बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
त्रिषष्टितमोऽध्यायः
प्रयोक्तव्यादिमहीप्रांतमेतदंडार्थसाधनम् । प्रत्यात्मनियतं भोगभेदतो व्यवसीयते ॥८९॥ तत्त्वान्येवं कलाद्यानि प्रतिपुंनियतानि हि । देहेषु कर्मवशतः सर्वेषु विचरंति हि ॥९०॥ मायेयश्चैव पाशोऽयं येनावृतमिदं जगत् । अशुद्धाध्वा मतो ह्येष धरण्यादिकलावधिः ॥९१॥ तत्र भूमण्डलस्थोऽसौ स्थावरो जङ्गमात्मकः । स्थावरा गिरिवृक्षाद्या जङ्गमस्त्रिविधः पुनः ॥९२॥ स्वेदजाश्चांडजाश्चैव तथैव च जरायुजाः । चराचरेषु लक्षाणां चतुराशीतियोनयः ॥९३॥ भ्रममाणस्तेषु जीवः कदाचिन्मानुषं वपुः । प्राप्नोति कर्मवशतः परं सर्वार्थसाधकम् ॥९४॥ तत्रापि भारते खण्डे ब्राह्मणादिकुलेषु च । महापुण्यवशेनैव जनिर्भवति दुर्लभा ॥९५॥ जनिश्च पुंस्त्रियोर्योगः शुक्रशोणितयोगतः । बिंदुरेकः प्रविशति यदा गर्भे द्वयात्मकः ॥९६॥ तदा रजोऽधिके नारी भवेद्रतोऽधिके पुमान् । मलकर्मादिपाशेन कश्चिदात्मा नियंत्रितः ॥९७॥ जीवभावं तदा तस्मिन्सकलः प्रतिपद्यते । अथ तत्राहुतैर्मात्रा पानान्नाद्यैश्च पोषितः ॥९८॥ पक्षमासादिकालेन वर्धते वपुरत्र हि । दुःखाद्यैः पीडितश्चैवाच्छन्नदेहो जरायुणा ॥९९॥ एवं तत्र स्थितो गर्भे प्राग्जन्मोत्थं शुभाशुभम् । स्मरंस्तिष्ठति दुःखात्मा पीड्यमानो मुहुर्मुहुः ॥१००॥ कालक्रमेण बालोऽसौ मातरं पीडयन्नपि । संपीडितो निःसरति योनियंत्रादवाङ्मुखः ॥१०१॥ क्षणं तिष्ठति निश्चेष्टस्ततो रोदितुमिच्छति । ततः क्रमेण स शिशुर्वर्धमानो दिनेदिने ॥१०२॥ बालपौगंडभेदेन युवत्वं प्रतिपद्यते । एवं क्रमेण लोकेऽस्मिन्देहिनां देहसंभवः ॥१०३॥ मानुषं दुर्लभं प्राप्य सर्वलोकोपकारकम् । यस्तारयति नात्मानं तस्मात्पापपरोऽत्र कः ॥१०४॥
हिंदी अनुवाद:
शय में आकाश तत्त्व व्याप्त है। कला से लेकर पृथ्वीपर्यन्त यह तत्त्वसमुदाय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का साधन है। प्रति व्यक्ति में ये कला आदि तत्त्व नियत रूप से हैं और कर्म के वश में होकर सब शरीर में घूमते रहते हैं। यह पाश मायेय है जिससे सारा संसार ढका है। पृथ्वी से लेकर कला तक अशुद्धाध्वा कहा जाता है। यह अशुद्धाध्वा इस पर स्थावर जंगम के रूप में वर्तमान है। पहाड़ और पेड़ आदि स्थावर हैं, जंगम के भी तीन भेद हैं स्वेदज, अंडज और जरायुज। चराचर में कुल मिलाकर चौरासी लाख योनियां हैं। संयोगवश अपने कर्मों के कारण सब योनियों में भ्रमण करता हुआ जीव मानव शरीर पाता है जो भली भाँति सब अर्थों को सिद्ध करने वाला है। उसमें भारत खण्ड में ब्राह्मण आदि कुलों में जन्म पाना अत्यन्त दुर्लभ है, क्योंकि ऐसा जन्म महापुण्यों के कारण प्राप्त होता है। जन्म पुरुष-स्त्री के संयोग से रज वीर्य का संयोग होने पर होता है। जब गर्भ में वीर्य रज के साथ पहुँचता है तब रज की अधिकता होने पर स्त्री और वीर्य की अधिकता होने पर पुरुष उत्पन्न होता है। मल और कर्म के पाश में जकड़ा हुआ कोई आत्मा कला के सहित उस गर्भ में जीव रूप हो जाता है। इसके बाद उस गर्भ में माता के भोजन से बने हुए रस से उस जीव का पोषण होता और पक्ष, मास आदि के अनुसार धीरे-धीरे जीव का शरीर बढ़ने लगता है। गर्भ की झिल्ली से बंधा वह बहुत अधिक कष्ट पाता है। इस प्रकार गर्भ में बार-बार कष्ट होने पर दुःखी जीवात्मा पूर्व जन्म के शुभ-अशुभ कर्मों का स्मरण करता हुआ निवास करता है। माता को पीड़ा पहुँचाता हुआ वह जीव दस महीने बीत जाने पर स्वयं पीड़ित होकर औंधे मुख योनि से बाहर निकलता है। उस समय क्षण भर तो निश्चेष्ट रहता फिर उसके बाद रोने की इच्छा होती है। क्रमशः दिनों दिन वह शिशु बढ़ने लगता और बाल्य, पौगण्ड को बिता कर युवावस्था को प्राप्त करता है, इस प्रकार इस लोक में आत्मा जन्म लेता है। जो सारे लोक का उपकार करने वाले मनुष्य-शरीर को पाकर अपना उद्धार नहीं करता उससे बढ़कर पापी कौन हो सकता है ? ॥८७-१०४॥
५४८ नारदीयपुराणम् आहारश्चैव निद्रा च भयं मैथुनमेव च । पश्वादीनां च सर्वेषां साधारणमितीरितम् ॥१०५॥ चतुष्र्वेवानुरक्तो यः स मूर्खो ह्यात्मघातकः । मनुष्याणामयं धर्मः स्वबंधच्छेदनात्मकः ॥१०६॥ पाशबंधनविच्छेदो दीक्षयैव प्रजायते । अतो बंधनविच्छित्त्यै मंत्रदीक्षां समाचरेत् ॥१०७॥ दीक्षाज्ञानाख्यया शक्त्या ह्यपध्वंसितबन्धनः । शुद्धात्मतत्त्वनामासौ निर्वाणपदमश्नुते ॥१०८॥ स्वशक्त्यात्मिकया दृष्ट्या शिवं ध्यायति पश्यति । यजते शिवमन्त्रैश्च स्वपरेषां हिताय सः ॥१०८॥/ शिवाकंशक्तिदीधित्या समर्थीकृतचिद्दृशा । शिवशक्त्यादिभिः साद्धं पश्यत्यात्मगतावृत्तिः ॥११०॥ अन्तःकरणवृत्त्या बोधाख्या सा महेश्वरम् । न प्रकाशयितुं शक्ता पाशत्वान्निगडादिवत् ॥१११॥ दीक्षैव परमो हेतुः पाशविच्छेदने पुनः । अतः शास्त्रोक्तविधिना मत्रदीक्षां समाचरेत् ॥११२॥ दीक्षितस्तंत्रविधिना स्ववर्णाचारतत्परः । अनुष्ठानं प्रकुर्वीत नित्यनैमित्तिकात्मकम् ॥११३॥ निजवर्णाश्रमाचारान्मनसापि न लंघयेत् । यो यस्मिन्नाश्रमे तिष्ठन्दीक्षां प्राप्नोति मानवः ॥११४॥ स तस्मिन्नाश्रमे तिष्ठेत्तद्धर्माननुपालयेत् । कृतान्यपि न कर्माणि बंधनाय भवंति हि ॥११५॥ एकं तु फलदं कर्म मंत्रानुष्ठानसंभवम् । दीक्षितोऽभिलषेदभोगान्यद्यल्लोकगतानसौ ॥११६॥ मंत्राराधनसामर्थ्यात्तद्भुक्त्वा मोक्षमश्नुते । नित्यं नैमित्तिकं दीक्षां प्राप्य यो नाचरेन्नरः ॥११७॥ कंचित्कालं पिशाचत्वं प्राप्यांते मोक्षमश्नुते । तस्मात्तु दीक्षितः कुर्यान्नित्यनैमित्तिकादिकम् ॥११८॥ अनुष्ठानं च तेनास्य दीक्षां प्राप्याऽनुमीयते । नित्यनैमित्तिकाचार पालकस्य नरस्य तु ॥११९॥ साधारणतया आहार, निद्रा, भय और मैथुन पशुओं में भी पाये जाते हैं । जो मूर्ख इन चारों में ही अनुरक्त रहता है वह आत्मघाती है । मनुष्यों का यह अपने को माया बन्धन से छुड़ाना ही धर्म है । पाश बन्धन से दीक्षा के द्वारा ही मुक्ति होती है अतः बन्धन से अपने को छुड़ाने के लिये मन्त्र दीक्षा अवश्य लेनी चाहिये । दीक्षा ज्ञान नामक शक्ति से अपने सब बन्धनों को ध्वस्त कर देने वाला शुद्ध आत्म तत्त्व वाला ही मुक्ति पद पाता है । जो स्व-शक्ति सम्पन्न दृष्टि से शिव का ध्यान करता और देखता है और अपने तथा दूसरों के हित के लिये शिव मन्त्र से शिव की पूजा करता है। वह शिव, सूर्य और शक्ति की किरणों से (तेज से) अपनी दृष्टि को शक्ति- शाली बनाकर शक्ति आदि के सहित शिव को आत्मस्थ होकर देखता है । जो ज्ञान या बोध नाम की अन्तःकरण वृत्ति है वह जंजीर के समान पाशों से बद्ध होने के कारण शिव को प्रकाशित नहीं कर सकती । पाश से मुक्त करने में दीक्षा ही परम कारण है इसलिये शास्त्रोक्त विधि से मन्त्र दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए । तन्त्र विधि से दीक्षित होकर अपने वर्ण के अनुकूल आचरण करते हुए नित्य नैमित्तिक कर्म¹ को करना चाहिए । वर्णाश्रम के अनुकूल आचारों के उल्लंघन का मन में विचार तक करना अनुचित है । जो मनुष्य जिस आश्रम में रह कर दीक्षा ग्रहण करता है वह उसी आश्रम में रहता हुआ धर्म का पालन करे । इस प्रकार वर्ण धर्म के अनुसार कृत कर्म बन्धन के कारण नहीं बनते । मन्त्र के अनुष्ठान से किया हुआ एक ही कर्म फल-दायक होता है । मन्त्र से दीक्षित व्यक्ति जिन-जिन लौकिक भोगों की इच्छा करता है वह मन्त्र जप के प्रभाव से उन-उन भोगों को भोग कर अन्त में मोक्ष भी पा जाता है । जो मनुष्य दीक्षा प्राप्त कर लेने पर नित्य नैमित्तिक² कर्मों का परित्याग कर देता है वह कुछ काल तक पिशाच योनि में जाकर अन्त में मोक्ष पाता है । इसलिये दीक्षित होकर नित्य नैमित्तिक आदि कर्मों को अवश्य करना चाहिये । नित्य नैमित्तिक कर्मों का पालन करने वाले व्यक्ति के किसी अनुष्ठान १--नित्य कर्म सन्ध्या वन्दन आदि, नैमित्तिक कर्म--किसी विशेष कारण से किये हुए कार्य यज्ञ आदि ।
चतुःषष्टितमोऽध्यायः ५४६ दीक्षावैकल्यविरहात्सद्यो मुक्तिस्तु जायते । तत्रापि गुरुभक्तस्य गतिर्भवति नान्यथा ॥१२०॥ दीक्षया गुरुमूर्तिस्थः सर्वानुग्राहकः शिवः । दृष्टाद्यर्थतया यस्य गुरुभक्तिस्तु कृत्रिमा ॥१२१॥ कृतेऽपि विफलं तस्य प्रायश्चित्तं पदे पदे । कायेन मनसा वाचा गुरुभक्तिपरस्य च ॥१२२॥ प्रायश्चित्तं भवेन्नैव सिद्धिस्तस्य पदे पदे । गुरुभक्तियुते शिष्ये सर्वस्वविनिवेदके ॥१२३॥ मिथ्याप्रयुक्तमन्त्रस्तु प्रायश्चित्ती भवेद्गुरुः । ॥१२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥६३॥ चतुःषष्टितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ जीवस्य पाशौघच्छेदनायेष्टसिद्धिदम् । दीक्षाविधिं प्रवक्ष्यामि मन्त्रसामर्थ्यदायकम् ॥१॥ दिव्यं भावं यतो दद्यात्क्षिणुयाद्दुरितानि च । अतो दीक्षेति सा प्रोक्ता सर्वागमविशारदैः ॥२॥ के फल का अनुमान दीक्षा पा लेने के बाद ही लगाया जा सकता है। अवश्य दीक्षा प्राप्त करने पर तत्काल मुक्ति मिल जाती है, उसमें गुरुभक्त की ही मुक्ति होती है अन्यथा नहीं। दीक्षा से सब पर अनुग्रह करने वाले शिव स्वयं गुरु रूप में उपस्थित हो जाते हैं। जो केवल लौकिक लाभ के लिये कृत्रिम गुरुभक्ति दिखलाता है, उसके कर्म करने पर भी फल नहीं मिलते और उसको पद-पद पर प्रायश्चित्त लगता है। शरीर, मन और वाणी से गुरुभक्ति करने वाले शिष्य को किसी प्रकार का प्रायश्चित्त नहीं लगता और पग-पग पर उसको सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार सर्वस्व अर्पण करने वाले गुरुभक्त शिष्य को मिथ्या मन्त्र का आदेश करने वाला गुरु प्रायश्चित्त का भागी होता है ।। १२०५-१२४।। श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग में तिरसठवां अध्याय समाप्त ॥६३॥ अध्याय ६४ दीक्षा विधि का निरूपण सनत्कुमार बोले- इसके अनन्तर जीव को पाश समूह से मुक्त कर इष्ट-सिद्धि-प्रदान-कारक और मन्त्र-शक्तिदायक दीक्षा-विधि का वर्णन कर रहा हूँ ।।१।। यतः यह दिव्य भावना को प्रदान करती और सब पापों का क्षय करती है अतः सब शास्त्रों के निपुण विद्वान् इसको दीक्षा कहते हैं ।।२।। मनन और त्राण से
