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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 556

द्विषष्टितमोऽध्यायः ५३७ शुकः सर्वगतिर्भूत्वा सर्वात्मा सर्वतोमुखः । प्रत्यभाषत धर्मात्मा भो शब्देनानुनादयन् ॥२६॥ तत एकाक्षरं नादं भोरित्येवमुदीरयन् । प्रत्याहरज्जगत्सर्वमुच्चैः स्थावरजंगमम् ॥३०॥ ततःप्रभृति वाद्यापि शब्दानुच्चारितान्पृथक् । गिरिगह्वरपृष्ठेषु व्याजहार शुकं प्रति ॥३१॥ अंतर्हितप्रभावं तं दर्शयित्वा शुकस्तदा । गुणान्संत्यज्य सत्त्वादीन्पदमध्यगमत्परम् ॥३२॥ महिमानं तु तं दृष्ट्वा पुत्रस्यामिततेजसः । सोऽनुनीतो भगवता व्यासो रुद्रेण नारद ॥३३॥ किमु त्वं ताम्यसि मुने पुत्रं प्रति समाकुलः । पश्यसि विप्र नायांतं ब्रह्मभूतं निजांतिके ॥३४॥ इत्येवमनुनीतोऽसौ व्यासः पुनरुपाव्रजत् । स्वाश्रमं स शुको ब्रह्मभूतो लोकांश्चचार ह ॥३५॥ तत कालांतरे ब्रह्मन्व्यासः सत्यवतीसुतः । नरनारायणौ द्रष्टुं ययौ बदरिकाश्रमम् ॥३६॥ तत्र दृष्ट्वा तु तौ देवौ तप्यमानो महत्तपः । स्वयं च तत्र तपसि स्थितः शुकमनुस्मरन् ॥३७॥ यावत्तत्र स्थितो व्यासःशुकःपरमयोगवित् । श्वेतद्वीपं गतस्तात यत्र त्वमगमः पुरा ॥३८॥ तत्र दृष्टप्रभावस्तु श्रीमन्नारायणः प्रभुः । दृष्टः श्रुतिविमृग्यो हि देवदेवो जनार्दनः ॥३६॥ स्तुतश्च शुकदेवेन प्रसन्नः प्राह नारद । त्वया दृष्टोऽस्मि योगीन्द्र सर्वदेवरहःस्थितः ॥४०॥ श्रीभगवानुवाच सनत्कुमारादिष्टेन सिद्धो योगेन वाडव । त्वं सदागतिमार्गस्थो लोकान्पश्य यथेच्छया ॥४१॥ इत्युक्तो वासुदेवेन तं नत्वारणिसंभवः । वैकुंठं प्रययौ विप्र सर्वलोकनमसकृतम् ॥४२॥ प्रतिध्वनित हो उठे । सर्वात्मा, सर्वतोमुख (चारों ओर मुख वाले) धर्मात्मा शुक ने सर्वत्र गति होकर 'भोः' शब्द का उच्चारण किया उनकी इस 'भोः' एकाक्षर ध्वनि के अनन्तर ही सारे स्थावर जंगमात्मक जगत् ने उच्च स्वर से ऐसी ही प्रतिध्वनि को ।।२८-३०।। उसी समय से आज तक शुक की ध्वनि के प्रतिध्वनि करने के कारण पर्वतों की गुफाओं में शब्द ध्वनि करने पर पृथक्-पृथक् प्रतिध्वनि निकलती है ।।३१।। उस समय अपने योग के गुप्त प्रभाव को दिखाकर शुक देव ने सत्त्व आदि गुणों का परित्याग कर परम पद को प्राप्त कर लिया ।।३२।। नारद ! अमित तेजस्वी अपने पुत्र की योग महिमा को देख कर व्यास जी आश्चर्यचकित हो गए। यह देखकर भगवान् रुद्र ने व्यास को समझाया ।।३३।। कि मुने ! तुम क्यों पुत्र स्नेह से आकुल होकर इस प्रकार खेद कर रहे हो ? विप्र ! क्या तुम अपने पुत्र को ब्रह्म रूप में अपने पास आते हुए नहीं देख रहे हो ।।३४।। इस प्रकार रुद्र से समझाये जाने पर व्यास जी पुनः अपने आश्रम को लौट आये । वह शुक देव भी ब्रह्ममय होकर लोक में विचरण करने लगे ।।३५।। कुछ समय बीत जाने पर सत्यवती-सुत व्यास जी नर नारायण का दर्शन करने के लिये बदरिकाश्रम को गए ।।३६।। वहाँ उन दोनों देवों को महान् तपस्या में लीन देखकर स्वयं व्यास भी शुक का स्मरण करते हुए वहीं पर तप करने लगे ।।३७।। तात ! जितनी देर तक व्यास जी वहाँ तपस्या करते रहे उतने समय में शुकदेव जी श्वेत द्वीप को चले गये जहाँ पर आज से बहुत पहले तुम गये थे ।।३८।। वहाँ दृष्ट प्रभाव वाले श्रुतियों के वन्द्य और उनके द्वारा खोजने योग्य देवदेव जनार्दन नारायण प्रभु ने शुकदेव को दर्शन दिये और शुकदेव की स्तुति से प्रसन्न होकर बोले ।।३९३॥ योगीन्द्र ! तुमने सब देवताओं से एकान्त में रहने वाले मेरा दर्शन प्राप्त कर लिया ।।४०।। ब्राह्मण ! तुमने सनत्कुमार द्वारा दिखाये गये योगपथ से सिद्धि भी प्राप्त कर ली। अब तुम वायु मार्ग पर स्थित होकर इच्छानुकूल लोकों का अवलोकन करो ।।४१।। वासुदेव ने अरणिसंभव शुक को इस प्रकार का वरदान दिया । विप्र ! शुक भी उन्हें प्रणाम करके सब लोकों में श्रेष्ठ वैकुण्ठ लोक में गये ।।४२।। नारद ! जो विमान विहारी ६८ ना० पु०