बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 566, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिषष्टितमोऽध्यायः
प्रयोक्तव्यादिमहीप्रांतमेतदंडार्थसाधनम् । प्रत्यात्मनियतं भोगभेदतो व्यवसीयते ॥८९॥ तत्त्वान्येवं कलाद्यानि प्रतिपुंनियतानि हि । देहेषु कर्मवशतः सर्वेषु विचरंति हि ॥९०॥ मायेयश्चैव पाशोऽयं येनावृतमिदं जगत् । अशुद्धाध्वा मतो ह्येष धरण्यादिकलावधिः ॥९१॥ तत्र भूमण्डलस्थोऽसौ स्थावरो जङ्गमात्मकः । स्थावरा गिरिवृक्षाद्या जङ्गमस्त्रिविधः पुनः ॥९२॥ स्वेदजाश्चांडजाश्चैव तथैव च जरायुजाः । चराचरेषु लक्षाणां चतुराशीतियोनयः ॥९३॥ भ्रममाणस्तेषु जीवः कदाचिन्मानुषं वपुः । प्राप्नोति कर्मवशतः परं सर्वार्थसाधकम् ॥९४॥ तत्रापि भारते खण्डे ब्राह्मणादिकुलेषु च । महापुण्यवशेनैव जनिर्भवति दुर्लभा ॥९५॥ जनिश्च पुंस्त्रियोर्योगः शुक्रशोणितयोगतः । बिंदुरेकः प्रविशति यदा गर्भे द्वयात्मकः ॥९६॥ तदा रजोऽधिके नारी भवेद्रतोऽधिके पुमान् । मलकर्मादिपाशेन कश्चिदात्मा नियंत्रितः ॥९७॥ जीवभावं तदा तस्मिन्सकलः प्रतिपद्यते । अथ तत्राहुतैर्मात्रा पानान्नाद्यैश्च पोषितः ॥९८॥ पक्षमासादिकालेन वर्धते वपुरत्र हि । दुःखाद्यैः पीडितश्चैवाच्छन्नदेहो जरायुणा ॥९९॥ एवं तत्र स्थितो गर्भे प्राग्जन्मोत्थं शुभाशुभम् । स्मरंस्तिष्ठति दुःखात्मा पीड्यमानो मुहुर्मुहुः ॥१००॥ कालक्रमेण बालोऽसौ मातरं पीडयन्नपि । संपीडितो निःसरति योनियंत्रादवाङ्मुखः ॥१०१॥ क्षणं तिष्ठति निश्चेष्टस्ततो रोदितुमिच्छति । ततः क्रमेण स शिशुर्वर्धमानो दिनेदिने ॥१०२॥ बालपौगंडभेदेन युवत्वं प्रतिपद्यते । एवं क्रमेण लोकेऽस्मिन्देहिनां देहसंभवः ॥१०३॥ मानुषं दुर्लभं प्राप्य सर्वलोकोपकारकम् । यस्तारयति नात्मानं तस्मात्पापपरोऽत्र कः ॥१०४॥
हिंदी अनुवाद:
शय में आकाश तत्त्व व्याप्त है। कला से लेकर पृथ्वीपर्यन्त यह तत्त्वसमुदाय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का साधन है। प्रति व्यक्ति में ये कला आदि तत्त्व नियत रूप से हैं और कर्म के वश में होकर सब शरीर में घूमते रहते हैं। यह पाश मायेय है जिससे सारा संसार ढका है। पृथ्वी से लेकर कला तक अशुद्धाध्वा कहा जाता है। यह अशुद्धाध्वा इस पर स्थावर जंगम के रूप में वर्तमान है। पहाड़ और पेड़ आदि स्थावर हैं, जंगम के भी तीन भेद हैं स्वेदज, अंडज और जरायुज। चराचर में कुल मिलाकर चौरासी लाख योनियां हैं। संयोगवश अपने कर्मों के कारण सब योनियों में भ्रमण करता हुआ जीव मानव शरीर पाता है जो भली भाँति सब अर्थों को सिद्ध करने वाला है। उसमें भारत खण्ड में ब्राह्मण आदि कुलों में जन्म पाना अत्यन्त दुर्लभ है, क्योंकि ऐसा जन्म महापुण्यों के कारण प्राप्त होता है। जन्म पुरुष-स्त्री के संयोग से रज वीर्य का संयोग होने पर होता है। जब गर्भ में वीर्य रज के साथ पहुँचता है तब रज की अधिकता होने पर स्त्री और वीर्य की अधिकता होने पर पुरुष उत्पन्न होता है। मल और कर्म के पाश में जकड़ा हुआ कोई आत्मा कला के सहित उस गर्भ में जीव रूप हो जाता है। इसके बाद उस गर्भ में माता के भोजन से बने हुए रस से उस जीव का पोषण होता और पक्ष, मास आदि के अनुसार धीरे-धीरे जीव का शरीर बढ़ने लगता है। गर्भ की झिल्ली से बंधा वह बहुत अधिक कष्ट पाता है। इस प्रकार गर्भ में बार-बार कष्ट होने पर दुःखी जीवात्मा पूर्व जन्म के शुभ-अशुभ कर्मों का स्मरण करता हुआ निवास करता है। माता को पीड़ा पहुँचाता हुआ वह जीव दस महीने बीत जाने पर स्वयं पीड़ित होकर औंधे मुख योनि से बाहर निकलता है। उस समय क्षण भर तो निश्चेष्ट रहता फिर उसके बाद रोने की इच्छा होती है। क्रमशः दिनों दिन वह शिशु बढ़ने लगता और बाल्य, पौगण्ड को बिता कर युवावस्था को प्राप्त करता है, इस प्रकार इस लोक में आत्मा जन्म लेता है। जो सारे लोक का उपकार करने वाले मनुष्य-शरीर को पाकर अपना उद्धार नहीं करता उससे बढ़कर पापी कौन हो सकता है ? ॥८७-१०४॥