५५० नारदीयपुराणम्
मननं सर्ववेदित्वं त्राणं संसार्यनुग्रहः । । मननात्त्राणधर्मत्वान्मंत्र इत्यभिधीयते ॥३॥ स्त्रीपुंनपुंसकात्मानस्ते मंत्रास्तु त्रिधा मताः । स्त्रीमंस्त्रास्तु द्विठांताःस्युः पुंमंत्रा हुं फडंतकाः ॥४॥ क्लीबाश्चैव नमोऽताः स्युर्मंत्राणां जातयः स्मृताः । पुंदैवतास्तु मन्त्राः स्युर्विद्याः स्त्रीदैवता मताः ॥५॥ षट्कर्मसु प्रशस्तास्ते मनवस्त्रिविधाः [पुनः । तारांत्यरेफः स्वाहास्तु त्वाग्नेयाः समीरिताः ॥६॥ सौम्यास्तु भृगुपीयूषबीजाढयाः कथिता मुने । अग्नीषोमात्मका ह्येवं मंत्रा ज्ञेया मनीषिभिः ॥७॥ बोधमायांति चाग्नेयाः श्वसने पिंगलाश्रिते । सौम्याश्चैव प्रबुध्यंते वामे वहति मारुतेः ॥८॥ सर्वे मंत्राः प्रबुध्यंते वायौ नाडिद्वयाश्रिते । स्वापकाले तु मन्त्रस्य जपोऽनर्थफलप्रदः ॥६॥ प्रत्येकं मन्त्रमुच्चार्य नाव्यानां तान्समुच्चरेत् । अनुलोमे बिंदुयुक्तान्विलोमे सर्गसंयुतान् ॥१०॥ जप्तो यदि स वै देवं प्रबुद्धः क्षिप्रसिद्धिदः । अनया मालया जप्तो दुष्टमन्त्रोऽपि सिद्ध्यति ॥११॥ क्रूरे कर्मणि चाग्नेयाः सौम्याः सौम्यफलप्रदाः । शांतज्ञानेति रौद्र्येशांतिजातिसमन्वितः ॥१२॥ शांतोऽपि रौद्रतामेति हुंफट्पल्लवियोजनात् । छिन्नादिदोषयुक्तास्ते नैव रक्षंति साधकम् ॥१३॥ छिन्नो रुद्धः शक्तिहीनस्ततश्चैव पराङ्मुखः । कर्णहीनो नेत्रहीनः कीलितः स्तंभितस्तथा ॥१४॥ दग्धः त्रस्तश्च भीतश्च मलिनश्च तिरस्कृतः । भेदितश्च सुषुप्तश्च मदोन्मत्तश्च मूर्च्छितः ॥१५॥ हतवीर्यो भ्रांतसंज्ञः प्रध्वस्तो बालकस्तथा । कुमारोऽथ युवा प्रौढो वृद्धो निस्त्रिंशकस्तथा ॥१६॥ निर्बीजः सिद्धिहीनश्च मंदः कूटो निरंशकः । सत्त्वहीनः केकरश्च बीजहीनश्च घूर्णितः ॥१७॥
मन्त्र बनता है। मनन का अर्थ सर्वज्ञत्व और त्राण का जीवों पर अनुग्रह करना है मनन और त्राण धर्म के कारण ही इसका नाम मन्त्र पड़ा ॥३॥ उन मन्त्रों के स्त्री, पुरुष और नपुंसक तीन भेद हैं। दो ठ (स्वाहा) वाला मन्त्र स्त्री मन्त्र है, 'हुँ' और 'फट्' जिसके अन्त में हों पुल्लिंग्ग मन्त्र हैं। नमः जिसके अन्त में हो वे मन्त्र नपुंसक हैं। ये ही तीन मन्त्रों की जातियाँ हैं। मन्त्र पुंदैवत अर्थात् पुल्लिंग देवता वाले हैं और विद्यायें स्त्री दैवत हैं ॥४-५॥ ये तीन प्रकार के मन्त्र छः कर्मों में प्रशस्त (शुभ) माने जाते हैं। जिसमें प्रणवान्त रेफ (रां) और स्वाहा का प्रयोग हो, वह मन्त्र आग्नेय कहा जाता है ॥६॥ मुने ! भृगु बीज (सं) और पीयूष (वं) से परिपूर्ण मन्त्र सौम्य मन्त्र हैं। इस प्रकार मनीषियों ने मन्त्रों को अग्नि और सोमात्मक माना है ॥७॥ जब प्राण पिंगला नाड़ी में रहता है (अर्थात् दाहिनी सांस चलती हो) तब आग्नेय मन्त्र सिद्ध होते हैं और वाम नाड़ी में प्राण के संचारित होने पर अर्थात् बायीं सांस चलने पर सौम्य मन्त्र प्रबुद्ध होते हैं ॥८॥ सब मन्त्र दो नाड़ियों में प्राण के संचारित होने पर ही जाग्रत होते हैं। मन्त्र के सोते समय उसका जप करने से मन्त्र अनर्थ कर देने वाला हो जाता है ॥९॥ प्रत्येक मन्त्र का उच्चारण करते समय उनका श्वास रोककर उच्चारण न करे। अनुलोम में तो विन्दु (अनुस्वार) और विलोम में विसर्ग संयुक्त मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए ॥१०॥ यदि इस विधि से देवों के मन्त्रों का जप किया जाय तो शीघ्र सिद्धि हो जाती है। इस प्रकार की माला से जप करने पर दुष्ट मन्त्र भी सिद्ध हो जाते हैं ॥११॥ क्रूर कर्म (मारण, उच्चाटन आदि) में आग्नेय मन्त्र सिद्धि प्रद होते हैं और सौम्य कर्मों में (मोहन, वशीकरण) में सौम्य मन्त्र फलप्रद होते हैं। शान्तिजाति से युक्त मन्त्र शान्त कर्मों में सिद्धिदायक होते हैं। शान्ति मन्त्र भी 'हुँ फट्' आदि के जोड़ देने से रौद्र मन्त्र हो जाते हैं ॥१-१२३॥ परन्तु छिन्न आदि दोष से युक्त मन्त्र कभी भी साधक के रक्षक नहीं होते हैं ॥१३॥ छिन्न, रुद्ध, शक्तिहीन, पराङ् मुख, कर्ण हीन, नेत्र हीन, कीलित, स्तंभित, दग्ध, त्रस्त, भीत, मलिन, तिरस्कृत, भेदित, सुषुप्त, मदोन्मत्त, मूर्च्छित, हतवीर्य, भ्रांत, प्रध्वस्त, बालक, कुमार, युवा, प्रौढ़, वृद्ध, निस्त्रिंशक, निर्बीज, सिद्धिहीन, मंदकूट, निरंशक, सत्त्वहीन, केकर, बीजहीन,
चतुःषष्टितमोऽध्यायः ५५१ आलिंगितो मोहितश्च क्षुधार्तश्चातिदीप्तकः । अंगहीनोऽतिक्रु द्धश्चातिक्रू रो व्रीडितस्तथा ॥११८॥ प्रशांतमानसःस्थानभ्रष्टश्च विकलस्तथा । अतिवृद्धोऽतिनिःस्नेहः पीड़ितश्च तथा पुनः ॥११८॥ दोषा ह्येते समाख्याता वक्ष्याम्येषां च लक्षणम् । संयुक्तं वा वियुक्तं वा त्रिधा वा स्वरसंयुतम् ॥१२०॥ मनोर्यस्यादिमध्यांते वह्निबीजं तथोच्यते । चतुर्द्धा पञ्चधा वापि स मन्त्रश्छिन्नसंज्ञकः ॥१२१॥ मनोर्यस्यादिमध्यांते भूबीजद्वयमुच्यते । स तु रुद्धो मनुर्ज्ञेयो ह्यतिक्लेशेन सिद्धिदः ॥१२२॥ तारवर्मत्रया लक्ष्मीरेवं हीनस्तु यो मनुः । शक्तिहीनः स विज्ञेयश्चिरकालफलप्रदः ॥१२३॥ कामबीजं मुखं मायाह्यं ते चैवाङ्कुशं तथा । असौ पराङ्मुखो ज्ञेयो भजतां चिरसिद्धिदः ॥१२४॥ आदिमध्यावसानेषु सकारो दृश्यते यदि । स मन्त्रो बधिरः प्रोक्तः कष्टेनाल्पफलप्रदः ॥१२५॥ पञ्चार्णो यदि रेफार्काबंदुवर्जितविग्रहः । नेत्रहीनस्तु विज्ञेयः क्लेशेनापि न सिद्धिदः ॥१२६॥ आदिमध्यावसानेषु हंसः प्रासादवाग्भवौ । हंसेंदुर्वा सकारो वा फकारो वर्म वा पुनः ॥१२७॥ मात्रा नमामि च पदं नास्ति यस्मिन्स कीलितः । एवं मध्ये द्वयं मूर्ध्नि यस्मिन्नस्त्रलकारको ॥१२८॥ न विद्यंते स मंत्रस्तु स्तंभितः सिद्धिरोधकृत् । अग्निः पवनसंयुक्तो मनोर्यस्य तु मूर्द्धनि ॥१२६॥ स सार्णो दृश्यते यस्तु स मंत्रो दग्धसंज्ञकः । अस्त्रं द्वाभ्यां त्रिभिः षड्भिरष्टाभिदृ श्यतेऽक्षरैः ॥१३०॥ त्रस्तः स मंत्रो विज्ञेयो मुखे तारविवर्जितः । हकारः शक्तिरथवा भीतो मंत्रः स एव हि ॥१३१॥ मनोर्यस्यादिमध्यांते स्यान्मकारचतुष्टयम् । मलिनस्तु स विज्ञेयो ह्यतिक्लेशेन सिद्धिदः ॥१३२॥ घूमित, आलिंगित, मोहित, क्षुधार्त, अति दीप्तक, अंग हीन, अतिक्रूर, अतिक्रुद्ध, व्रीडित, प्रशान्तमानस,स्थान- भ्रष्ट, विकल, अतिवृद्ध, अति निःस्नेह और पीडित इतने मन्त्र के दोष हैं, जिनके लक्षण आगे कहूँगा ॥११४-४९३॥ जिस मन्त्र के आदि, मध्य और अन्त में संयुक्त, वियुक्त और तीन भागों में विभक्त अथवा स्वर से संयुक्त हो उसको वह्नि बीज (रं) कहते हैं। जिस मन्त्र के आदि मध्य और अन्त में वह्नि बीज हो अथवा चार प्रकार या पांच प्रकार से वह विभक्त हो या वह्नि बीज हो उसको छिन्न कहते हैं ॥१२०-२१॥ जिस मन्त्र के आदि मध्य और अन्त में दो भू बीज (लं) हो उसको रुद्ध मन्त्र कहते हैं और वह अत्यन्त क्लेश से सिद्धि प्रदान करता है ॥१२२॥ प्रणव और कवच (हूँ) ये तीन बार जिस मन्त्र में आये हों, वह लक्ष्मो युक्त होता है। ऐसी लक्ष्मी से हीन जो मंत्र है उसे शक्ति हीन जानना चाहिए। वह चिरकाल में फल देने वाला होता है ॥१२३॥ जिस मन्त्र के आदि में काम बीज (क्लीं), मध्य में माया बीज (ह्रीं) और अन्त में अङ्कुश बीज (क्रों) हो उस मन्त्र को पराङ्मुख कहते हैं जो साधकों को चिरकाल में सिद्धि प्रदान करता है ॥१२४॥ जिस मन्त्र के आदि मध्य, और अन्त में सकार हो उसको बधिर (कर्णहीन) कहते हैं और बहुत कष्ट उठाने पर भी स्वल्प फल देता है ॥१२५॥ पांच वणों वाला मन्त्र यदि रेफ, मकार और अनुस्वार से रहित हो तो उसको नेत्र हीन कहते हैं और वह कष्ट उठाने पर भो सिद्धिप्रद नहीं होता ॥१२६॥ जिस मन्त्र के आदि, मध्य और अन्त में हंस, (सं) प्रासाद, तथा वाग्बीज (ऐं) हो अथवा हंस और चन्द्रविन्दु या सकार फकार अथवा हूँ हो तथा जिसमें मा प्रा और नमामि पद न हो वह मन्त्र कीलित माना गया है। इसी प्रकार जिसके मध्य में और अन्त वे दोनों पद न हों तथा जिसमें फट् और लकार न हों उसको स्तंभित मन्त्र कहते हैं और वह सिद्धि में बाधा उत्पन्न करता है ॥१२७३॥ जिस मन्त्र के अन्त में अग्नि (रं) बीज वायु (य) बीज के साथ हो तथा जो सात अक्षरों से युक्त हो, वह मन्त्र दग्ध है। जो मन्त्र दो, तीन, छः और आठ अक्षरों के साथ अस्त्र (फट्) से युक्त हो तथा जिसके मुखभागमें प्रणवरहित हकार शक्ति हो उसको त्रस्त कहते हैं। अथवा भोत मंत्र उसी को कहते हैं, जिस मंत्र के आदि मध्य और अन्त में चार मकार हों उसको मलिन कहते हैं और उसको कष्टपूर्वक जप करने पर सिद्धि प्राप्त होती है ॥१२९-३२॥ जिस मन्त्र के मध्य
