बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
त्रिवष्टितमोऽध्यायः ५४१ मानसा ब्रह्मणः पुत्राः सनकाद्या मुनीश्वराः । चरंति लोकान्संसिद्धा लोकोद्धरणतत्पराः ॥३॥ नारदोऽपि महाभाग नित्यं कृष्णपरायणः । तेषां समागमे भद्रा का कथा लोकपावनी ॥४॥ सूत उवाच साधु पृष्टं महाभाग त्वया लोकोपकारिणा । कथयिष्यामि तत्सर्वं यत्पृष्टं नारदर्षिणा ॥५॥ श्रुत्वा सनंदनप्रोक्तान्मोक्षधर्मान्सनातनान् । नारदो भार्गवश्रेष्ठ पुनः पप्रच्छ तान्मुनीन् ॥६॥ नारद उवाच सर्वदेवेश्वरो विष्णुर्वेदे तंत्रे च कीर्तितः । समाराध्यः स एवात्र सर्वैः सर्वार्थकांक्षिभिः ॥७॥ कैर्मंत्रैर्भगवान्विष्णुः समाराध्यो मुनीश्वराः । के देवाः पुजनीयाश्च विष्णुपादपरायणैः ॥८॥ तंत्रं भागवतं विप्रा गुरुशिष्यप्रयोजकम् । दीक्षणं प्रातराद्यं च कृत्यं स्याद्यत्तदुच्यताम् ॥९॥ यैर्मासैः कर्मभिर्यैर्वा जप्यैर्होमादिभिस्तथा । प्रीयेत परमात्मा वै तद्ब्रूत मम मानदाः ॥१०॥ सूत उवाच एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य नारदस्य महात्मनः । सनत्कुमारो भगवानुवाचार्कसमद्युतिः ॥११॥ सनत्कुमार उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि तंत्रं भागवतं तव । यज्ज्ञात्वाऽमलया भक्त्या साधयेद्विष्णुमव्ययम् ॥१२॥ त्रिपदार्थं चतुष्पादं महातंत्रं प्रचक्षते । भोगमोक्षक्रियाचर्याद्विया पादाः प्रकीर्तिताः ॥१३॥
भ्रमण करते हैं ॥३॥ महाभाग, नारद भी नित्य कृष्ण प्रेम में मस्त रहने वाले भक्त हैं । तो उन लोगों की गोष्ठी में कौन मंगलमयी लोक-पावनी कथा हुई, उसको कहिये । ॥३-४॥ सूत बोले--महाभाग ! लोकोपकारी तुमने अति उत्तम प्रश्न पूछा, ऋषि नारद ने जो कुछ पूछा वह सब अवश्यमेव कहूँगा ॥५॥ सनन्दन के मुख से कहे गये सनातन मोक्षधर्म को सुनकर नारद ने पुनः उन मुनियों से पूछा ॥६॥ नारद बोले--वेद और तन्त्र (शास्त्र) में विष्णु को सब देवों का ईश्वर कहा गया है, और यह भी कहा गया है कि इस लोक में सब प्रकार के मनोरथों की इच्छा करने वाले सब व्यक्ति उनकी ही आराधना करें । ॥७॥ मुनीश्वर ! अब आप लोग यह बतायें कि किन मन्त्रों से भगवान् की आराधना करनी चाहिये । विष्णु चरणानुरागी किन देवों की पूजा करें ॥८॥ विप्रवर्य ! भागवत तन्त्र, गुरु-शिष्य भाव को दृढ़ करने वाली दीक्षा, प्रातःकाल आदि के अनुष्ठान कार्य आदि जो कुछ हों उनको कहिये ॥९॥ जिन कर्मों, जप या हवन से जिस मास में परमात्मा प्रसन्न होते हैं, उनको हे मानद, आपलोग अवश्य कहें ॥१०॥ सूत बोले--महात्मा नारद की इन बातों को सुनकर सूर्य के समान तेजस्वी सनत्कुमार बोले ॥११॥ नारद ! सुनो, मैं तुमको भागवत तन्त्र सुना रहा हूँ जिसको जानकर अपनी विमल भक्ति के द्वारा अव्यय विष्णु को प्रसन्न किया जा सकता है । ॥१२॥ महातंत्र को त्रिपदार्थ वाला और चतुष्पाद कहा जाता है, भोग मोक्ष, क्रिया और आचार्या ये चार पाद हैं । पदार्थ पशुपति, पशु और पाश तीन ही हैं । ॥१३॥ शिव को एकमात्र
५४२ नारदीयपुराणम् पदार्थांस्तु पशुपतिः पशुपाशास्त्रय एव हि । पतिस्तत्र शिवोह्येको जीवास्तु पशवः स्मृताः ॥१४॥ यावन्मोहादिसंयोगाः स्वरूपाबोधलक्षणाः । तावत्पशुत्वमेतेषां द्वैतवत्पश्य नारद ॥१५॥ पाशाः पंचविधास्तेषां प्रत्येकं तेषु लक्षणम् । पशवस्त्रिविधाश्चापि विज्ञाताः कलसंज्ञिकाः ॥१६॥ तलपाकलसंज्ञश्च सकलश्चेति नामतः । तत्राद्यो मलसंयुक्तो मलकर्मयुतः परः ॥१७॥ मलमायाकर्मयुतस्तृतीयः परिकीर्तितः । आद्यस्तु द्विविधस्तत्र समासकलुषस्तथा ॥१८॥ असमासमलश्चेति द्वितीयोऽपि पुनस्तथा । पक्वापक्वमलेनैव द्विविधः परिकीर्तितः ॥१९॥ शुद्धेऽध्वनि गतावेतो विज्ञानप्रलयाकलौ । कलादितत्त्वनियततः सकलः पर्यटत्ययम् ॥२०॥ कर्मानुगशरीरेषु तत्तद्भुवनगेषु च । पाशाः पंच तथा तत्र प्रथमौ मलकर्मजौ ॥२१॥ मायेयश्च तिरोधानशक्तिजो बिंदुजः परः । एकोऽप्यनेक शक्तिदृग्विक्रियाच्छादनकोमलः ॥२२॥ तुषकंचुकवद्देहनिमित्तं चात्मनामिह । धर्माधर्मात्मकं कर्म विचित्रफलभोगदम् ॥२३॥ प्रवाइनित्यं तद्बीजांकुरन्यायेन संस्थितम् । इत्येतौ प्रथमौ चाथ मायेयाद्यान् शृणु द्विज ॥२४॥ सच्चिदानंदविभवः परमात्मा सनातनः । पतिर्जयति सर्वेषामेको बीजं विभुः परम् ॥२५॥ मनस्यति न चोदेति निवृत्तिं च प्रयच्छति । वर्वत्ति दृक्क्रियारूपं तत्तेजः शांभवं परम् ॥२६॥ शक्तो मया हरौ भक्तो मुक्तो पशुगणस्थ हि । तच्छक्तिमाद्यामेकांतां विद्रूपाख्यां वदंति हि ॥२७॥ तया चोज्जृंभितो बिंदुर्द्विविक्रियात्मा शिवाभिधः । अशेषतत्त्वजातस्य कारणं विभुरव्ययम् ॥२८॥ पशु-पति और जीव को आचार्यों ने पशु कहा है ॥१४॥ नारद ! जब तक स्वरूप बोध में बाधा पहुँचाने वाले मोह आदि से जीव बद्ध हैं, तब तक इन जीवों में पशुभाव द्वैतभाव की भांति बना ही रहता है, इसको तुम भी विचारो । ॥१५॥ उन पशुओं (जीवों) के पाश भी पांच प्रकार के हैं जिनमें प्रत्येक के लक्षण भिन्न हैं। पशु भी तीन प्रकार के माने गये हैं जिनकी कल संज्ञा है ॥१६॥ तल, पाकल और सकल इनकी संज्ञायें (नाम) हैं। इनमें प्रथम मल से युक्त रहता है, दूसरा मल और कर्म से और तीसरा मल, माया और कर्म से । इनमें पहला समास कलुष और असमास कलुष भेद से दो प्रकार का है। दूसरे के भी दो भेद हैं असमास और मल । सकल के भी दो भेद हैं पक्व मल और अपक्व मल । ये विज्ञान और प्रलयकल शुद्ध मार्ग पर चले गये । कला आदि तत्वों पर अटल रहने वाले सकल जीव अपने कर्मानुकूल शरीरों में भिन्न-भिन्न लोकों में कर्म भोग के लिये जाते हैं । पाश पांच प्रकार के हैं, उनमें पहले दो मल और कर्म से उत्पन्न मायेय, तिरोधान शक्तिज और पर विन्दुज हैं। एक होते हुए भी अनेक शक्ति वाला है और नेत्र, क्रिया और आच्छादन के कारण कोमल है। ये पाश आत्मा (जीव) के अन्न के छिलके और कंचुक (खोल या आवरण) शरीर की रक्षा के लिए हैं या आवरण के लिए हैं। धर्म और अधर्म से संबन्ध रखने वाले कर्म विचित्र फल भोग देने वाले हैं। ये प्रवाह नित्य और बीजांकुर न्याय के समान अनिर्णय हैं। द्विज ! ये प्रथम पाश जिनके समीप नहीं जाते उनको सुनो। सच्चिदानन्द, परमात्मा सनातन, व्यापक, पर और सबका एक मात्र कारण पति (शंकर) हो इन पर विजय प्राप्त करता है। वह न तो किसी वस्तु की कामना करता है, न तो वृद्धि ही प्राप्त करता है प्रत्युत उसकी सेवा करने पर निवृत्ति (सुख) की प्राप्ति होती है। ऐसा शम्भु का उत्कृष्ट तेज है जो कि दृक् क्रिया रूप में वर्त्तमान है ॥१७-२६॥ उस शम्भु की अद्वितीय, आद्य और चिद्रूपा नाम की शक्ति है ऐसा आचार्य कहते हैं। उस शक्ति की प्रेरणा से दृक् (ज्ञान) और क्रिया स्वरूप विभु और अव्यय बिन्दु, जिसकी संज्ञा है शक्तिशाली होकर सम्पूर्ण तत्त्वों
त्रिषष्टितमोऽध्यायः ५४३ अस्मिन्निलीना निखिला इच्छायाः शक्तयः स्वकम् । कृत्यं कुर्वन्ति तेनेदं सर्वानुग्राहकं मुने ॥२८॥ चिज्जडानुपग्रहार्थाय यस्य विश्वं सिसृक्षतः । आद्योन्मेषोऽस्य नादात्मा शांत्यादिभुवनात्मकः ॥३०॥ तच्छक्तितत्त्वं विप्रेन्द्र प्रोक्तं सावयवं परम् । ततो ज्ञानक्रियाशक्त्योस्तथोत्कर्षोपकर्षयोः ॥३१॥ प्रसरश्चाप्यभावेन तत्त्वं चैतत्सदाशिवम् । दृक्शक्तियंत्र न्यूनता क्रियाशक्तिर्विशिष्यते ॥३२॥ ईश्वराख्यं तु तत्तत्त्वं प्रोक्तं सर्वार्थकत्कृकम् । यत्र क्रिया हि न्यूनाता ज्ञानाख्योद्रेकमश्नुते ॥३३॥ तत्तत्त्वं चैव विद्याख्यं ज्ञानरूपं प्रकाशकम् । नादो बिंदुश्च सकलः सदाख्यं तत्त्वमाश्रितौ ॥३४॥ विद्येशाः पुनरैशं तु मंत्रा विद्याभिधं पुनः । इमानि चैव तत्त्वानि शुद्धाध्वेति प्रकीर्तितम् ॥३५॥ साक्षान्निमित्तमीशोऽत्रेत्युपादानसंर्बिदुराट् । पंचानां कालरहित्यात्क्रमो नास्तीति निश्चितम् ॥३६॥ व्यापारवसतो ह्येषां विहिता खलु कल्पना । तत्त्वं वस्तुत एकं तु शिवाख्यं चित्तशक्तिकम् ॥३७॥ शक्तं यां वृत्तिभेदात्तु विहिताः खलु कल्पनाः । चिज्जडानुग्रहार्थाय कृत्वा रूपाणि वै प्रभुः ॥३८॥ अनादिमलरुद्धानां कुरुतेऽनुग्रहं चिताम् । मुक्तिं भुक्तिं च विश्वेषां स्वव्यापारे समर्थताम् ॥३९॥ विधत्ते जडवर्गस्य सर्वानुग्राहकः शिवः । शिवसामान्यरूपो हि मोक्षस्तु चिदनुग्रहः ॥४०॥ सोऽनादित्वात्कर्मणो हि तत्तद्भोगं विना भवेत् । तेनानुग्राहकः शम्भुस्तद्मुक्त्यै प्रभुरव्ययः ॥४१॥ कुरुते सूक्ष्मकरणभुवनोत्पत्तिमंजसा । कर्त्तोपादानकरणैर्विना कार्यं न दृश्यते ॥४२॥ शक्तयः करणं चात्र मायोपादानमिष्यते । नित्यैका च शिवा शक्त्या ह्यनादिनिधना सती ॥४३॥ का कारण अर्थात् उत्पादक होता है। इस शिव में लीन सम्पूर्ण इच्छा शक्तियां अपने-अपने कार्य को करती हैं इसलिए यह सब पर अनुग्रह करने वाला है ॥२७-२९॥ विश्व सृष्टि की इच्छा करने वाले जिस शिव का जड़ और चेतन पर अनुग्रह करने के अभिप्राय से नाद रूप में शान्ति, सुख और भुवन के रूप में सर्व प्रथम उद्भव हुआ, विप्रेंद्र ! उस शिव का पर शक्तितत्त्व सावयव है। उसे शक्तितत्त्व से ज्ञान और क्रिया शक्ति तथा उत्कर्ष एवं अपकर्ष का विस्तार हुआ । वह मूलभूत तत्त्व सदाशिव है जिसमें दृक् शक्ति के दुर्बल होने पर क्रिया शक्ति प्रबल हो जाती है ॥३०-३२॥ वह ईश्वर तत्त्व सब पदार्थों का कर्ता है। जिसमें क्रिया शक्ति के दुर्बल होने पर ज्ञान शक्ति की प्रभा- नता होती है। वह तत्त्व विद्या रूप, ज्ञान रूप और प्रकाशक है। नाद, बिन्दु और सकल, सत् नामक तत्त्व के आश्रय में रहते हैं और विद्येश मन्त्र विद्यानामक ऐश तत्त्व के आश्रित हैं। ये ही तत्त्व शुद्ध अध्वा (पथ) कहे गये हैं ॥३३-३५॥ इस शुद्ध पंथ का साक्षात् कारण ईश (शिव) है और वह बिन्दुराट् उपादान कारण है । इन पाँचों का काल से कुछ भी संबन्ध न होने के कारण कोई क्रम नहीं है ऐसा निश्चित है । इनकी क्रिया के कारण इनके विषय में कल्पना की गई है । वस्तुतः तत्त्व एक ही है जिसकी शक्तियां भिन्न-भिन्न हैं। जिस शक्तिशाली तत्त्व के विषय में वृत्तिभेद के कारण कल्पनायें की गई हैं, वह प्रभु जड़ और चेतन पर अनुग्रह करने के लिए विभिन्न रूप धारण कर अनादि मल से रुद्ध चेतन जीव पर अनुग्रह करता है। सब पर अनुग्रह करने वाला शिव सब को भुक्ति और मुक्ति प्रदान करता है और जड़ समूह को अपने कार्य में समर्थ बनाता है। अर्थात् जड़ पदार्थ पर भी अनुग्रह कर उनको कार्य योग्य बनाता है । शिव का सामान्य रूप प्राप्त करना हो मोक्ष है, वह मोक्ष क्या है, चेतन पर शिव का अनुग्रह ॥३६-४०॥ वह मोक्ष कर्मों के अनादि होने के कारण कर्म भोग के बिना भी भगवत कृपा से होता है । [तात्पर्य यह है कि जब तक कर्म भोग रहेगा तब तक मोक्ष असम्भव है।] जब शिव के अनुग्रह से कर्म भोग का संबन्ध छूट जाता है तब मोक्ष प्राप्त होता है ।] इसलिए अनुग्रहकर्त्ता, प्रभु, अव्यय शिव कर्म भोग के लिए सम्पूर्ण रूप से सूक्ष्म करणों के द्वारा भुवनों की सृष्टि करता है। बिना कर्त्ता और उपादान कारण के कार्य की उत्पत्ति नहीं देखी गई है ॥४१-४२॥ शक्तियां करण और
