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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 562, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 562

त्रिषष्टितमोऽध्यायः ५४३ अस्मिन्निलीना निखिला इच्छायाः शक्तयः स्वकम् । कृत्यं कुर्वन्ति तेनेदं सर्वानुग्राहकं मुने ॥२८॥ चिज्जडानुपग्रहार्थाय यस्य विश्वं सिसृक्षतः । आद्योन्मेषोऽस्य नादात्मा शांत्यादिभुवनात्मकः ॥३०॥ तच्छक्तितत्त्वं विप्रेन्द्र प्रोक्तं सावयवं परम् । ततो ज्ञानक्रियाशक्त्योस्तथोत्कर्षोपकर्षयोः ॥३१॥ प्रसरश्चाप्यभावेन तत्त्वं चैतत्सदाशिवम् । दृक्शक्तियंत्र न्यूनता क्रियाशक्तिर्विशिष्यते ॥३२॥ ईश्वराख्यं तु तत्तत्त्वं प्रोक्तं सर्वार्थकत्कृकम् । यत्र क्रिया हि न्यूनाता ज्ञानाख्योद्रेकमश्नुते ॥३३॥ तत्तत्त्वं चैव विद्याख्यं ज्ञानरूपं प्रकाशकम् । नादो बिंदुश्च सकलः सदाख्यं तत्त्वमाश्रितौ ॥३४॥ विद्येशाः पुनरैशं तु मंत्रा विद्याभिधं पुनः । इमानि चैव तत्त्वानि शुद्धाध्वेति प्रकीर्तितम् ॥३५॥ साक्षान्निमित्तमीशोऽत्रेत्युपादानसंर्बिदुराट् । पंचानां कालरहित्यात्क्रमो नास्तीति निश्चितम् ॥३६॥ व्यापारवसतो ह्येषां विहिता खलु कल्पना । तत्त्वं वस्तुत एकं तु शिवाख्यं चित्तशक्तिकम् ॥३७॥ शक्तं यां वृत्तिभेदात्तु विहिताः खलु कल्पनाः । चिज्जडानुग्रहार्थाय कृत्वा रूपाणि वै प्रभुः ॥३८॥ अनादिमलरुद्धानां कुरुतेऽनुग्रहं चिताम् । मुक्तिं भुक्तिं च विश्वेषां स्वव्यापारे समर्थताम् ॥३९॥ विधत्ते जडवर्गस्य सर्वानुग्राहकः शिवः । शिवसामान्यरूपो हि मोक्षस्तु चिदनुग्रहः ॥४०॥ सोऽनादित्वात्कर्मणो हि तत्तद्भोगं विना भवेत् । तेनानुग्राहकः शम्भुस्तद्मुक्त्यै प्रभुरव्ययः ॥४१॥ कुरुते सूक्ष्मकरणभुवनोत्पत्तिमंजसा । कर्त्तोपादानकरणैर्विना कार्यं न दृश्यते ॥४२॥ शक्तयः करणं चात्र मायोपादानमिष्यते । नित्यैका च शिवा शक्त्या ह्यनादिनिधना सती ॥४३॥ का कारण अर्थात् उत्पादक होता है। इस शिव में लीन सम्पूर्ण इच्छा शक्तियां अपने-अपने कार्य को करती हैं इसलिए यह सब पर अनुग्रह करने वाला है ॥२७-२९॥ विश्व सृष्टि की इच्छा करने वाले जिस शिव का जड़ और चेतन पर अनुग्रह करने के अभिप्राय से नाद रूप में शान्ति, सुख और भुवन के रूप में सर्व प्रथम उद्भव हुआ, विप्रेंद्र ! उस शिव का पर शक्तितत्त्व सावयव है। उसे शक्तितत्त्व से ज्ञान और क्रिया शक्ति तथा उत्कर्ष एवं अपकर्ष का विस्तार हुआ । वह मूलभूत तत्त्व सदाशिव है जिसमें दृक् शक्ति के दुर्बल होने पर क्रिया शक्ति प्रबल हो जाती है ॥३०-३२॥ वह ईश्वर तत्त्व सब पदार्थों का कर्ता है। जिसमें क्रिया शक्ति के दुर्बल होने पर ज्ञान शक्ति की प्रभा- नता होती है। वह तत्त्व विद्या रूप, ज्ञान रूप और प्रकाशक है। नाद, बिन्दु और सकल, सत् नामक तत्त्व के आश्रय में रहते हैं और विद्येश मन्त्र विद्यानामक ऐश तत्त्व के आश्रित हैं। ये ही तत्त्व शुद्ध अध्वा (पथ) कहे गये हैं ॥३३-३५॥ इस शुद्ध पंथ का साक्षात् कारण ईश (शिव) है और वह बिन्दुराट् उपादान कारण है । इन पाँचों का काल से कुछ भी संबन्ध न होने के कारण कोई क्रम नहीं है ऐसा निश्चित है । इनकी क्रिया के कारण इनके विषय में कल्पना की गई है । वस्तुतः तत्त्व एक ही है जिसकी शक्तियां भिन्न-भिन्न हैं। जिस शक्तिशाली तत्त्व के विषय में वृत्तिभेद के कारण कल्पनायें की गई हैं, वह प्रभु जड़ और चेतन पर अनुग्रह करने के लिए विभिन्न रूप धारण कर अनादि मल से रुद्ध चेतन जीव पर अनुग्रह करता है। सब पर अनुग्रह करने वाला शिव सब को भुक्ति और मुक्ति प्रदान करता है और जड़ समूह को अपने कार्य में समर्थ बनाता है। अर्थात् जड़ पदार्थ पर भी अनुग्रह कर उनको कार्य योग्य बनाता है । शिव का सामान्य रूप प्राप्त करना हो मोक्ष है, वह मोक्ष क्या है, चेतन पर शिव का अनुग्रह ॥३६-४०॥ वह मोक्ष कर्मों के अनादि होने के कारण कर्म भोग के बिना भी भगवत कृपा से होता है । [तात्पर्य यह है कि जब तक कर्म भोग रहेगा तब तक मोक्ष असम्भव है।] जब शिव के अनुग्रह से कर्म भोग का संबन्ध छूट जाता है तब मोक्ष प्राप्त होता है ।] इसलिए अनुग्रहकर्त्ता, प्रभु, अव्यय शिव कर्म भोग के लिए सम्पूर्ण रूप से सूक्ष्म करणों के द्वारा भुवनों की सृष्टि करता है। बिना कर्त्ता और उपादान कारण के कार्य की उत्पत्ति नहीं देखी गई है ॥४१-४२॥ शक्तियां करण और