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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 575, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 575

५५६ नारदीयपुराणम् तत्सुसिद्धप्राप्तिमात्रात्सुसिद्धारिःकुटुम्बहृत् । अरिसिद्धस्तु पुत्रघ्नोऽरिसाध्यः कन्यकापहः ॥१५॥ तत्सुसिद्धः कलत्रघ्नः साधकघ्नोऽप्यरः स्मृतः। अन्येऽप्यत्र प्रकारा हि संति वै बहवो मुने ॥१६॥ सर्वेषु मुख्योऽयं तेऽत्र कथितोऽकथहाभिधः । एवं संशोध्य मंत्रं तु शुद्धे काले स्थले तथा ॥१७॥ दीक्षयेच्च गुरुः शिष्यं तद्विधानमुदीर्यते । नित्यकृत्यं विधायैाथ प्रणम्य गुरुपादुकाम् ॥१८॥ प्रार्थयेत्सद्गुरुं भक्त्याभीष्टमंत्रार्थमादृतः । संपुज्य वस्त्रालंकारगोहिरण्यधरादिभिः ॥१९॥ कृत्वा स्वस्ति विधानं तु मंडलादि च तुष्टिमन्। गुरुः शिष्येण सहितः शुचिर्यागमृहं विशेत् ॥२०॥ सामान्यार्घोदकेनाथ संप्रोक्ष्य द्वारमन्त्रतः । दिव्यान्उत्सारयेद्विघ्नान्नभस्थानर्च्य वारिणा ॥२१॥ पार्षिणघातैस्त्रिभिर्भौमांस्ततः कर्मसमाचरेत् । वर्णकैः सर्वतोभद्रे यथोक्तपरिकल्पिते ॥२२॥ वह्निमण्डलमभ्यर्च्य तत्कलाः परिपूज्य च । अस्त्रप्रक्षालितं कुंभं यथाशक्ति विनिर्मितम् ॥२३॥ तत्र संस्थाप्य विधिवत्तत्र भानोः कलां यजेत् । विलोममातृकामूलमुच्चरन् शुद्धवारिणा ॥२४॥ आपूर्य कुंभं तत्रार्चेत्सोमस्य विधिवत्कलाः । धूम्रार्चिरूष्मा ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिगिनी ॥२५॥ सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यकव्यवाहा तथा । वह्ने र्दश कलाः प्रोक्ताः प्रोच्यंतेऽथ रवेः कलाः ॥२६॥ तपिनो तापिनो धूम्रा मरीचिज्ज्वलिनी रुचिः । सुषुम्णा भोगदा विश्वा बोधिनी धारिणी क्षमा ॥२७॥ अथेन्दोश्च कला ज्ञेया ह्यमृता मानदा पुनः । पूषा तुष्टिश्च पुष्टिश्च रतिश्च धृतिसंज्ञिकाः ॥२८॥ शशिनी चंद्रिका कांतिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरंगदा । पूर्णामूर्णामृता चेति प्रोक्ताश्चंद्रमसः कलाः ॥२६॥


नाश करता है। अरिसिद्ध पुत्रनाशक है तथा अरिसाध्य कन्या का नाश करने वाला होता है ॥१५॥ अरिसुसिद्ध स्त्री का नाश करता है और अरिअरि मन्त्र साधक का ही नाश करने वाला माना गया है। मुने ! यहाँ मन्त्र शोधन के और भी बहुत से प्रकार हैं, किन्तु यह अकथह नामक चक्र सब में प्रधान है; इसलिए यही तुम्हें बताया गया है ॥१६३॥ इस प्रकार मन्त्र का भलीभाँति शोधन करके शुद्ध समय और पवित्र स्थान में गुरु शिष्य को दीक्षा दे । अब दीक्षा का विधान बताया जाता है ॥१७॥ प्रातःकाल नित्यकर्म करके पहले गुरुचरणों की पादुका को प्रणाम करे । तत्पश्चात् आदरपूर्वक वस्त्र आदि के द्वारा भक्तिभाव से सद्गुरु की पूजा करके उनसे अभीष्ट मन्त्र के लिए प्रार्थना करे ॥१८३॥ तदनन्तर गुरु संतुष्टचित्त हो स्वस्तिवाचनपूर्वक मंडल आदि विधान करके शिष्य के साथ पवित्र हो यज्ञमंडप में प्रवेश करें ॥१९-२०॥ फिर सामान्य अर्घ्य-जल से द्वार का अभिषेक करके अस्त्रमंत्रों से दिव्य विघ्नों का निवारण करे; इसके बाद आकाश में स्थित विघ्नों का जल से पूजन करके निराकरण करे । भूमिसम्बन्धी विघ्नों को तीन बार पाणि (एडी) के आघात से ताली बजाकर हटाये । तत्पश्चात् कार्य प्रारंभ करे ॥२१॥ भिन्न-भिन्न रंगों द्वारा शास्त्रोक्त विधि से सर्वतोभद्रमण्डल की रचना करके उसमें वह्निमण्डल और उसकी कलाओं का पूजन करे । तत्पश्चात् अस्त्र-मंत्र का उच्चारण करके धोये हुए यथाशक्ति-निर्मित कलश की वहाँ विधिपूर्वक स्थापना करके सूर्य की कला का यजन करे । ॥२२-२३३॥ विलोममातृका मूल मंत्र का उच्चारण कर उस कलश को शुद्ध जल से परिपूर्ण कर उसमें सोम की कला को अर्चना करे ॥२४३॥ धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वलिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, सुश्री, सुरूपा, कपिला, हव्यवाहा तथा कव्यवाहा ये दश अग्नि की कलायें हैं। इसके अनन्तर सूर्य की कलाओं का वर्णन कर रहा हूँ ॥२५-२६॥ तपिनो, तापिनी, धूम्रा, मरीचिज्ज्वालिनी, रुचि, सुषुम्णा, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी और क्षमा सूर्य की कलायें हैं। अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्ति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्णा, और पूर्णामृता इतनी चन्द्रमा की