५४४ नारदीयपुराणम् साधारणीनराणां वै भुवनानां च कारणम् । स्वभावान्मोहजननी स्वचित्तानजनकर्मभिः ॥४४॥ विभ्वी सूक्ष्मा परा माया विकृतेः परतस्तु सा । कर्माण्यावेक्ष्य विद्येशो मायां विक्षोभ्य शक्तिभिः ॥४५॥ विधत्ते जीवभोगार्थं वपूंषि करणानि च । सृजत्यादौ कालतत्त्वं नानाशक्तिमयी च सा ॥४६॥ भावि भूतं भवच्चैदं जगत्कलयते लयम् । सूते ह्यनन्तरं माया शक्ति नियमतात्मिकाम् ॥४७॥ सर्वं नियमयत्येषा तेनेयं नियतिः स्मृता । अनन्तरं हि सा माया नित्या विश्वविमोहिनी ॥४८॥ अनादिनिधना तत्त्वं कलाख्यं जनयत्यपि । एकतस्तु नृणां येन कलयित्वा मलं ततः ॥४६॥ कर्तृशक्तिं व्यंजयति तेनेदं तु कलाभिधम् । कालेन च नियत्योपसर् गतां समुपेतया ॥५०॥ व्यापारं विदधात्येषा भूपर्यंतं स्वकीयकम् । प्रदर्शनाय वै पुंसो विषयाणां च सा पुनः ॥५१॥ प्रकाशरूपं विद्याख्यं तत्त्वं सूते कलैव हि । विद्या त्वावरणं भित्त्वा ज्ञानशक्तेःस्वकर्मणा ॥५२॥ विषयान्दर्शयत्येषात्मनांशाकारणं ह्यतः । करोति भोग्यं येनासौ करणेन परेण वै ॥५३॥ उद्बुद्धशक्तिः पुरुषः प्रचोद्य महदादिकान् । भोग्ये भोगं च भोक्तारं तत्परं करणं तु सा ॥५४॥ भोग्यस्य भोग्यतिर्मासाच्चिद्व्यक्तिर्भोग उच्यते । सुखादिरूपा विषयाकारा बुद्धिः समासतः ॥५५॥ भोग्यं भोक्तुश्च स्वेनैव विद्याख्यं करणं तु तत् । यद्यर्कवत्प्रकाशा धीः कर्तृत्वाच्च तथापि हि ॥५६॥ करणान्तरसापेक्षा शक्ता ग्राहयितुं च तम् । संबन्धात्कारणाद्यैस्तद्द्मगोत्सुक्येन चोदनात् ॥५७॥ माया उपादान कारण हैं। वह माया अपनी शक्ति के कारण नित्य, एक, अनादि, अनन्त है। वह साधारणी शक्ति नर और सम्पूर्ण भुवनों की जननी (कारण है।) वह अपने स्वभाव के कारण अपनी बुद्धि से और जनों के कृत कर्म से मोह को उत्पन्न करने वाली है। स्वयं वह व्यापक, सूक्ष्म परा, माया और विकारग्रस्त वस्तुओं से परे रहने वाली है। अर्थात् स्वयं वह विकृत नहीं होती । विद्येश शिव कर्मों को देखकर अपनी शक्ति से माया को क्षुब्ध कर (जाग्रत) कर जीवों के कर्म भोग के लिये शरीर और करण (इन्द्रियों) को उत्पन्न करते हैं। वह नाना शक्ति से सम्पन्न माया प्रारम्भ में कालतत्त्व को उत्पन्न करती है। वह भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान के रूप में विभक्त होकर इस संसार का लय करता है। तदनन्तर वह माया नियमनात्मिका शक्ति को उत्पन्न करती है। यह सब को अनुशासन में रखती है इसीलिये इसका नाम नियति भी है। पुनः वह नित्य विश्वविमोहिनी माया और अनादि निधना माया कला नामक तत्त्व को जनती है। वह जिस कारण मनुष्यों के मलों (कर्मों) की गणना करके कर्तृशक्ति को व्यक्त (प्रकट) करती है अतः उसका नाम कला है।॥४३-४९३॥ काल, सृष्टि करने वाली कर्तृ शक्ति और नियति के द्वारा कला भूतल तक अपने व्यापार को फैलाती है। [तात्पर्य यह है कि माया भू पर्यन्त सृष्टि कर सर्वत्र अपनी धाक जमा लेती है ।] तदनन्तर वही कला मनुष्यों को विषयों का ज्ञान कराने के लिए प्रकाश रूप विद्या तत्त्व को उत्पन्न करती है। विद्या अपने कर्म के ज्ञान शक्ति से आवरण का भेदन कर जीवात्माओं के विषयों का दर्शन कराती है, इसलिए वह कारज मानी गई है, क्योंकि वह पर करणों से भोग्य वस्तु का निर्माण करती है। पुरुष की शक्ति जब जाग्रत हो जाती है तब वह महत् आदि तत्त्वों को प्रेरित कर भोग्य, भोग और इसके अनन्तर करणों (इन्द्रियों), को बनाता है। जिसका उपभोग किया जाता उसको भोग्य और चिद्व्यक्ति को भोग कहते हैं। संक्षेप से विषयाकारा बुद्धि ही सुख-दुःख आदि के रूप में परिणत होती है ॥५०-५५॥ भोक्ता को भोग्य अपने ही कर्म से प्राप्त होता है, विद्या उसमें सहायक मात्र होती । यद्यपि प्रकाश सूर्य के समान स्वयं प्रकाश है तथापि धीः उस प्रकाश ग्रहण करने में अन्य कारणों के सहयोग से ही ग्रहण करने में समर्थ होती है क्योंकि प्रकाश को ग्रहण करना एक
त्रिषष्टितमोऽध्यायः ५४५ तच्चेष्टाफलयोगाच्च संसिद्धा कर्तृतास्य तु । अकर्तृत्वम्युपगमे भोक्तृत्वाख्या वृथास्य तु ॥५८॥ किं च प्रधानचरितं व्यर्थं सर्वं भवेत्ततः । कर्तृ त्वरहिते पुंसि करणाद्यप्रयोजके ॥५६॥ भोगस्यासंभवस्तस्मात्स एवात्र प्रवर्तकः । करणादिप्रयोक्तृत्वं विद्ययैवास्य संमतम् ॥६०॥ अनन्तरं कलारागं सूते भिद्यंगरुपकम् । येन भोग्याय जनिता भिद्यंगे पुरुषे पुनः ॥६१॥ क्रियाप्रवृत्तिर्भवति तेनेदं रागसंज्ञिकम् । एभिस्तत्त्वैश्च भोक्तृत्वदशायां कलितो यदा ॥६२॥ नित्यस्तदायमात्मा तु लभते पुरुषाभिधाम् । कलैव पश्चादव्यक्तं सूते भोग्याय चास्य तु ॥६३॥ सप्तग्रंथिविधानस्य यत्तद्गौणस्य कारणम् । गुणानामविभागोऽत्र ह्याधारे क्ष्मादिभागवत् ॥६४॥ आधारोऽपि च यस्तेषां तदव्यक्तं च गीयते । त्रय एव गुणा ह्येषामव्यक्तादेव संभवः ॥६५॥ सत्त्वं रजस्तमःप्रख्या व्यापारनियमात्मिका । गुणतो धीश्च विषयाध्यवसायस्वरूपिणी ॥६६॥ गुणतस्त्रिविधा सापि प्रोक्ता कर्मानुसारतः । महत्त्वादहंकारो जातः संरंभवृत्तिमान् ॥६७॥ संभेदादस्य विषयः प्राप्नोति व्यवहार्यताम् । सत्त्वादिगुणभेदेन स पुनस्त्रिविधो भवेत् ॥ ६८॥ तैजसो राजसश्चैव तामसश्चेति नामतः । तत्र तैजसतो ज्ञानेन्द्रियाणि मनसा सह ॥६६॥ प्रकाशान्वयतस्तस्मान्प्रद्योतकानि भवन्ति हि । राजसाच्च क्रियाहेतोस्तथा कर्मेन्द्रियाणि तु ॥७०॥ तामसाच्चैव जायन्ते तन्मात्रा भूतयोनयः । इच्छारूपं च संकल्पव्यापारं तत्र वै मनः ॥७१॥ द्विधाधिकारि तच्चित्तं भोक्तृभोगोपपादकम् । बहिःकरणभावेन स्वोचितेन यतः सदा ॥७२॥ कर्म है । कर्म साधनापेक्ष होते ही हैं । कारण आदि के संयोग से और प्रेरणा से जीव को कर्म-भोग के प्रति उत्सुकता रहती है और उसकी चेष्टाओं के फल योग के कारण ही जीव का कर्तृत्व सिद्ध होता है । क्योंकि यदि जीव का कर्तृत्व सिद्ध न होगा अर्थात् यदि जीव को कर्त्ता न माना जायगा तो उसको भोक्ता कैसे माना जायगा, उसकी भोक्तृता सिद्ध न होगी । और यदि जीव को करण आदि का प्रयोजक न माना जायगा, उसको कर्त्ता न माना जायगा तो उसकी प्रधानता भी व्यर्थ हो जायगी । भोग भी उसके लिये संभव न होगा अर्थात् वह भोक्ता संभव न होगा अतएव विषय भोग या कर्म का प्रवर्तक स्वयं जीव ही है । और जो यह करण आदि (साधन या इन्द्रिय आदि) का प्रयोक्ता माना जाता है वह विद्या के कारण ही सम्भव है ॥५६-६०॥ इसके अनन्तर कला दृढ़ वज्रलेप के सदृश राग को उत्पन्न करती है, जिससे उस वज्रलेप-रागयुक्त पुरुष में भोग के लिये फिर शक्ति उत्पन्न होती है । यतः इसके द्वारा क्रिया-प्रवृत्ति (कार्य करने की इच्छा) होती है अतः इसका नाम राग कहा जाता है । इन तत्त्वों से युक्त होकर आत्मा जब भोक्तृत्व दशा को प्राप्त होता है तब यह नित्य आत्मा पुरुष संज्ञाको प्राप्त करता है अर्थात् पुरुष कहलाता है । इस आत्मा के भोग के लिए कला ही अव्यक्त को उत्पन्न करती है । सप्त ग्रन्थि विधानों से युक्त अव्यक्त के कारण गुण हैं । इसके आधार में भी क्ष्मा (पृथ्वी) के समान गुणों का अविभाग (एकता) है। गुणों का जो आधार है उसको अव्यक्त ही कहते हैं। गुण तीन ही हैं। इनकी उत्पत्ति अव्यक्त से हो होती है । सत्त्व, रज और तम रूप तीन गुण क्रिया के नियम रूप हैं । गुणों से ही विषयों में प्रवृत्त होने वाली धी उत्पन्न होती है । कर्मों के अनुसार गुण भेद से बुद्धि भी तीन प्रकार की होती है तैजस, राजस और तामस । तैजस धी से मन के साथ ज्ञानेन्द्रियाँ प्रकाश के संयोग से विषयों का ज्ञान कराने वाली होती हैं। क्रिया हेतु राजस से कर्मेन्द्रियाँ और तामस से रूप, रस आदि पंच तन्मात्रायें और पंच महाभूत के कारण उत्पन्न होते हैं। उनमें इच्छा स्वरूप और संकल्प करने वाला मन भी हैं । भोक्तृत्व और भोग को उत्पन्न करने वाला वह चित्त दो प्रकार का है । क्योंकि वह सदा अपने अनुकूल बाह्य करणों (साधनों) के द्वारा और आत्मवृत्ति संकल्प ६१ ना० पु०
