बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चषष्टितमोऽध्यायः [पृष्ठ संख्या: ५५१]
विद्यावतारसंसिद्ध्यै स्वीकृतानेकविग्रह। नवायतनरूपाय परमार्थैकरूपिणे ॥५८॥ सर्वाज्ञानतमोभेदभानवे चिद्घनाय ते। स्वतंत्राय दयाक्लृप्तविग्रहाय शिवात्मने ॥६०॥ परतंत्राय भक्तानां भव्यानां भावरूपिणे। विवेकिनां विवेकाय विमर्शाय विमर्शिनाम् ॥६१॥ प्रकाशानां प्रकाशाय ज्ञानिनां ज्ञानरूपिणे। पुरस्तात्पार्श्वयोः पृष्ठे नमस्तुभ्यमुपर्यधः ॥६२॥ सदा सच्चित्स्वरूपेण विधेहि भवदासनम्। त्वत्प्रसादादहं देव कृतकृत्योऽस्मि सर्वतः ॥६३॥ मायामृत्युमहापाशाद्विमुक्तोऽस्मि शिवोऽस्मि वः। इति स्तुत्वा ततः सर्वं गुरवे विनिवेदयेत् ॥६४॥ प्रातःप्रभृति सायांतं सायादिप्रातरंततः। यत्करोमि जगन्नाथ तदस्तु तव पूजनम् ॥६५॥ ततश्च गुरुपादाम्बजगलितामृतधारया। क्षालितं निजमात्मानं निर्मलं भावयेत्सुधीः ॥६६॥ मूलादिब्रह्मरंध्रांतं मूलविद्यां विभावयेत्। मूलाधारादधो भागे वर्तुलं वायुमंडलम् ॥६७॥ तत्रस्थवायुबीजोत्थवायुना च तदूर्ध्वकम्। त्रिकोणं मंडलं वह्नेस्तत्स्थं वह्निबीजतः ॥६८॥ उत्पन्नेनाग्निना मूलाधारावस्थितविग्रहम्। प्रसुप्तभुजगाकारां स्वयंभूलिंगवेष्टिनीम् ॥६९॥ बिसतंतुनिभां कोटिविद्युद्दाभां तनीयसीम्। कुलकुंडलिनीं ध्यात्वा कूर्चेनोत्थापयेच्च ताम् ॥७०॥ सुषुम्णावर्त्मना तां च षट्चक्रक्रमभेदिनीम्। गुरुपदिष्टविधिना ब्रह्मरंध्रं नयेत्सुधीः ॥७१॥ तत्रस्थामृतसंमग्नीकृत्यात्मानं विभावयेत्। तत्प्रभापटलव्याप्तं विमलं चिन्मयं परम् ॥७२॥ पुनस्तां स्वस्थलं नीत्वा हृदि देवं विचितयन्। दृष्ट्वा च मान्सैर्द्रव्यैः प्रार्थयेन्मनुनामुना ॥७३॥
ओम् ॰॰॰नाथ, भगवन्, विद्या दान के लिये अनेक प्रकार के शरीर धारण करने वाले, गुरुरूपी शिव को नमस्कार है। परमार्थ मात्र रूप वाले, तन रूप, और नव (शंकर) को नमस्कार है ॥५८-५९॥ सब प्रकार के अज्ञान रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाले सूर्य, चिद्घन, स्वतन्त्र, दयामूर्ति, शिवात्मा को नमस्कार है। भक्तों के वश में रहने वाले, भव्य (भावुक) जनों के भाव, विवेकिकयों के विवेक, विचारशीलों के विचार, प्रकाशों के प्रकाश, ज्ञानियों के ज्ञान वाले, उस शिव को प्रणाम है। आगे, पीछे, बगल में, ऊपर और नीचे आपको नमस्कार है ॥६०-६२॥ आप सर्वदा सत्, चित् स्वरूप से मेरे हृदय में अपना आसन जमावें। देव, मैं तुम्हारी कृपा से सर्वथा कृतकृत्य हूँ। तुम्हारी कृपा से माया मृत्यु के महापाश से मुक्त हूँ और शिव रूप हो गया हूँ। इस प्रकार गुरु की स्तुति करने के अनन्तर गुरु को सर्वस्व अर्पण करे कि 'जगन्नाथ ! प्रातःकाल से सायंकाल और सायंकाल से प्रातःकाल तक जो कर्म करता हूँ वह और कुछ नहीं केवल तुम्हारा पूजन है' ॥६३-६५॥ इसके अनन्तर वह बुद्धिमान् शिष्य ऐसी भावना करे कि वह गुरु के चरण कमलों से निकलती हुई अमृत धारा में स्नान कर रहा है और उसके सब पाप धुलते जा रहे हैं, इस प्रकार वह निर्मल हो गया ॥६६॥ इस प्रकार निर्मलता प्राप्त कर मूलाधार चक्र से ब्रह्मरन्ध्र तक मूल विद्या की भावना करे। मूलाधार के नीचे वर्तुलकार (गोल) वायु मण्डल है, उस वायु मण्डल में स्थित वायुबीज को प्रदीप्त कर उससे ऊपर के भाग में स्थित अग्नि के त्रिकोण मण्डल में स्थित अग्नि बीज (रकार) को जाग्रत करे ॥६७-६८॥ उस जाग्रत वह्नि बीज से प्रदीप्त अग्नि से मूलाधार में स्थित रहने वाली, सोये सर्प के समान आकार वाली, भूर्लिंग को अपने में जकड़ रखने वाली, कमल नाल के समान, करोड़ों विद्युत् के समान चकाचौंध उत्पन्न करने वाली, अति कृश, कुलकुण्डलिनी का ध्यान कर उसको कूर्च (कूँची) से जगाये ॥६९-७०॥ सुषुम्णा नाड़ी से उस कुण्डलिनी को क्रम से षट्चक्र का भेदन करते हुए गुरु की बताई विधि से ब्रह्म रन्ध्र तक ले जाय। उस ब्रह्मरन्ध्र में स्थित अमृत में अपने को मग्न कर दे और अपने को तेज पुंज से व्याप्त, विमल और चिन्मय के रूप में समझे अर्थात् चिन्मय की भावना से