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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 573

५५४ नारदीयपुराणम् सुंदरः सुमुखः शांतः कुलीनः सुलभो वशी । मंत्रतंत्रार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहक्षमः ॥६५॥ निरपेक्षो मुनिर्दांतो हितवादी विचक्षणः । तत्त्वनिष्कासने दक्षो विनयी च सुवेषवान् ॥६६॥ आश्रमी ध्याननिरतः संशयच्छित्सुबुद्धिमान् । नित्यानुष्ठानसंयुक्तस्तवाचार्यः परिकीर्तितः ॥६७॥ शांतो विनीतः शुद्धात्मा सर्वलक्षणसंयुतः । शमादिसाधनोपेतः श्रद्धालुः सुस्थिराशयः ॥६८॥ शुद्धदेहोऽन्नपानाद्यैर्धार्मिकः शुद्धमानसः । दृढव्रतसमाचारः कृतज्ञः पापभीरुकः ॥६९॥ गुरुध्यानस्तुतिकथासेवनासक्तमानसः । एवंविधो भवेच्छिष्यस्त्वन्यथा गुरुदुःखदः ॥७०॥ इतिश्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥६४॥

अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच परीक्ष्य शिष्यं तु गुरुर्मंत्रशोधनमाचरेत् । प्राक्प्रत्यग्दक्षिणोदक्च पंचसूत्राणि पातयेत् ॥१॥ चतुष्टयं चतुष्कानां स्यादेवं नृपकोष्ठके । तत्राद्यप्रथमे त्वाद्यं द्वितीयाद्ये द्वितीयकम् ॥२॥

गुरु की आज्ञा में लीन रहने वाला, श्रीमान्, अभिषेक (स्नान) से युक्त, सुन्दर, सुमुख, शान्त, कुलीन, सुलभ, जितेन्द्रिय, मन्त्र और तन्त्रों का तत्त्वज्ञ, यथोचित निग्रह (दण्ड) और अनुग्रह (कृपा) करनेवाला, निरपेक्ष, मननशील, दान्त, हितवादी, विद्वान्, तत्त्व निकालने में या तत्त्व निर्णय में कुशल, विनयी, सुवेष, वर्णाश्रमी, ध्यान-निरत, सन्देहों को स्वयं मिटाने वाला, सुबुद्धिमान्, नित्य अनुष्ठान में लगा रहने वाला, पुरुष ही आचार्य बनने योग्य है ॥६४-६७॥ और अन्नपानादि से शुद्ध देह वाला, शान्त, विनीत, शुद्धात्मा, सब लक्षणों से सम्पन्न, शम, दम आदि साधनों से युक्त, श्रद्धालु, स्थिर चित्तवृत्ति वाला, खान-पान शुद्ध रखने वाला, धार्मिक, शुद्धचित्त, व्रत और आचार पालन में दृढ़, कृतज्ञ, पापों से डरने वाला और गुरु का ध्यान, स्तुति और कथा श्रवण में रमने वाला व्यक्ति ही शिष्य होने योग्य है अन्यथा विपरीत आचरण करने वाला केवल गुरु को दुख देने वाला है, शिष्य नहीं । ॥६८-७०॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में चौसठवां अध्याय समाप्त । ॥६४॥

अध्याय ६५ मन्त्रजपविधिकथन सनत्कुमार ने कहा- गुरु शिष्य की विधिवत् परीक्षा लेकर मन्त्र शोधन कार्य करे। पूर्व से पश्चिम और दक्षिण से उत्तर (रंग में डुबोये हुए) पांच-पांच सूत गिराये (तात्पर्य यह है कि पांच खड़ी रेखायें खींचकर उनके ऊपर पांच पड़ी रेखायें खींचे) ॥१॥ इस प्रकार चार-चार कोष्ठों के चार समुदाय बनेंगे। उनमें से पहले चौक के प्रथम कोष्ठ में एक, दूसरे के प्रथम में दो, तीसरे के प्रथम में तीन और चौथे के प्रथम में चार लिखे