५४६ नारदीयपुराणम् इन्द्रियाणां च सामर्थ्यं संकल्पेनात्मवृत्तिना । करोत्यंतःस्थितं भूयस्ततोऽन्तःकरणं मनः ॥७३॥ मनोऽहंकारबुद्धयाख्यमस्त्यन्तःकरणं त्रिधा । इच्छासंरंभबोधाख्या वृत्तयःक्रमतोऽस्य तु ॥७४॥ ज्ञानेंद्रियाणि श्रोत्रं त्वक् चक्षुर्जिह्वा च नासिका । ग्राह्याश्च विषया ह्येषां ज्ञेयाःशब्दादयो मुने ॥७५॥ शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः शब्दादयो मताः । वाक्पाणिपादपायूपस्थास्तु कर्मेन्द्रियाण्यपि ॥७६॥ वचनादानगमनोत्सर्गानंदेषु कर्मसु । करणानि च सिद्धिर्ना न कृतिः करणैर्विना ॥७७॥ दशधा करणैश्चेष्टां कार्यमाविश्य कार्यान्ये । चेष्टंते कार्यमालंब्य विभुत्वात्करणानि तु ॥७८॥ तन्मात्राणि तु खंवायुस्तेजोऽम्भः क्ष्मेति पञ्च वै । तेभ्यो भूतान्येकगुणान्याख्यातानि भवंति हि ॥७६॥ इति पञ्चसु शब्दोऽयं स्पर्शो भूतचतुष्टये । रूपं त्रिषु रसश्चैव द्वयोर्गंधः क्षितौ तथा ॥८०॥ कार्याण्येषां क्रमेणैवावकाशो व्यूहकल्पनम् । पाकश्च संग्रहश्चैव धारणं चेति कथ्यते ॥८१॥ आशीतोष्णौ महावायौ शीतोष्णौ वारितेजसोः । भास्वदग्नौ जले शुक्लं क्षितौ शुक्लाद्यनेकधा ॥८२॥ रूपं त्रिषु रसोऽम्भःसु मधुरः षड्विधः क्षितौ । गन्धः क्षितावसुरभिः सुरभिश्च प्रकीर्तितः ॥८३॥ तन्मात्रं तद्भूतगुणं करणं पोषणं तथा । भूतस्य तु विशेषोऽयं विशेषरहितं तु तत् ॥८४॥ इमानि पञ्चभूतानि संनिविष्टानि सर्वतः । पञ्चभूतात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥८५॥ शरीरसंनिविष्टत्वमेषां तावन्निरूप्यते । देहेऽस्थिमांसकेशत्वङ्नखदन्ताश्च पार्थिवाः ॥८६॥ मूत्ररक्तकफस्वेदशुक्रादिषु जलस्थितिः । हृदि पंक्तौ दृशोः पित्ते तेजस्तद्धर्मदर्शनात् ॥८७॥ प्राणादिवृत्तिभेदेन वायुश्चैवात्र संस्थितः । वियत्सर्वासु नाडीषु गर्भवृत्त्यनुषंगतः ॥८८॥ के द्वारा इन्द्रियों में कार्य क्षमता उत्पन्न करता है। पुनः अन्तः स्थित हो जाता और उसकी संज्ञा अन्तःकरण हो जाती है। अन्तःकरण के मन, अहंकार और बुद्धि नामक तीन भेद हैं और इनकी वृत्तियां क्रमशः इच्छा, संरंभ (कोप) और बोध हैं। मुने ! श्रोत्र (कान), त्वक्, चक्षु, जिह्वा और नासिका ज्ञानेन्द्रियां हैं और इनके शब्द आदि ग्राह्य विषय हैं ॥६१-७५॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध की शब्द आदि में गणना होती है। वाक्, पाणि (हाथ) पाद, गुदा और लिङ्ग कर्मेन्द्रियां हैं। ये वचन, ग्रहण, गमन (चलना), मल त्याग और आनन्दानुभूति कर्मों के असाधारण कारण हैं, क्योंकि असाधारण कारणों के बिना कार्योत्पत्ति नहीं होती। इन दश कारणों से इच्छायें उत्पन्न होतीं और तब कार्य सम्पन्न होते हैं। इन्द्रियों के व्यापक होने के कारण कार्य का आलम्बन कर (लक्षित कर) चेष्टायें उत्पन्न होती हैं। पंच तन्मात्राओं से आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी-ये पंच महाभूत उत्पन्न होते हैं और इन पंच महाभूतों से अनेक गुणों वाले अनगिनत जीव उत्पन्न होते हैं। इन पांचों महाभूतों में शब्द और स्पर्श गुण चार में होते हैं, रूप तीन में, रस दो में और गन्ध केवल पृथ्वी में होता है ॥७६-८०॥ इन पंच महाभूतों के कार्य भी क्रमशः अवकाश, व्यूह कल्पन, पाक, संग्रह और धारण हैं। अशीत, उष्ण; महावाय, शीत उष्ण जन और तेज में होते हैं। अग्नि में भास्वर शुक्ल, तेज में अभास्वर शुक्ल और पृथ्वी में शुक्ल आदि अनेक रूप हैं। रूप तीन भूतों (जल, तेज और क्षिति) में, मधुर रस जल में और पृथ्वी में छः प्रकार के रस हैं। गन्ध पृथ्वी में होता है, जिसके दो भेद हैं सुरभि और असुरभि । तन्मात्राओं में उनके भूतों के ही गुण हैं। करण और पोषण यह भूत समुदाय की विशेषता है। परमात्मतत्त्व निर्विशेष है। ये पांच महाभूत सर्वत्र और सब में सन्निविष्ट हैं, यह सम्पूर्ण स्थावर जंगमात्मक जगत् पंचभूतात्मक है। पांच महाभूत शरीर में कहाँ-कहाँ रहते हैं इसका निरूपण किया जा रहा है। इस देह में हड्डी, मांस, केश, चमड़ा, नख और दाँत पृथ्वी तत्त्व से बने हैं। मूत्र, रक्त, कफ, पसीना और वीर्य आदि में जल तत्त्व है। हृदय, पंक्ति, नेत्र और पित्त में तेज तत्त्व है। क्योंकि इनमें तेज के गुण दृष्टिगोचर होते हैं। और वायु प्राण, अपान आदि के रूप में इस देह में स्थित है। सब नाड़ियों तथा गर्भा-
त्रिषष्टितमोऽध्यायः
प्रयोक्तव्यादिमहीप्रांतमेतदंडार्थसाधनम् । प्रत्यात्मनियतं भोगभेदतो व्यवसीयते ॥८९॥ तत्त्वान्येवं कलाद्यानि प्रतिपुंनियतानि हि । देहेषु कर्मवशतः सर्वेषु विचरंति हि ॥९०॥ मायेयश्चैव पाशोऽयं येनावृतमिदं जगत् । अशुद्धाध्वा मतो ह्येष धरण्यादिकलावधिः ॥९१॥ तत्र भूमण्डलस्थोऽसौ स्थावरो जङ्गमात्मकः । स्थावरा गिरिवृक्षाद्या जङ्गमस्त्रिविधः पुनः ॥९२॥ स्वेदजाश्चांडजाश्चैव तथैव च जरायुजाः । चराचरेषु लक्षाणां चतुराशीतियोनयः ॥९३॥ भ्रममाणस्तेषु जीवः कदाचिन्मानुषं वपुः । प्राप्नोति कर्मवशतः परं सर्वार्थसाधकम् ॥९४॥ तत्रापि भारते खण्डे ब्राह्मणादिकुलेषु च । महापुण्यवशेनैव जनिर्भवति दुर्लभा ॥९५॥ जनिश्च पुंस्त्रियोर्योगः शुक्रशोणितयोगतः । बिंदुरेकः प्रविशति यदा गर्भे द्वयात्मकः ॥९६॥ तदा रजोऽधिके नारी भवेद्रतोऽधिके पुमान् । मलकर्मादिपाशेन कश्चिदात्मा नियंत्रितः ॥९७॥ जीवभावं तदा तस्मिन्सकलः प्रतिपद्यते । अथ तत्राहुतैर्मात्रा पानान्नाद्यैश्च पोषितः ॥९८॥ पक्षमासादिकालेन वर्धते वपुरत्र हि । दुःखाद्यैः पीडितश्चैवाच्छन्नदेहो जरायुणा ॥९९॥ एवं तत्र स्थितो गर्भे प्राग्जन्मोत्थं शुभाशुभम् । स्मरंस्तिष्ठति दुःखात्मा पीड्यमानो मुहुर्मुहुः ॥१००॥ कालक्रमेण बालोऽसौ मातरं पीडयन्नपि । संपीडितो निःसरति योनियंत्रादवाङ्मुखः ॥१०१॥ क्षणं तिष्ठति निश्चेष्टस्ततो रोदितुमिच्छति । ततः क्रमेण स शिशुर्वर्धमानो दिनेदिने ॥१०२॥ बालपौगंडभेदेन युवत्वं प्रतिपद्यते । एवं क्रमेण लोकेऽस्मिन्देहिनां देहसंभवः ॥१०३॥ मानुषं दुर्लभं प्राप्य सर्वलोकोपकारकम् । यस्तारयति नात्मानं तस्मात्पापपरोऽत्र कः ॥१०४॥
हिंदी अनुवाद:
शय में आकाश तत्त्व व्याप्त है। कला से लेकर पृथ्वीपर्यन्त यह तत्त्वसमुदाय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का साधन है। प्रति व्यक्ति में ये कला आदि तत्त्व नियत रूप से हैं और कर्म के वश में होकर सब शरीर में घूमते रहते हैं। यह पाश मायेय है जिससे सारा संसार ढका है। पृथ्वी से लेकर कला तक अशुद्धाध्वा कहा जाता है। यह अशुद्धाध्वा इस पर स्थावर जंगम के रूप में वर्तमान है। पहाड़ और पेड़ आदि स्थावर हैं, जंगम के भी तीन भेद हैं स्वेदज, अंडज और जरायुज। चराचर में कुल मिलाकर चौरासी लाख योनियां हैं। संयोगवश अपने कर्मों के कारण सब योनियों में भ्रमण करता हुआ जीव मानव शरीर पाता है जो भली भाँति सब अर्थों को सिद्ध करने वाला है। उसमें भारत खण्ड में ब्राह्मण आदि कुलों में जन्म पाना अत्यन्त दुर्लभ है, क्योंकि ऐसा जन्म महापुण्यों के कारण प्राप्त होता है। जन्म पुरुष-स्त्री के संयोग से रज वीर्य का संयोग होने पर होता है। जब गर्भ में वीर्य रज के साथ पहुँचता है तब रज की अधिकता होने पर स्त्री और वीर्य की अधिकता होने पर पुरुष उत्पन्न होता है। मल और कर्म के पाश में जकड़ा हुआ कोई आत्मा कला के सहित उस गर्भ में जीव रूप हो जाता है। इसके बाद उस गर्भ में माता के भोजन से बने हुए रस से उस जीव का पोषण होता और पक्ष, मास आदि के अनुसार धीरे-धीरे जीव का शरीर बढ़ने लगता है। गर्भ की झिल्ली से बंधा वह बहुत अधिक कष्ट पाता है। इस प्रकार गर्भ में बार-बार कष्ट होने पर दुःखी जीवात्मा पूर्व जन्म के शुभ-अशुभ कर्मों का स्मरण करता हुआ निवास करता है। माता को पीड़ा पहुँचाता हुआ वह जीव दस महीने बीत जाने पर स्वयं पीड़ित होकर औंधे मुख योनि से बाहर निकलता है। उस समय क्षण भर तो निश्चेष्ट रहता फिर उसके बाद रोने की इच्छा होती है। क्रमशः दिनों दिन वह शिशु बढ़ने लगता और बाल्य, पौगण्ड को बिता कर युवावस्था को प्राप्त करता है, इस प्रकार इस लोक में आत्मा जन्म लेता है। जो सारे लोक का उपकार करने वाले मनुष्य-शरीर को पाकर अपना उद्धार नहीं करता उससे बढ़कर पापी कौन हो सकता है ? ॥८७-१०४॥
५४८ नारदीयपुराणम् आहारश्चैव निद्रा च भयं मैथुनमेव च । पश्वादीनां च सर्वेषां साधारणमितीरितम् ॥१०५॥ चतुष्र्वेवानुरक्तो यः स मूर्खो ह्यात्मघातकः । मनुष्याणामयं धर्मः स्वबंधच्छेदनात्मकः ॥१०६॥ पाशबंधनविच्छेदो दीक्षयैव प्रजायते । अतो बंधनविच्छित्त्यै मंत्रदीक्षां समाचरेत् ॥१०७॥ दीक्षाज्ञानाख्यया शक्त्या ह्यपध्वंसितबन्धनः । शुद्धात्मतत्त्वनामासौ निर्वाणपदमश्नुते ॥१०८॥ स्वशक्त्यात्मिकया दृष्ट्या शिवं ध्यायति पश्यति । यजते शिवमन्त्रैश्च स्वपरेषां हिताय सः ॥१०८॥/ शिवाकंशक्तिदीधित्या समर्थीकृतचिद्दृशा । शिवशक्त्यादिभिः साद्धं पश्यत्यात्मगतावृत्तिः ॥११०॥ अन्तःकरणवृत्त्या बोधाख्या सा महेश्वरम् । न प्रकाशयितुं शक्ता पाशत्वान्निगडादिवत् ॥१११॥ दीक्षैव परमो हेतुः पाशविच्छेदने पुनः । अतः शास्त्रोक्तविधिना मत्रदीक्षां समाचरेत् ॥११२॥ दीक्षितस्तंत्रविधिना स्ववर्णाचारतत्परः । अनुष्ठानं प्रकुर्वीत नित्यनैमित्तिकात्मकम् ॥११३॥ निजवर्णाश्रमाचारान्मनसापि न लंघयेत् । यो यस्मिन्नाश्रमे तिष्ठन्दीक्षां प्राप्नोति मानवः ॥११४॥ स तस्मिन्नाश्रमे तिष्ठेत्तद्धर्माननुपालयेत् । कृतान्यपि न कर्माणि बंधनाय भवंति हि ॥११५॥ एकं तु फलदं कर्म मंत्रानुष्ठानसंभवम् । दीक्षितोऽभिलषेदभोगान्यद्यल्लोकगतानसौ ॥११६॥ मंत्राराधनसामर्थ्यात्तद्भुक्त्वा मोक्षमश्नुते । नित्यं नैमित्तिकं दीक्षां प्राप्य यो नाचरेन्नरः ॥११७॥ कंचित्कालं पिशाचत्वं प्राप्यांते मोक्षमश्नुते । तस्मात्तु दीक्षितः कुर्यान्नित्यनैमित्तिकादिकम् ॥११८॥ अनुष्ठानं च तेनास्य दीक्षां प्राप्याऽनुमीयते । नित्यनैमित्तिकाचार पालकस्य नरस्य तु ॥११९॥ साधारणतया आहार, निद्रा, भय और मैथुन पशुओं में भी पाये जाते हैं । जो मूर्ख इन चारों में ही अनुरक्त रहता है वह आत्मघाती है । मनुष्यों का यह अपने को माया बन्धन से छुड़ाना ही धर्म है । पाश बन्धन से दीक्षा के द्वारा ही मुक्ति होती है अतः बन्धन से अपने को छुड़ाने के लिये मन्त्र दीक्षा अवश्य लेनी चाहिये । दीक्षा ज्ञान नामक शक्ति से अपने सब बन्धनों को ध्वस्त कर देने वाला शुद्ध आत्म तत्त्व वाला ही मुक्ति पद पाता है । जो स्व-शक्ति सम्पन्न दृष्टि से शिव का ध्यान करता और देखता है और अपने तथा दूसरों के हित के लिये शिव मन्त्र से शिव की पूजा करता है। वह शिव, सूर्य और शक्ति की किरणों से (तेज से) अपनी दृष्टि को शक्ति- शाली बनाकर शक्ति आदि के सहित शिव को आत्मस्थ होकर देखता है । जो ज्ञान या बोध नाम की अन्तःकरण वृत्ति है वह जंजीर के समान पाशों से बद्ध होने के कारण शिव को प्रकाशित नहीं कर सकती । पाश से मुक्त करने में दीक्षा ही परम कारण है इसलिये शास्त्रोक्त विधि से मन्त्र दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए । तन्त्र विधि से दीक्षित होकर अपने वर्ण के अनुकूल आचरण करते हुए नित्य नैमित्तिक कर्म¹ को करना चाहिए । वर्णाश्रम के अनुकूल आचारों के उल्लंघन का मन में विचार तक करना अनुचित है । जो मनुष्य जिस आश्रम में रह कर दीक्षा ग्रहण करता है वह उसी आश्रम में रहता हुआ धर्म का पालन करे । इस प्रकार वर्ण धर्म के अनुसार कृत कर्म बन्धन के कारण नहीं बनते । मन्त्र के अनुष्ठान से किया हुआ एक ही कर्म फल-दायक होता है । मन्त्र से दीक्षित व्यक्ति जिन-जिन लौकिक भोगों की इच्छा करता है वह मन्त्र जप के प्रभाव से उन-उन भोगों को भोग कर अन्त में मोक्ष भी पा जाता है । जो मनुष्य दीक्षा प्राप्त कर लेने पर नित्य नैमित्तिक² कर्मों का परित्याग कर देता है वह कुछ काल तक पिशाच योनि में जाकर अन्त में मोक्ष पाता है । इसलिये दीक्षित होकर नित्य नैमित्तिक आदि कर्मों को अवश्य करना चाहिये । नित्य नैमित्तिक कर्मों का पालन करने वाले व्यक्ति के किसी अनुष्ठान १--नित्य कर्म सन्ध्या वन्दन आदि, नैमित्तिक कर्म--किसी विशेष कारण से किये हुए कार्य यज्ञ आदि ।
चतुःषष्टितमोऽध्यायः ५४६ दीक्षावैकल्यविरहात्सद्यो मुक्तिस्तु जायते । तत्रापि गुरुभक्तस्य गतिर्भवति नान्यथा ॥१२०॥ दीक्षया गुरुमूर्तिस्थः सर्वानुग्राहकः शिवः । दृष्टाद्यर्थतया यस्य गुरुभक्तिस्तु कृत्रिमा ॥१२१॥ कृतेऽपि विफलं तस्य प्रायश्चित्तं पदे पदे । कायेन मनसा वाचा गुरुभक्तिपरस्य च ॥१२२॥ प्रायश्चित्तं भवेन्नैव सिद्धिस्तस्य पदे पदे । गुरुभक्तियुते शिष्ये सर्वस्वविनिवेदके ॥१२३॥ मिथ्याप्रयुक्तमन्त्रस्तु प्रायश्चित्ती भवेद्गुरुः । ॥१२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥६३॥ चतुःषष्टितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ जीवस्य पाशौघच्छेदनायेष्टसिद्धिदम् । दीक्षाविधिं प्रवक्ष्यामि मन्त्रसामर्थ्यदायकम् ॥१॥ दिव्यं भावं यतो दद्यात्क्षिणुयाद्दुरितानि च । अतो दीक्षेति सा प्रोक्ता सर्वागमविशारदैः ॥२॥ के फल का अनुमान दीक्षा पा लेने के बाद ही लगाया जा सकता है। अवश्य दीक्षा प्राप्त करने पर तत्काल मुक्ति मिल जाती है, उसमें गुरुभक्त की ही मुक्ति होती है अन्यथा नहीं। दीक्षा से सब पर अनुग्रह करने वाले शिव स्वयं गुरु रूप में उपस्थित हो जाते हैं। जो केवल लौकिक लाभ के लिये कृत्रिम गुरुभक्ति दिखलाता है, उसके कर्म करने पर भी फल नहीं मिलते और उसको पद-पद पर प्रायश्चित्त लगता है। शरीर, मन और वाणी से गुरुभक्ति करने वाले शिष्य को किसी प्रकार का प्रायश्चित्त नहीं लगता और पग-पग पर उसको सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार सर्वस्व अर्पण करने वाले गुरुभक्त शिष्य को मिथ्या मन्त्र का आदेश करने वाला गुरु प्रायश्चित्त का भागी होता है ।। १२०५-१२४।। श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग में तिरसठवां अध्याय समाप्त ॥६३॥ अध्याय ६४ दीक्षा विधि का निरूपण सनत्कुमार बोले- इसके अनन्तर जीव को पाश समूह से मुक्त कर इष्ट-सिद्धि-प्रदान-कारक और मन्त्र-शक्तिदायक दीक्षा-विधि का वर्णन कर रहा हूँ ।।१।। यतः यह दिव्य भावना को प्रदान करती और सब पापों का क्षय करती है अतः सब शास्त्रों के निपुण विद्वान् इसको दीक्षा कहते हैं ।।२।। मनन और त्राण से
५५० नारदीयपुराणम्
मननं सर्ववेदित्वं त्राणं संसार्यनुग्रहः । । मननात्त्राणधर्मत्वान्मंत्र इत्यभिधीयते ॥३॥ स्त्रीपुंनपुंसकात्मानस्ते मंत्रास्तु त्रिधा मताः । स्त्रीमंस्त्रास्तु द्विठांताःस्युः पुंमंत्रा हुं फडंतकाः ॥४॥ क्लीबाश्चैव नमोऽताः स्युर्मंत्राणां जातयः स्मृताः । पुंदैवतास्तु मन्त्राः स्युर्विद्याः स्त्रीदैवता मताः ॥५॥ षट्कर्मसु प्रशस्तास्ते मनवस्त्रिविधाः [पुनः । तारांत्यरेफः स्वाहास्तु त्वाग्नेयाः समीरिताः ॥६॥ सौम्यास्तु भृगुपीयूषबीजाढयाः कथिता मुने । अग्नीषोमात्मका ह्येवं मंत्रा ज्ञेया मनीषिभिः ॥७॥ बोधमायांति चाग्नेयाः श्वसने पिंगलाश्रिते । सौम्याश्चैव प्रबुध्यंते वामे वहति मारुतेः ॥८॥ सर्वे मंत्राः प्रबुध्यंते वायौ नाडिद्वयाश्रिते । स्वापकाले तु मन्त्रस्य जपोऽनर्थफलप्रदः ॥६॥ प्रत्येकं मन्त्रमुच्चार्य नाव्यानां तान्समुच्चरेत् । अनुलोमे बिंदुयुक्तान्विलोमे सर्गसंयुतान् ॥१०॥ जप्तो यदि स वै देवं प्रबुद्धः क्षिप्रसिद्धिदः । अनया मालया जप्तो दुष्टमन्त्रोऽपि सिद्ध्यति ॥११॥ क्रूरे कर्मणि चाग्नेयाः सौम्याः सौम्यफलप्रदाः । शांतज्ञानेति रौद्र्येशांतिजातिसमन्वितः ॥१२॥ शांतोऽपि रौद्रतामेति हुंफट्पल्लवियोजनात् । छिन्नादिदोषयुक्तास्ते नैव रक्षंति साधकम् ॥१३॥ छिन्नो रुद्धः शक्तिहीनस्ततश्चैव पराङ्मुखः । कर्णहीनो नेत्रहीनः कीलितः स्तंभितस्तथा ॥१४॥ दग्धः त्रस्तश्च भीतश्च मलिनश्च तिरस्कृतः । भेदितश्च सुषुप्तश्च मदोन्मत्तश्च मूर्च्छितः ॥१५॥ हतवीर्यो भ्रांतसंज्ञः प्रध्वस्तो बालकस्तथा । कुमारोऽथ युवा प्रौढो वृद्धो निस्त्रिंशकस्तथा ॥१६॥ निर्बीजः सिद्धिहीनश्च मंदः कूटो निरंशकः । सत्त्वहीनः केकरश्च बीजहीनश्च घूर्णितः ॥१७॥
मन्त्र बनता है। मनन का अर्थ सर्वज्ञत्व और त्राण का जीवों पर अनुग्रह करना है मनन और त्राण धर्म के कारण ही इसका नाम मन्त्र पड़ा ॥३॥ उन मन्त्रों के स्त्री, पुरुष और नपुंसक तीन भेद हैं। दो ठ (स्वाहा) वाला मन्त्र स्त्री मन्त्र है, 'हुँ' और 'फट्' जिसके अन्त में हों पुल्लिंग्ग मन्त्र हैं। नमः जिसके अन्त में हो वे मन्त्र नपुंसक हैं। ये ही तीन मन्त्रों की जातियाँ हैं। मन्त्र पुंदैवत अर्थात् पुल्लिंग देवता वाले हैं और विद्यायें स्त्री दैवत हैं ॥४-५॥ ये तीन प्रकार के मन्त्र छः कर्मों में प्रशस्त (शुभ) माने जाते हैं। जिसमें प्रणवान्त रेफ (रां) और स्वाहा का प्रयोग हो, वह मन्त्र आग्नेय कहा जाता है ॥६॥ मुने ! भृगु बीज (सं) और पीयूष (वं) से परिपूर्ण मन्त्र सौम्य मन्त्र हैं। इस प्रकार मनीषियों ने मन्त्रों को अग्नि और सोमात्मक माना है ॥७॥ जब प्राण पिंगला नाड़ी में रहता है (अर्थात् दाहिनी सांस चलती हो) तब आग्नेय मन्त्र सिद्ध होते हैं और वाम नाड़ी में प्राण के संचारित होने पर अर्थात् बायीं सांस चलने पर सौम्य मन्त्र प्रबुद्ध होते हैं ॥८॥ सब मन्त्र दो नाड़ियों में प्राण के संचारित होने पर ही जाग्रत होते हैं। मन्त्र के सोते समय उसका जप करने से मन्त्र अनर्थ कर देने वाला हो जाता है ॥९॥ प्रत्येक मन्त्र का उच्चारण करते समय उनका श्वास रोककर उच्चारण न करे। अनुलोम में तो विन्दु (अनुस्वार) और विलोम में विसर्ग संयुक्त मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए ॥१०॥ यदि इस विधि से देवों के मन्त्रों का जप किया जाय तो शीघ्र सिद्धि हो जाती है। इस प्रकार की माला से जप करने पर दुष्ट मन्त्र भी सिद्ध हो जाते हैं ॥११॥ क्रूर कर्म (मारण, उच्चाटन आदि) में आग्नेय मन्त्र सिद्धि प्रद होते हैं और सौम्य कर्मों में (मोहन, वशीकरण) में सौम्य मन्त्र फलप्रद होते हैं। शान्तिजाति से युक्त मन्त्र शान्त कर्मों में सिद्धिदायक होते हैं। शान्ति मन्त्र भी 'हुँ फट्' आदि के जोड़ देने से रौद्र मन्त्र हो जाते हैं ॥१-१२३॥ परन्तु छिन्न आदि दोष से युक्त मन्त्र कभी भी साधक के रक्षक नहीं होते हैं ॥१३॥ छिन्न, रुद्ध, शक्तिहीन, पराङ् मुख, कर्ण हीन, नेत्र हीन, कीलित, स्तंभित, दग्ध, त्रस्त, भीत, मलिन, तिरस्कृत, भेदित, सुषुप्त, मदोन्मत्त, मूर्च्छित, हतवीर्य, भ्रांत, प्रध्वस्त, बालक, कुमार, युवा, प्रौढ़, वृद्ध, निस्त्रिंशक, निर्बीज, सिद्धिहीन, मंदकूट, निरंशक, सत्त्वहीन, केकर, बीजहीन,
