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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 558, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 558

द्विषष्टितमोऽध्यायः ५३६ श्रीशाय श्रीनिवासाय भक्तवश्याय शार्ङ्गिणे । अष्टप्रकृत्यधीशाय ब्रह्मणेऽनंतशक्तये ॥५८॥ बृहदारण्यवेद्याय हृषीकेशाय वेधसे । पुंडरीकनिभाक्षाय क्षेत्रज्ञाय विभासिने ॥६०॥ गोविन्दाय जगत्कर्त्रे जगन्नाथाय योगिने । सत्याय सत्यसंधाय वैकुंठायाच्युताय च ॥६१॥ अधोक्षजाय धर्माय वामनाय त्रिधातवे । धृतार्चिषे विष्णवे तेऽनंताय कपिलाय च ॥६२॥ विरिंचये त्रिककुदे ऋग्यजुःसामरूपिणे । एकशृंगाय च शुचिश्रवसे शास्त्रयोनये ॥६३॥ वृषाकपय ऋद्धाय प्रभवे विश्वकर्मणे । भूर्भुवःस्वःस्वरूपाय दैत्यघ्ने निर्गुणाय च ॥६४॥ निरंजनाय नित्याय ह्यव्ययायाक्षराय च । नमस्ते पाहि मामीश शरणागतवत्सल ॥६५॥ इति स्तुतःस भगवान्छंखचक्रगदाधरः । आरणेयमुवाचेदं भृशं प्रणतवत्सलः ॥६६॥ व्यासपुत्र महाभाग प्रीतोऽस्मि तव सुव्रत । विद्यामाप्नुहि भक्तिं च ज्ञानी त्वं मम रूपधृक् ॥६७॥ श्रीभगवानुवाच यद्रूपं मम दृष्टं प्राक् श्वेतद्वीपे त्वया द्विज । सोऽहमेवावतारार्थं स्थितो विश्वंभरात्मकः ॥६८॥ सिद्धोऽसि त्वं महाभाग मोक्षधर्मानुचिंतया । वरलोकान्यथा वायुर्यथा खं सविता तथा ॥६९॥ नित्यमुक्तस्वरूपस्त्वं पूज्यमानः सुरैर्नरैः । न। भक्तिर्हि दुर्लभा लोके मयि सर्वपरापणे ॥७०॥ तां लब्ध्वा नापरं किंचिल्लभध्यमवशिष्यते । आकल्पांतः तपः संस्थो नरनारायणावृषी ॥७१॥ तयोर्निदेशतो व्यासो जनकस्तव सुव्रतः । कर्ता भागवतं शास्त्रं तवधीष्व भुवं व्रज ॥७२॥ स तप्यति तपस्त्वद्य पर्वते गंधमादने । त्वद्वियोगेन खिन्नात्मा तं प्रसादय मत्प्रियम् ॥७३॥ और बाहु वाले ॥५७-५८॥ श्रीश, श्रीनिवास, भक्तवश्य, शाङ्ग धारी, अष्ट प्रकृति के अधीश, ब्रह्मा, अनन्त शक्ति, बृहदारण्य के द्वारा जानने योग्य, हृषीकेश, बेधा, पुण्डरीक के समान नेत्र वाले, क्षेत्रज्ञ, विशिष्ट कान्ति वाले ॥५९- ६०॥ गोविन्द, जगत्कर्ता, जगन्नाथ, योगी, सत्य, सत्यप्रतिज्ञ, वैकुण्ठरूप, अच्युत, अधोक्षज, धर्म, वामन, त्रिधातु, तेज धारण करने वाले, विष्णु, अनन्त, कपिल ॥६१-६२॥ विरिंचि, त्रिककुद्, ऋग्, यजु ओर साम स्वरूप, एक शृंग (शृंगीरूप) शुचिश्रवा, शास्त्रयोनि, वृषाकपि, ऋद्ध, प्रभु, विश्वकर्मा, भूः भुवःस्वः स्वरूप, दैत्यहन्ता, निर्गुण ॥६३- ६४॥ निरञ्जन, नित्य, अव्यय और अक्षर को नमस्कार है। ईश ! शरणागत-वत्सल ! मेरी रक्षा करें ॥६५॥ शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् की इस प्रकार स्तुति करने पर अत्यन्त भक्तवत्सल भगवान् ने शुक से कहा-॥६६॥ श्री भगवान् बोले- व्यासपुत्र ! महाभाग ! सुव्रत ! तुम पर मैं प्रसन्न हूँ। ज्ञानी, तुम मेरे रूप को धारण कर विद्या और भक्ति को प्राप्त करो ॥६७॥ द्विज ! तुमने पूर्वकाल में श्वेत द्वीप में मेरे जिस रूप का दर्शन किया था, वही विश्वम्भर रूप में अवतार धारण करने के लिए स्थित हूँ ॥६८॥ महाभाग ! तुम मोक्ष धर्म की चिन्ता के द्वारा अब सिद्ध हो गए हो । जिस प्रकार वायु ने श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त किया, सविता (सूर्य) ने आकाश को उसी प्रकार सुर और नरों के पूज्य तुम भी नित्य मुक्त स्वरूप हो जाओ । ॥६९३॥ इस लोक में मुझमें सर्वात्मना लीन रहने वाले व्यक्तियों के लिए भी भक्ति दुर्लभ है। भक्ति को पा जाने पर इस लोक में दूसरी किसी भी वस्तु की कामना शेष नहीं रह जाती है अर्थात् सब पदार्थ मिल जाते हैं ॥७०३॥ ऋषि नर और नारायण कल्पान्त तक तपस्या करने के उद्देश्य से तप कर रहे हैं। उनके ही आदेश से तुम्हारे सुव्रती पिता व्यास भागवत शास्त्र का निर्माण करेंगे । भूलोक में जाओ और उसी का अध्ययन करो ॥७१-७२॥ इस समय व्यास जी गंध- मादन पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं, तुम्हारे वियोग से खिन्न, मेरे प्रिय व्यास को प्रसन्न करो । ॥७३॥ विप्र !