बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 560, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिवष्टितमोऽध्यायः ५४१ मानसा ब्रह्मणः पुत्राः सनकाद्या मुनीश्वराः । चरंति लोकान्संसिद्धा लोकोद्धरणतत्पराः ॥३॥ नारदोऽपि महाभाग नित्यं कृष्णपरायणः । तेषां समागमे भद्रा का कथा लोकपावनी ॥४॥ सूत उवाच साधु पृष्टं महाभाग त्वया लोकोपकारिणा । कथयिष्यामि तत्सर्वं यत्पृष्टं नारदर्षिणा ॥५॥ श्रुत्वा सनंदनप्रोक्तान्मोक्षधर्मान्सनातनान् । नारदो भार्गवश्रेष्ठ पुनः पप्रच्छ तान्मुनीन् ॥६॥ नारद उवाच सर्वदेवेश्वरो विष्णुर्वेदे तंत्रे च कीर्तितः । समाराध्यः स एवात्र सर्वैः सर्वार्थकांक्षिभिः ॥७॥ कैर्मंत्रैर्भगवान्विष्णुः समाराध्यो मुनीश्वराः । के देवाः पुजनीयाश्च विष्णुपादपरायणैः ॥८॥ तंत्रं भागवतं विप्रा गुरुशिष्यप्रयोजकम् । दीक्षणं प्रातराद्यं च कृत्यं स्याद्यत्तदुच्यताम् ॥९॥ यैर्मासैः कर्मभिर्यैर्वा जप्यैर्होमादिभिस्तथा । प्रीयेत परमात्मा वै तद्ब्रूत मम मानदाः ॥१०॥ सूत उवाच एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य नारदस्य महात्मनः । सनत्कुमारो भगवानुवाचार्कसमद्युतिः ॥११॥ सनत्कुमार उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि तंत्रं भागवतं तव । यज्ज्ञात्वाऽमलया भक्त्या साधयेद्विष्णुमव्ययम् ॥१२॥ त्रिपदार्थं चतुष्पादं महातंत्रं प्रचक्षते । भोगमोक्षक्रियाचर्याद्विया पादाः प्रकीर्तिताः ॥१३॥
भ्रमण करते हैं ॥३॥ महाभाग, नारद भी नित्य कृष्ण प्रेम में मस्त रहने वाले भक्त हैं । तो उन लोगों की गोष्ठी में कौन मंगलमयी लोक-पावनी कथा हुई, उसको कहिये । ॥३-४॥ सूत बोले--महाभाग ! लोकोपकारी तुमने अति उत्तम प्रश्न पूछा, ऋषि नारद ने जो कुछ पूछा वह सब अवश्यमेव कहूँगा ॥५॥ सनन्दन के मुख से कहे गये सनातन मोक्षधर्म को सुनकर नारद ने पुनः उन मुनियों से पूछा ॥६॥ नारद बोले--वेद और तन्त्र (शास्त्र) में विष्णु को सब देवों का ईश्वर कहा गया है, और यह भी कहा गया है कि इस लोक में सब प्रकार के मनोरथों की इच्छा करने वाले सब व्यक्ति उनकी ही आराधना करें । ॥७॥ मुनीश्वर ! अब आप लोग यह बतायें कि किन मन्त्रों से भगवान् की आराधना करनी चाहिये । विष्णु चरणानुरागी किन देवों की पूजा करें ॥८॥ विप्रवर्य ! भागवत तन्त्र, गुरु-शिष्य भाव को दृढ़ करने वाली दीक्षा, प्रातःकाल आदि के अनुष्ठान कार्य आदि जो कुछ हों उनको कहिये ॥९॥ जिन कर्मों, जप या हवन से जिस मास में परमात्मा प्रसन्न होते हैं, उनको हे मानद, आपलोग अवश्य कहें ॥१०॥ सूत बोले--महात्मा नारद की इन बातों को सुनकर सूर्य के समान तेजस्वी सनत्कुमार बोले ॥११॥ नारद ! सुनो, मैं तुमको भागवत तन्त्र सुना रहा हूँ जिसको जानकर अपनी विमल भक्ति के द्वारा अव्यय विष्णु को प्रसन्न किया जा सकता है । ॥१२॥ महातंत्र को त्रिपदार्थ वाला और चतुष्पाद कहा जाता है, भोग मोक्ष, क्रिया और आचार्या ये चार पाद हैं । पदार्थ पशुपति, पशु और पाश तीन ही हैं । ॥१३॥ शिव को एकमात्र