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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 580, कुल 1008 में से

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५६१ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ब्रह्मणे षट्सहस्रं तु हंसारूढाय चार्पयेत् । विद्युल्लसितमेघाभे डादिफांतार्णपत्रके ॥८५॥ मणिपूरे शंखचक्रगदापंकजधारिणे । सश्रिये षट्सहस्रं च विष्णवे विनिवेदयेत् ॥८६॥ अनाहतेऽर्कपत्रे च कादिठांतादिसंयुते । शुक्ले शूलाभयवरसुधाकलशधारिणे ॥८७॥ वामांगे भक्तियुक्ताय विद्याधिपतये सुधीः । वृषारूढाय रुद्राय षट्सहस्रं निवेदयेत् ॥८८॥ विशुद्धे षोडशदले स्वराढ्ये शुक्लवर्णके । महाज्योतिप्रकाशाथेन्द्रियाधिपतये ततः ॥८९॥ सहस्रमर्पयेत्प्राणशक्त्या युक्तेश्वराय च । आज्ञाचक्रे हक्षयुक्ते द्विदलेऽब्जे सहस्रकम् ॥९०॥ सदाशिवाय गुरवे पराशक्तियुताय वै । सहस्रारे महापद्मे नादबिन्दुद्वयान्विते ॥९१॥ विलसन्मातृकावर्णे वराभयकराय च । परमाद्ये च गुरवे सहस्रं विनिवेदयेत् ॥९२॥ चुलुकैऽम्बु पुनर्हृत्त्वा स्वभावादेव सिध्यतः । एकविंशतिसाहस्रप्रमितस्य जपस्य च ॥९३॥ षट्‌शताधिकसंख्यास्यादजपाया विभागशः । संकल्पेन मोक्षदाता विष्णुर्मे प्रीयतामिति ॥९४॥ अस्याः संकल्पमात्रेण महापापैः प्रमुच्यते । ब्रह्म वाहं न संसारी नित्यमुक्तो न शोकभाक् ॥९५॥ सच्चिदानंदरूपोऽहमात्मानमिति भावयेत् । ततः समाचरेद्दे हकृत्यं देवार्चनं तथा ॥९६॥ तद्विधानं प्रवक्ष्यामि सदाचारस्य लक्षणम् । इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥६५॥ उसकी प्रभा बिजली से युक्त मेघ के समान है। उसमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले विष्णु लक्ष्मी सहित विराजमान हैं, उन्हें छः हजार जप अर्पण करना चाहिए ॥८४-८६॥ अनाहत चक्र में द्वादशदल कमल विद्यमान है। इसके प्रत्येक दल पर क्रमशः क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ अक्षर अंकित हैं। इसका वर्ण शुभ्र है। उसमें शूल, अभय, वर और अमृत कलश धारण करने वाले वृषभारूढ भगवान् रुद्र विराज रहे हैं। उनके वामाङ्ग भाग में शक्ति पार्वती विद्यमान हैं। ये विद्या के अधिपति हैं। साधक रुद्रदेव को छः हजार जप अर्पण करे ॥८७-८८॥ विशुद्ध चक्र षोडश दल कमल से युक्त है। उसके प्रत्येक दल पर क्रमशः स्वर वर्ण (अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः) अंकित हैं। यह चक्र शुक्ल वर्ण का है। उसमें महा ज्योति से प्रकाशित होने वाले इन्द्रियाधिपति ईश्वर विराजमान हैं, जो प्राण शक्ति से युक्त हैं। उन्हें एक सहस्र जप अर्पण करे। आज्ञाचक्र दो दलों वाला है। उसके दलों में क्रमशः ह और क्ष अंकित हैं। उसमें महाशक्ति न युक्त गुरु सदाशिव विराज- मान हैं। उन्हें एक सहस्र जप अर्पण करे। सहस्रार चक्र में सहस्र दलों से युक्त महापद्म विद्यमान है। उसमें नादविन्दु सहित समस्त मातृकावर्ग विराजमान हैं। उनमें वर और अभययुक्त हाथों वाले परम आदिगुरु को एक सहस्र जप अर्पण करे ॥८९-९२॥ फिर चुल्लू में जल लेकर इस प्रकार कहे- 'स्वभावतः होते रहने वाले इक्कीस हजार छह सौ अजपा जप का पूर्वोक्त रूप से विभागपूर्वक संकल्प करने के कारण मोक्षदाता भगवान् विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।' इस अजपा गायत्री के संकल्प मात्र से मनुष्य बड़े-बड़े पापों से मुक्त हो जाता है। मैं ब्रह्म ही हूँ, संसारी जीव नहीं हूँ। नित्यमुक्त हूँ, शोक मेरा स्पर्श नहीं कर सकता। मैं सच्चिदानन्दस्वरूप हूँ।' इस प्रकार अपने विषय में चिन्तन करे। इसके अनन्तर अपना शारीरिक कार्य और देवार्चन करे। उस देवार्चन को विधि और सदा- चार का लक्षण कहूँगा ॥९३-९७॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग में दीक्षा-दान तथा शिष्य-धर्म-निरूपण नामक पैंसठवां अध्याय समाप्त ॥६५॥ ७१ ना० पु०

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