५५२ नारदीयपुराणम् दार्णो यस्य मनोर्मध्ये मूर्ध्नि क्रोधयुगं तथा । अस्त्रं चास्ति स मन्त्रस्तु तिरस्कृत उदीरितः ॥३३॥ म्योद्वयं हृदयं शीर्षे वषड्वौषट्कमध्यमः । यस्य स्याद्भेदितो मन्त्रस्त्याज्यः क्लिष्टफलप्रदः ॥३४॥ व्यक्षरो हंसहीनो यः सुषुप्तः कीर्तितस्तु सः । विद्या वाप्यथवा मंत्रो भवेत्सप्तदशाक्षरः ॥३५॥ षट्कारपंचकादिर्यो मदोन्मत्तस्तु स स्मृतः । यस्य मध्ये स्थितं चास्त्रं स मंत्रो मूर्च्छितः स्मृतः ॥३६॥ विरामस्थानगं चास्त्रं हतवीर्यः स उच्यते । मंत्रस्यादौ च मध्ये च मूर्ध्नि चास्त्रचतुष्टयम् ॥३७॥ ज्ञातव्यो भ्रांत इत्येष यः स्यादष्टादशाक्षरः । पुनर्विंशतिवर्णो वा यो मंत्रः स्मरसंयुतः ॥३८॥ हृल्लेखांकुशबीजाद्यः प्रध्वस्तः स तु कथ्यते । सप्ताणो बालमंत्रस्तु कुमारो वसुवर्णवान् ॥३६॥ षोडशार्णो युवा प्रौढश्चतुर्विंशतिवर्णकः । त्रिंशद्वर्णश्चतुःषष्टिवर्णश्चापि शताक्षरः ॥४०॥ चतुःशताक्षरो मंत्रो वृद्ध इत्यभिधीयते । नवार्णस्तार संयुक्तो मंत्रो निस्त्रिंश उच्यते ॥४१॥ यस्यांते हृदयं प्रोक्तं शिरोमंत्रोऽथ मध्यगः । शिखा वर्म च यस्यांते नेत्रमस्त्रं च दृश्यते ॥४२॥ शिवशक्त्यार्णहीनो वै निर्बीजः स मनुः स्मृतः । आद्यंतमध्ये फट्कारः षोढा यस्मिन्प्रदृश्यते ॥४३॥ स मनुः सिद्धिहीनः स्यान्मंदः पंक्त्यक्षरो मनुः । कूट एकाक्षरो मंत्रः स एवोक्तो निरंशकः ॥४४॥ द्विवर्णःसत्त्वहीनः स्यात्केकरश्चतुरक्षरः । षड्वर्णो बीजहीनो वा सार्द्धसप्ताक्षरोऽपि वा ॥४५॥ सार्द्धद्वादशवर्णो वा धूमितो निंदितस्तु सः । सार्द्धबोजत्रययुतो मंत्रो विशतिवर्णवान् ॥४६॥ त्रिंशद्वर्णश्चैकविशद्वर्णश्चालिंगितस्तु सः । यो मंत्रो दंतवर्णस्तु मोहित सः तु कीर्तितः ॥४७॥ द वर्ण हो और अन्त में दो क्रोध (हुं हुं) बीज हों और उनके साथ अस्त्र (फट्) भी हो तो उसको तिरस्कृत कहते हैं। जिस मन्त्र के अन्त में म और य तथा हृदय हो और मध्य में वषट् और वौषट् हो उसको भेदित कहते हैं और वह कष्ट से सिद्धिदायक होता है उसका सर्वथा त्याग करना चाहिये ॥३३-३४॥ जो तीन अक्षरों का हो और हंस हीन हो उसको सुषुप्त कहते हैं। जो विद्या अथवा मन्त्र सत्रह अक्षर वाला हो और उसके आदि में पाँच बार फट् का प्रयोग हुआ हो, उसे मदोन्मत्त कहते हैं ॥३५½॥ जिसके मध्य में फट् हो उसको मूर्च्छित कहते हैं। जिसके विराम स्थान में अस्त्र (फट्) हो उसको हतवीर्य कहते हैं ॥३६½॥ जिस मन्त्र के आदि, मध्य और अन्त में चार अस्त्र (फट्) हों उसको भ्रान्त कहते हैं। जो मन्त्र अठारह या बीस वर्ण वाला हो कामबीज (क्लीं) से युक्त होकर हृदय, लेख और अंकुश के भी बीज से परिपूर्ण हो उसको प्रध्वस्त कहते हैं ॥३७½॥ सात वर्णों वाला मन्त्र बालमन्त्र और आठ वर्ण वाला कुमार है। सोलह वर्ण वाला युवा और चौबीस वर्ण वाला प्रौढ है। तीस, चौंसठ, सौ और चार सौ अक्षरों वाले मन्त्र वृद्ध कहे गये हैं ॥३९-४०½॥ नव वर्ण और तार (प्रणव) संयुक्त मन्त्र को निस्त्रिंश कहते हैं। जिनके अन्त में हृदय (नमः) हो, मध्य में शिरोमन्त्र (स्वाहा) हो और अन्त में शिखा (वषट्), कवच (हुं), नेत्र (वौषट्) और अस्त्र (फट्) हों तथा जो शिव एवं शक्ति अक्षरों से हीन हो, उसे निर्बीज कहा जाता है ॥४१-४२½॥ जिस मन्त्र के आदि, अन्त और मध्य में छःबार फट् हों वह मन्त्र सिद्धिहीन है। पाँच अक्षर वाला मन्त्र मंद और एक अक्षर वाला कूट है। उसी को निरंशक भी कहते हैं ॥४३-४४॥ दो वर्ण वाले को सत्त्वहीन, और चार अक्षर वाले को केकर कहते हैं। छः या साढ़े सात वर्ण वाला बीजहीन और साढ़े बारह अक्षर वाला धूमित माना गया है। वह निंदित है। जो साढ़े तीन बीज से युक्त, बीस वर्णों वाला, तीस और इक्कीस वर्णों वाला हो उसको आलिङ्गित कहा जाता है ॥४५-४६½॥ जो मन्त्र दन्त्य वर्ण वाला होता है उसको
चतुःषष्टितमोऽध्यायः ५५३ चतुर्विंशतिवर्णो वा सप्तविंशतिवर्णवान् । क्षुधार्तः स तु विज्ञेयो मंत्रसिद्धिर्विवर्जितः ॥४८॥ एकादशाक्षरो वापि पंचविंशतिवर्णकः । त्रयोविंशतिवर्णो वा स मनुदृप्तसंज्ञकः ॥४६॥ षड्विंशत्यक्षरो वापि षट्त्रिंशद्वर्णकोऽपि वा । एकोनत्रिंशद्वर्णो वा मंत्रो हीनांगकः स्मृतः ॥५०॥ अष्टाविंशतिवर्णो वा तथैर्कात्रंशदर्णकः । अतिक्रूरः स विज्ञेयोऽखिलकर्मसु गर्हितः ॥५१॥ चत्वारिंशत्समारभ्य त्रिषष्टंचतस्तु यो मनुः । व्रीडितः स तु विज्ञेयः सर्वकर्मसु न क्षमः ॥५२॥ पञ्चषष्ट्यक्षरा मन्त्रा ज्ञेया वै शांतमानसाः । पञ्चषष्ट्यर्णमारभ्य नवन्तदाक्षरावधि ॥५३॥ ये मंत्रास्ते तु विज्ञेयाः स्थानभ्रष्टा मुनीश्वर । त्रयोदशार्णा ये मन्त्रास्तिथ्यर्थाश्च तथा पुनः ॥५४॥ विकलास्ते समाख्याताः सर्वतंत्वविशारदैः । शतं सार्द्धशतं वापि शतद्वयमथापि वा ॥५५॥ द्विनवत्येकहीनो वा शतत्रयमथापि वा । ये मंत्रा वर्णसंख्याका निःस्नेहास्ते प्रकीर्तिताः ॥५६॥ चतुःशतं समारभ्य सहस्रार्णावधि द्विज । अतिवृद्धाः प्रयोगेषु शिथिलास्ते समीरिताः ॥५७॥ सहस्रवर्णादधिका मंत्रास्ते पीडिताह्वयाः । तदूर्ध्वं चैव ये मंत्राः स्तोत्ररूपास्तु ते स्मृताः ॥५८॥ एवंविधाः समाख्याता मनवो दोषसंयुताः । दोषनेतान्विज्ञाय मंत्रानेताञ्जपन्ति ये ॥५९॥ सिद्धिर्न जायते तेषां कल्पकोटिशतैरपि । छिन्नादिदोषदुष्टानां मंत्राणां साधनं ब्रुवे ॥६०॥ योनिमुद्रासने स्थित्वा प्रजपेद्यः समाहितः । यं कांचदपि वा मंत्रं तस्य स्युः सर्वसिद्धयः ॥६१॥ सव्यपाष्णि गुदे स्थाप्य दक्षिणं च ध्वजोपरि । योनिमुद्राबंध एवं भवेवासनमुत्तमम् ॥६२॥ अन्योऽप्यत्र प्रकारोऽस्ति योनिमुद्रानिबंधने । तदग्रे सरहस्यं ते कथयिष्यामि नारद ॥६३॥ पारंपर्यक्रमप्राप्तो नित्यानुष्ठानतत्परः । गुर्वनुज्ञातः श्रीमानभिषेकसमन्वितः ॥६४॥
मोहित और चौबीस तथा सत्ताईस वर्ण वाला क्षुधार्त कहा जाता है जो कि मन्त्रसिद्धि से शून्य रहता है ॥४७-४८॥ ग्यारह, पचीस, तैंतीस वर्ण वाला दृप्त मन्त्र है ॥४९॥ छब्बीस छत्तीस और उनतीस वर्ण वाला हीनांग है ॥५०॥ अट्ठाईस और इकतीस वर्ण वाला मन्त्र अति क्रूर है जो सब कर्मों में निन्दित समझा जाता है ॥५१॥ चालीस से लेकर तिरसठ वर्ण वाले मन्त्र व्रीड़ित (लज्जित) है जो सब प्रकार के कार्यों में समर्थ नहीं होता है ॥५२॥ पैंसठ अक्षर वाले मन्त्र शान्तमानस हैं। मुनीश्वर ! पैंसठ वर्णों से लेकर निन्यानबे वर्णों तक के जितने मन्त्र हैं, उनको स्थान भ्रष्ट कहा जाता है ॥५३३॥ तेरह वर्ण वाले मन्त्रों और पन्द्रह वर्ण वाले मन्त्रों को मन्त्राचार्यों ने विकल कहा है ॥५४३॥ सो, डेढ़ सौ, दो सौ, इक्यानबे अथवा तीन सौ वर्णों वाले जितने मन्त्र हैं वे निःस्नेह कहे जाते हैं ॥५५-५६॥ चार सौ से लेकर हजार वर्ण वाले मन्त्र अति वृद्ध हैं और वे शिथिल कहे जाते हैं ॥५७॥ हजार वर्णों से अधिक वर्ण वाले मन्त्र पीड़ित हैं और इनसे अधिक वर्ण वाले मन्त्र नहीं प्रत्युत स्तोत्र हैं ॥५८॥ इस प्रकार मन्त्रों के दोष गिनाये गए हैं। जो इन दोषों को न जानकर ऐसे दोषों से दुष्ट मंत्र को जपते हैं उनको सौ करोड़ कल्प में भी सिद्धि नहीं मिलती। ॥५९३॥ अब छिन्न आदि उपर्युक्त दोषों से दुष्ट मन्त्रों की साधन विधि बता रहा हूँ ॥६०॥ जो योनि मुद्रा में स्थित होकर एकाग्र भाव से जिस किसी मन्त्र को जपता है उसको सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥६१॥ बायें पैर की एड़ी को गुदा द्वार पर लगाकर दाहिने पैर की एड़ी को लिङ्ग के ऊपर रखें तो उसे योनि मुद्रा बन्ध कहते हैं ॥६२॥ यह सर्वोत्तम आसन है। योनि मुद्रा बन्ध के और भी प्रकार (तरीके) हैं जिनका भेद और रहस्य सहित वर्णन आगे करूंगा ॥६३॥ परम्परा क्रम द्वारा मन्त्रों को सीखा हुआ, नित्य प्रति अनुष्ठान में तत्पर रहने वाला, ७० ना० पु०
५५४ नारदीयपुराणम् सुंदरः सुमुखः शांतः कुलीनः सुलभो वशी । मंत्रतंत्रार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहक्षमः ॥६५॥ निरपेक्षो मुनिर्दांतो हितवादी विचक्षणः । तत्त्वनिष्कासने दक्षो विनयी च सुवेषवान् ॥६६॥ आश्रमी ध्याननिरतः संशयच्छित्सुबुद्धिमान् । नित्यानुष्ठानसंयुक्तस्तवाचार्यः परिकीर्तितः ॥६७॥ शांतो विनीतः शुद्धात्मा सर्वलक्षणसंयुतः । शमादिसाधनोपेतः श्रद्धालुः सुस्थिराशयः ॥६८॥ शुद्धदेहोऽन्नपानाद्यैर्धार्मिकः शुद्धमानसः । दृढव्रतसमाचारः कृतज्ञः पापभीरुकः ॥६९॥ गुरुध्यानस्तुतिकथासेवनासक्तमानसः । एवंविधो भवेच्छिष्यस्त्वन्यथा गुरुदुःखदः ॥७०॥ इतिश्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥६४॥
अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच परीक्ष्य शिष्यं तु गुरुर्मंत्रशोधनमाचरेत् । प्राक्प्रत्यग्दक्षिणोदक्च पंचसूत्राणि पातयेत् ॥१॥ चतुष्टयं चतुष्कानां स्यादेवं नृपकोष्ठके । तत्राद्यप्रथमे त्वाद्यं द्वितीयाद्ये द्वितीयकम् ॥२॥
गुरु की आज्ञा में लीन रहने वाला, श्रीमान्, अभिषेक (स्नान) से युक्त, सुन्दर, सुमुख, शान्त, कुलीन, सुलभ, जितेन्द्रिय, मन्त्र और तन्त्रों का तत्त्वज्ञ, यथोचित निग्रह (दण्ड) और अनुग्रह (कृपा) करनेवाला, निरपेक्ष, मननशील, दान्त, हितवादी, विद्वान्, तत्त्व निकालने में या तत्त्व निर्णय में कुशल, विनयी, सुवेष, वर्णाश्रमी, ध्यान-निरत, सन्देहों को स्वयं मिटाने वाला, सुबुद्धिमान्, नित्य अनुष्ठान में लगा रहने वाला, पुरुष ही आचार्य बनने योग्य है ॥६४-६७॥ और अन्नपानादि से शुद्ध देह वाला, शान्त, विनीत, शुद्धात्मा, सब लक्षणों से सम्पन्न, शम, दम आदि साधनों से युक्त, श्रद्धालु, स्थिर चित्तवृत्ति वाला, खान-पान शुद्ध रखने वाला, धार्मिक, शुद्धचित्त, व्रत और आचार पालन में दृढ़, कृतज्ञ, पापों से डरने वाला और गुरु का ध्यान, स्तुति और कथा श्रवण में रमने वाला व्यक्ति ही शिष्य होने योग्य है अन्यथा विपरीत आचरण करने वाला केवल गुरु को दुख देने वाला है, शिष्य नहीं । ॥६८-७०॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में चौसठवां अध्याय समाप्त । ॥६४॥
