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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 559, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 559

५४० नारदीयपुराणम् एवमुक्तः शुको विप्र नमस्कृत्य चतुर्भुजम् । यथागतं निवृत्तोऽसौ पितुरंतिकमागमत् ॥७४॥ अथ तं स्वांतिके दृष्ट्वा पाराशर्य्यः प्रतापवान् । पुत्रं प्राप्य प्रहृष्टात्मा तपसो निववर्त्त ह ॥७५॥ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । आरणेयसमायुक्तः स्वाश्रमं समुपागमत् ॥७६॥ नारायणनियोगात्तु त्वन्मुखेन मुनीश्वर । चकार संहितां दिव्यां नानाख्यानसमन्विताम् ॥७७॥ वेदतुल्यां भागवतीं हरिभक्तिविवर्द्धिनीम् । निवृत्तिनिरतं पुत्रं शुकमध्यापयच्च ताम् ॥७८॥ आत्मारामोऽपि भगवान्पाराशर्यात्मजः शुकः । अधीतवांसंहितां वै नित्यं विष्णुजनप्रियाम् ॥७९॥ एवमेते समाख्याता मोक्षधर्मास्तवानघ । पठतां शृण्वतां चापि हरिभक्तिविवर्द्धनाः ॥८०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे बृहदुपाख्याने मोक्षधर्मनिरूपणं नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥६२॥ ॥ समाप्तश्चायं द्वितीयः पादः ॥ ॥ अथ तृतीयः पादः ॥ अथ त्रिषष्टितमोऽध्यायः शौनक उवाच सूत साधो चिरंजीव सर्वशास्त्रविशारद । यत्त्वया पायिता विद्वन्वयं कृष्णकथामृतम् ॥१॥ श्रुत्वा तु मोक्षधर्मान्वै नारदो भगवत्प्रियः । सनंदनमुखोद्गीतान्किं पप्रच्छ ततः परम् ॥२॥

भगवान् विष्णु की इन बातों को सुनकर शुक ने चतुर्भुज वासुदेव को नमस्कार किया और जिस मार्ग से आये थे उसी मार्ग से लौट कर अपने पिता के समीप गये ॥७४॥ प्रतापी पराशर-पुत्र व्यास अपने पुत्र को अपने समीप देखकर प्रफुल्लित होगए और तपस्या से विरत हो गए। अनन्तर नारायण और नरोत्तम नर को नमस्कार कर अरणि-पुत्र शुक के सहित अपने आश्रम पर लौट आये ॥७५-७६॥ मुनीश्वर ! तुम्हारे द्वारा नारायण की आज्ञा प्राप्त कर व्यास ने नाना आख्यानों से युक्त, वेदतुल्य हरि भक्ति की वृद्धि या प्रचार करने वाली भागवती संहिता बनाई, और निवृत्तिप्रेमी अपने पुत्र शुक को पढ़ाया ॥७७-७८॥ पाराशर्य (व्यास)-पुत्र शुक ने आत्माराम होते हुए भी भक्तप्रिय उस संहिता का नित्य प्रति अध्ययन किया। अनघ ! इस भांति आज तुमको मोक्ष धर्म की व्याख्या सुनाई जिसके अध्ययन और श्रवण से हरि भक्ति की प्राप्ति या वृद्धि होती है । ॥७९-८०॥ श्री नारदीय महापुराण के पूर्वभाग के द्वितीयपाद में मोक्ष धर्म निरूपण नामक बासठवां अध्याय समाप्त ॥६२॥

अध्याय ६३ तृतीयपाद में पाशुपतदर्शनतत्त्व निरूपण शौनक ने कहा--सूत ! साधो ! सर्वशास्त्रविशारद ! चिरंजीवी होओ, क्योंकि हे विद्वन् ! आज तुमने हम लोगों को कृष्ण-कथामृत का पान कराया ॥१॥ सनन्दन के मुख से मोक्ष धर्म सुनने के अनन्तर भगवत्प्रिय नारद ने फिर क्या पूछा ॥२॥ ब्रह्मा के मानस पुत्र सिद्ध मुनीश्वर सनक आदि लोकोद्धार में लीन होकर लोकों में