बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४२ नारदीयपुराणम् पदार्थांस्तु पशुपतिः पशुपाशास्त्रय एव हि । पतिस्तत्र शिवोह्येको जीवास्तु पशवः स्मृताः ॥१४॥ यावन्मोहादिसंयोगाः स्वरूपाबोधलक्षणाः । तावत्पशुत्वमेतेषां द्वैतवत्पश्य नारद ॥१५॥ पाशाः पंचविधास्तेषां प्रत्येकं तेषु लक्षणम् । पशवस्त्रिविधाश्चापि विज्ञाताः कलसंज्ञिकाः ॥१६॥ तलपाकलसंज्ञश्च सकलश्चेति नामतः । तत्राद्यो मलसंयुक्तो मलकर्मयुतः परः ॥१७॥ मलमायाकर्मयुतस्तृतीयः परिकीर्तितः । आद्यस्तु द्विविधस्तत्र समासकलुषस्तथा ॥१८॥ असमासमलश्चेति द्वितीयोऽपि पुनस्तथा । पक्वापक्वमलेनैव द्विविधः परिकीर्तितः ॥१९॥ शुद्धेऽध्वनि गतावेतो विज्ञानप्रलयाकलौ । कलादितत्त्वनियततः सकलः पर्यटत्ययम् ॥२०॥ कर्मानुगशरीरेषु तत्तद्भुवनगेषु च । पाशाः पंच तथा तत्र प्रथमौ मलकर्मजौ ॥२१॥ मायेयश्च तिरोधानशक्तिजो बिंदुजः परः । एकोऽप्यनेक शक्तिदृग्विक्रियाच्छादनकोमलः ॥२२॥ तुषकंचुकवद्देहनिमित्तं चात्मनामिह । धर्माधर्मात्मकं कर्म विचित्रफलभोगदम् ॥२३॥ प्रवाइनित्यं तद्बीजांकुरन्यायेन संस्थितम् । इत्येतौ प्रथमौ चाथ मायेयाद्यान् शृणु द्विज ॥२४॥ सच्चिदानंदविभवः परमात्मा सनातनः । पतिर्जयति सर्वेषामेको बीजं विभुः परम् ॥२५॥ मनस्यति न चोदेति निवृत्तिं च प्रयच्छति । वर्वत्ति दृक्क्रियारूपं तत्तेजः शांभवं परम् ॥२६॥ शक्तो मया हरौ भक्तो मुक्तो पशुगणस्थ हि । तच्छक्तिमाद्यामेकांतां विद्रूपाख्यां वदंति हि ॥२७॥ तया चोज्जृंभितो बिंदुर्द्विविक्रियात्मा शिवाभिधः । अशेषतत्त्वजातस्य कारणं विभुरव्ययम् ॥२८॥ पशु-पति और जीव को आचार्यों ने पशु कहा है ॥१४॥ नारद ! जब तक स्वरूप बोध में बाधा पहुँचाने वाले मोह आदि से जीव बद्ध हैं, तब तक इन जीवों में पशुभाव द्वैतभाव की भांति बना ही रहता है, इसको तुम भी विचारो । ॥१५॥ उन पशुओं (जीवों) के पाश भी पांच प्रकार के हैं जिनमें प्रत्येक के लक्षण भिन्न हैं। पशु भी तीन प्रकार के माने गये हैं जिनकी कल संज्ञा है ॥१६॥ तल, पाकल और सकल इनकी संज्ञायें (नाम) हैं। इनमें प्रथम मल से युक्त रहता है, दूसरा मल और कर्म से और तीसरा मल, माया और कर्म से । इनमें पहला समास कलुष और असमास कलुष भेद से दो प्रकार का है। दूसरे के भी दो भेद हैं असमास और मल । सकल के भी दो भेद हैं पक्व मल और अपक्व मल । ये विज्ञान और प्रलयकल शुद्ध मार्ग पर चले गये । कला आदि तत्वों पर अटल रहने वाले सकल जीव अपने कर्मानुकूल शरीरों में भिन्न-भिन्न लोकों में कर्म भोग के लिये जाते हैं । पाश पांच प्रकार के हैं, उनमें पहले दो मल और कर्म से उत्पन्न मायेय, तिरोधान शक्तिज और पर विन्दुज हैं। एक होते हुए भी अनेक शक्ति वाला है और नेत्र, क्रिया और आच्छादन के कारण कोमल है। ये पाश आत्मा (जीव) के अन्न के छिलके और कंचुक (खोल या आवरण) शरीर की रक्षा के लिए हैं या आवरण के लिए हैं। धर्म और अधर्म से संबन्ध रखने वाले कर्म विचित्र फल भोग देने वाले हैं। ये प्रवाह नित्य और बीजांकुर न्याय के समान अनिर्णय हैं। द्विज ! ये प्रथम पाश जिनके समीप नहीं जाते उनको सुनो। सच्चिदानन्द, परमात्मा सनातन, व्यापक, पर और सबका एक मात्र कारण पति (शंकर) हो इन पर विजय प्राप्त करता है। वह न तो किसी वस्तु की कामना करता है, न तो वृद्धि ही प्राप्त करता है प्रत्युत उसकी सेवा करने पर निवृत्ति (सुख) की प्राप्ति होती है। ऐसा शम्भु का उत्कृष्ट तेज है जो कि दृक् क्रिया रूप में वर्त्तमान है ॥१७-२६॥ उस शम्भु की अद्वितीय, आद्य और चिद्रूपा नाम की शक्ति है ऐसा आचार्य कहते हैं। उस शक्ति की प्रेरणा से दृक् (ज्ञान) और क्रिया स्वरूप विभु और अव्यय बिन्दु, जिसकी संज्ञा है शक्तिशाली होकर सम्पूर्ण तत्त्वों