बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुःषष्टितमोऽध्यायः ५४६ दीक्षावैकल्यविरहात्सद्यो मुक्तिस्तु जायते । तत्रापि गुरुभक्तस्य गतिर्भवति नान्यथा ॥१२०॥ दीक्षया गुरुमूर्तिस्थः सर्वानुग्राहकः शिवः । दृष्टाद्यर्थतया यस्य गुरुभक्तिस्तु कृत्रिमा ॥१२१॥ कृतेऽपि विफलं तस्य प्रायश्चित्तं पदे पदे । कायेन मनसा वाचा गुरुभक्तिपरस्य च ॥१२२॥ प्रायश्चित्तं भवेन्नैव सिद्धिस्तस्य पदे पदे । गुरुभक्तियुते शिष्ये सर्वस्वविनिवेदके ॥१२३॥ मिथ्याप्रयुक्तमन्त्रस्तु प्रायश्चित्ती भवेद्गुरुः । ॥१२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥६३॥ चतुःषष्टितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ जीवस्य पाशौघच्छेदनायेष्टसिद्धिदम् । दीक्षाविधिं प्रवक्ष्यामि मन्त्रसामर्थ्यदायकम् ॥१॥ दिव्यं भावं यतो दद्यात्क्षिणुयाद्दुरितानि च । अतो दीक्षेति सा प्रोक्ता सर्वागमविशारदैः ॥२॥ के फल का अनुमान दीक्षा पा लेने के बाद ही लगाया जा सकता है। अवश्य दीक्षा प्राप्त करने पर तत्काल मुक्ति मिल जाती है, उसमें गुरुभक्त की ही मुक्ति होती है अन्यथा नहीं। दीक्षा से सब पर अनुग्रह करने वाले शिव स्वयं गुरु रूप में उपस्थित हो जाते हैं। जो केवल लौकिक लाभ के लिये कृत्रिम गुरुभक्ति दिखलाता है, उसके कर्म करने पर भी फल नहीं मिलते और उसको पद-पद पर प्रायश्चित्त लगता है। शरीर, मन और वाणी से गुरुभक्ति करने वाले शिष्य को किसी प्रकार का प्रायश्चित्त नहीं लगता और पग-पग पर उसको सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार सर्वस्व अर्पण करने वाले गुरुभक्त शिष्य को मिथ्या मन्त्र का आदेश करने वाला गुरु प्रायश्चित्त का भागी होता है ।। १२०५-१२४।। श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग में तिरसठवां अध्याय समाप्त ॥६३॥ अध्याय ६४ दीक्षा विधि का निरूपण सनत्कुमार बोले- इसके अनन्तर जीव को पाश समूह से मुक्त कर इष्ट-सिद्धि-प्रदान-कारक और मन्त्र-शक्तिदायक दीक्षा-विधि का वर्णन कर रहा हूँ ।।१।। यतः यह दिव्य भावना को प्रदान करती और सब पापों का क्षय करती है अतः सब शास्त्रों के निपुण विद्वान् इसको दीक्षा कहते हैं ।।२।। मनन और त्राण से