चतुःषष्टितमोऽध्यायः ५५१ आलिंगितो मोहितश्च क्षुधार्तश्चातिदीप्तकः । अंगहीनोऽतिक्रु द्धश्चातिक्रू रो व्रीडितस्तथा ॥११८॥ प्रशांतमानसःस्थानभ्रष्टश्च विकलस्तथा । अतिवृद्धोऽतिनिःस्नेहः पीड़ितश्च तथा पुनः ॥११८॥ दोषा ह्येते समाख्याता वक्ष्याम्येषां च लक्षणम् । संयुक्तं वा वियुक्तं वा त्रिधा वा स्वरसंयुतम् ॥१२०॥ मनोर्यस्यादिमध्यांते वह्निबीजं तथोच्यते । चतुर्द्धा पञ्चधा वापि स मन्त्रश्छिन्नसंज्ञकः ॥१२१॥ मनोर्यस्यादिमध्यांते भूबीजद्वयमुच्यते । स तु रुद्धो मनुर्ज्ञेयो ह्यतिक्लेशेन सिद्धिदः ॥१२२॥ तारवर्मत्रया लक्ष्मीरेवं हीनस्तु यो मनुः । शक्तिहीनः स विज्ञेयश्चिरकालफलप्रदः ॥१२३॥ कामबीजं मुखं मायाह्यं ते चैवाङ्कुशं तथा । असौ पराङ्मुखो ज्ञेयो भजतां चिरसिद्धिदः ॥१२४॥ आदिमध्यावसानेषु सकारो दृश्यते यदि । स मन्त्रो बधिरः प्रोक्तः कष्टेनाल्पफलप्रदः ॥१२५॥ पञ्चार्णो यदि रेफार्काबंदुवर्जितविग्रहः । नेत्रहीनस्तु विज्ञेयः क्लेशेनापि न सिद्धिदः ॥१२६॥ आदिमध्यावसानेषु हंसः प्रासादवाग्भवौ । हंसेंदुर्वा सकारो वा फकारो वर्म वा पुनः ॥१२७॥ मात्रा नमामि च पदं नास्ति यस्मिन्स कीलितः । एवं मध्ये द्वयं मूर्ध्नि यस्मिन्नस्त्रलकारको ॥१२८॥ न विद्यंते स मंत्रस्तु स्तंभितः सिद्धिरोधकृत् । अग्निः पवनसंयुक्तो मनोर्यस्य तु मूर्द्धनि ॥१२६॥ स सार्णो दृश्यते यस्तु स मंत्रो दग्धसंज्ञकः । अस्त्रं द्वाभ्यां त्रिभिः षड्भिरष्टाभिदृ श्यतेऽक्षरैः ॥१३०॥ त्रस्तः स मंत्रो विज्ञेयो मुखे तारविवर्जितः । हकारः शक्तिरथवा भीतो मंत्रः स एव हि ॥१३१॥ मनोर्यस्यादिमध्यांते स्यान्मकारचतुष्टयम् । मलिनस्तु स विज्ञेयो ह्यतिक्लेशेन सिद्धिदः ॥१३२॥ घूमित, आलिंगित, मोहित, क्षुधार्त, अति दीप्तक, अंग हीन, अतिक्रूर, अतिक्रुद्ध, व्रीडित, प्रशान्तमानस,स्थान- भ्रष्ट, विकल, अतिवृद्ध, अति निःस्नेह और पीडित इतने मन्त्र के दोष हैं, जिनके लक्षण आगे कहूँगा ॥११४-४९३॥ जिस मन्त्र के आदि, मध्य और अन्त में संयुक्त, वियुक्त और तीन भागों में विभक्त अथवा स्वर से संयुक्त हो उसको वह्नि बीज (रं) कहते हैं। जिस मन्त्र के आदि मध्य और अन्त में वह्नि बीज हो अथवा चार प्रकार या पांच प्रकार से वह विभक्त हो या वह्नि बीज हो उसको छिन्न कहते हैं ॥१२०-२१॥ जिस मन्त्र के आदि मध्य और अन्त में दो भू बीज (लं) हो उसको रुद्ध मन्त्र कहते हैं और वह अत्यन्त क्लेश से सिद्धि प्रदान करता है ॥१२२॥ प्रणव और कवच (हूँ) ये तीन बार जिस मन्त्र में आये हों, वह लक्ष्मो युक्त होता है। ऐसी लक्ष्मी से हीन जो मंत्र है उसे शक्ति हीन जानना चाहिए। वह चिरकाल में फल देने वाला होता है ॥१२३॥ जिस मन्त्र के आदि में काम बीज (क्लीं), मध्य में माया बीज (ह्रीं) और अन्त में अङ्कुश बीज (क्रों) हो उस मन्त्र को पराङ्मुख कहते हैं जो साधकों को चिरकाल में सिद्धि प्रदान करता है ॥१२४॥ जिस मन्त्र के आदि मध्य, और अन्त में सकार हो उसको बधिर (कर्णहीन) कहते हैं और बहुत कष्ट उठाने पर भी स्वल्प फल देता है ॥१२५॥ पांच वणों वाला मन्त्र यदि रेफ, मकार और अनुस्वार से रहित हो तो उसको नेत्र हीन कहते हैं और वह कष्ट उठाने पर भो सिद्धिप्रद नहीं होता ॥१२६॥ जिस मन्त्र के आदि, मध्य और अन्त में हंस, (सं) प्रासाद, तथा वाग्बीज (ऐं) हो अथवा हंस और चन्द्रविन्दु या सकार फकार अथवा हूँ हो तथा जिसमें मा प्रा और नमामि पद न हो वह मन्त्र कीलित माना गया है। इसी प्रकार जिसके मध्य में और अन्त वे दोनों पद न हों तथा जिसमें फट् और लकार न हों उसको स्तंभित मन्त्र कहते हैं और वह सिद्धि में बाधा उत्पन्न करता है ॥१२७३॥ जिस मन्त्र के अन्त में अग्नि (रं) बीज वायु (य) बीज के साथ हो तथा जो सात अक्षरों से युक्त हो, वह मन्त्र दग्ध है। जो मन्त्र दो, तीन, छः और आठ अक्षरों के साथ अस्त्र (फट्) से युक्त हो तथा जिसके मुखभागमें प्रणवरहित हकार शक्ति हो उसको त्रस्त कहते हैं। अथवा भोत मंत्र उसी को कहते हैं, जिस मंत्र के आदि मध्य और अन्त में चार मकार हों उसको मलिन कहते हैं और उसको कष्टपूर्वक जप करने पर सिद्धि प्राप्त होती है ॥१२९-३२॥ जिस मन्त्र के मध्य
५५२ नारदीयपुराणम् दार्णो यस्य मनोर्मध्ये मूर्ध्नि क्रोधयुगं तथा । अस्त्रं चास्ति स मन्त्रस्तु तिरस्कृत उदीरितः ॥३३॥ म्योद्वयं हृदयं शीर्षे वषड्वौषट्कमध्यमः । यस्य स्याद्भेदितो मन्त्रस्त्याज्यः क्लिष्टफलप्रदः ॥३४॥ व्यक्षरो हंसहीनो यः सुषुप्तः कीर्तितस्तु सः । विद्या वाप्यथवा मंत्रो भवेत्सप्तदशाक्षरः ॥३५॥ षट्कारपंचकादिर्यो मदोन्मत्तस्तु स स्मृतः । यस्य मध्ये स्थितं चास्त्रं स मंत्रो मूर्च्छितः स्मृतः ॥३६॥ विरामस्थानगं चास्त्रं हतवीर्यः स उच्यते । मंत्रस्यादौ च मध्ये च मूर्ध्नि चास्त्रचतुष्टयम् ॥३७॥ ज्ञातव्यो भ्रांत इत्येष यः स्यादष्टादशाक्षरः । पुनर्विंशतिवर्णो वा यो मंत्रः स्मरसंयुतः ॥३८॥ हृल्लेखांकुशबीजाद्यः प्रध्वस्तः स तु कथ्यते । सप्ताणो बालमंत्रस्तु कुमारो वसुवर्णवान् ॥३६॥ षोडशार्णो युवा प्रौढश्चतुर्विंशतिवर्णकः । त्रिंशद्वर्णश्चतुःषष्टिवर्णश्चापि शताक्षरः ॥४०॥ चतुःशताक्षरो मंत्रो वृद्ध इत्यभिधीयते । नवार्णस्तार संयुक्तो मंत्रो निस्त्रिंश उच्यते ॥४१॥ यस्यांते हृदयं प्रोक्तं शिरोमंत्रोऽथ मध्यगः । शिखा वर्म च यस्यांते नेत्रमस्त्रं च दृश्यते ॥४२॥ शिवशक्त्यार्णहीनो वै निर्बीजः स मनुः स्मृतः । आद्यंतमध्ये फट्कारः षोढा यस्मिन्प्रदृश्यते ॥४३॥ स मनुः सिद्धिहीनः स्यान्मंदः पंक्त्यक्षरो मनुः । कूट एकाक्षरो मंत्रः स एवोक्तो निरंशकः ॥४४॥ द्विवर्णःसत्त्वहीनः स्यात्केकरश्चतुरक्षरः । षड्वर्णो बीजहीनो वा सार्द्धसप्ताक्षरोऽपि वा ॥४५॥ सार्द्धद्वादशवर्णो वा धूमितो निंदितस्तु सः । सार्द्धबोजत्रययुतो मंत्रो विशतिवर्णवान् ॥४६॥ त्रिंशद्वर्णश्चैकविशद्वर्णश्चालिंगितस्तु सः । यो मंत्रो दंतवर्णस्तु मोहित सः तु कीर्तितः ॥४७॥ द वर्ण हो और अन्त में दो क्रोध (हुं हुं) बीज हों और उनके साथ अस्त्र (फट्) भी हो तो उसको तिरस्कृत कहते हैं। जिस मन्त्र के अन्त में म और य तथा हृदय हो और मध्य में वषट् और वौषट् हो उसको भेदित कहते हैं और वह कष्ट से सिद्धिदायक होता है उसका सर्वथा त्याग करना चाहिये ॥३३-३४॥ जो तीन अक्षरों का हो और हंस हीन हो उसको सुषुप्त कहते हैं। जो विद्या अथवा मन्त्र सत्रह अक्षर वाला हो और उसके आदि में पाँच बार फट् का प्रयोग हुआ हो, उसे मदोन्मत्त कहते हैं ॥३५½॥ जिसके मध्य में फट् हो उसको मूर्च्छित कहते हैं। जिसके विराम स्थान में अस्त्र (फट्) हो उसको हतवीर्य कहते हैं ॥३६½॥ जिस मन्त्र के आदि, मध्य और अन्त में चार अस्त्र (फट्) हों उसको भ्रान्त कहते हैं। जो मन्त्र अठारह या बीस वर्ण वाला हो कामबीज (क्लीं) से युक्त होकर हृदय, लेख और अंकुश के भी बीज से परिपूर्ण हो उसको प्रध्वस्त कहते हैं ॥३७½॥ सात वर्णों वाला मन्त्र बालमन्त्र और आठ वर्ण वाला कुमार है। सोलह वर्ण वाला युवा और चौबीस वर्ण वाला प्रौढ है। तीस, चौंसठ, सौ और चार सौ अक्षरों वाले मन्त्र वृद्ध कहे गये हैं ॥३९-४०½॥ नव वर्ण और तार (प्रणव) संयुक्त मन्त्र को निस्त्रिंश कहते हैं। जिनके अन्त में हृदय (नमः) हो, मध्य में शिरोमन्त्र (स्वाहा) हो और अन्त में शिखा (वषट्), कवच (हुं), नेत्र (वौषट्) और अस्त्र (फट्) हों तथा जो शिव एवं शक्ति अक्षरों से हीन हो, उसे निर्बीज कहा जाता है ॥४१-४२½॥ जिस मन्त्र के आदि, अन्त और मध्य में छःबार फट् हों वह मन्त्र सिद्धिहीन है। पाँच अक्षर वाला मन्त्र मंद और एक अक्षर वाला कूट है। उसी को निरंशक भी कहते हैं ॥४३-४४॥ दो वर्ण वाले को सत्त्वहीन, और चार अक्षर वाले को केकर कहते हैं। छः या साढ़े सात वर्ण वाला बीजहीन और साढ़े बारह अक्षर वाला धूमित माना गया है। वह निंदित है। जो साढ़े तीन बीज से युक्त, बीस वर्णों वाला, तीस और इक्कीस वर्णों वाला हो उसको आलिङ्गित कहा जाता है ॥४५-४६½॥ जो मन्त्र दन्त्य वर्ण वाला होता है उसको
चतुःषष्टितमोऽध्यायः ५५३ चतुर्विंशतिवर्णो वा सप्तविंशतिवर्णवान् । क्षुधार्तः स तु विज्ञेयो मंत्रसिद्धिर्विवर्जितः ॥४८॥ एकादशाक्षरो वापि पंचविंशतिवर्णकः । त्रयोविंशतिवर्णो वा स मनुदृप्तसंज्ञकः ॥४६॥ षड्विंशत्यक्षरो वापि षट्त्रिंशद्वर्णकोऽपि वा । एकोनत्रिंशद्वर्णो वा मंत्रो हीनांगकः स्मृतः ॥५०॥ अष्टाविंशतिवर्णो वा तथैर्कात्रंशदर्णकः । अतिक्रूरः स विज्ञेयोऽखिलकर्मसु गर्हितः ॥५१॥ चत्वारिंशत्समारभ्य त्रिषष्टंचतस्तु यो मनुः । व्रीडितः स तु विज्ञेयः सर्वकर्मसु न क्षमः ॥५२॥ पञ्चषष्ट्यक्षरा मन्त्रा ज्ञेया वै शांतमानसाः । पञ्चषष्ट्यर्णमारभ्य नवन्तदाक्षरावधि ॥५३॥ ये मंत्रास्ते तु विज्ञेयाः स्थानभ्रष्टा मुनीश्वर । त्रयोदशार्णा ये मन्त्रास्तिथ्यर्थाश्च तथा पुनः ॥५४॥ विकलास्ते समाख्याताः सर्वतंत्वविशारदैः । शतं सार्द्धशतं वापि शतद्वयमथापि वा ॥५५॥ द्विनवत्येकहीनो वा शतत्रयमथापि वा । ये मंत्रा वर्णसंख्याका निःस्नेहास्ते प्रकीर्तिताः ॥५६॥ चतुःशतं समारभ्य सहस्रार्णावधि द्विज । अतिवृद्धाः प्रयोगेषु शिथिलास्ते समीरिताः ॥५७॥ सहस्रवर्णादधिका मंत्रास्ते पीडिताह्वयाः । तदूर्ध्वं चैव ये मंत्राः स्तोत्ररूपास्तु ते स्मृताः ॥५८॥ एवंविधाः समाख्याता मनवो दोषसंयुताः । दोषनेतान्विज्ञाय मंत्रानेताञ्जपन्ति ये ॥५९॥ सिद्धिर्न जायते तेषां कल्पकोटिशतैरपि । छिन्नादिदोषदुष्टानां मंत्राणां साधनं ब्रुवे ॥६०॥ योनिमुद्रासने स्थित्वा प्रजपेद्यः समाहितः । यं कांचदपि वा मंत्रं तस्य स्युः सर्वसिद्धयः ॥६१॥ सव्यपाष्णि गुदे स्थाप्य दक्षिणं च ध्वजोपरि । योनिमुद्राबंध एवं भवेवासनमुत्तमम् ॥६२॥ अन्योऽप्यत्र प्रकारोऽस्ति योनिमुद्रानिबंधने । तदग्रे सरहस्यं ते कथयिष्यामि नारद ॥६३॥ पारंपर्यक्रमप्राप्तो नित्यानुष्ठानतत्परः । गुर्वनुज्ञातः श्रीमानभिषेकसमन्वितः ॥६४॥