अध्याय ६५ मन्त्रजपविधिकथन सनत्कुमार ने कहा- गुरु शिष्य की विधिवत् परीक्षा लेकर मन्त्र शोधन कार्य करे। पूर्व से पश्चिम और दक्षिण से उत्तर (रंग में डुबोये हुए) पांच-पांच सूत गिराये (तात्पर्य यह है कि पांच खड़ी रेखायें खींचकर उनके ऊपर पांच पड़ी रेखायें खींचे) ॥१॥ इस प्रकार चार-चार कोष्ठों के चार समुदाय बनेंगे। उनमें से पहले चौक के प्रथम कोष्ठ में एक, दूसरे के प्रथम में दो, तीसरे के प्रथम में तीन और चौथे के प्रथम में चार लिखे
तृतीयार्थे तृतीयं स्याच्चतुर्थांशे तुरीयकम् । तत्तदाग्नेयकोष्ठेषु तत्तत्पंचममक्षरम् ॥३॥ विलिख्य क्रमतो धीमान्म्रनुं संशाधयेत्ततः । नामाद्यक्षरमारभ्य यावन्मन्त्रादि वर्णकम् ॥४॥ चतुष्के यत्र नामार्णस्तत्स्यात्सिद्धचतुष्ककम् । प्रादक्षिण्यात्तद्वितीयं साध्याख्यं परिकीर्तितम् ॥५॥ तृतीयं पुंसि सिद्धाख्यं तुरीयमरिसंज्ञकम् । द्वयोर्वर्णविककोष्ठे सिद्धसिद्धेति तन्मतम् ॥६॥ तद्वितीये तु मंत्रार्णे सिद्धसाध्यः प्रकीर्तितः । तृतीये तत्सुसिद्धःस्यात्सिद्धा रस्तच्चतुर्थके ॥७॥ नामार्णान्यचतुष्कात्तु द्वितीये मंत्रवर्णके । चतुष्के चेत्तदा पूर्वं यत्र नामाक्षरं स्थितम् ॥८॥ तत्र तत्कोष्ठमारभ्य गणयेत्पूर्ववत्क्रमात् । साध्यसिद्धः साध्यसाध्यस्तत्सुसिद्धश्च तद्रिपुः ॥६॥ तृतीये चेच्चतुष्के तु यदि स्यान्मंत्रवर्णकः । तदा पूर्वोक्तरीत्या तु क्रमाद्वेयं मनीषिभिः ॥१०॥ सुसिद्धसिद्धस्तत्साध्यस्तत्सुसिद्धश्च तद्रिपुः । तुरीये चेच्चतुष्के तु तद्वैवं गणयेत्सुधीः ॥११॥ अरिसिद्धोऽरिसाध्यश्च तत्सुसिद्धश्च तद्रिपुः । सिद्धसिद्धो यथोक्तेन द्विगुणात्सिद्धसाध्यकः ॥१२॥ सिद्धः सुसिद्धोऽर्द्धतयात्सिद्धा रिर्हन्ति गोत्रजान् । द्विगुणात्साध्यसिद्धस्तु साध्यसाध्यो विलंबतः ॥१३॥ साध्यः सुसिद्धो द्विगुणात्साध्यारिर्हन्ति बांधवान् । सुसिद्धसिद्धोऽर्द्धतया तत्साध्यो द्विगुणाज्जपात् ॥१४॥ ॥२॥ (इसी क्रम से आगे की संख्यायें भी लिख ले ।) प्रथम कोष्ठ में 'अ' लिखकर उसके आग्नेय कोण में उससे पाँचवां अक्षर लिखे ॥३॥ इस प्रकार सभी कोष्ठों में क्रमशः अक्षरों को लिखकर बुद्धिमान् पुरुष मन्त्र का संशोधन करे । साधक के नाम का आदि अक्षर जिस कोष्ठ में हो, वहाँ से लेकर जहाँ मन्त्र का आदि अक्षर हो उस कोष्ठ तक प्रदक्षिणाक्रम से गिनना चाहिए । यदि उसी चौक में मन्त्र का आदि अक्षर हो, जिसमें नाम का आदि अक्षर है तो वह 'सिद्ध चौक' कहा जाएगा ॥४॥ उससे प्रदक्षिणाक्रम से गिनने पर यदि द्वितीय चौक में मन्त्र का आदि अक्षर हो तो वह साध्य कहा गया । इसी प्रकार तीसरा चौक सुसिद्ध और चौथा चौक अरि नाम से प्रसिद्ध है । यदि साधक के नाम संबंधी और मन्त्र संबंधी आदि अक्षर प्रथम चौक के पहले ही कोष्ठ में पड़े हों तो वह मन्त्र 'सिद्धसिद्ध' माना गया है ॥५-६॥ यदि मन्त्रवर्ण प्रथम चौक के द्वितीय कोष्ठ में पड़ा हो तो वह सिद्धसाध्य कहा गया है । प्रथम के तृतीय कोष्ठ में हो तो सिद्धसुसिद्ध होगा और चौथे में हो तो सिद्धारि कहलाएगा ॥७॥ नामा- क्षरयुक्त चौक से दूसरे चौक में यदि मन्त्र का अक्षर हो तो पहले जहाँ नाम का अक्षर था वहाँ के उस कोष्ठ से आरंभ करके क्रमशः पूर्ववत् गणना करे । द्वितीय चौक के प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ कोष्ठ में मन्त्राक्षर होने पर उसकी क्रमशः साध्यसिद्ध, साध्यसाध्य, साध्यसुसिद्ध तथा साध्य आदि संज्ञा होगी ॥८-९॥ तीसरे चौक में मंत्र का अक्षर हो तो मनीषी पुरुषों को पूर्वोक्त रीति से गणना करनी चाहिए । तृतीय चौक के प्रथम आदि कोष्ठों के अनुसार क्रमशः उस मन्त्र की सुसिद्धसिद्ध, सुसिद्धसाध्य, सुसिद्धसुसिद्ध तथा सुसिद्ध अरि संज्ञा होगी ॥१०॥ यदि चौथे चौक में मन्त्राक्षर हो तो भी विद्वान् पुरुष इसी प्रकार गणना करे । चतुर्थ चौक के प्रथम आदि कोष्ठों के अनुसार उस मन्त्र की अरिसिद्ध, अरिसाध्य, अरिसुसिद्ध तथा अरिअरि यह संज्ञा होगी ॥११॥ सिद्धसिद्ध मंत्र शास्त्रोक्त विधि से उतनी ही संख्या में जप करने पर सिद्ध हो जाएगा । परंतु सिद्धसाध्य मन्त्र दूनी संख्या में जप करने से सिद्ध होगा । सिद्धसुसिद्ध मन्त्र शास्त्रोक्त संख्या से आधा जप करने पर ही सिद्ध हो जाएगा । परंतु सिद्धारि मन्त्र कुटुंबी जनों का नाश करता है । साध्यसिद्ध मन्त्र दूनी संख्या में जप करने से सिद्ध होता है । साध्य- साध्य मन्त्र बहुत विलंब से सिद्ध होता है ॥१२-१३॥ साध्यसुसिद्ध भी द्विगुण जप से सिद्ध होता है; किन्तु साध्यारि मन्त्र बंधु-बांधवों का हनन करता है । सुसिद्धसिद्ध आधे ही जप से सिद्ध होता है । सुसिद्धसाध्य द्विगुण जप से सिद्ध होता है ॥१४॥ सुसिद्धसुसिद्ध मन्त्र प्राप्त होते ही सिद्ध हो जाता है और सुसिद्धारि मन्त्र सारे कुटुंब का
५५६ नारदीयपुराणम् तत्सुसिद्धप्राप्तिमात्रात्सुसिद्धारिःकुटुम्बहृत् । अरिसिद्धस्तु पुत्रघ्नोऽरिसाध्यः कन्यकापहः ॥१५॥ तत्सुसिद्धः कलत्रघ्नः साधकघ्नोऽप्यरः स्मृतः। अन्येऽप्यत्र प्रकारा हि संति वै बहवो मुने ॥१६॥ सर्वेषु मुख्योऽयं तेऽत्र कथितोऽकथहाभिधः । एवं संशोध्य मंत्रं तु शुद्धे काले स्थले तथा ॥१७॥ दीक्षयेच्च गुरुः शिष्यं तद्विधानमुदीर्यते । नित्यकृत्यं विधायैाथ प्रणम्य गुरुपादुकाम् ॥१८॥ प्रार्थयेत्सद्गुरुं भक्त्याभीष्टमंत्रार्थमादृतः । संपुज्य वस्त्रालंकारगोहिरण्यधरादिभिः ॥१९॥ कृत्वा स्वस्ति विधानं तु मंडलादि च तुष्टिमन्। गुरुः शिष्येण सहितः शुचिर्यागमृहं विशेत् ॥२०॥ सामान्यार्घोदकेनाथ संप्रोक्ष्य द्वारमन्त्रतः । दिव्यान्उत्सारयेद्विघ्नान्नभस्थानर्च्य वारिणा ॥२१॥ पार्षिणघातैस्त्रिभिर्भौमांस्ततः कर्मसमाचरेत् । वर्णकैः सर्वतोभद्रे यथोक्तपरिकल्पिते ॥२२॥ वह्निमण्डलमभ्यर्च्य तत्कलाः परिपूज्य च । अस्त्रप्रक्षालितं कुंभं यथाशक्ति विनिर्मितम् ॥२३॥ तत्र संस्थाप्य विधिवत्तत्र भानोः कलां यजेत् । विलोममातृकामूलमुच्चरन् शुद्धवारिणा ॥२४॥ आपूर्य कुंभं तत्रार्चेत्सोमस्य विधिवत्कलाः । धूम्रार्चिरूष्मा ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिगिनी ॥२५॥ सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यकव्यवाहा तथा । वह्ने र्दश कलाः प्रोक्ताः प्रोच्यंतेऽथ रवेः कलाः ॥२६॥ तपिनो तापिनो धूम्रा मरीचिज्ज्वलिनी रुचिः । सुषुम्णा भोगदा विश्वा बोधिनी धारिणी क्षमा ॥२७॥ अथेन्दोश्च कला ज्ञेया ह्यमृता मानदा पुनः । पूषा तुष्टिश्च पुष्टिश्च रतिश्च धृतिसंज्ञिकाः ॥२८॥ शशिनी चंद्रिका कांतिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरंगदा । पूर्णामूर्णामृता चेति प्रोक्ताश्चंद्रमसः कलाः ॥२६॥
नाश करता है। अरिसिद्ध पुत्रनाशक है तथा अरिसाध्य कन्या का नाश करने वाला होता है ॥१५॥ अरिसुसिद्ध स्त्री का नाश करता है और अरिअरि मन्त्र साधक का ही नाश करने वाला माना गया है। मुने ! यहाँ मन्त्र शोधन के और भी बहुत से प्रकार हैं, किन्तु यह अकथह नामक चक्र सब में प्रधान है; इसलिए यही तुम्हें बताया गया है ॥१६३॥ इस प्रकार मन्त्र का भलीभाँति शोधन करके शुद्ध समय और पवित्र स्थान में गुरु शिष्य को दीक्षा दे । अब दीक्षा का विधान बताया जाता है ॥१७॥ प्रातःकाल नित्यकर्म करके पहले गुरुचरणों की पादुका को प्रणाम करे । तत्पश्चात् आदरपूर्वक वस्त्र आदि के द्वारा भक्तिभाव से सद्गुरु की पूजा करके उनसे अभीष्ट मन्त्र के लिए प्रार्थना करे ॥१८३॥ तदनन्तर गुरु संतुष्टचित्त हो स्वस्तिवाचनपूर्वक मंडल आदि विधान करके शिष्य के साथ पवित्र हो यज्ञमंडप में प्रवेश करें ॥१९-२०॥ फिर सामान्य अर्घ्य-जल से द्वार का अभिषेक करके अस्त्रमंत्रों से दिव्य विघ्नों का निवारण करे; इसके बाद आकाश में स्थित विघ्नों का जल से पूजन करके निराकरण करे । भूमिसम्बन्धी विघ्नों को तीन बार पाणि (एडी) के आघात से ताली बजाकर हटाये । तत्पश्चात् कार्य प्रारंभ करे ॥२१॥ भिन्न-भिन्न रंगों द्वारा शास्त्रोक्त विधि से सर्वतोभद्रमण्डल की रचना करके उसमें वह्निमण्डल और उसकी कलाओं का पूजन करे । तत्पश्चात् अस्त्र-मंत्र का उच्चारण करके धोये हुए यथाशक्ति-निर्मित कलश की वहाँ विधिपूर्वक स्थापना करके सूर्य की कला का यजन करे । ॥२२-२३३॥ विलोममातृका मूल मंत्र का उच्चारण कर उस कलश को शुद्ध जल से परिपूर्ण कर उसमें सोम की कला को अर्चना करे ॥२४३॥ धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वलिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, सुश्री, सुरूपा, कपिला, हव्यवाहा तथा कव्यवाहा ये दश अग्नि की कलायें हैं। इसके अनन्तर सूर्य की कलाओं का वर्णन कर रहा हूँ ॥२५-२६॥ तपिनो, तापिनी, धूम्रा, मरीचिज्ज्वालिनी, रुचि, सुषुम्णा, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी और क्षमा सूर्य की कलायें हैं। अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्ति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्णा, और पूर्णामृता इतनी चन्द्रमा की
