बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४८ नारदीयपुराणम् आहारश्चैव निद्रा च भयं मैथुनमेव च । पश्वादीनां च सर्वेषां साधारणमितीरितम् ॥१०५॥ चतुष्र्वेवानुरक्तो यः स मूर्खो ह्यात्मघातकः । मनुष्याणामयं धर्मः स्वबंधच्छेदनात्मकः ॥१०६॥ पाशबंधनविच्छेदो दीक्षयैव प्रजायते । अतो बंधनविच्छित्त्यै मंत्रदीक्षां समाचरेत् ॥१०७॥ दीक्षाज्ञानाख्यया शक्त्या ह्यपध्वंसितबन्धनः । शुद्धात्मतत्त्वनामासौ निर्वाणपदमश्नुते ॥१०८॥ स्वशक्त्यात्मिकया दृष्ट्या शिवं ध्यायति पश्यति । यजते शिवमन्त्रैश्च स्वपरेषां हिताय सः ॥१०८॥/ शिवाकंशक्तिदीधित्या समर्थीकृतचिद्दृशा । शिवशक्त्यादिभिः साद्धं पश्यत्यात्मगतावृत्तिः ॥११०॥ अन्तःकरणवृत्त्या बोधाख्या सा महेश्वरम् । न प्रकाशयितुं शक्ता पाशत्वान्निगडादिवत् ॥१११॥ दीक्षैव परमो हेतुः पाशविच्छेदने पुनः । अतः शास्त्रोक्तविधिना मत्रदीक्षां समाचरेत् ॥११२॥ दीक्षितस्तंत्रविधिना स्ववर्णाचारतत्परः । अनुष्ठानं प्रकुर्वीत नित्यनैमित्तिकात्मकम् ॥११३॥ निजवर्णाश्रमाचारान्मनसापि न लंघयेत् । यो यस्मिन्नाश्रमे तिष्ठन्दीक्षां प्राप्नोति मानवः ॥११४॥ स तस्मिन्नाश्रमे तिष्ठेत्तद्धर्माननुपालयेत् । कृतान्यपि न कर्माणि बंधनाय भवंति हि ॥११५॥ एकं तु फलदं कर्म मंत्रानुष्ठानसंभवम् । दीक्षितोऽभिलषेदभोगान्यद्यल्लोकगतानसौ ॥११६॥ मंत्राराधनसामर्थ्यात्तद्भुक्त्वा मोक्षमश्नुते । नित्यं नैमित्तिकं दीक्षां प्राप्य यो नाचरेन्नरः ॥११७॥ कंचित्कालं पिशाचत्वं प्राप्यांते मोक्षमश्नुते । तस्मात्तु दीक्षितः कुर्यान्नित्यनैमित्तिकादिकम् ॥११८॥ अनुष्ठानं च तेनास्य दीक्षां प्राप्याऽनुमीयते । नित्यनैमित्तिकाचार पालकस्य नरस्य तु ॥११९॥ साधारणतया आहार, निद्रा, भय और मैथुन पशुओं में भी पाये जाते हैं । जो मूर्ख इन चारों में ही अनुरक्त रहता है वह आत्मघाती है । मनुष्यों का यह अपने को माया बन्धन से छुड़ाना ही धर्म है । पाश बन्धन से दीक्षा के द्वारा ही मुक्ति होती है अतः बन्धन से अपने को छुड़ाने के लिये मन्त्र दीक्षा अवश्य लेनी चाहिये । दीक्षा ज्ञान नामक शक्ति से अपने सब बन्धनों को ध्वस्त कर देने वाला शुद्ध आत्म तत्त्व वाला ही मुक्ति पद पाता है । जो स्व-शक्ति सम्पन्न दृष्टि से शिव का ध्यान करता और देखता है और अपने तथा दूसरों के हित के लिये शिव मन्त्र से शिव की पूजा करता है। वह शिव, सूर्य और शक्ति की किरणों से (तेज से) अपनी दृष्टि को शक्ति- शाली बनाकर शक्ति आदि के सहित शिव को आत्मस्थ होकर देखता है । जो ज्ञान या बोध नाम की अन्तःकरण वृत्ति है वह जंजीर के समान पाशों से बद्ध होने के कारण शिव को प्रकाशित नहीं कर सकती । पाश से मुक्त करने में दीक्षा ही परम कारण है इसलिये शास्त्रोक्त विधि से मन्त्र दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए । तन्त्र विधि से दीक्षित होकर अपने वर्ण के अनुकूल आचरण करते हुए नित्य नैमित्तिक कर्म¹ को करना चाहिए । वर्णाश्रम के अनुकूल आचारों के उल्लंघन का मन में विचार तक करना अनुचित है । जो मनुष्य जिस आश्रम में रह कर दीक्षा ग्रहण करता है वह उसी आश्रम में रहता हुआ धर्म का पालन करे । इस प्रकार वर्ण धर्म के अनुसार कृत कर्म बन्धन के कारण नहीं बनते । मन्त्र के अनुष्ठान से किया हुआ एक ही कर्म फल-दायक होता है । मन्त्र से दीक्षित व्यक्ति जिन-जिन लौकिक भोगों की इच्छा करता है वह मन्त्र जप के प्रभाव से उन-उन भोगों को भोग कर अन्त में मोक्ष भी पा जाता है । जो मनुष्य दीक्षा प्राप्त कर लेने पर नित्य नैमित्तिक² कर्मों का परित्याग कर देता है वह कुछ काल तक पिशाच योनि में जाकर अन्त में मोक्ष पाता है । इसलिये दीक्षित होकर नित्य नैमित्तिक आदि कर्मों को अवश्य करना चाहिये । नित्य नैमित्तिक कर्मों का पालन करने वाले व्यक्ति के किसी अनुष्ठान १--नित्य कर्म सन्ध्या वन्दन आदि, नैमित्तिक कर्म--किसी विशेष कारण से किये हुए कार्य यज्ञ आदि ।