मोहित और चौबीस तथा सत्ताईस वर्ण वाला क्षुधार्त कहा जाता है जो कि मन्त्रसिद्धि से शून्य रहता है ॥४७-४८॥ ग्यारह, पचीस, तैंतीस वर्ण वाला दृप्त मन्त्र है ॥४९॥ छब्बीस छत्तीस और उनतीस वर्ण वाला हीनांग है ॥५०॥ अट्ठाईस और इकतीस वर्ण वाला मन्त्र अति क्रूर है जो सब कर्मों में निन्दित समझा जाता है ॥५१॥ चालीस से लेकर तिरसठ वर्ण वाले मन्त्र व्रीड़ित (लज्जित) है जो सब प्रकार के कार्यों में समर्थ नहीं होता है ॥५२॥ पैंसठ अक्षर वाले मन्त्र शान्तमानस हैं। मुनीश्वर ! पैंसठ वर्णों से लेकर निन्यानबे वर्णों तक के जितने मन्त्र हैं, उनको स्थान भ्रष्ट कहा जाता है ॥५३३॥ तेरह वर्ण वाले मन्त्रों और पन्द्रह वर्ण वाले मन्त्रों को मन्त्राचार्यों ने विकल कहा है ॥५४३॥ सो, डेढ़ सौ, दो सौ, इक्यानबे अथवा तीन सौ वर्णों वाले जितने मन्त्र हैं वे निःस्नेह कहे जाते हैं ॥५५-५६॥ चार सौ से लेकर हजार वर्ण वाले मन्त्र अति वृद्ध हैं और वे शिथिल कहे जाते हैं ॥५७॥ हजार वर्णों से अधिक वर्ण वाले मन्त्र पीड़ित हैं और इनसे अधिक वर्ण वाले मन्त्र नहीं प्रत्युत स्तोत्र हैं ॥५८॥ इस प्रकार मन्त्रों के दोष गिनाये गए हैं। जो इन दोषों को न जानकर ऐसे दोषों से दुष्ट मंत्र को जपते हैं उनको सौ करोड़ कल्प में भी सिद्धि नहीं मिलती। ॥५९३॥ अब छिन्न आदि उपर्युक्त दोषों से दुष्ट मन्त्रों की साधन विधि बता रहा हूँ ॥६०॥ जो योनि मुद्रा में स्थित होकर एकाग्र भाव से जिस किसी मन्त्र को जपता है उसको सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥६१॥ बायें पैर की एड़ी को गुदा द्वार पर लगाकर दाहिने पैर की एड़ी को लिङ्ग के ऊपर रखें तो उसे योनि मुद्रा बन्ध कहते हैं ॥६२॥ यह सर्वोत्तम आसन है। योनि मुद्रा बन्ध के और भी प्रकार (तरीके) हैं जिनका भेद और रहस्य सहित वर्णन आगे करूंगा ॥६३॥ परम्परा क्रम द्वारा मन्त्रों को सीखा हुआ, नित्य प्रति अनुष्ठान में तत्पर रहने वाला, ७० ना० पु०
५५४ नारदीयपुराणम् सुंदरः सुमुखः शांतः कुलीनः सुलभो वशी । मंत्रतंत्रार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहक्षमः ॥६५॥ निरपेक्षो मुनिर्दांतो हितवादी विचक्षणः । तत्त्वनिष्कासने दक्षो विनयी च सुवेषवान् ॥६६॥ आश्रमी ध्याननिरतः संशयच्छित्सुबुद्धिमान् । नित्यानुष्ठानसंयुक्तस्तवाचार्यः परिकीर्तितः ॥६७॥ शांतो विनीतः शुद्धात्मा सर्वलक्षणसंयुतः । शमादिसाधनोपेतः श्रद्धालुः सुस्थिराशयः ॥६८॥ शुद्धदेहोऽन्नपानाद्यैर्धार्मिकः शुद्धमानसः । दृढव्रतसमाचारः कृतज्ञः पापभीरुकः ॥६९॥ गुरुध्यानस्तुतिकथासेवनासक्तमानसः । एवंविधो भवेच्छिष्यस्त्वन्यथा गुरुदुःखदः ॥७०॥ इतिश्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥६४॥
अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच परीक्ष्य शिष्यं तु गुरुर्मंत्रशोधनमाचरेत् । प्राक्प्रत्यग्दक्षिणोदक्च पंचसूत्राणि पातयेत् ॥१॥ चतुष्टयं चतुष्कानां स्यादेवं नृपकोष्ठके । तत्राद्यप्रथमे त्वाद्यं द्वितीयाद्ये द्वितीयकम् ॥२॥
गुरु की आज्ञा में लीन रहने वाला, श्रीमान्, अभिषेक (स्नान) से युक्त, सुन्दर, सुमुख, शान्त, कुलीन, सुलभ, जितेन्द्रिय, मन्त्र और तन्त्रों का तत्त्वज्ञ, यथोचित निग्रह (दण्ड) और अनुग्रह (कृपा) करनेवाला, निरपेक्ष, मननशील, दान्त, हितवादी, विद्वान्, तत्त्व निकालने में या तत्त्व निर्णय में कुशल, विनयी, सुवेष, वर्णाश्रमी, ध्यान-निरत, सन्देहों को स्वयं मिटाने वाला, सुबुद्धिमान्, नित्य अनुष्ठान में लगा रहने वाला, पुरुष ही आचार्य बनने योग्य है ॥६४-६७॥ और अन्नपानादि से शुद्ध देह वाला, शान्त, विनीत, शुद्धात्मा, सब लक्षणों से सम्पन्न, शम, दम आदि साधनों से युक्त, श्रद्धालु, स्थिर चित्तवृत्ति वाला, खान-पान शुद्ध रखने वाला, धार्मिक, शुद्धचित्त, व्रत और आचार पालन में दृढ़, कृतज्ञ, पापों से डरने वाला और गुरु का ध्यान, स्तुति और कथा श्रवण में रमने वाला व्यक्ति ही शिष्य होने योग्य है अन्यथा विपरीत आचरण करने वाला केवल गुरु को दुख देने वाला है, शिष्य नहीं । ॥६८-७०॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में चौसठवां अध्याय समाप्त । ॥६४॥
अध्याय ६५ मन्त्रजपविधिकथन सनत्कुमार ने कहा- गुरु शिष्य की विधिवत् परीक्षा लेकर मन्त्र शोधन कार्य करे। पूर्व से पश्चिम और दक्षिण से उत्तर (रंग में डुबोये हुए) पांच-पांच सूत गिराये (तात्पर्य यह है कि पांच खड़ी रेखायें खींचकर उनके ऊपर पांच पड़ी रेखायें खींचे) ॥१॥ इस प्रकार चार-चार कोष्ठों के चार समुदाय बनेंगे। उनमें से पहले चौक के प्रथम कोष्ठ में एक, दूसरे के प्रथम में दो, तीसरे के प्रथम में तीन और चौथे के प्रथम में चार लिखे
तृतीयार्थे तृतीयं स्याच्चतुर्थांशे तुरीयकम् । तत्तदाग्नेयकोष्ठेषु तत्तत्पंचममक्षरम् ॥३॥ विलिख्य क्रमतो धीमान्म्रनुं संशाधयेत्ततः । नामाद्यक्षरमारभ्य यावन्मन्त्रादि वर्णकम् ॥४॥ चतुष्के यत्र नामार्णस्तत्स्यात्सिद्धचतुष्ककम् । प्रादक्षिण्यात्तद्वितीयं साध्याख्यं परिकीर्तितम् ॥५॥ तृतीयं पुंसि सिद्धाख्यं तुरीयमरिसंज्ञकम् । द्वयोर्वर्णविककोष्ठे सिद्धसिद्धेति तन्मतम् ॥६॥ तद्वितीये तु मंत्रार्णे सिद्धसाध्यः प्रकीर्तितः । तृतीये तत्सुसिद्धःस्यात्सिद्धा रस्तच्चतुर्थके ॥७॥ नामार्णान्यचतुष्कात्तु द्वितीये मंत्रवर्णके । चतुष्के चेत्तदा पूर्वं यत्र नामाक्षरं स्थितम् ॥८॥ तत्र तत्कोष्ठमारभ्य गणयेत्पूर्ववत्क्रमात् । साध्यसिद्धः साध्यसाध्यस्तत्सुसिद्धश्च तद्रिपुः ॥६॥ तृतीये चेच्चतुष्के तु यदि स्यान्मंत्रवर्णकः । तदा पूर्वोक्तरीत्या तु क्रमाद्वेयं मनीषिभिः ॥१०॥ सुसिद्धसिद्धस्तत्साध्यस्तत्सुसिद्धश्च तद्रिपुः । तुरीये चेच्चतुष्के तु तद्वैवं गणयेत्सुधीः ॥११॥ अरिसिद्धोऽरिसाध्यश्च तत्सुसिद्धश्च तद्रिपुः । सिद्धसिद्धो यथोक्तेन द्विगुणात्सिद्धसाध्यकः ॥१२॥ सिद्धः सुसिद्धोऽर्द्धतयात्सिद्धा रिर्हन्ति गोत्रजान् । द्विगुणात्साध्यसिद्धस्तु साध्यसाध्यो विलंबतः ॥१३॥ साध्यः सुसिद्धो द्विगुणात्साध्यारिर्हन्ति बांधवान् । सुसिद्धसिद्धोऽर्द्धतया तत्साध्यो द्विगुणाज्जपात् ॥१४॥ ॥२॥ (इसी क्रम से आगे की संख्यायें भी लिख ले ।) प्रथम कोष्ठ में 'अ' लिखकर उसके आग्नेय कोण में उससे पाँचवां अक्षर लिखे ॥३॥ इस प्रकार सभी कोष्ठों में क्रमशः अक्षरों को लिखकर बुद्धिमान् पुरुष मन्त्र का संशोधन करे । साधक के नाम का आदि अक्षर जिस कोष्ठ में हो, वहाँ से लेकर जहाँ मन्त्र का आदि अक्षर हो उस कोष्ठ तक प्रदक्षिणाक्रम से गिनना चाहिए । यदि उसी चौक में मन्त्र का आदि अक्षर हो, जिसमें नाम का आदि अक्षर है तो वह 'सिद्ध चौक' कहा जाएगा ॥४॥ उससे प्रदक्षिणाक्रम से गिनने पर यदि द्वितीय चौक में मन्त्र का आदि अक्षर हो तो वह साध्य कहा गया । इसी प्रकार तीसरा चौक सुसिद्ध और चौथा चौक अरि नाम से प्रसिद्ध है । यदि साधक के नाम संबंधी और मन्त्र संबंधी आदि अक्षर प्रथम चौक के पहले ही कोष्ठ में पड़े हों तो वह मन्त्र 'सिद्धसिद्ध' माना गया है ॥५-६॥ यदि मन्त्रवर्ण प्रथम चौक के द्वितीय कोष्ठ में पड़ा हो तो वह सिद्धसाध्य कहा गया है । प्रथम के तृतीय कोष्ठ में हो तो सिद्धसुसिद्ध होगा और चौथे में हो तो सिद्धारि कहलाएगा ॥७॥ नामा- क्षरयुक्त चौक से दूसरे चौक में यदि मन्त्र का अक्षर हो तो पहले जहाँ नाम का अक्षर था वहाँ के उस कोष्ठ से आरंभ करके क्रमशः पूर्ववत् गणना करे । द्वितीय चौक के प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ कोष्ठ में मन्त्राक्षर होने पर उसकी क्रमशः साध्यसिद्ध, साध्यसाध्य, साध्यसुसिद्ध तथा साध्य आदि संज्ञा होगी ॥८-९॥ तीसरे चौक में मंत्र का अक्षर हो तो मनीषी पुरुषों को पूर्वोक्त रीति से गणना करनी चाहिए । तृतीय चौक के प्रथम आदि कोष्ठों के अनुसार क्रमशः उस मन्त्र की सुसिद्धसिद्ध, सुसिद्धसाध्य, सुसिद्धसुसिद्ध तथा सुसिद्ध अरि संज्ञा होगी ॥१०॥ यदि चौथे चौक में मन्त्राक्षर हो तो भी विद्वान् पुरुष इसी प्रकार गणना करे । चतुर्थ चौक के प्रथम आदि कोष्ठों के अनुसार उस मन्त्र की अरिसिद्ध, अरिसाध्य, अरिसुसिद्ध तथा अरिअरि यह संज्ञा होगी ॥११॥ सिद्धसिद्ध मंत्र शास्त्रोक्त विधि से उतनी ही संख्या में जप करने पर सिद्ध हो जाएगा । परंतु सिद्धसाध्य मन्त्र दूनी संख्या में जप करने से सिद्ध होगा । सिद्धसुसिद्ध मन्त्र शास्त्रोक्त संख्या से आधा जप करने पर ही सिद्ध हो जाएगा । परंतु सिद्धारि मन्त्र कुटुंबी जनों का नाश करता है । साध्यसिद्ध मन्त्र दूनी संख्या में जप करने से सिद्ध होता है । साध्य- साध्य मन्त्र बहुत विलंब से सिद्ध होता है ॥१२-१३॥ साध्यसुसिद्ध भी द्विगुण जप से सिद्ध होता है; किन्तु साध्यारि मन्त्र बंधु-बांधवों का हनन करता है । सुसिद्धसिद्ध आधे ही जप से सिद्ध होता है । सुसिद्धसाध्य द्विगुण जप से सिद्ध होता है ॥१४॥ सुसिद्धसुसिद्ध मन्त्र प्राप्त होते ही सिद्ध हो जाता है और सुसिद्धारि मन्त्र सारे कुटुंब का
५५६ नारदीयपुराणम् तत्सुसिद्धप्राप्तिमात्रात्सुसिद्धारिःकुटुम्बहृत् । अरिसिद्धस्तु पुत्रघ्नोऽरिसाध्यः कन्यकापहः ॥१५॥ तत्सुसिद्धः कलत्रघ्नः साधकघ्नोऽप्यरः स्मृतः। अन्येऽप्यत्र प्रकारा हि संति वै बहवो मुने ॥१६॥ सर्वेषु मुख्योऽयं तेऽत्र कथितोऽकथहाभिधः । एवं संशोध्य मंत्रं तु शुद्धे काले स्थले तथा ॥१७॥ दीक्षयेच्च गुरुः शिष्यं तद्विधानमुदीर्यते । नित्यकृत्यं विधायैाथ प्रणम्य गुरुपादुकाम् ॥१८॥ प्रार्थयेत्सद्गुरुं भक्त्याभीष्टमंत्रार्थमादृतः । संपुज्य वस्त्रालंकारगोहिरण्यधरादिभिः ॥१९॥ कृत्वा स्वस्ति विधानं तु मंडलादि च तुष्टिमन्। गुरुः शिष्येण सहितः शुचिर्यागमृहं विशेत् ॥२०॥ सामान्यार्घोदकेनाथ संप्रोक्ष्य द्वारमन्त्रतः । दिव्यान्उत्सारयेद्विघ्नान्नभस्थानर्च्य वारिणा ॥२१॥ पार्षिणघातैस्त्रिभिर्भौमांस्ततः कर्मसमाचरेत् । वर्णकैः सर्वतोभद्रे यथोक्तपरिकल्पिते ॥२२॥ वह्निमण्डलमभ्यर्च्य तत्कलाः परिपूज्य च । अस्त्रप्रक्षालितं कुंभं यथाशक्ति विनिर्मितम् ॥२३॥ तत्र संस्थाप्य विधिवत्तत्र भानोः कलां यजेत् । विलोममातृकामूलमुच्चरन् शुद्धवारिणा ॥२४॥ आपूर्य कुंभं तत्रार्चेत्सोमस्य विधिवत्कलाः । धूम्रार्चिरूष्मा ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिगिनी ॥२५॥ सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यकव्यवाहा तथा । वह्ने र्दश कलाः प्रोक्ताः प्रोच्यंतेऽथ रवेः कलाः ॥२६॥ तपिनो तापिनो धूम्रा मरीचिज्ज्वलिनी रुचिः । सुषुम्णा भोगदा विश्वा बोधिनी धारिणी क्षमा ॥२७॥ अथेन्दोश्च कला ज्ञेया ह्यमृता मानदा पुनः । पूषा तुष्टिश्च पुष्टिश्च रतिश्च धृतिसंज्ञिकाः ॥२८॥ शशिनी चंद्रिका कांतिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरंगदा । पूर्णामूर्णामृता चेति प्रोक्ताश्चंद्रमसः कलाः ॥२६॥
