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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 557, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 557

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५३८ नारदीयपुराणम् वैमानिकैः सुरैर्जुष्टं विरजापरिवेष्टितम् । यं भांतमनुभांत्येते लोकाः सर्वेऽपि नारद ॥४३॥ यत्र विद्रुमसोपानाः स्वर्णरत्नविचित्रिताः । वाप्य उत्पलसंछन्नाः सुरस्त्रीक्रीडनाकुलाः ॥४४॥ दिव्यैर्हंसकुलैर्घृष्टाः स्वच्छाम्बुनिभृताः सदा । तत्र द्वाःस्थैश्चतुर्हस्तैर्नानाभरणभूषितैः ॥४५॥ विष्वक्सेनानुगैः सिद्धैः कुमुदाद्यैरवारितः । प्रविश्याभ्यंतरं तत्र देवदेवं चतुर्भुजम् ॥४६॥ शांतं प्रसन्नवदनं पीतकौशेयवाससम् । शंखचक्रगदापद्ममूर्तिमद्भिरुपासितम् ॥४७॥ वक्षःस्थलस्थया लक्ष्म्या कौस्तुभेन विराजितम् । कटिसूत्रब्रह्मसूत्रकटकांगदभूषितम् ॥४८॥ भ्राजत्किरीटवलयं मणिनूपुरशोभितम् । ददर्श सिद्धनिकरैः सेव्यमानमहर्निशम् ॥४६॥ तं दृष्ट्वा भक्तिभावेन तुष्टाव मधुसूदनम् । नमस्ते वासुदेवाय सर्वलोकैकसाक्षिणे ॥५०॥ शुक उवाच जगद्बीजस्वरूपाय पूर्णाय निभृतात्मने । हरये वासुकिस्थाय श्वेतद्वीपनिवासिने ॥५१॥ हंसाय मत्स्यरूपाय वाराहतनुधारिणे । नृसिंहाय ध्रुवेज्याय सांख्ययोगेश्वराय च ॥५२॥ चतुःसनाय कूर्माय पृथवे स्वसुखात्मने । नाभेयाय जगद्धात्रे विधात्रेऽन्तकराय च ॥५३॥ भार्गवेन्द्राय रामाय राघवाय पराय च । कृष्णाय वेदकर्त्रे च बुद्धकलिकस्वरूपिणे ॥५४॥ चतुर्व्यूहाय वेद्याय ध्येयाय परमात्मने । नरनारायणाख्याय शिपिविष्टाय विष्णवे ॥५५॥ ऋतधाम्ने विधाम्ने च सुपर्णाय स्वरोचिषे । ऋषभवे सुव्रताख्याय सुधाम्ने चाजिताय च ॥५६॥ विश्वरूपाय विश्वाय सृष्टिस्थित्यंतकारिणे । यज्ञाय यज्ञभोक्त्रे च स्थविष्ठायानवेऽर्थिने ॥५७॥ आदित्यसोमनेत्राय सहस्रोजोबलाय च । ईज्याय साक्षिणेऽजाय बहुशीर्षांघ्रिबाहवे ॥५८॥ देवों द्वारा वन्दित और विरजा का प्रिय लोक है, जिसके प्रकाश से सब लोक प्रकाशित होते हैं । ॥४३॥ जहाँ की बावलियों की सीढ़ियाँ विद्रुम की बनी हैं जिनमें स्वर्ण और रत्न जड़े हुए हैं, जिनका जल देवाङ्गनाओं की जल- क्रीड़ा के कारण क्षुब्ध रहता है ॥४४॥ जो दिव्य कलहंसों के कलरव से मुखरित और निर्मल जल से सदा परि- पूर्ण रहती हैं। वहाँ जाने पर द्वार पर स्थित नाना आभूषणों से आभूषित, चतुर्भुज, विष्वक्सेन के अनुचर कुमुद आदि सिद्धों ने सम्मानपूर्वक भीतर जाने दिया । भीतर जाकर उन्होंने शान्त, प्रसन्न वदन, पीत-कौशेय-वस्त्र- धारी, मूर्तिमान् शंख चक्र गदा पद्म से सेवित, वक्षःस्थल पर स्थित लक्ष्मी और कौस्तुभ मणि से सुशोभित, कटि सूत्र, ब्रह्मसूत्र, वलय, अंगद से आभूषित, किरीट वलय और मणि के बने नूपुरों से अलङ्कृत मधुसूदन को देखा जिनकी सेवा में सिद्धगण अहर्निश लगे हुए थे । उस भगवान् को देखकर शुक ने भक्तिपूर्वक स्तुति प्रारम्भ की । ॥४५-४९॥ शुक बोले—सब लोकों के एक मात्रसाक्षी वासुदेव को नमस्कार है ॥५०॥ जगत् के बीजस्वरूप, पूर्ण, अन्तरातमा, हरि, वासुकि के ऊपर स्थित, श्वेतद्वीप-निवासी, हंस, मत्स्यरूप, वाराह शरीर धारण करने वाले नृसिंह, ध्रुव के पूज्य, सांख्य योग के ईश्वर ॥५१-५२॥ सनकादि चार रूप वाले (१) कूर्म, पृथु, आत्माराम, नाभेय, जगद्धाता, विधाता, अन्तकर, भार्गव, इन्द्र, राम, राघव, परात्पर कृष्ण, वेदव्यास, बुद्ध, कलिकरूपधारी ॥५३-५४॥ चतुर्व्यूह, वेद्य, ध्येय, परमात्मा, नर-नारायण, शिपिविष्ट, विष्णु, ऋतुधाम, विधाम, सुपर्ण, स्वयं प्रकाश, ऋषभ, सुव्रत, सुधामा, अजित ॥५५-५६॥ विश्वरूप, विश्व, सृष्टि-स्थिति-संहारकारी, यज्ञ, यज्ञभोक्ता, स्थविष्ठ, अणु अर्थी, आदित्य और सोमरूपी नेत्र वाले, साहस, ओज और बल वाले, पूज्य, साक्षी, अज, अनन्त शिव, चरण