनती है। वह जिस कारण मनुष्यों के मलों (कर्मों) की गणना करके कर्तृशक्ति को व्यक्त (प्रकट) करती है अतः उसका नाम कला है।॥४३-४९३॥ काल, सृष्टि करने वाली कर्तृ शक्ति और नियति के द्वारा कला भूतल तक अपने व्यापार को फैलाती है। [तात्पर्य यह है कि माया भू पर्यन्त सृष्टि कर सर्वत्र अपनी धाक जमा लेती है ।] तदनन्तर वही कला मनुष्यों को विषयों का ज्ञान कराने के लिए प्रकाश रूप विद्या तत्त्व को उत्पन्न करती है। विद्या अपने कर्म के ज्ञान शक्ति से आवरण का भेदन कर जीवात्माओं के विषयों का दर्शन कराती है, इसलिए वह कारज मानी गई है, क्योंकि वह पर करणों से भोग्य वस्तु का निर्माण करती है। पुरुष की शक्ति जब जाग्रत हो जाती है तब वह महत् आदि तत्त्वों को प्रेरित कर भोग्य, भोग और इसके अनन्तर करणों (इन्द्रियों), को बनाता है। जिसका उपभोग किया जाता उसको भोग्य और चिद्व्यक्ति को भोग कहते हैं। संक्षेप से विषयाकारा बुद्धि ही सुख-दुःख आदि के रूप में परिणत होती है ॥५०-५५॥ भोक्ता को भोग्य अपने ही कर्म से प्राप्त होता है, विद्या उसमें सहायक मात्र होती । यद्यपि प्रकाश सूर्य के समान स्वयं प्रकाश है तथापि धीः उस प्रकाश ग्रहण करने में अन्य कारणों के सहयोग से ही ग्रहण करने में समर्थ होती है क्योंकि प्रकाश को ग्रहण करना एक