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ५५७ वस्त्रयुग्मेन संवेष्ट्य तस्मिन्सर्वौषधीः क्षिपेत् । नवरत्नानि निक्षिप्य विन्यसेत्पञ्चपल्लवान् ॥३०॥ पनसाम्रवटाश्वत्थबकुलेति च तान् विदुः । मुक्तामाणिक्यवैडूर्यगोमेदान्वज्रविद्रुमौ ॥३१॥ पद्मरागं मरकतं नीलं चेति यथाक्रमम् । एवं रत्नानि निक्षिप्य त्वावाह्यावेष्टदेवताम् ॥३२॥ संपूज्य विधिवन्मंत्री ततः शिष्यं स्वलंकृतम् । वेद्यां संवेश्य संप्रोक्ष्य प्रोक्षणीस्थेन वारिणा ॥३३॥ भूतशुद्ध्यादिकं कृत्वा तच्छरीरे विधानतः । न्यासजालेन संशोध्य मूध्र्नि विन्यस्य पल्लवान् ॥३४॥ अष्टोत्तरशतेनाथ मूलमंत्रेण मंत्रितैः । अभिषिंचेत्प्रियं शिष्यं जपन्मूलमनुं हृदि ॥३५॥ शिष्टोदकेन वाचम्य परिधायांवरं शिशुः । गुरुं प्रणम्य विधिवत्संविशेत्पुरतः शुचिः ॥३६॥ अथ शिष्यस्य शिरसि हस्तं दत्त्वा गुरुस्ततः । जपेदष्टोत्तरशतं देयमन्त्रं विधानतः ॥३७॥ समोऽस्त्वित्यक्षरान्दद्यात्ततः शिष्योऽर्चयेद्गुरुम् । ततः सचन्दनं हस्तं दत्त्वा शिष्यस्य मस्तके ॥३८॥ तत्कर्णे प्रर्वदेद्विद्यामष्टवारं समाहितः । संप्राप्तविद्यः शिष्योऽपि निपतेद्गुरुपादयोः ॥३९॥ उत्तिष्ठ वत्स मुक्तोऽसि सम्यगाचारवान्भव । कीर्तिश्रीकांतिपुत्रायुर्बलारोग्यं सदास्तु ते ॥४०॥ ततः शिष्यः समुत्थाय गन्धाद्यैर्गुरुमर्चयेत् । दद्याच्च दक्षिणां तस्मै वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥४१॥ संप्राप्यैवं गुरोर्मंत्रं तदारभ्य धनादिभिः । देहपुत्रकलत्रैश्च गुरुसेवापरो भवेत् ॥४२॥ स्वेष्टदेवं यजेन्मध्ये दत्त्वा पुष्पांजलिं ततः । अग्निनैर्ऋतिवागीशान् क्रमेण परिपूजयेत् ॥४३॥ कलार्थ कही गई हैं ॥२७-२९॥ उस कलश को दो वस्त्रों से लपेटकर उसमें सर्वोषधि छोड़ दे। फिर उसमें नव रत्नों को डालकर पंच पल्लव छोड़े ॥३०॥ कटहल, आम, वट, पीपल और मौलिश्री को पंच पल्लव कहते हैं। नव रत्नों में मुक्ता, माणिक्य, वैडूर्य, गोमेद, वज्र, विद्रुम, पद्मराग, मरकत और नीलमणि की गणना है॥३१ १/२॥ इस प्रकार नव रत्नों को कलश में छोड़ने के पश्चात् अपने इष्ट देवता का स्मरण करे। मन्त्रदाता गुरु इस प्रकार सर्वतोभद्र मण्डल में आबाहित देवताओं की विधिवत् पूजा करने के अनन्तर आभूषण, वस्त्र आदि आदि पहने हुए शिष्य को वेदी पर बैठाये और प्रोक्षणी जल से उसका अभिषेक करे ॥३२-३३॥ विधिपूर्वक भूत शुद्धि आदि करके उसके शरीर को अङ्गन्यास से शुद्ध कर शिर पर पल्लव रखकर मूलमन्त्र का एक सौ आठ बार पाठ कर जल को अभिमन्त्रित करे और उससे अपने प्रिय शिष्य का अभिषेक करे। उस समय गुरु हृदय में मूल मन्त्र का उच्चारण करता रहे ॥३४-३५॥ बचे हुये जल से शिष्य आचमन कर पुनः नवीन वस्त्र धारण करे और विधिपूर्वक गुरु की वन्दना कर सामने ही बैठ जाय ॥३६॥ गुरु शिष्य के सिर पर अपना हाथ रखकर विधिपूर्वक देवमन्त्र को एक सौ आठ बार जपे ॥३७॥ जप के बाद गुरु शिष्य से कहे कि 'समोऽस्तु' अर्थात् मेरे ही समान हो जाओ। फिर शिष्य गुरु की पूजा करे। गुरु अपने चन्दन चर्चित हाथ को शिष्य के मस्तक पर रखकर सावधानी से उसके कान में आठ बार देव मन्त्र को पढ़े। इस भांति विधिपूर्वक मन्त्रदीक्षा प्राप्त कर लेने पर शिष्य गुरु चरणों पर शिर रख दे ॥३८-३९॥ गुरु-वत्स, उठो, तुम मुक्त हो गये। भली-भांति आचार का पालन करो। तुमको कीर्ति, श्री, कान्ति पुत्र, आयु, बल और आरोग्य सदा मिलें। यह कह कर आशीर्वाद दे ॥४०॥ गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करने के अनन्तर शिष्य उठकर गन्ध आदि से गुरु की पूजा करे, और उदार हो कर गुरु दक्षिणा दे ॥४१॥ इस प्रकार गुरु से मन्त्र प्राप्त कर लेने पर उस दिन से धन आदि और अपने परिवार के द्वारा गुरु सेवा में तत्पर रहे ॥४२॥ प्रति दिन अपने इष्ट देव की पूजा करे पुष्पांजलि दे और फिर क्रमशः अग्नि, नैऋति और वागीश की पूजा करे ॥४३॥ जब मध्य में विष्णु की पूजा करे तब उनके चारों ओर विनायक, १. पंच पल्लव में मतभेद है-आम, पीपल, गूलर, पाकड़ी और बरगद को पंच पल्लव कहते हैं।
५५८ नारदीयपुराणम् यदा मध्ये यजेद्विष्णुं बाह्यादिषु विनायकम् । रविं शिवां शिवं चैव यदा मध्ये तु शङ्करम् ॥४४॥ रविं गणेशमंबां च हरिं चाथ यदा शिवाम् । ईशं विघ्नार्कगोविन्दान्मध्ये चेद्गणनायकम् ॥४५॥ शिवं शिवां रविं विष्णुं रवौ मध्यगते पुनः । गणेशं विष्णुमंबां च शिवं चेति यथाक्रमम् ॥४६॥ एवं नित्यं समभ्यर्च्य देवपञ्चकमादृतः । ब्राह्मे मुहूर्ते ह्युत्थाय कृत्वा चावश्यकं बुधः ॥४७॥ अशंकितो वा शय्यायां स्वकीयशिरसि स्मरेत् । सहस्रदलशुक्लाब्जकर्णिकास्थेंदुमण्डले ॥४८॥ अकथादित्रिकोणस्थं वराभयकरं गुरुम् । द्विनेत्रं द्विभुजं शुक्लगंधमाल्यानुलेपनम् ॥४९॥ वामे शक्त्या युतं ध्यात्वा मानसैरुपचारकैः । आराध्य पादुकामन्त्रं दशधा प्रजपेत्सुधीः ॥५०॥ वाङ्माया श्रीभर्गेद्वाढ्या वियद्धंसखकाग्नयः । हसक्षमलवार्यग्निवामकर्णेंदुयुग्मरुत् ॥५१॥ ततो भृग्वाकाशखाग्निभगेंद्राढ्याः परंतिमः । सहक्षमलतोयाग्निश्चंद्रशां तियुतो मरुत् ॥५२॥ ततः श्रीश्वामुकांते तु नन्दनाथामुकी पुनः । देव्यंतांते श्रीपादुकां पूजयामि हृदंतिमे ॥५३॥ अयं श्रीपादुकामंत्रः सर्वसिद्धिप्रदो नृणाम् । गुह्येति च समर्प्याथ मन्त्रैरैतैर्र्नमत्सुधीः ॥५४॥ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥५५॥ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥५६॥ नमोऽस्तु गुरवे तस्मा इष्टदेवस्वरूपिणे । यस्य वागमृतं हंति विषं संसारसंज्ञकम् ॥५७॥ इति नत्वा पठेत्स्तोत्रं सद्यः प्रत्ययकारकम् । ओम् नमस्ते नाथ भगवन् शिवाय गुरुरूपिणे ॥५८॥ सूर्य, शिवा ओर शिव की पूजा करे । यदि मध्य में शिव की अर्चा करे तब रवि, गणेश, हरि और शिवा की चारों ओर पूजा करे । मध्य में यदि शिवा की पूजा हो तो चारों ओर शिव, गणेश, सूर्य और विष्णु की पूजा होनी चाहिए। मध्य में गणेश की पूजा होने पर शिव, शिवा, सूर्य और विष्णु के बाह्य भाग की पूजा हो । रवि को मध्य में रख कर पूजा करने पर गणेश, विष्णु, पार्वती और शिव को बाह्य भाग में स्थापित कर अर्चना करनी चाहिए ॥४४-४६॥ इस प्रकार विज्ञ शिष्य प्रति दिन ब्राह्म मुहूर्त्त में उठ कर पंच देवों की पूजा करे । आवश्यक कार्यों से निवृत्त होकर निश्चन्त भाव से शय्या पर बैठे बैठे अपने शिर में सहस्र दल वाले श्वेत कमल की कर्णिका में स्थित चन्द्रमण्डल में अ. क. थ आदि त्रिकोण में श्रेष्ठ और अभयप्रद गुरु का स्मरण करे, जिनकी दो भुजायें हों और उनके शरीर में श्वेत सुगन्धित पदार्थ का लेप लगा हो और श्वेत माला से शरीर सुशोभित हो, और वाम भाग में शक्ति विराजमान हो । ऐसी मुद्रा में गुरु का ध्यान कर मानसिक उपचार से उनकी पूजा कर पादुका मन्त्र का दश बार जप करे ॥४७-५०॥ वाङ्माया श्री भगेन्द्राढ्या वियद्धंसखकाग्नयः । हसक्ष मलवार्याग्निवामकर्णेन्दुयुग्मरुत् । ततो भृग्वाकाशखाग्निभगेन्द्राढ्याः परंतिमः । सहक्षमलतोयाग्निश्चन्द्र शान्तियुतो मरुत् । ततः श्रीश्वामुकान्ते तु नंदनाथामुकी पुनः देव्यंबान्ते श्रीपादुकां पूजामि हृदन्ते मे ॥५१-५२॥ यह पादुका मन्त्र मनुष्यों को सब प्रकार की सिद्धियां देने वाली है । इस क्रिया के अनन्तर 'गुह्याति गुह्य – इस मन्त्र से मन्त्र का समर्पण कर आगे कहे गये मन्त्रों से नमस्कार करे । ५४॥ मन्त्र 'जिस गुरु ने सब चराचर जगत् में व्याप्त, अखण्ड मण्डलाकार ब्रह्म पद का दर्शन करा दिया उस गुरु को नमस्कार है ॥५५॥ जिस गुरु ने अज्ञान के अन्धकार के कारण कुछ भी न देख सकने वाले शिष्य (लोक) की आंखों में ज्ञान की अञ्जन-शलाका लगाकर खोल दिया (ज्ञान की ज्योति प्रदान की) उस गुरु को नमस्कार है ॥५६॥ उस इष्टदेव स्वरूप गुरु को प्रणाम है जिसकी वाणी रूपी सुधा संसार (माया) रूप विष को नष्ट कर देती है ॥५७॥ इस मन्त्र से गुरु का नमस्कार कर तत्काल श्रद्धा उत्पन्न कर देने वाले अग्रिम स्तोत्र का पाठ करे । स्तोत्र-
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः [पृष्ठ संख्या: ५५१]
विद्यावतारसंसिद्ध्यै स्वीकृतानेकविग्रह। नवायतनरूपाय परमार्थैकरूपिणे ॥५८॥ सर्वाज्ञानतमोभेदभानवे चिद्घनाय ते। स्वतंत्राय दयाक्लृप्तविग्रहाय शिवात्मने ॥६०॥ परतंत्राय भक्तानां भव्यानां भावरूपिणे। विवेकिनां विवेकाय विमर्शाय विमर्शिनाम् ॥६१॥ प्रकाशानां प्रकाशाय ज्ञानिनां ज्ञानरूपिणे। पुरस्तात्पार्श्वयोः पृष्ठे नमस्तुभ्यमुपर्यधः ॥६२॥ सदा सच्चित्स्वरूपेण विधेहि भवदासनम्। त्वत्प्रसादादहं देव कृतकृत्योऽस्मि सर्वतः ॥६३॥ मायामृत्युमहापाशाद्विमुक्तोऽस्मि शिवोऽस्मि वः। इति स्तुत्वा ततः सर्वं गुरवे विनिवेदयेत् ॥६४॥ प्रातःप्रभृति सायांतं सायादिप्रातरंततः। यत्करोमि जगन्नाथ तदस्तु तव पूजनम् ॥६५॥ ततश्च गुरुपादाम्बजगलितामृतधारया। क्षालितं निजमात्मानं निर्मलं भावयेत्सुधीः ॥६६॥ मूलादिब्रह्मरंध्रांतं मूलविद्यां विभावयेत्। मूलाधारादधो भागे वर्तुलं वायुमंडलम् ॥६७॥ तत्रस्थवायुबीजोत्थवायुना च तदूर्ध्वकम्। त्रिकोणं मंडलं वह्नेस्तत्स्थं वह्निबीजतः ॥६८॥ उत्पन्नेनाग्निना मूलाधारावस्थितविग्रहम्। प्रसुप्तभुजगाकारां स्वयंभूलिंगवेष्टिनीम् ॥६९॥ बिसतंतुनिभां कोटिविद्युद्दाभां तनीयसीम्। कुलकुंडलिनीं ध्यात्वा कूर्चेनोत्थापयेच्च ताम् ॥७०॥ सुषुम्णावर्त्मना तां च षट्चक्रक्रमभेदिनीम्। गुरुपदिष्टविधिना ब्रह्मरंध्रं नयेत्सुधीः ॥७१॥ तत्रस्थामृतसंमग्नीकृत्यात्मानं विभावयेत्। तत्प्रभापटलव्याप्तं विमलं चिन्मयं परम् ॥७२॥ पुनस्तां स्वस्थलं नीत्वा हृदि देवं विचितयन्। दृष्ट्वा च मान्सैर्द्रव्यैः प्रार्थयेन्मनुनामुना ॥७३॥
