बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चषष्टितमोऽध्यायः ५५७ वस्त्रयुग्मेन संवेष्ट्य तस्मिन्सर्वौषधीः क्षिपेत् । नवरत्नानि निक्षिप्य विन्यसेत्पञ्चपल्लवान् ॥३०॥ पनसाम्रवटाश्वत्थबकुलेति च तान् विदुः । मुक्तामाणिक्यवैडूर्यगोमेदान्वज्रविद्रुमौ ॥३१॥ पद्मरागं मरकतं नीलं चेति यथाक्रमम् । एवं रत्नानि निक्षिप्य त्वावाह्यावेष्टदेवताम् ॥३२॥ संपूज्य विधिवन्मंत्री ततः शिष्यं स्वलंकृतम् । वेद्यां संवेश्य संप्रोक्ष्य प्रोक्षणीस्थेन वारिणा ॥३३॥ भूतशुद्ध्यादिकं कृत्वा तच्छरीरे विधानतः । न्यासजालेन संशोध्य मूध्र्नि विन्यस्य पल्लवान् ॥३४॥ अष्टोत्तरशतेनाथ मूलमंत्रेण मंत्रितैः । अभिषिंचेत्प्रियं शिष्यं जपन्मूलमनुं हृदि ॥३५॥ शिष्टोदकेन वाचम्य परिधायांवरं शिशुः । गुरुं प्रणम्य विधिवत्संविशेत्पुरतः शुचिः ॥३६॥ अथ शिष्यस्य शिरसि हस्तं दत्त्वा गुरुस्ततः । जपेदष्टोत्तरशतं देयमन्त्रं विधानतः ॥३७॥ समोऽस्त्वित्यक्षरान्दद्यात्ततः शिष्योऽर्चयेद्गुरुम् । ततः सचन्दनं हस्तं दत्त्वा शिष्यस्य मस्तके ॥३८॥ तत्कर्णे प्रर्वदेद्विद्यामष्टवारं समाहितः । संप्राप्तविद्यः शिष्योऽपि निपतेद्गुरुपादयोः ॥३९॥ उत्तिष्ठ वत्स मुक्तोऽसि सम्यगाचारवान्भव । कीर्तिश्रीकांतिपुत्रायुर्बलारोग्यं सदास्तु ते ॥४०॥ ततः शिष्यः समुत्थाय गन्धाद्यैर्गुरुमर्चयेत् । दद्याच्च दक्षिणां तस्मै वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥४१॥ संप्राप्यैवं गुरोर्मंत्रं तदारभ्य धनादिभिः । देहपुत्रकलत्रैश्च गुरुसेवापरो भवेत् ॥४२॥ स्वेष्टदेवं यजेन्मध्ये दत्त्वा पुष्पांजलिं ततः । अग्निनैर्ऋतिवागीशान् क्रमेण परिपूजयेत् ॥४३॥ कलार्थ कही गई हैं ॥२७-२९॥ उस कलश को दो वस्त्रों से लपेटकर उसमें सर्वोषधि छोड़ दे। फिर उसमें नव रत्नों को डालकर पंच पल्लव छोड़े ॥३०॥ कटहल, आम, वट, पीपल और मौलिश्री को पंच पल्लव कहते हैं। नव रत्नों में मुक्ता, माणिक्य, वैडूर्य, गोमेद, वज्र, विद्रुम, पद्मराग, मरकत और नीलमणि की गणना है॥३१ १/२॥ इस प्रकार नव रत्नों को कलश में छोड़ने के पश्चात् अपने इष्ट देवता का स्मरण करे। मन्त्रदाता गुरु इस प्रकार सर्वतोभद्र मण्डल में आबाहित देवताओं की विधिवत् पूजा करने के अनन्तर आभूषण, वस्त्र आदि आदि पहने हुए शिष्य को वेदी पर बैठाये और प्रोक्षणी जल से उसका अभिषेक करे ॥३२-३३॥ विधिपूर्वक भूत शुद्धि आदि करके उसके शरीर को अङ्गन्यास से शुद्ध कर शिर पर पल्लव रखकर मूलमन्त्र का एक सौ आठ बार पाठ कर जल को अभिमन्त्रित करे और उससे अपने प्रिय शिष्य का अभिषेक करे। उस समय गुरु हृदय में मूल मन्त्र का उच्चारण करता रहे ॥३४-३५॥ बचे हुये जल से शिष्य आचमन कर पुनः नवीन वस्त्र धारण करे और विधिपूर्वक गुरु की वन्दना कर सामने ही बैठ जाय ॥३६॥ गुरु शिष्य के सिर पर अपना हाथ रखकर विधिपूर्वक देवमन्त्र को एक सौ आठ बार जपे ॥३७॥ जप के बाद गुरु शिष्य से कहे कि 'समोऽस्तु' अर्थात् मेरे ही समान हो जाओ। फिर शिष्य गुरु की पूजा करे। गुरु अपने चन्दन चर्चित हाथ को शिष्य के मस्तक पर रखकर सावधानी से उसके कान में आठ बार देव मन्त्र को पढ़े। इस भांति विधिपूर्वक मन्त्रदीक्षा प्राप्त कर लेने पर शिष्य गुरु चरणों पर शिर रख दे ॥३८-३९॥ गुरु-वत्स, उठो, तुम मुक्त हो गये। भली-भांति आचार का पालन करो। तुमको कीर्ति, श्री, कान्ति पुत्र, आयु, बल और आरोग्य सदा मिलें। यह कह कर आशीर्वाद दे ॥४०॥ गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करने के अनन्तर शिष्य उठकर गन्ध आदि से गुरु की पूजा करे, और उदार हो कर गुरु दक्षिणा दे ॥४१॥ इस प्रकार गुरु से मन्त्र प्राप्त कर लेने पर उस दिन से धन आदि और अपने परिवार के द्वारा गुरु सेवा में तत्पर रहे ॥४२॥ प्रति दिन अपने इष्ट देव की पूजा करे पुष्पांजलि दे और फिर क्रमशः अग्नि, नैऋति और वागीश की पूजा करे ॥४३॥ जब मध्य में विष्णु की पूजा करे तब उनके चारों ओर विनायक, १. पंच पल्लव में मतभेद है-आम, पीपल, गूलर, पाकड़ी और बरगद को पंच पल्लव कहते हैं।