बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५५८ नारदीयपुराणम् यदा मध्ये यजेद्विष्णुं बाह्यादिषु विनायकम् । रविं शिवां शिवं चैव यदा मध्ये तु शङ्करम् ॥४४॥ रविं गणेशमंबां च हरिं चाथ यदा शिवाम् । ईशं विघ्नार्कगोविन्दान्मध्ये चेद्गणनायकम् ॥४५॥ शिवं शिवां रविं विष्णुं रवौ मध्यगते पुनः । गणेशं विष्णुमंबां च शिवं चेति यथाक्रमम् ॥४६॥ एवं नित्यं समभ्यर्च्य देवपञ्चकमादृतः । ब्राह्मे मुहूर्ते ह्युत्थाय कृत्वा चावश्यकं बुधः ॥४७॥ अशंकितो वा शय्यायां स्वकीयशिरसि स्मरेत् । सहस्रदलशुक्लाब्जकर्णिकास्थेंदुमण्डले ॥४८॥ अकथादित्रिकोणस्थं वराभयकरं गुरुम् । द्विनेत्रं द्विभुजं शुक्लगंधमाल्यानुलेपनम् ॥४९॥ वामे शक्त्या युतं ध्यात्वा मानसैरुपचारकैः । आराध्य पादुकामन्त्रं दशधा प्रजपेत्सुधीः ॥५०॥ वाङ्माया श्रीभर्गेद्वाढ्या वियद्धंसखकाग्नयः । हसक्षमलवार्यग्निवामकर्णेंदुयुग्मरुत् ॥५१॥ ततो भृग्वाकाशखाग्निभगेंद्राढ्याः परंतिमः । सहक्षमलतोयाग्निश्चंद्रशां तियुतो मरुत् ॥५२॥ ततः श्रीश्वामुकांते तु नन्दनाथामुकी पुनः । देव्यंतांते श्रीपादुकां पूजयामि हृदंतिमे ॥५३॥ अयं श्रीपादुकामंत्रः सर्वसिद्धिप्रदो नृणाम् । गुह्येति च समर्प्याथ मन्त्रैरैतैर्र्नमत्सुधीः ॥५४॥ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥५५॥ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥५६॥ नमोऽस्तु गुरवे तस्मा इष्टदेवस्वरूपिणे । यस्य वागमृतं हंति विषं संसारसंज्ञकम् ॥५७॥ इति नत्वा पठेत्स्तोत्रं सद्यः प्रत्ययकारकम् । ओम् नमस्ते नाथ भगवन् शिवाय गुरुरूपिणे ॥५८॥ सूर्य, शिवा ओर शिव की पूजा करे । यदि मध्य में शिव की अर्चा करे तब रवि, गणेश, हरि और शिवा की चारों ओर पूजा करे । मध्य में यदि शिवा की पूजा हो तो चारों ओर शिव, गणेश, सूर्य और विष्णु की पूजा होनी चाहिए। मध्य में गणेश की पूजा होने पर शिव, शिवा, सूर्य और विष्णु के बाह्य भाग की पूजा हो । रवि को मध्य में रख कर पूजा करने पर गणेश, विष्णु, पार्वती और शिव को बाह्य भाग में स्थापित कर अर्चना करनी चाहिए ॥४४-४६॥ इस प्रकार विज्ञ शिष्य प्रति दिन ब्राह्म मुहूर्त्त में उठ कर पंच देवों की पूजा करे । आवश्यक कार्यों से निवृत्त होकर निश्चन्त भाव से शय्या पर बैठे बैठे अपने शिर में सहस्र दल वाले श्वेत कमल की कर्णिका में स्थित चन्द्रमण्डल में अ. क. थ आदि त्रिकोण में श्रेष्ठ और अभयप्रद गुरु का स्मरण करे, जिनकी दो भुजायें हों और उनके शरीर में श्वेत सुगन्धित पदार्थ का लेप लगा हो और श्वेत माला से शरीर सुशोभित हो, और वाम भाग में शक्ति विराजमान हो । ऐसी मुद्रा में गुरु का ध्यान कर मानसिक उपचार से उनकी पूजा कर पादुका मन्त्र का दश बार जप करे ॥४७-५०॥ वाङ्माया श्री भगेन्द्राढ्या वियद्धंसखकाग्नयः । हसक्ष मलवार्याग्निवामकर्णेन्दुयुग्मरुत् । ततो भृग्वाकाशखाग्निभगेन्द्राढ्याः परंतिमः । सहक्षमलतोयाग्निश्चन्द्र शान्तियुतो मरुत् । ततः श्रीश्वामुकान्ते तु नंदनाथामुकी पुनः देव्यंबान्ते श्रीपादुकां पूजामि हृदन्ते मे ॥५१-५२॥ यह पादुका मन्त्र मनुष्यों को सब प्रकार की सिद्धियां देने वाली है । इस क्रिया के अनन्तर 'गुह्याति गुह्य – इस मन्त्र से मन्त्र का समर्पण कर आगे कहे गये मन्त्रों से नमस्कार करे । ५४॥ मन्त्र 'जिस गुरु ने सब चराचर जगत् में व्याप्त, अखण्ड मण्डलाकार ब्रह्म पद का दर्शन करा दिया उस गुरु को नमस्कार है ॥५५॥ जिस गुरु ने अज्ञान के अन्धकार के कारण कुछ भी न देख सकने वाले शिष्य (लोक) की आंखों में ज्ञान की अञ्जन-शलाका लगाकर खोल दिया (ज्ञान की ज्योति प्रदान की) उस गुरु को नमस्कार है ॥५६॥ उस इष्टदेव स्वरूप गुरु को प्रणाम है जिसकी वाणी रूपी सुधा संसार (माया) रूप विष को नष्ट कर देती है ॥५७॥ इस मन्त्र से गुरु का नमस्कार कर तत्काल श्रद्धा उत्पन्न कर देने वाले अग्रिम स्तोत्र का पाठ करे । स्तोत्र-