ओम् ॰॰॰नाथ, भगवन्, विद्या दान के लिये अनेक प्रकार के शरीर धारण करने वाले, गुरुरूपी शिव को नमस्कार है। परमार्थ मात्र रूप वाले, तन रूप, और नव (शंकर) को नमस्कार है ॥५८-५९॥ सब प्रकार के अज्ञान रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाले सूर्य, चिद्घन, स्वतन्त्र, दयामूर्ति, शिवात्मा को नमस्कार है। भक्तों के वश में रहने वाले, भव्य (भावुक) जनों के भाव, विवेकिकयों के विवेक, विचारशीलों के विचार, प्रकाशों के प्रकाश, ज्ञानियों के ज्ञान वाले, उस शिव को प्रणाम है। आगे, पीछे, बगल में, ऊपर और नीचे आपको नमस्कार है ॥६०-६२॥ आप सर्वदा सत्, चित् स्वरूप से मेरे हृदय में अपना आसन जमावें। देव, मैं तुम्हारी कृपा से सर्वथा कृतकृत्य हूँ। तुम्हारी कृपा से माया मृत्यु के महापाश से मुक्त हूँ और शिव रूप हो गया हूँ। इस प्रकार गुरु की स्तुति करने के अनन्तर गुरु को सर्वस्व अर्पण करे कि 'जगन्नाथ ! प्रातःकाल से सायंकाल और सायंकाल से प्रातःकाल तक जो कर्म करता हूँ वह और कुछ नहीं केवल तुम्हारा पूजन है' ॥६३-६५॥ इसके अनन्तर वह बुद्धिमान् शिष्य ऐसी भावना करे कि वह गुरु के चरण कमलों से निकलती हुई अमृत धारा में स्नान कर रहा है और उसके सब पाप धुलते जा रहे हैं, इस प्रकार वह निर्मल हो गया ॥६६॥ इस प्रकार निर्मलता प्राप्त कर मूलाधार चक्र से ब्रह्मरन्ध्र तक मूल विद्या की भावना करे। मूलाधार के नीचे वर्तुलकार (गोल) वायु मण्डल है, उस वायु मण्डल में स्थित वायुबीज को प्रदीप्त कर उससे ऊपर के भाग में स्थित अग्नि के त्रिकोण मण्डल में स्थित अग्नि बीज (रकार) को जाग्रत करे ॥६७-६८॥ उस जाग्रत वह्नि बीज से प्रदीप्त अग्नि से मूलाधार में स्थित रहने वाली, सोये सर्प के समान आकार वाली, भूर्लिंग को अपने में जकड़ रखने वाली, कमल नाल के समान, करोड़ों विद्युत् के समान चकाचौंध उत्पन्न करने वाली, अति कृश, कुलकुण्डलिनी का ध्यान कर उसको कूर्च (कूँची) से जगाये ॥६९-७०॥ सुषुम्णा नाड़ी से उस कुण्डलिनी को क्रम से षट्चक्र का भेदन करते हुए गुरु की बताई विधि से ब्रह्म रन्ध्र तक ले जाय। उस ब्रह्मरन्ध्र में स्थित अमृत में अपने को मग्न कर दे और अपने को तेज पुंज से व्याप्त, विमल और चिन्मय के रूप में समझे अर्थात् चिन्मय की भावना से
५६० नारदीयपुराणम् त्रैलोक्यचैतन्यमयादिदेव श्रीनाथ विष्णो भवदाज्ञयैव । प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थं संसारयात्रां त्वनुवर्तयिष्ये ॥७४॥ विष्णोरिति स्थले विप्र कार्यं ऊहोऽन्यदैवते । ततः कुर्यात्सर्वसिद्धयै त्वजपाया निवेदनम् ॥७५॥ षट्शतानि दिवा रात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः । अजपाख्यां तु गायत्रीं जीवो जपति सर्वदा ॥७६॥ ऋषिर्हंसस्तथाव्यक्तगायत्रीछंद ईरितम् । देवता परमो हंसश्चाद्यंते बीजशक्तिकम् ॥७७॥ ततः षडंगं कुर्वीत सूर्यः सोमो निरंजनः । निराभासश्च धर्मश्च ज्ञानं चेति तथा पुनः ॥७८॥ क्रमादेतान्हंसपूर्वानात्मनेपदपश्चिमान् । जातयुक्तान्साधकेंद्र षडंगेषु नियोजयेत् ॥७९॥ हकारः सूर्यसंकाशतेजाः संगच्छते बहिः । सकारस्तादृशश्चैव प्रवेशे ध्यानमीरितम् ॥८०॥ एवं ध्यात्वार्पयेद्धीमान्हृच्चक्रेषु विभागशः । मूलाधारे वादिसान्तबीजयुक्ते चतुर्दले ॥८१॥ बंधूकाभे स्वशक्त्या तु सहितापास्तवागय च । पाशांकुशसुधापात्रमोदकोल्लासपाणये ॥८२॥ षट्शतं तु गणेशाय वागधीशाय चार्पयेत् । स्वाधिष्ठाने विद्रुमाभे बादिलांतांणसंयुते ॥८३॥ वामांगशक्तियुक्ताय विद्याधिपतये तथा । स्रुवाक्षमालाकलसितबाहवे पद्मजन्मने ॥८४॥ भावित करे ॥७१-७२॥ फिर उस कुण्डलिनी को यथा स्थान ले जाकर हृदय प्रदेश में इष्ट देव का चिन्तन करे और हृदय में उस चिन्मय देव की कल्पित मानसिक सामग्रियों से पूजा करे और इस मन्त्र से प्रार्थना करे-- 'त्रिलोकी के चैतन्यस्वरूप ! आदि देव, श्रीनाथ, विष्णो, आपकी आज्ञा से ही प्रातःकाल उठकर तुम्हें प्रसन्न करने के लिये ही सांसारिक कार्यों को कर रहा हूँ।' ॥७३-७४॥ विप्र, ! यदि दूसरे देवता का मन्त्र लेना हो तो पूर्वोक्त मन्त्र में 'विष्णोः' आदि के स्थान में ऊहापोह द्वारा उसके वाचक शब्द या नाम का प्रयोग करना चाहिए । तदनन्तर समस्त सिद्धि के लिये 'अजपा' जप निवेदित करना चाहिए ॥७५॥ दिन-रात में जीव इक्कीस हजार छः सौ (२१६००) बार अजपा नामक गायत्री का जप सदा करता है ॥७६॥ (इस अजपा मंत्र के) ऋषि हंस हैं, अव्यक्त गायत्री छन्द कहा गया है देवता परमहंस हैं। आदि (हं) बीज और अन्त (सः) शक्ति है । तदनन्तर षडंगन्यास करे । सूर्य, सोम, निरंजन, निराभास, धर्म और ज्ञान—ये छह अंग हैं ॥७७-७८॥ क्रमशः इनके पूर्व में 'हंसः' और अन्त में आत्मनेपद जोड़कर श्रेष्ठ साधक इनका छह अंगों में न्यास करे । (हंसः सूर्यात्मने हृदयाय नमः । हंसःसोमात्मने शिरसे स्वाहा । हंसो निरंजनात्मने शिखायै वषट् । हंसो निराभासात्मने कवचाय हुम् । हंसो धर्मात्मने नेत्राभ्यां वौषट् । हंसो ज्ञानात्मने अस्त्राय फट् ।) हकार सूर्य के समान तेजस्वी होकर शरीर से बाहर निकलता है, और सकार वैसे ही तेजस्वी रूप से प्रवेश करता है । इस प्रकार हकार और सकार का ध्यान कहा गया है ॥७९-८०॥ इस प्रकार ध्यान करके बुद्धि- मान् पुरुष अग्नि और सूर्य मण्डल में विभागपूर्वक जप अर्पण करे । मूलाधार में चार दलों का कमल है, जो बन्धूक पुष्प के समान लाल है । उसके चारों दलों में क्रमशः व, श, ष, स ये अक्षर अंकित हैं। उसमें अपनी शक्ति के साथ गणेश जी विराजमान हैं। वे अपने चारों हाथों में पाश, अंकुश, अमृतपात्र तथा लड्डू लेकर प्रसन्न हैं ॥८१-८२॥ ऐसे वाक्पति गणेश जी को ६०० जप अपूर्ण करे । स्वाधिष्ठान चक्र में छः दलों का कमल है । वह चक्र मूँगे के समान कांति युक्त है । उसके छः दलों में क्रमशः ब. भ. म. य. र. ल—ये अक्षर अंकित हैं ॥८३॥ उसमें विद्या के अधिपति ब्रह्मा जी हंस पर आरूढ होकर विराजमान हैं; उनके वामभाग में ब्राह्मी शक्ति हैं; उनके हाथों में स्रुवा और अक्षमाला हैं । ऐसे ब्रह्मा को छः हजार जप अर्पित करे । मणिपूर चक्र में दस दल वाला कमल विद्यमान है । उसके प्रत्येक दल पर क्रमशः ड. ढ. ण. त. थ. द. ध. न. प. फ--ये अक्षर अंकित हैं।
५६१ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ब्रह्मणे षट्सहस्रं तु हंसारूढाय चार्पयेत् । विद्युल्लसितमेघाभे डादिफांतार्णपत्रके ॥८५॥ मणिपूरे शंखचक्रगदापंकजधारिणे । सश्रिये षट्सहस्रं च विष्णवे विनिवेदयेत् ॥८६॥ अनाहतेऽर्कपत्रे च कादिठांतादिसंयुते । शुक्ले शूलाभयवरसुधाकलशधारिणे ॥८७॥ वामांगे भक्तियुक्ताय विद्याधिपतये सुधीः । वृषारूढाय रुद्राय षट्सहस्रं निवेदयेत् ॥८८॥ विशुद्धे षोडशदले स्वराढ्ये शुक्लवर्णके । महाज्योतिप्रकाशाथेन्द्रियाधिपतये ततः ॥८९॥ सहस्रमर्पयेत्प्राणशक्त्या युक्तेश्वराय च । आज्ञाचक्रे हक्षयुक्ते द्विदलेऽब्जे सहस्रकम् ॥९०॥ सदाशिवाय गुरवे पराशक्तियुताय वै । सहस्रारे महापद्मे नादबिन्दुद्वयान्विते ॥९१॥ विलसन्मातृकावर्णे वराभयकराय च । परमाद्ये च गुरवे सहस्रं विनिवेदयेत् ॥९२॥ चुलुकैऽम्बु पुनर्हृत्त्वा स्वभावादेव सिध्यतः । एकविंशतिसाहस्रप्रमितस्य जपस्य च ॥९३॥ षट्शताधिकसंख्यास्यादजपाया विभागशः । संकल्पेन मोक्षदाता विष्णुर्मे प्रीयतामिति ॥९४॥ अस्याः संकल्पमात्रेण महापापैः प्रमुच्यते । ब्रह्म वाहं न संसारी नित्यमुक्तो न शोकभाक् ॥९५॥ सच्चिदानंदरूपोऽहमात्मानमिति भावयेत् । ततः समाचरेद्दे हकृत्यं देवार्चनं तथा ॥९६॥ तद्विधानं प्रवक्ष्यामि सदाचारस्य लक्षणम् । इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥६५॥ उसकी प्रभा बिजली से युक्त मेघ के समान है। उसमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले विष्णु लक्ष्मी सहित विराजमान हैं, उन्हें छः हजार जप अर्पण करना चाहिए ॥८४-८६॥ अनाहत चक्र में द्वादशदल कमल विद्यमान है। इसके प्रत्येक दल पर क्रमशः क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ अक्षर अंकित हैं। इसका वर्ण शुभ्र है। उसमें शूल, अभय, वर और अमृत कलश धारण करने वाले वृषभारूढ भगवान् रुद्र विराज रहे हैं। उनके वामाङ्ग भाग में शक्ति पार्वती विद्यमान हैं। ये विद्या के अधिपति हैं। साधक रुद्रदेव को छः हजार जप अर्पण करे ॥८७-८८॥ विशुद्ध चक्र षोडश दल कमल से युक्त है। उसके प्रत्येक दल पर क्रमशः स्वर वर्ण (अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः) अंकित हैं। यह चक्र शुक्ल वर्ण का है। उसमें महा ज्योति से प्रकाशित होने वाले इन्द्रियाधिपति ईश्वर विराजमान हैं, जो प्राण शक्ति से युक्त हैं। उन्हें एक सहस्र जप अर्पण करे। आज्ञाचक्र दो दलों वाला है। उसके दलों में क्रमशः ह और क्ष अंकित हैं। उसमें महाशक्ति न युक्त गुरु सदाशिव विराज- मान हैं। उन्हें एक सहस्र जप अर्पण करे। सहस्रार चक्र में सहस्र दलों से युक्त महापद्म विद्यमान है। उसमें नादविन्दु सहित समस्त मातृकावर्ग विराजमान हैं। उनमें वर और अभययुक्त हाथों वाले परम आदिगुरु को एक सहस्र जप अर्पण करे ॥८९-९२॥ फिर चुल्लू में जल लेकर इस प्रकार कहे- 'स्वभावतः होते रहने वाले इक्कीस हजार छह सौ अजपा जप का पूर्वोक्त रूप से विभागपूर्वक संकल्प करने के कारण मोक्षदाता भगवान् विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।' इस अजपा गायत्री के संकल्प मात्र से मनुष्य बड़े-बड़े पापों से मुक्त हो जाता है। मैं ब्रह्म ही हूँ, संसारी जीव नहीं हूँ। नित्यमुक्त हूँ, शोक मेरा स्पर्श नहीं कर सकता। मैं सच्चिदानन्दस्वरूप हूँ।' इस प्रकार अपने विषय में चिन्तन करे। इसके अनन्तर अपना शारीरिक कार्य और देवार्चन करे। उस देवार्चन को विधि और सदा- चार का लक्षण कहूँगा ॥९३-९७॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग में दीक्षा-दान तथा शिष्य-धर्म-निरूपण नामक पैंसठवां अध्याय समाप्त ॥६५॥ ७१ ना० पु०
