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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 574, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 574

तृतीयार्थे तृतीयं स्याच्चतुर्थांशे तुरीयकम् । तत्तदाग्नेयकोष्ठेषु तत्तत्पंचममक्षरम् ॥३॥ विलिख्य क्रमतो धीमान्म्रनुं संशाधयेत्ततः । नामाद्यक्षरमारभ्य यावन्मन्त्रादि वर्णकम् ॥४॥ चतुष्के यत्र नामार्णस्तत्स्यात्सिद्धचतुष्ककम् । प्रादक्षिण्यात्तद्वितीयं साध्याख्यं परिकीर्तितम् ॥५॥ तृतीयं पुंसि सिद्धाख्यं तुरीयमरिसंज्ञकम् । द्वयोर्वर्णविककोष्ठे सिद्धसिद्धेति तन्मतम् ॥६॥ तद्वितीये तु मंत्रार्णे सिद्धसाध्यः प्रकीर्तितः । तृतीये तत्सुसिद्धःस्यात्सिद्धा रस्तच्चतुर्थके ॥७॥ नामार्णान्यचतुष्कात्तु द्वितीये मंत्रवर्णके । चतुष्के चेत्तदा पूर्वं यत्र नामाक्षरं स्थितम् ॥८॥ तत्र तत्कोष्ठमारभ्य गणयेत्पूर्ववत्क्रमात् । साध्यसिद्धः साध्यसाध्यस्तत्सुसिद्धश्च तद्रिपुः ॥६॥ तृतीये चेच्चतुष्के तु यदि स्यान्मंत्रवर्णकः । तदा पूर्वोक्तरीत्या तु क्रमाद्वेयं मनीषिभिः ॥१०॥ सुसिद्धसिद्धस्तत्साध्यस्तत्सुसिद्धश्च तद्रिपुः । तुरीये चेच्चतुष्के तु तद्वैवं गणयेत्सुधीः ॥११॥ अरिसिद्धोऽरिसाध्यश्च तत्सुसिद्धश्च तद्रिपुः । सिद्धसिद्धो यथोक्तेन द्विगुणात्सिद्धसाध्यकः ॥१२॥ सिद्धः सुसिद्धोऽर्द्धतयात्सिद्धा रिर्हन्ति गोत्रजान् । द्विगुणात्साध्यसिद्धस्तु साध्यसाध्यो विलंबतः ॥१३॥ साध्यः सुसिद्धो द्विगुणात्साध्यारिर्हन्ति बांधवान् । सुसिद्धसिद्धोऽर्द्धतया तत्साध्यो द्विगुणाज्जपात् ॥१४॥ ॥२॥ (इसी क्रम से आगे की संख्यायें भी लिख ले ।) प्रथम कोष्ठ में 'अ' लिखकर उसके आग्नेय कोण में उससे पाँचवां अक्षर लिखे ॥३॥ इस प्रकार सभी कोष्ठों में क्रमशः अक्षरों को लिखकर बुद्धिमान् पुरुष मन्त्र का संशोधन करे । साधक के नाम का आदि अक्षर जिस कोष्ठ में हो, वहाँ से लेकर जहाँ मन्त्र का आदि अक्षर हो उस कोष्ठ तक प्रदक्षिणाक्रम से गिनना चाहिए । यदि उसी चौक में मन्त्र का आदि अक्षर हो, जिसमें नाम का आदि अक्षर है तो वह 'सिद्ध चौक' कहा जाएगा ॥४॥ उससे प्रदक्षिणाक्रम से गिनने पर यदि द्वितीय चौक में मन्त्र का आदि अक्षर हो तो वह साध्य कहा गया । इसी प्रकार तीसरा चौक सुसिद्ध और चौथा चौक अरि नाम से प्रसिद्ध है । यदि साधक के नाम संबंधी और मन्त्र संबंधी आदि अक्षर प्रथम चौक के पहले ही कोष्ठ में पड़े हों तो वह मन्त्र 'सिद्धसिद्ध' माना गया है ॥५-६॥ यदि मन्त्रवर्ण प्रथम चौक के द्वितीय कोष्ठ में पड़ा हो तो वह सिद्धसाध्य कहा गया है । प्रथम के तृतीय कोष्ठ में हो तो सिद्धसुसिद्ध होगा और चौथे में हो तो सिद्धारि कहलाएगा ॥७॥ नामा- क्षरयुक्त चौक से दूसरे चौक में यदि मन्त्र का अक्षर हो तो पहले जहाँ नाम का अक्षर था वहाँ के उस कोष्ठ से आरंभ करके क्रमशः पूर्ववत् गणना करे । द्वितीय चौक के प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ कोष्ठ में मन्त्राक्षर होने पर उसकी क्रमशः साध्यसिद्ध, साध्यसाध्य, साध्यसुसिद्ध तथा साध्य आदि संज्ञा होगी ॥८-९॥ तीसरे चौक में मंत्र का अक्षर हो तो मनीषी पुरुषों को पूर्वोक्त रीति से गणना करनी चाहिए । तृतीय चौक के प्रथम आदि कोष्ठों के अनुसार क्रमशः उस मन्त्र की सुसिद्धसिद्ध, सुसिद्धसाध्य, सुसिद्धसुसिद्ध तथा सुसिद्ध अरि संज्ञा होगी ॥१०॥ यदि चौथे चौक में मन्त्राक्षर हो तो भी विद्वान् पुरुष इसी प्रकार गणना करे । चतुर्थ चौक के प्रथम आदि कोष्ठों के अनुसार उस मन्त्र की अरिसिद्ध, अरिसाध्य, अरिसुसिद्ध तथा अरिअरि यह संज्ञा होगी ॥११॥ सिद्धसिद्ध मंत्र शास्त्रोक्त विधि से उतनी ही संख्या में जप करने पर सिद्ध हो जाएगा । परंतु सिद्धसाध्य मन्त्र दूनी संख्या में जप करने से सिद्ध होगा । सिद्धसुसिद्ध मन्त्र शास्त्रोक्त संख्या से आधा जप करने पर ही सिद्ध हो जाएगा । परंतु सिद्धारि मन्त्र कुटुंबी जनों का नाश करता है । साध्यसिद्ध मन्त्र दूनी संख्या में जप करने से सिद्ध होता है । साध्य- साध्य मन्त्र बहुत विलंब से सिद्ध होता है ॥१२-१३॥ साध्यसुसिद्ध भी द्विगुण जप से सिद्ध होता है; किन्तु साध्यारि मन्त्र बंधु-बांधवों का हनन करता है । सुसिद्धसिद्ध आधे ही जप से सिद्ध होता है । सुसिद्धसाध्य द्विगुण जप से सिद्ध होता है ॥१४॥ सुसिद्धसुसिद्ध मन्त्र प्राप्त होते ही सिद्ध हो जाता है और सुसिद्धारि मन्त्र सारे कुटुंब का