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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 581

षट्षष्टितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच ततः श्वासानुसारेण दत्त्वा पादं महीतले । समुद्रमेखले देवि पर्वतस्तनमण्डले ॥१॥ विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे । इति भूमिं तु संप्रार्थ्य निहरेच्च यथाविधि ॥२॥ रक्षःकोणे ततो ग्रामाद्गत्वा संत्यनुदीरयेत् । उत्तिष्ठन्तु मनुष्या देवाः पिशाचा ये च गुह्यकाः ॥३॥ पितृभूतगणाः सर्वे करिष्ये मलमोचनम् । इति तालत्रयं दत्त्वा शिरः प्रावृत्य वाससा ॥४॥ दक्षिणाभिमुखं रात्रौ दिवा स्थित्वा ह्युदङ्मुखः । जलं विसृज्य शौचं तु मृदाद्भिः समाचरेत् ॥५॥ एका लिङ्गे गुदे तिस्रो दश वामकरे मृदः । करयोः सप्त वैः दद्यात्त्रित्रिवारं च पादयोः ॥६॥ एवं शौचं विधायाथ गण्डूषांद्वादशैव तु । कृत्वा वनस्पतिं चाथ प्रार्थयेन्मनुनामुना ॥७॥ आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च । श्रियं प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते ॥८॥ संप्रार्थ्यैवं दन्तकाष्ठं द्वादशांगुलसंमितम् । गृहीत्वा काममंत्रेण कुर्यान्मंती समाहितः ॥६॥ कामदेवपदं ङेन्तं तथा सर्वजनप्रियम् । हृदंतः कामबीजाढ्यं दन्तांश्चानेन शोधयेत् ॥१०॥

अध्याय ६६ शौचाचार, स्नान, संध्या, तर्पण आदि का निरूपण सनत्कुमार बोले-प्रातःकाल जो श्वास चलता हो उसी के अनुसार पृथ्वी पर अपना पैर रखें। और हे समुद्ररूपी मेखलावाली देवि, पर्वतरूपी स्तन मण्डल वाली विष्णु-पत्नी, तुमको नमस्कार है, तुम मेरे चरण से स्पर्श करने के अपराध को क्षमा करो ॥१॥ इस प्रकार पृथ्वी की प्रार्थना कर शास्त्रानुकूल दिनचर्या प्रारम्भ करें ॥२॥ शास्त्र ने आचार पालन के विषय में इस प्रकार बतलाया है कि सबसे पहले ग्राम से नैर्ऋत्य कोण की ओर जाकर किसी एकान्त स्थान पर मलत्याग (शौच) करे। मलत्याग के पूर्व यह मन्त्र पढ़े, 'जो ऋषि, देव, पिशाच, गुह्यक, पितृगण या भूतगण हों वे सब यहाँ से अन्यत्र चले जायें। मैं यहाँ मलत्याग करूँगा। इस मन्त्र को पढ़कर तीन तालियां बजावे और वस्त्र से शिर बांध ले ॥३-४॥ रात में दक्षिण ओर और दिन में उत्तर की ओर मुँह करके शौच होना चाहिए। शौच के अनन्तर मिट्टी और जल से मलद्वार स्वच्छ कर लेना चाहिए ॥५॥ लिङ्ग में एक बार, गुदा में तीन बार, बायें हाथ में दश बार और दोनों हाथ में सात बार और दोनों पैरों में तीन बार मिट्टी लगानी चाहिये। इस भाँति पवित्र होकर बारह बार कुल्ला करे और आगे के कहे हुये मन्त्र से वनस्पति की प्रार्थना करे-प्रार्थना मन्त्र, 'वनस्पते, तुम हमको आयु, विद्या, बल, यश, तेज, सन्तति, पशु, धन, श्री, प्रज्ञा और मेधा को प्रदान करो, इस प्रकार मन्त्र पढ़कर बारह अंगुल की दतुअन को काम मन्त्र को पढ़कर सावधानी से करे । (काम मन्त्र-काम देवाय सर्वजन प्रियाय......) इस मन्त्र से दांतों को स्वच्छ करे ॥६-१०॥

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 581, कुल 1008 में से · BharatKosha