षट्षष्टितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच ततः श्वासानुसारेण दत्त्वा पादं महीतले । समुद्रमेखले देवि पर्वतस्तनमण्डले ॥१॥ विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे । इति भूमिं तु संप्रार्थ्य निहरेच्च यथाविधि ॥२॥ रक्षःकोणे ततो ग्रामाद्गत्वा संत्यनुदीरयेत् । उत्तिष्ठन्तु मनुष्या देवाः पिशाचा ये च गुह्यकाः ॥३॥ पितृभूतगणाः सर्वे करिष्ये मलमोचनम् । इति तालत्रयं दत्त्वा शिरः प्रावृत्य वाससा ॥४॥ दक्षिणाभिमुखं रात्रौ दिवा स्थित्वा ह्युदङ्मुखः । जलं विसृज्य शौचं तु मृदाद्भिः समाचरेत् ॥५॥ एका लिङ्गे गुदे तिस्रो दश वामकरे मृदः । करयोः सप्त वैः दद्यात्त्रित्रिवारं च पादयोः ॥६॥ एवं शौचं विधायाथ गण्डूषांद्वादशैव तु । कृत्वा वनस्पतिं चाथ प्रार्थयेन्मनुनामुना ॥७॥ आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च । श्रियं प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते ॥८॥ संप्रार्थ्यैवं दन्तकाष्ठं द्वादशांगुलसंमितम् । गृहीत्वा काममंत्रेण कुर्यान्मंती समाहितः ॥६॥ कामदेवपदं ङेन्तं तथा सर्वजनप्रियम् । हृदंतः कामबीजाढ्यं दन्तांश्चानेन शोधयेत् ॥१०॥
अध्याय ६६ शौचाचार, स्नान, संध्या, तर्पण आदि का निरूपण सनत्कुमार बोले-प्रातःकाल जो श्वास चलता हो उसी के अनुसार पृथ्वी पर अपना पैर रखें। और हे समुद्ररूपी मेखलावाली देवि, पर्वतरूपी स्तन मण्डल वाली विष्णु-पत्नी, तुमको नमस्कार है, तुम मेरे चरण से स्पर्श करने के अपराध को क्षमा करो ॥१॥ इस प्रकार पृथ्वी की प्रार्थना कर शास्त्रानुकूल दिनचर्या प्रारम्भ करें ॥२॥ शास्त्र ने आचार पालन के विषय में इस प्रकार बतलाया है कि सबसे पहले ग्राम से नैर्ऋत्य कोण की ओर जाकर किसी एकान्त स्थान पर मलत्याग (शौच) करे। मलत्याग के पूर्व यह मन्त्र पढ़े, 'जो ऋषि, देव, पिशाच, गुह्यक, पितृगण या भूतगण हों वे सब यहाँ से अन्यत्र चले जायें। मैं यहाँ मलत्याग करूँगा। इस मन्त्र को पढ़कर तीन तालियां बजावे और वस्त्र से शिर बांध ले ॥३-४॥ रात में दक्षिण ओर और दिन में उत्तर की ओर मुँह करके शौच होना चाहिए। शौच के अनन्तर मिट्टी और जल से मलद्वार स्वच्छ कर लेना चाहिए ॥५॥ लिङ्ग में एक बार, गुदा में तीन बार, बायें हाथ में दश बार और दोनों हाथ में सात बार और दोनों पैरों में तीन बार मिट्टी लगानी चाहिये। इस भाँति पवित्र होकर बारह बार कुल्ला करे और आगे के कहे हुये मन्त्र से वनस्पति की प्रार्थना करे-प्रार्थना मन्त्र, 'वनस्पते, तुम हमको आयु, विद्या, बल, यश, तेज, सन्तति, पशु, धन, श्री, प्रज्ञा और मेधा को प्रदान करो, इस प्रकार मन्त्र पढ़कर बारह अंगुल की दतुअन को काम मन्त्र को पढ़कर सावधानी से करे । (काम मन्त्र-काम देवाय सर्वजन प्रियाय......) इस मन्त्र से दांतों को स्वच्छ करे ॥६-१०॥
षट्षष्टितमोऽध्यायः ५६३
जिह्वोल्लेखो वाग्भवेन मूलेन क्षालयेन्मुखम् । देवागारं ततो गत्वा निर्माल्यमपसार्य च ॥११॥ परिधायाम्बरं शुद्धं मंगलात्तिकं चरेत् । अस्त्रेण पात्रं संप्रोक्ष्य मूलेन ज्वालयेच्च तम् ॥१२॥ संपूज्य पात्राणादायापोत्थाय घंटां च वादयेत् । सुगोघृतप्रदीपेन भ्रामितेन समंततः ॥१३॥ वाद्यैर्गीतैर्मनोज्ञैश्च देवस्यारातिकं भवेत् । इति नीराजनं कृत्वा प्रार्थयित्वा निजेश्वरम् ॥१४॥ स्नातुं यायान्निम्नगादौ कीर्तयन्देवतागुणान् । गत्वा तीर्थं नमस्कृत्य स्नानीयं च निधाय वै ॥१५॥ मूलाभिमंत्रितमृदमादाय कटिदेशतः । विलिप्य पादपर्यंतं क्षालयेत्तीर्थवारिणा ॥१६॥ ततश्च पञ्चभिः पादौ प्रक्षाल्यांतर्जले पुनः । प्रविश्य नाभिमात्रे तु मृदं वामकरस्य च ॥१७॥ मणिबन्धे हस्ततले तदग्रे च तथा पुनः । कृत्वांगुल्या गांगमृदमादायास्त्रेण तत्पुनः ॥१८॥ निजोपरि च मंत्रज्ञो भ्रामयित्वा त्यजेत्सुधीः । तलस्थां च षडंगेषु तन्मंत्रैः प्रविलेपयेत् ॥१९॥ निमज्ज्य क्षालयेत्सम्यग् मलस्नानमितीरितम् । विभाव्येष्टमयं सर्वमेतन्मत्रं स्नानमाचरेत् ॥२०॥ अनंतादित्यसंकाशं निजभूषायुधैर्युतम् । मंत्रमूर्तिं प्रभुं स्मृत्वा तत्पादोदकसंभवाम् ॥२१॥ धारां च ब्रह्मरंध्रेण प्रविशंतीं निजां तनुम् । तथा संक्षालयेत्सर्वमंतर्देहगतं मलम् ॥२२॥ तत्क्षणाद्विरजा मंत्री जायते स्फटिकोपमः । ततः श्रौतोक्तविधिना स्नात्वा मन्त्री समाहितः ॥२३॥
जीभ को वाग्भव मन्त्र से और मूल मन्त्र से मुंह को धोये। स्वयं इस प्रकार शुद्ध होकर देव मन्दिर में जाय और पहले की चढ़ी हुई पूजा सामग्री (फूल, अक्षत आदि) को दूर हटा दे। फिर स्वच्छ वस्त्र पहन कर मंगला' आरती करे। मंगला आरती की विधि—अस्त्राय फट् कह कर पात्र पर जल छिड़के, मूल मन्त्र से उस दीपक को जला दे। पात्र को पूजा कर उसको हाथ में ले ले और घंटी बजाने लगे या दूसरों को बजाने के लिए कहें। शुद्ध गोघृत के दीपक को चारों ओर घुमा कर देव की आरती करे। उस समय मनोहर गीत और बाजे बजने चाहिए। आरती के अनन्तर नीराजन कर अपने इष्ट देव की प्रार्थना कर देवता के गुणों का कीर्तन करते हुये नदी या सरोवर आदि की ओर जावे। स्नान तीर्थ (नदी तट) पर जाकर तीर्थ को नमस्कार कर स्नानीय सामग्री को भूमि पर रख दें ॥११-१५॥ मूल मन्त्र से अभिमन्त्रित की हुई मिट्टी को हाथ में लेकर कमर से नीचे पैर तक लगावें फिर उसको जल से धो दें। तदनन्तर पाँच वार पैरों को धोकर कमर तक जल में घुस जाय और बायें हाथ के मणिवन्ध (कलाई), हाथ के तलवे और अंगुलियों पर मिट्टी लगा दें। अपनी अंगुलियों से जल के नीचे की मिट्टी निकाल कर 'अस्त्राय फट्' कह कर उसको अपने चारों ओर घुमाकर उस मिट्टी को स्नान करने वाला वह व्यक्ति फेंक दे। बायें हाथ की मिट्टी को 'अस्त्राय फट्' एवं अन्य मन्त्रों से अपने छहों अंगों में लगावें। फिर जल में डुबकी लगाकर अपने अंगों को मल मल कर धो डालें। स्नान के समय उस जल में सब इष्ट माताओं का ध्यान अवश्य करना चाहिए। यही स्नान की विधि है ॥१६-२०॥
अनन्त सूर्य के समान कान्तिमान्, अपने आभूषण और अस्त्रों से युक्त मन्त्र मूर्ति प्रभु का स्मरण कर उनके चरणोदक से निकली हुई गंगा के जल को नाक के छेदों से अपने शरीर में ले जाकर इससे शरीर के भीतर के मल को बाहर निकाल दें। इस प्रकार अन्तःशुद्धि करने वाला साधक तत्काल रजोगुण से रहित होकर स्फटिक के समान दिव्य देह हो जाता है। इस प्रकार शास्त्र विधि के अनुसार स्नान करने के उपरान्त वह मन्त्री सावधानी से मन्त्र स्नान करे। मन्त्रस्नान की विधि निम्नलिखित है ॥२१-२३½॥
१. रात में चार बजे भगवान् को उठाकर जो आरती की जाती है ।
५६४ नारदीयपुराणम् मंत्रस्नानं ततः कुर्यात्तद्विधानमथोच्यते । देशकालौ च संकीर्त्य प्राणायामषडंगकैः ॥२४॥ कृत्वार्कमंडलात्तीर्थान्याह्वयेन्मुष्टिमुद्रया । ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि ते रखेः ॥२५॥ तेन सत्येन मे देव देहि तीर्थं दिवाकर ॥२६॥ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिंधुकावेरि जलेऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ॥२७॥ इत्यावाह्य जले तानि सुधाबीजेन योजयेत् । गोमुद्रयाऽमृतीकृत्य कवचेनावगुंठ्य च ॥२८॥ संरक्ष्यास्त्रेण तत्पश्चाच्चक्रमुद्रां प्रदर्शयेत् । वह््न्यर्केंदुमण्डलानि तत्र साचतयेद्बुधः ॥२९॥ मंत्रयेदर्कमन्त्रेण सुधाबीजेन तज्जलम् । मूलेन चैकादशधा तत्र संमंथ्य भावयेत् ॥३०॥ पूजायंत्रं च तन्मध्ये स्वांतादावाह्य देवताम् । स्नापयित्वार्चयेत्तां च मानसेरुपचारकैः ॥३१॥ सिंहासनस्थां तां नत्वा तज्जलं प्रणमेत्सुधीः । आधारः सर्वभूतानां विष्णोरतलतेजसः ॥३२॥ तद्रूपाश्च ततो जाता आपस्ताः प्रणमाम्यहम् । इति नत्वा समारुन्ध्य सप्तच्छिद्राणि साधकः ॥३३॥ निमज्ज्य सलिलेऽतस्मिन्मूलं देवाकृतिं स्मरेत् । निमज्ज्योन्मज्ज्य त्रिश्चैवं सिंचेत्कं कुंभमुद्रया ॥३४॥ त्रिमूलेन चतुर्मंत्रैरभिषिंचेन्निजां तनुम् । चत्वारो मनवस्तेऽत्र कथ्यन्ते तांत्रिका मुने ॥३५॥ सिसृक्षोर्निखिलं विश्वं मुहुः शुक्रं प्रजापतेः । मातरः सर्वभूतानामापो देव्यः पुनंतु माम् ॥३६॥ अलक्ष्मीर्मलरूपा या सर्वभूतेषु संस्थिता । क्षालयंति च तां स्पर्शादापो देव्यः पुनंतु माम् ॥३७॥