नाश करता है। अरिसिद्ध पुत्रनाशक है तथा अरिसाध्य कन्या का नाश करने वाला होता है ॥१५॥ अरिसुसिद्ध स्त्री का नाश करता है और अरिअरि मन्त्र साधक का ही नाश करने वाला माना गया है। मुने ! यहाँ मन्त्र शोधन के और भी बहुत से प्रकार हैं, किन्तु यह अकथह नामक चक्र सब में प्रधान है; इसलिए यही तुम्हें बताया गया है ॥१६३॥ इस प्रकार मन्त्र का भलीभाँति शोधन करके शुद्ध समय और पवित्र स्थान में गुरु शिष्य को दीक्षा दे । अब दीक्षा का विधान बताया जाता है ॥१७॥ प्रातःकाल नित्यकर्म करके पहले गुरुचरणों की पादुका को प्रणाम करे । तत्पश्चात् आदरपूर्वक वस्त्र आदि के द्वारा भक्तिभाव से सद्गुरु की पूजा करके उनसे अभीष्ट मन्त्र के लिए प्रार्थना करे ॥१८३॥ तदनन्तर गुरु संतुष्टचित्त हो स्वस्तिवाचनपूर्वक मंडल आदि विधान करके शिष्य के साथ पवित्र हो यज्ञमंडप में प्रवेश करें ॥१९-२०॥ फिर सामान्य अर्घ्य-जल से द्वार का अभिषेक करके अस्त्रमंत्रों से दिव्य विघ्नों का निवारण करे; इसके बाद आकाश में स्थित विघ्नों का जल से पूजन करके निराकरण करे । भूमिसम्बन्धी विघ्नों को तीन बार पाणि (एडी) के आघात से ताली बजाकर हटाये । तत्पश्चात् कार्य प्रारंभ करे ॥२१॥ भिन्न-भिन्न रंगों द्वारा शास्त्रोक्त विधि से सर्वतोभद्रमण्डल की रचना करके उसमें वह्निमण्डल और उसकी कलाओं का पूजन करे । तत्पश्चात् अस्त्र-मंत्र का उच्चारण करके धोये हुए यथाशक्ति-निर्मित कलश की वहाँ विधिपूर्वक स्थापना करके सूर्य की कला का यजन करे । ॥२२-२३३॥ विलोममातृका मूल मंत्र का उच्चारण कर उस कलश को शुद्ध जल से परिपूर्ण कर उसमें सोम की कला को अर्चना करे ॥२४३॥ धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वलिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, सुश्री, सुरूपा, कपिला, हव्यवाहा तथा कव्यवाहा ये दश अग्नि की कलायें हैं। इसके अनन्तर सूर्य की कलाओं का वर्णन कर रहा हूँ ॥२५-२६॥ तपिनो, तापिनी, धूम्रा, मरीचिज्ज्वालिनी, रुचि, सुषुम्णा, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी और क्षमा सूर्य की कलायें हैं। अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्ति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्णा, और पूर्णामृता इतनी चन्द्रमा की
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ५५७ वस्त्रयुग्मेन संवेष्ट्य तस्मिन्सर्वौषधीः क्षिपेत् । नवरत्नानि निक्षिप्य विन्यसेत्पञ्चपल्लवान् ॥३०॥ पनसाम्रवटाश्वत्थबकुलेति च तान् विदुः । मुक्तामाणिक्यवैडूर्यगोमेदान्वज्रविद्रुमौ ॥३१॥ पद्मरागं मरकतं नीलं चेति यथाक्रमम् । एवं रत्नानि निक्षिप्य त्वावाह्यावेष्टदेवताम् ॥३२॥ संपूज्य विधिवन्मंत्री ततः शिष्यं स्वलंकृतम् । वेद्यां संवेश्य संप्रोक्ष्य प्रोक्षणीस्थेन वारिणा ॥३३॥ भूतशुद्ध्यादिकं कृत्वा तच्छरीरे विधानतः । न्यासजालेन संशोध्य मूध्र्नि विन्यस्य पल्लवान् ॥३४॥ अष्टोत्तरशतेनाथ मूलमंत्रेण मंत्रितैः । अभिषिंचेत्प्रियं शिष्यं जपन्मूलमनुं हृदि ॥३५॥ शिष्टोदकेन वाचम्य परिधायांवरं शिशुः । गुरुं प्रणम्य विधिवत्संविशेत्पुरतः शुचिः ॥३६॥ अथ शिष्यस्य शिरसि हस्तं दत्त्वा गुरुस्ततः । जपेदष्टोत्तरशतं देयमन्त्रं विधानतः ॥३७॥ समोऽस्त्वित्यक्षरान्दद्यात्ततः शिष्योऽर्चयेद्गुरुम् । ततः सचन्दनं हस्तं दत्त्वा शिष्यस्य मस्तके ॥३८॥ तत्कर्णे प्रर्वदेद्विद्यामष्टवारं समाहितः । संप्राप्तविद्यः शिष्योऽपि निपतेद्गुरुपादयोः ॥३९॥ उत्तिष्ठ वत्स मुक्तोऽसि सम्यगाचारवान्भव । कीर्तिश्रीकांतिपुत्रायुर्बलारोग्यं सदास्तु ते ॥४०॥ ततः शिष्यः समुत्थाय गन्धाद्यैर्गुरुमर्चयेत् । दद्याच्च दक्षिणां तस्मै वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥४१॥ संप्राप्यैवं गुरोर्मंत्रं तदारभ्य धनादिभिः । देहपुत्रकलत्रैश्च गुरुसेवापरो भवेत् ॥४२॥ स्वेष्टदेवं यजेन्मध्ये दत्त्वा पुष्पांजलिं ततः । अग्निनैर्ऋतिवागीशान् क्रमेण परिपूजयेत् ॥४३॥ कलार्थ कही गई हैं ॥२७-२९॥ उस कलश को दो वस्त्रों से लपेटकर उसमें सर्वोषधि छोड़ दे। फिर उसमें नव रत्नों को डालकर पंच पल्लव छोड़े ॥३०॥ कटहल, आम, वट, पीपल और मौलिश्री को पंच पल्लव कहते हैं। नव रत्नों में मुक्ता, माणिक्य, वैडूर्य, गोमेद, वज्र, विद्रुम, पद्मराग, मरकत और नीलमणि की गणना है॥३१ १/२॥ इस प्रकार नव रत्नों को कलश में छोड़ने के पश्चात् अपने इष्ट देवता का स्मरण करे। मन्त्रदाता गुरु इस प्रकार सर्वतोभद्र मण्डल में आबाहित देवताओं की विधिवत् पूजा करने के अनन्तर आभूषण, वस्त्र आदि आदि पहने हुए शिष्य को वेदी पर बैठाये और प्रोक्षणी जल से उसका अभिषेक करे ॥३२-३३॥ विधिपूर्वक भूत शुद्धि आदि करके उसके शरीर को अङ्गन्यास से शुद्ध कर शिर पर पल्लव रखकर मूलमन्त्र का एक सौ आठ बार पाठ कर जल को अभिमन्त्रित करे और उससे अपने प्रिय शिष्य का अभिषेक करे। उस समय गुरु हृदय में मूल मन्त्र का उच्चारण करता रहे ॥३४-३५॥ बचे हुये जल से शिष्य आचमन कर पुनः नवीन वस्त्र धारण करे और विधिपूर्वक गुरु की वन्दना कर सामने ही बैठ जाय ॥३६॥ गुरु शिष्य के सिर पर अपना हाथ रखकर विधिपूर्वक देवमन्त्र को एक सौ आठ बार जपे ॥३७॥ जप के बाद गुरु शिष्य से कहे कि 'समोऽस्तु' अर्थात् मेरे ही समान हो जाओ। फिर शिष्य गुरु की पूजा करे। गुरु अपने चन्दन चर्चित हाथ को शिष्य के मस्तक पर रखकर सावधानी से उसके कान में आठ बार देव मन्त्र को पढ़े। इस भांति विधिपूर्वक मन्त्रदीक्षा प्राप्त कर लेने पर शिष्य गुरु चरणों पर शिर रख दे ॥३८-३९॥ गुरु-वत्स, उठो, तुम मुक्त हो गये। भली-भांति आचार का पालन करो। तुमको कीर्ति, श्री, कान्ति पुत्र, आयु, बल और आरोग्य सदा मिलें। यह कह कर आशीर्वाद दे ॥४०॥ गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करने के अनन्तर शिष्य उठकर गन्ध आदि से गुरु की पूजा करे, और उदार हो कर गुरु दक्षिणा दे ॥४१॥ इस प्रकार गुरु से मन्त्र प्राप्त कर लेने पर उस दिन से धन आदि और अपने परिवार के द्वारा गुरु सेवा में तत्पर रहे ॥४२॥ प्रति दिन अपने इष्ट देव की पूजा करे पुष्पांजलि दे और फिर क्रमशः अग्नि, नैऋति और वागीश की पूजा करे ॥४३॥ जब मध्य में विष्णु की पूजा करे तब उनके चारों ओर विनायक, १. पंच पल्लव में मतभेद है-आम, पीपल, गूलर, पाकड़ी और बरगद को पंच पल्लव कहते हैं।
५५८ नारदीयपुराणम् यदा मध्ये यजेद्विष्णुं बाह्यादिषु विनायकम् । रविं शिवां शिवं चैव यदा मध्ये तु शङ्करम् ॥४४॥ रविं गणेशमंबां च हरिं चाथ यदा शिवाम् । ईशं विघ्नार्कगोविन्दान्मध्ये चेद्गणनायकम् ॥४५॥ शिवं शिवां रविं विष्णुं रवौ मध्यगते पुनः । गणेशं विष्णुमंबां च शिवं चेति यथाक्रमम् ॥४६॥ एवं नित्यं समभ्यर्च्य देवपञ्चकमादृतः । ब्राह्मे मुहूर्ते ह्युत्थाय कृत्वा चावश्यकं बुधः ॥४७॥ अशंकितो वा शय्यायां स्वकीयशिरसि स्मरेत् । सहस्रदलशुक्लाब्जकर्णिकास्थेंदुमण्डले ॥४८॥ अकथादित्रिकोणस्थं वराभयकरं गुरुम् । द्विनेत्रं द्विभुजं शुक्लगंधमाल्यानुलेपनम् ॥४९॥ वामे शक्त्या युतं ध्यात्वा मानसैरुपचारकैः । आराध्य पादुकामन्त्रं दशधा प्रजपेत्सुधीः ॥५०॥ वाङ्माया श्रीभर्गेद्वाढ्या वियद्धंसखकाग्नयः । हसक्षमलवार्यग्निवामकर्णेंदुयुग्मरुत् ॥५१॥ ततो भृग्वाकाशखाग्निभगेंद्राढ्याः परंतिमः । सहक्षमलतोयाग्निश्चंद्रशां तियुतो मरुत् ॥५२॥ ततः श्रीश्वामुकांते तु नन्दनाथामुकी पुनः । देव्यंतांते श्रीपादुकां पूजयामि हृदंतिमे ॥५३॥ अयं श्रीपादुकामंत्रः सर्वसिद्धिप्रदो नृणाम् । गुह्येति च समर्प्याथ मन्त्रैरैतैर्र्नमत्सुधीः ॥५४॥ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥५५॥ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥५६॥ नमोऽस्तु गुरवे तस्मा इष्टदेवस्वरूपिणे । यस्य वागमृतं हंति विषं संसारसंज्ञकम् ॥५७॥ इति नत्वा पठेत्स्तोत्रं सद्यः प्रत्ययकारकम् । ओम् नमस्ते नाथ भगवन् शिवाय गुरुरूपिणे ॥५८॥ सूर्य, शिवा ओर शिव की पूजा करे । यदि मध्य में शिव की अर्चा करे तब रवि, गणेश, हरि और शिवा की चारों ओर पूजा करे । मध्य में यदि शिवा की पूजा हो तो चारों ओर शिव, गणेश, सूर्य और विष्णु की पूजा होनी चाहिए। मध्य में गणेश की पूजा होने पर शिव, शिवा, सूर्य और विष्णु के बाह्य भाग की पूजा हो । रवि को मध्य में रख कर पूजा करने पर गणेश, विष्णु, पार्वती और शिव को बाह्य भाग में स्थापित कर अर्चना करनी चाहिए ॥४४-४६॥ इस प्रकार विज्ञ शिष्य प्रति दिन ब्राह्म मुहूर्त्त में उठ कर पंच देवों की पूजा करे । आवश्यक कार्यों से निवृत्त होकर निश्चन्त भाव से शय्या पर बैठे बैठे अपने शिर में सहस्र दल वाले श्वेत कमल की कर्णिका में स्थित चन्द्रमण्डल में अ. क. थ आदि त्रिकोण में श्रेष्ठ और अभयप्रद गुरु का स्मरण करे, जिनकी दो भुजायें हों और उनके शरीर में श्वेत सुगन्धित पदार्थ का लेप लगा हो और श्वेत माला से शरीर सुशोभित हो, और वाम भाग में शक्ति विराजमान हो । ऐसी मुद्रा में गुरु का ध्यान कर मानसिक उपचार से उनकी पूजा कर पादुका मन्त्र का दश बार जप करे ॥४७-५०॥ वाङ्माया श्री भगेन्द्राढ्या वियद्धंसखकाग्नयः । हसक्ष मलवार्याग्निवामकर्णेन्दुयुग्मरुत् । ततो भृग्वाकाशखाग्निभगेन्द्राढ्याः परंतिमः । सहक्षमलतोयाग्निश्चन्द्र शान्तियुतो मरुत् । ततः श्रीश्वामुकान्ते तु नंदनाथामुकी पुनः देव्यंबान्ते श्रीपादुकां पूजामि हृदन्ते मे ॥५१-५२॥ यह पादुका मन्त्र मनुष्यों को सब प्रकार की सिद्धियां देने वाली है । इस क्रिया के अनन्तर 'गुह्याति गुह्य – इस मन्त्र से मन्त्र का समर्पण कर आगे कहे गये मन्त्रों से नमस्कार करे । ५४॥ मन्त्र 'जिस गुरु ने सब चराचर जगत् में व्याप्त, अखण्ड मण्डलाकार ब्रह्म पद का दर्शन करा दिया उस गुरु को नमस्कार है ॥५५॥ जिस गुरु ने अज्ञान के अन्धकार के कारण कुछ भी न देख सकने वाले शिष्य (लोक) की आंखों में ज्ञान की अञ्जन-शलाका लगाकर खोल दिया (ज्ञान की ज्योति प्रदान की) उस गुरु को नमस्कार है ॥५६॥ उस इष्टदेव स्वरूप गुरु को प्रणाम है जिसकी वाणी रूपी सुधा संसार (माया) रूप विष को नष्ट कर देती है ॥५७॥ इस मन्त्र से गुरु का नमस्कार कर तत्काल श्रद्धा उत्पन्न कर देने वाले अग्रिम स्तोत्र का पाठ करे । स्तोत्र-
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः [पृष्ठ संख्या: ५५१]
विद्यावतारसंसिद्ध्यै स्वीकृतानेकविग्रह। नवायतनरूपाय परमार्थैकरूपिणे ॥५८॥ सर्वाज्ञानतमोभेदभानवे चिद्घनाय ते। स्वतंत्राय दयाक्लृप्तविग्रहाय शिवात्मने ॥६०॥ परतंत्राय भक्तानां भव्यानां भावरूपिणे। विवेकिनां विवेकाय विमर्शाय विमर्शिनाम् ॥६१॥ प्रकाशानां प्रकाशाय ज्ञानिनां ज्ञानरूपिणे। पुरस्तात्पार्श्वयोः पृष्ठे नमस्तुभ्यमुपर्यधः ॥६२॥ सदा सच्चित्स्वरूपेण विधेहि भवदासनम्। त्वत्प्रसादादहं देव कृतकृत्योऽस्मि सर्वतः ॥६३॥ मायामृत्युमहापाशाद्विमुक्तोऽस्मि शिवोऽस्मि वः। इति स्तुत्वा ततः सर्वं गुरवे विनिवेदयेत् ॥६४॥ प्रातःप्रभृति सायांतं सायादिप्रातरंततः। यत्करोमि जगन्नाथ तदस्तु तव पूजनम् ॥६५॥ ततश्च गुरुपादाम्बजगलितामृतधारया। क्षालितं निजमात्मानं निर्मलं भावयेत्सुधीः ॥६६॥ मूलादिब्रह्मरंध्रांतं मूलविद्यां विभावयेत्। मूलाधारादधो भागे वर्तुलं वायुमंडलम् ॥६७॥ तत्रस्थवायुबीजोत्थवायुना च तदूर्ध्वकम्। त्रिकोणं मंडलं वह्नेस्तत्स्थं वह्निबीजतः ॥६८॥ उत्पन्नेनाग्निना मूलाधारावस्थितविग्रहम्। प्रसुप्तभुजगाकारां स्वयंभूलिंगवेष्टिनीम् ॥६९॥ बिसतंतुनिभां कोटिविद्युद्दाभां तनीयसीम्। कुलकुंडलिनीं ध्यात्वा कूर्चेनोत्थापयेच्च ताम् ॥७०॥ सुषुम्णावर्त्मना तां च षट्चक्रक्रमभेदिनीम्। गुरुपदिष्टविधिना ब्रह्मरंध्रं नयेत्सुधीः ॥७१॥ तत्रस्थामृतसंमग्नीकृत्यात्मानं विभावयेत्। तत्प्रभापटलव्याप्तं विमलं चिन्मयं परम् ॥७२॥ पुनस्तां स्वस्थलं नीत्वा हृदि देवं विचितयन्। दृष्ट्वा च मान्सैर्द्रव्यैः प्रार्थयेन्मनुनामुना ॥७३॥
ओम् ॰॰॰नाथ, भगवन्, विद्या दान के लिये अनेक प्रकार के शरीर धारण करने वाले, गुरुरूपी शिव को नमस्कार है। परमार्थ मात्र रूप वाले, तन रूप, और नव (शंकर) को नमस्कार है ॥५८-५९॥ सब प्रकार के अज्ञान रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाले सूर्य, चिद्घन, स्वतन्त्र, दयामूर्ति, शिवात्मा को नमस्कार है। भक्तों के वश में रहने वाले, भव्य (भावुक) जनों के भाव, विवेकिकयों के विवेक, विचारशीलों के विचार, प्रकाशों के प्रकाश, ज्ञानियों के ज्ञान वाले, उस शिव को प्रणाम है। आगे, पीछे, बगल में, ऊपर और नीचे आपको नमस्कार है ॥६०-६२॥ आप सर्वदा सत्, चित् स्वरूप से मेरे हृदय में अपना आसन जमावें। देव, मैं तुम्हारी कृपा से सर्वथा कृतकृत्य हूँ। तुम्हारी कृपा से माया मृत्यु के महापाश से मुक्त हूँ और शिव रूप हो गया हूँ। इस प्रकार गुरु की स्तुति करने के अनन्तर गुरु को सर्वस्व अर्पण करे कि 'जगन्नाथ ! प्रातःकाल से सायंकाल और सायंकाल से प्रातःकाल तक जो कर्म करता हूँ वह और कुछ नहीं केवल तुम्हारा पूजन है' ॥६३-६५॥ इसके अनन्तर वह बुद्धिमान् शिष्य ऐसी भावना करे कि वह गुरु के चरण कमलों से निकलती हुई अमृत धारा में स्नान कर रहा है और उसके सब पाप धुलते जा रहे हैं, इस प्रकार वह निर्मल हो गया ॥६६॥ इस प्रकार निर्मलता प्राप्त कर मूलाधार चक्र से ब्रह्मरन्ध्र तक मूल विद्या की भावना करे। मूलाधार के नीचे वर्तुलकार (गोल) वायु मण्डल है, उस वायु मण्डल में स्थित वायुबीज को प्रदीप्त कर उससे ऊपर के भाग में स्थित अग्नि के त्रिकोण मण्डल में स्थित अग्नि बीज (रकार) को जाग्रत करे ॥६७-६८॥ उस जाग्रत वह्नि बीज से प्रदीप्त अग्नि से मूलाधार में स्थित रहने वाली, सोये सर्प के समान आकार वाली, भूर्लिंग को अपने में जकड़ रखने वाली, कमल नाल के समान, करोड़ों विद्युत् के समान चकाचौंध उत्पन्न करने वाली, अति कृश, कुलकुण्डलिनी का ध्यान कर उसको कूर्च (कूँची) से जगाये ॥६९-७०॥ सुषुम्णा नाड़ी से उस कुण्डलिनी को क्रम से षट्चक्र का भेदन करते हुए गुरु की बताई विधि से ब्रह्म रन्ध्र तक ले जाय। उस ब्रह्मरन्ध्र में स्थित अमृत में अपने को मग्न कर दे और अपने को तेज पुंज से व्याप्त, विमल और चिन्मय के रूप में समझे अर्थात् चिन्मय की भावना से
५६० नारदीयपुराणम् त्रैलोक्यचैतन्यमयादिदेव श्रीनाथ विष्णो भवदाज्ञयैव । प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थं संसारयात्रां त्वनुवर्तयिष्ये ॥७४॥ विष्णोरिति स्थले विप्र कार्यं ऊहोऽन्यदैवते । ततः कुर्यात्सर्वसिद्धयै त्वजपाया निवेदनम् ॥७५॥ षट्शतानि दिवा रात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः । अजपाख्यां तु गायत्रीं जीवो जपति सर्वदा ॥७६॥ ऋषिर्हंसस्तथाव्यक्तगायत्रीछंद ईरितम् । देवता परमो हंसश्चाद्यंते बीजशक्तिकम् ॥७७॥ ततः षडंगं कुर्वीत सूर्यः सोमो निरंजनः । निराभासश्च धर्मश्च ज्ञानं चेति तथा पुनः ॥७८॥ क्रमादेतान्हंसपूर्वानात्मनेपदपश्चिमान् । जातयुक्तान्साधकेंद्र षडंगेषु नियोजयेत् ॥७९॥ हकारः सूर्यसंकाशतेजाः संगच्छते बहिः । सकारस्तादृशश्चैव प्रवेशे ध्यानमीरितम् ॥८०॥ एवं ध्यात्वार्पयेद्धीमान्हृच्चक्रेषु विभागशः । मूलाधारे वादिसान्तबीजयुक्ते चतुर्दले ॥८१॥ बंधूकाभे स्वशक्त्या तु सहितापास्तवागय च । पाशांकुशसुधापात्रमोदकोल्लासपाणये ॥८२॥ षट्शतं तु गणेशाय वागधीशाय चार्पयेत् । स्वाधिष्ठाने विद्रुमाभे बादिलांतांणसंयुते ॥८३॥ वामांगशक्तियुक्ताय विद्याधिपतये तथा । स्रुवाक्षमालाकलसितबाहवे पद्मजन्मने ॥८४॥ भावित करे ॥७१-७२॥ फिर उस कुण्डलिनी को यथा स्थान ले जाकर हृदय प्रदेश में इष्ट देव का चिन्तन करे और हृदय में उस चिन्मय देव की कल्पित मानसिक सामग्रियों से पूजा करे और इस मन्त्र से प्रार्थना करे-- 'त्रिलोकी के चैतन्यस्वरूप ! आदि देव, श्रीनाथ, विष्णो, आपकी आज्ञा से ही प्रातःकाल उठकर तुम्हें प्रसन्न करने के लिये ही सांसारिक कार्यों को कर रहा हूँ।' ॥७३-७४॥ विप्र, ! यदि दूसरे देवता का मन्त्र लेना हो तो पूर्वोक्त मन्त्र में 'विष्णोः' आदि के स्थान में ऊहापोह द्वारा उसके वाचक शब्द या नाम का प्रयोग करना चाहिए । तदनन्तर समस्त सिद्धि के लिये 'अजपा' जप निवेदित करना चाहिए ॥७५॥ दिन-रात में जीव इक्कीस हजार छः सौ (२१६००) बार अजपा नामक गायत्री का जप सदा करता है ॥७६॥ (इस अजपा मंत्र के) ऋषि हंस हैं, अव्यक्त गायत्री छन्द कहा गया है देवता परमहंस हैं। आदि (हं) बीज और अन्त (सः) शक्ति है । तदनन्तर षडंगन्यास करे । सूर्य, सोम, निरंजन, निराभास, धर्म और ज्ञान—ये छह अंग हैं ॥७७-७८॥ क्रमशः इनके पूर्व में 'हंसः' और अन्त में आत्मनेपद जोड़कर श्रेष्ठ साधक इनका छह अंगों में न्यास करे । (हंसः सूर्यात्मने हृदयाय नमः । हंसःसोमात्मने शिरसे स्वाहा । हंसो निरंजनात्मने शिखायै वषट् । हंसो निराभासात्मने कवचाय हुम् । हंसो धर्मात्मने नेत्राभ्यां वौषट् । हंसो ज्ञानात्मने अस्त्राय फट् ।) हकार सूर्य के समान तेजस्वी होकर शरीर से बाहर निकलता है, और सकार वैसे ही तेजस्वी रूप से प्रवेश करता है । इस प्रकार हकार और सकार का ध्यान कहा गया है ॥७९-८०॥ इस प्रकार ध्यान करके बुद्धि- मान् पुरुष अग्नि और सूर्य मण्डल में विभागपूर्वक जप अर्पण करे । मूलाधार में चार दलों का कमल है, जो बन्धूक पुष्प के समान लाल है । उसके चारों दलों में क्रमशः व, श, ष, स ये अक्षर अंकित हैं। उसमें अपनी शक्ति के साथ गणेश जी विराजमान हैं। वे अपने चारों हाथों में पाश, अंकुश, अमृतपात्र तथा लड्डू लेकर प्रसन्न हैं ॥८१-८२॥ ऐसे वाक्पति गणेश जी को ६०० जप अपूर्ण करे । स्वाधिष्ठान चक्र में छः दलों का कमल है । वह चक्र मूँगे के समान कांति युक्त है । उसके छः दलों में क्रमशः ब. भ. म. य. र. ल—ये अक्षर अंकित हैं ॥८३॥ उसमें विद्या के अधिपति ब्रह्मा जी हंस पर आरूढ होकर विराजमान हैं; उनके वामभाग में ब्राह्मी शक्ति हैं; उनके हाथों में स्रुवा और अक्षमाला हैं । ऐसे ब्रह्मा को छः हजार जप अर्पित करे । मणिपूर चक्र में दस दल वाला कमल विद्यमान है । उसके प्रत्येक दल पर क्रमशः ड. ढ. ण. त. थ. द. ध. न. प. फ--ये अक्षर अंकित हैं।