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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 579, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 579

५६० नारदीयपुराणम् त्रैलोक्यचैतन्यमयादिदेव श्रीनाथ विष्णो भवदाज्ञयैव । प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थं संसारयात्रां त्वनुवर्तयिष्ये ॥७४॥ विष्णोरिति स्थले विप्र कार्यं ऊहोऽन्यदैवते । ततः कुर्यात्सर्वसिद्धयै त्वजपाया निवेदनम् ॥७५॥ षट्शतानि दिवा रात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः । अजपाख्यां तु गायत्रीं जीवो जपति सर्वदा ॥७६॥ ऋषिर्हंसस्तथाव्यक्तगायत्रीछंद ईरितम् । देवता परमो हंसश्चाद्यंते बीजशक्तिकम् ॥७७॥ ततः षडंगं कुर्वीत सूर्यः सोमो निरंजनः । निराभासश्च धर्मश्च ज्ञानं चेति तथा पुनः ॥७८॥ क्रमादेतान्हंसपूर्वानात्मनेपदपश्चिमान् । जातयुक्तान्साधकेंद्र षडंगेषु नियोजयेत् ॥७९॥ हकारः सूर्यसंकाशतेजाः संगच्छते बहिः । सकारस्तादृशश्चैव प्रवेशे ध्यानमीरितम् ॥८०॥ एवं ध्यात्वार्पयेद्धीमान्हृच्चक्रेषु विभागशः । मूलाधारे वादिसान्तबीजयुक्ते चतुर्दले ॥८१॥ बंधूकाभे स्वशक्त्या तु सहितापास्तवागय च । पाशांकुशसुधापात्रमोदकोल्लासपाणये ॥८२॥ षट्शतं तु गणेशाय वागधीशाय चार्पयेत् । स्वाधिष्ठाने विद्रुमाभे बादिलांतांणसंयुते ॥८३॥ वामांगशक्तियुक्ताय विद्याधिपतये तथा । स्रुवाक्षमालाकलसितबाहवे पद्मजन्मने ॥८४॥ भावित करे ॥७१-७२॥ फिर उस कुण्डलिनी को यथा स्थान ले जाकर हृदय प्रदेश में इष्ट देव का चिन्तन करे और हृदय में उस चिन्मय देव की कल्पित मानसिक सामग्रियों से पूजा करे और इस मन्त्र से प्रार्थना करे-- 'त्रिलोकी के चैतन्यस्वरूप ! आदि देव, श्रीनाथ, विष्णो, आपकी आज्ञा से ही प्रातःकाल उठकर तुम्हें प्रसन्न करने के लिये ही सांसारिक कार्यों को कर रहा हूँ।' ॥७३-७४॥ विप्र, ! यदि दूसरे देवता का मन्त्र लेना हो तो पूर्वोक्त मन्त्र में 'विष्णोः' आदि के स्थान में ऊहापोह द्वारा उसके वाचक शब्द या नाम का प्रयोग करना चाहिए । तदनन्तर समस्त सिद्धि के लिये 'अजपा' जप निवेदित करना चाहिए ॥७५॥ दिन-रात में जीव इक्कीस हजार छः सौ (२१६००) बार अजपा नामक गायत्री का जप सदा करता है ॥७६॥ (इस अजपा मंत्र के) ऋषि हंस हैं, अव्यक्त गायत्री छन्द कहा गया है देवता परमहंस हैं। आदि (हं) बीज और अन्त (सः) शक्ति है । तदनन्तर षडंगन्यास करे । सूर्य, सोम, निरंजन, निराभास, धर्म और ज्ञान—ये छह अंग हैं ॥७७-७८॥ क्रमशः इनके पूर्व में 'हंसः' और अन्त में आत्मनेपद जोड़कर श्रेष्ठ साधक इनका छह अंगों में न्यास करे । (हंसः सूर्यात्मने हृदयाय नमः । हंसःसोमात्मने शिरसे स्वाहा । हंसो निरंजनात्मने शिखायै वषट् । हंसो निराभासात्मने कवचाय हुम् । हंसो धर्मात्मने नेत्राभ्यां वौषट् । हंसो ज्ञानात्मने अस्त्राय फट् ।) हकार सूर्य के समान तेजस्वी होकर शरीर से बाहर निकलता है, और सकार वैसे ही तेजस्वी रूप से प्रवेश करता है । इस प्रकार हकार और सकार का ध्यान कहा गया है ॥७९-८०॥ इस प्रकार ध्यान करके बुद्धि- मान् पुरुष अग्नि और सूर्य मण्डल में विभागपूर्वक जप अर्पण करे । मूलाधार में चार दलों का कमल है, जो बन्धूक पुष्प के समान लाल है । उसके चारों दलों में क्रमशः व, श, ष, स ये अक्षर अंकित हैं। उसमें अपनी शक्ति के साथ गणेश जी विराजमान हैं। वे अपने चारों हाथों में पाश, अंकुश, अमृतपात्र तथा लड्डू लेकर प्रसन्न हैं ॥८१-८२॥ ऐसे वाक्पति गणेश जी को ६०० जप अपूर्ण करे । स्वाधिष्ठान चक्र में छः दलों का कमल है । वह चक्र मूँगे के समान कांति युक्त है । उसके छः दलों में क्रमशः ब. भ. म. य. र. ल—ये अक्षर अंकित हैं ॥८३॥ उसमें विद्या के अधिपति ब्रह्मा जी हंस पर आरूढ होकर विराजमान हैं; उनके वामभाग में ब्राह्मी शक्ति हैं; उनके हाथों में स्रुवा और अक्षमाला हैं । ऐसे ब्रह्मा को छः हजार जप अर्पित करे । मणिपूर चक्र में दस दल वाला कमल विद्यमान है । उसके प्रत्येक दल पर क्रमशः ड. ढ. ण. त. थ. द. ध. न. प. फ--ये अक्षर अंकित हैं।