पहले देशकाल का नामोल्लेख कर संकल्प करे और षडङ्ग प्राणायाम करे फिर मुष्टि मुद्रा करके सूर्य मण्डल से तीर्थों का आवाहन करे । आवाहन मन्त्र - देव, तुम्हारी किरणें सारे ब्रह्माण्ड और तीर्थों (नदीजल या जल) का स्पर्श करती हैं । दिवाकर, उस सत्य के आधार पर आप मेरे लिये समस्त तीर्थों को मेरे समीप लावें । गंगे, यमुने, गोदावरि, सरस्वति, नर्मदे, सिन्धु, कावेरि ! इस जल में आकर आप निवास करें । इस प्रकार सबका आवाहन कर उनको सुधाबीज से उस जल में स्थापित करें ॥२४-२७$\frac{१}{२}$॥ गोमुद्रा से उसको अमृतमय बनाकर कवच से अवगुं- ठित कर अस्त्र से उसकी रक्षा कर चक्र मुद्रा का प्रदर्शन करे । बुध जन इस प्रकार जल को मुद्राओं द्वारा प्रभावित कर अग्नि, सूर्य और चन्द्र मण्डल का ध्यान करे । सूर्य के मन्त्र से उस जल को अभिमन्त्रित कर सुधाबीज से उसको पुनः अभिमन्त्रित करे । फिर ग्यारह बार मूल मन्त्र को पढ़कर उस जल को भावना- भावित करे ॥२८-३०॥ पूजा यन्त्र को उस भावित जल में स्थापित कर उसमें अपने हृदयस्थ देवता को स्थापित कर उस देवता को मानसिक (भावनामय) उपचारों से पूजा करे । इस भाँति पूजन करने के अनन्तर वह विद्वान् व्यक्ति सिहास- नस्थ उस देवता को प्रणाम कर उस जल को भी प्रणाम करे । प्रणाम मन्त्र - 'तुम (जल) सब प्राणियों के और अतुल तेजस्वी विष्णु के आधार हो, तदनन्तर तुम्हीं विष्णु के रूप भी बन गये इसलिये ऐसे जल को प्रणाम करता हूँ ॥३१-३२$\frac{१}{२}$॥ इस मन्त्र से नमस्कार कर साधक शरीर के सात छेदों (नाक, कान, आँख और मुँह) को मूंद कर उस जल में डुबकी लगावे और डूबे ही मूल देवाकृति का स्मरण करे । इस प्रकार तीन बार जल में डुबकी लगाये और ऊपर आये । पुनः कुम्भ मुद्रा से जल को सींच कर उसी जल से तीन बार और मन्त्र से चार बार अपने शरीर को सींचे । मुने, इस विषय के चार मन्त्र मुनियों ने बताये हैं । पहला -- बार-बार निखिल विश्व सृष्टि की इच्छा करने वाले प्रजापति के तुम शुक्र हो, और सब प्राणियों के एकमात्र जनक हो, जलदेव आपको नमस्कार है। आप मुझको पवित्र करें ॥३३-३६॥ दूसरा -- आप सब प्राणियों में मलरूपी जो अलक्ष्मी है उसको अपने स्पर्श
षट्षष्टितमोऽध्यायः ५६५ यन्मे केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्द्धनि । ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद्घ्नन्तु वो नमः ॥३६॥ आयुरारोग्यमैश्वर्यमरिक्षयं शुभम् । सन्तोषः शांतिरास्तिक्यं विद्या भवतु वो नमः ॥३८॥ विप्रपादोदकं पीत्वा शालग्रामशिलाजलम् । पिबेद्विरुद्धं नो कुर्यादेषां तु नियतो विधिः ॥४०॥ पृथिव्यां यानि तीर्थानि दक्षांघ्रौ तानि भूसुरे । स्वेष्टदेवं समुद्ध्रास्य मन्त्री मार्तण्डमण्डले ॥४१॥ ततस्तीरं समागत्य वस्त्रं संक्षाल्य यत्नतः । वाससी परिधायाथ कुर्यात्सन्ध्यादिकं सुधीः ॥४२॥ रोगाद्यशक्तो मनुजः कुर्यात्तवाघमर्षणम् । अथवा भस्मना स्नातो रजोभिश्चैव वाऽक्षमः ॥४३॥ अथ सन्ध्यादिकं कुर्यात् स्थित्वा चैवासने शुभे । केशवेन तथा नारायणेन माधवेन च ॥४४॥ संप्राश्य तोयं गोविन्दविष्णुभ्यां क्षालयेत्करौ । मधुसूदनत्रिविक्रमाभ्यामोष्ठौ च मार्जयेत् ॥४५॥ वामनश्रीधराभ्यां च मुखं हस्तौ स्पृशेत्ततः । हृषीकेशपद्मनाभाभ्यां स्पृशेच्चरणौ ततः ॥४६॥ दामोदरेण मूर्द्धानं मुखं संकर्षणेन च । वासुदेवेन प्रद्युम्नेन स्पृशेन्नासिके ततः ॥४७॥ अनिरुद्धपुरुषोत्तमाभ्यां नेत्रे स्पृशेत्ततः । अधोक्षजनृसिंहाभ्यां श्रवणे संस्पृशेत्तथा ॥४८॥ नाभिं स्पृशेदच्युतेन जनार्दनेन वक्षसि । हरिणा विष्णुनांसौ च वैष्णवाचमनं त्विदम् ॥४९॥ प्रणवाद्यैर्ङेऽन्तैर्नमोऽन्तः केशवादिकनामभिः । मुखे नसोः प्रदेशिन्याऽनामया नेत्रकर्णयोः ॥५०॥ कनिष्ठया नाभिदेशं सर्वांगुष्ठयोजनम् । आत्मविद्याशिवस्तत्त्वैःस्वाहांतैः शिवमरीरितम् ॥५१॥ से धो देते हैं, ऐसे जल देव मुझको पवित्र करें। तीसरा-मेरे केशों में, सीमन्त में, मूर्द्धा, ललाट, कानों और आँखों में जो दुर्भाग्य है उसको शीघ्र नष्ट कर दें । आपको नमस्कार है ॥३७-३८॥ चौथा-मुझको आपकी कृपा से आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, शत्रुनाश, कल्याण, संतोष, शान्ति, आस्तिक भाव और विद्या प्राप्त हो । फिर ब्राह्मणों का चरणोदक तथा शालग्राम शिला का जल पान करे । कभी इसके विरुद्ध आचरण न करे । यह शास्त्र का नियत विधान है । पृथवी पर जितने तीर्थ हैं वे सब तीर्थ ब्राह्मणों के दाहिने चरण में रहते हैं। सूर्य मण्डल में अपने इष्ट देव को स्थापन और उसका पूजन करने के अनन्तर वह मन्त्री तीर पर आकर अपने वस्त्र को भली भाँति धो डाले । स्वयं नवीन वस्त्र पहन कर सन्ध्या वंदन आदि करे । ॥३६-४२॥ यदि कोई व्यक्ति रोग आदि के कारण इस प्रकार स्नान और सन्ध्यावन्दन आदि करने में असमर्थ हो तो वह केवल अघमर्षण करे। अथवा भस्म या रेणु से स्नान कर शुभ आसन पर बैठकर सन्ध्या आदि करे । सन्ध्योपासन विधि--केशवाय नमः, नारायणाय नमः, माधवाय नमः कह कर तीन बार आचमन कर गोविन्द- विष्णुभ्यां नमः कह कर दोनों हाथों को धो डाले । मधुसूदनत्रिविक्रमाभ्यां नमः कहकर दोनों ओठों को धो दे। तदनन्तर वामनश्रीधाराभ्यां नमः कहकर मुँह और दोनों हाथो का स्पर्श करे । हृषिकेशपद्मनाभाभ्यां नमः कहकर दोनों चरणों को छुवे ॥४३-४६॥ दामोदराय नमः से मूर्द्धा का और संकर्षणाय नमः से मुख का, वासुदेवाय नमः, प्रद्युम्नाय नमः कहकर दोनों नासिका-छिद्रों का स्पर्श करे ॥४७॥ अनिरुद्धपुरुषोत्तमाभ्यां नमः कहकर दोनों नेत्रों को, अधोक्षजनृसिंहाभ्यां नमः मन्त्र से दोनों कानों का, अच्युताय नमः कहकर नाभि का और जनार्दनाय नमः कहकर वक्षःस्थल का स्पर्श करे । हरये नमः, विष्णवे नमः कहकर दोनों कन्धों का स्पर्श करे । पुनः वैष्णवाय नमः कहकर आचमन करे। इस प्रकार अङ्ग स्पर्श करने के अनन्तर केशव आदि नामों के आदि में ओम् और अन्त में चतुर्थी विभक्ति और नमः जोड़कर अर्थात् ओम् केशवाय नमः आदि कहकर अंगूठा और प्रदेशिनी से मुख और नासिका का, अंगुष्ठा और अनामिका से आंखों और कानों का और कनिष्ठिका से नाभिदेश का स्पर्श करे । आत्मविद्या और शिवतत्त्व को स्वाहा से संयुक्त कर देने पर शैव मन्त्र कहा जाता है ॥४८-५१॥
५६६ नारदीयपुराणम् दीर्घत्रयेन्दुयुग्व्योमपूर्वकेणैव पिबेज्जलम् । आत्मविद्याशिवैरेव शैवं स्वाहावसानिकैः ॥५२॥ वाग्लज्जाश्रीमुखैः प्रोक्तं शाक्तं स्वाहावसानिकैः । वाग्लज्जाश्रीमुखैः प्रोक्तं द्विजाचमनमर्थदम् ॥५३॥ तिलकं च ततः कुर्याद्भाले सुष्ठु गदाकृति । नंदकं हृदये शंखचक्रे चैव भुजद्वये ॥५४॥ शार्ङ्गबाणं मस्तके च विन्यसेत्क्रमशः सुधीः । कर्णमूले पार्श्वयोश्च पृष्ठे नाभौ ककुद्यपि ॥५५॥ एवं तु वैष्णवः कुर्यान्मृद्भिस्तीर्थोद्भववादिभिः । अग्निहोत्रोद्भवं भस्म गृहीत्वा त्र्यंबकेन तु ॥५६॥ किंवाग्निरिति मंत्रेणाभिमंत्र्य पञ्चमन्त्रकैः । क्रमात्तत्पुरुषाघोरसद्योजातादिनामभिः ॥५७॥ पञ्च कुर्यात्त्रिपुण्ड्राणि भालांसोदरहृत्सु च । शैवः शाक्तस्त्रिकोणाभं नारीवद्वा समाचरेत् ॥५८॥ कृत्वा तु वैदिकीं संध्यां तांत्रिकीं च समाचरेत् । आचम्य विधिवन्मन्त्री तीर्थान्यावाह्य पूर्ववत् ॥५९॥ ततस्त्रिवारं दर्भेण भूमौ तोयं विनिःक्षिपेत् । सप्तधा तज्जलेनाथ मूर्द्धानमभिषेचयेत् ॥६०॥ ततश्च प्राणानायम्य कृत्वा न्यासं षडंगकम् । आदाय वामहस्तेंऽबु दक्षिणेनाच्छाद्य पाणिना ॥६१॥ वियद्वातवह्नितोयक्ष्माबीजैः संम॑ध्य मंत्रवित् । मूलेन तस्मात् श्चोतद्भिर्बिन्दुभिस्तत्त्वमुद्रया ॥६२॥ स्वशिरः सप्तधा प्रोक्ष्यावशिष्टं तत्पुनर्जलम् । कृत्वा तदक्षरं मंत्री नासिकांतिकमानयेत् ॥६३॥ जलं तेजोमयं तच्चाकृष्यांतश्चेढया पुनः । प्रक्षाल्यांतर्गतं तेन कल्मषं तज्जलं पुनः ॥६४॥ कृष्णवर्णं पिंगलया रेचयेत्स्वाग्रतस्तथा । क्षिपेदस्त्रेण तत्पश्चात्कल्पिते कुलिशोपले ॥६५॥ दीर्घत्रय, इन्दु और व्योम से युक्त मन्त्र से जल पीना चाहिये । आत्मविद्या और शिव के नामों के अन्त में स्वाहा जोड़ देने से शैव मन्त्र बनता है। वाक्, लज्जा, श्री के साथ स्वाहा जोड़ देने से जो मन्त्र बनते हैं, उन मन्त्रों से अर्थात् "वाचे स्वाहा, लज्जायै स्वाहा, श्रियै स्वाहा" से आचमन करने पर अर्थ सिद्धि होती है ॥५२-५३॥ इसके अनन्तर वह सुधी गदा के आकार का ललाट में तिलक लगाये, हृदय में नन्दक के आकार का और दोनों भुजाओं पर शंख चक्र के आकार का और मस्तक पर धनुष-बाण के आकार का, कर्ण मूल, दोनों पसलियों पर, पीठ पर नाभि तथा ककुद (गर्दन के पीछे) पर क्रमशः चन्दन लगाये । इस प्रकार वैष्णव तीर्थ की मिट्टी या गोपी चन्दन का चन्दन सर्वाङ्गों में लगावे । इसके विपरीत शैव अग्निहोत्र के भस्म को लेकर त्र्यम्बकं यजामहे ॰॰॰॰॰॰ इस मन्त्र से या अग्निरिति भस्म ॰॰॰॰॰॰॰॰ इस मन्त्र से अभिमन्त्रित कर पंच मन्त्रकों से अर्थात् क्रमशः पुरुष, अघोर, सद्योजात आदि नामों से ललाट, अंस (कन्धे के ऊपर,) उदर और हृदय पर पांच त्रिपुण्ड्र लगाये । शाक्त त्रिकोणाकार या नारी जैसे वेंदी लगाती है उस तरह का तिलक धारण करें । इस विधि से वैदिकी सन्ध्या करने के बाद तान्त्रिकी सन्ध्या करे ॥५४-५८॥ तान्त्रिक विधि— मन्त्री (उपासक) विधिपूर्वक आचमन कर और पहले की भांति तीर्थों का आवाहन कर तीन वार कुश से पृथ्वी पर जल छिड़के । इसी कुश से सात वार मस्तक पर भी जल छिड़के । अभिषेक के अनन्तर प्राणायाम कर षडङ्गन्यास करे । बायें हाथ में जल रखकर दाहिने से उसको ढँक दे । फिर वह मन्त्रज्ञ आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के बीज से अभिमन्त्रित कर मूल मन्त्र से अपने हाथ से नीचे टपकते हुये जलबिन्दु से तत्त्व मुद्रा से अपने शिर को सात वार सींचे । बचे हुये जल को वह मन्त्री अपनी नासिका के पास लावे ॥५९-६३॥ उस तेजोमय जल को इड़ा नाड़ी द्वारा भीतर आकृष्ट करे और उसके द्वारा अपने अन्तः के पापों को धोकर कृष्णवर्ण के उस जल को बाईं नासिका (पिंगला) से बाहर निकाल दे । और उस जल को अपने आगे कल्पित कुलिश पत्थर (वज्र) पर फेंक दे । अर्थात् अपने आगे अपनी भावना के द्वारा कल्पित वज्र पर फेंक दे । यह सब प्रकार के पापों को नष्ट करने वाला अघमर्षण है ॥६४-६५॥ इसके अनन्तर हाथों को जल से धोकर पहले की भांति