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भारतकोश
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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

५६० नारदीयपुराणम् त्रैलोक्यचैतन्यमयादिदेव श्रीनाथ विष्णो भवदाज्ञयैव । प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थं संसारयात्रां त्वनुवर्तयिष्ये ॥७४॥ विष्णोरिति स्थले विप्र कार्यं ऊहोऽन्यदैवते । ततः कुर्यात्सर्वसिद्धयै त्वजपाया निवेदनम् ॥७५॥ षट्शतानि दिवा रात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः । अजपाख्यां तु गायत्रीं जीवो जपति सर्वदा ॥७६॥ ऋषिर्हंसस्तथाव्यक्तगायत्रीछंद ईरितम् । देवता परमो हंसश्चाद्यंते बीजशक्तिकम् ॥७७॥ ततः षडंगं कुर्वीत सूर्यः सोमो निरंजनः । निराभासश्च धर्मश्च ज्ञानं चेति तथा पुनः ॥७८॥ क्रमादेतान्हंसपूर्वानात्मनेपदपश्चिमान् । जातयुक्तान्साधकेंद्र षडंगेषु नियोजयेत् ॥७९॥ हकारः सूर्यसंकाशतेजाः संगच्छते बहिः । सकारस्तादृशश्चैव प्रवेशे ध्यानमीरितम् ॥८०॥ एवं ध्यात्वार्पयेद्धीमान्हृच्चक्रेषु विभागशः । मूलाधारे वादिसान्तबीजयुक्ते चतुर्दले ॥८१॥ बंधूकाभे स्वशक्त्या तु सहितापास्तवागय च । पाशांकुशसुधापात्रमोदकोल्लासपाणये ॥८२॥ षट्शतं तु गणेशाय वागधीशाय चार्पयेत् । स्वाधिष्ठाने विद्रुमाभे बादिलांतांणसंयुते ॥८३॥ वामांगशक्तियुक्ताय विद्याधिपतये तथा । स्रुवाक्षमालाकलसितबाहवे पद्मजन्मने ॥८४॥ भावित करे ॥७१-७२॥ फिर उस कुण्डलिनी को यथा स्थान ले जाकर हृदय प्रदेश में इष्ट देव का चिन्तन करे और हृदय में उस चिन्मय देव की कल्पित मानसिक सामग्रियों से पूजा करे और इस मन्त्र से प्रार्थना करे-- 'त्रिलोकी के चैतन्यस्वरूप ! आदि देव, श्रीनाथ, विष्णो, आपकी आज्ञा से ही प्रातःकाल उठकर तुम्हें प्रसन्न करने के लिये ही सांसारिक कार्यों को कर रहा हूँ।' ॥७३-७४॥ विप्र, ! यदि दूसरे देवता का मन्त्र लेना हो तो पूर्वोक्त मन्त्र में 'विष्णोः' आदि के स्थान में ऊहापोह द्वारा उसके वाचक शब्द या नाम का प्रयोग करना चाहिए । तदनन्तर समस्त सिद्धि के लिये 'अजपा' जप निवेदित करना चाहिए ॥७५॥ दिन-रात में जीव इक्कीस हजार छः सौ (२१६००) बार अजपा नामक गायत्री का जप सदा करता है ॥७६॥ (इस अजपा मंत्र के) ऋषि हंस हैं, अव्यक्त गायत्री छन्द कहा गया है देवता परमहंस हैं। आदि (हं) बीज और अन्त (सः) शक्ति है । तदनन्तर षडंगन्यास करे । सूर्य, सोम, निरंजन, निराभास, धर्म और ज्ञान—ये छह अंग हैं ॥७७-७८॥ क्रमशः इनके पूर्व में 'हंसः' और अन्त में आत्मनेपद जोड़कर श्रेष्ठ साधक इनका छह अंगों में न्यास करे । (हंसः सूर्यात्मने हृदयाय नमः । हंसःसोमात्मने शिरसे स्वाहा । हंसो निरंजनात्मने शिखायै वषट् । हंसो निराभासात्मने कवचाय हुम् । हंसो धर्मात्मने नेत्राभ्यां वौषट् । हंसो ज्ञानात्मने अस्त्राय फट् ।) हकार सूर्य के समान तेजस्वी होकर शरीर से बाहर निकलता है, और सकार वैसे ही तेजस्वी रूप से प्रवेश करता है । इस प्रकार हकार और सकार का ध्यान कहा गया है ॥७९-८०॥ इस प्रकार ध्यान करके बुद्धि- मान् पुरुष अग्नि और सूर्य मण्डल में विभागपूर्वक जप अर्पण करे । मूलाधार में चार दलों का कमल है, जो बन्धूक पुष्प के समान लाल है । उसके चारों दलों में क्रमशः व, श, ष, स ये अक्षर अंकित हैं। उसमें अपनी शक्ति के साथ गणेश जी विराजमान हैं। वे अपने चारों हाथों में पाश, अंकुश, अमृतपात्र तथा लड्डू लेकर प्रसन्न हैं ॥८१-८२॥ ऐसे वाक्पति गणेश जी को ६०० जप अपूर्ण करे । स्वाधिष्ठान चक्र में छः दलों का कमल है । वह चक्र मूँगे के समान कांति युक्त है । उसके छः दलों में क्रमशः ब. भ. म. य. र. ल—ये अक्षर अंकित हैं ॥८३॥ उसमें विद्या के अधिपति ब्रह्मा जी हंस पर आरूढ होकर विराजमान हैं; उनके वामभाग में ब्राह्मी शक्ति हैं; उनके हाथों में स्रुवा और अक्षमाला हैं । ऐसे ब्रह्मा को छः हजार जप अर्पित करे । मणिपूर चक्र में दस दल वाला कमल विद्यमान है । उसके प्रत्येक दल पर क्रमशः ड. ढ. ण. त. थ. द. ध. न. प. फ--ये अक्षर अंकित हैं।

५६१ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ब्रह्मणे षट्सहस्रं तु हंसारूढाय चार्पयेत् । विद्युल्लसितमेघाभे डादिफांतार्णपत्रके ॥८५॥ मणिपूरे शंखचक्रगदापंकजधारिणे । सश्रिये षट्सहस्रं च विष्णवे विनिवेदयेत् ॥८६॥ अनाहतेऽर्कपत्रे च कादिठांतादिसंयुते । शुक्ले शूलाभयवरसुधाकलशधारिणे ॥८७॥ वामांगे भक्तियुक्ताय विद्याधिपतये सुधीः । वृषारूढाय रुद्राय षट्सहस्रं निवेदयेत् ॥८८॥ विशुद्धे षोडशदले स्वराढ्ये शुक्लवर्णके । महाज्योतिप्रकाशाथेन्द्रियाधिपतये ततः ॥८९॥ सहस्रमर्पयेत्प्राणशक्त्या युक्तेश्वराय च । आज्ञाचक्रे हक्षयुक्ते द्विदलेऽब्जे सहस्रकम् ॥९०॥ सदाशिवाय गुरवे पराशक्तियुताय वै । सहस्रारे महापद्मे नादबिन्दुद्वयान्विते ॥९१॥ विलसन्मातृकावर्णे वराभयकराय च । परमाद्ये च गुरवे सहस्रं विनिवेदयेत् ॥९२॥ चुलुकैऽम्बु पुनर्हृत्त्वा स्वभावादेव सिध्यतः । एकविंशतिसाहस्रप्रमितस्य जपस्य च ॥९३॥ षट्‌शताधिकसंख्यास्यादजपाया विभागशः । संकल्पेन मोक्षदाता विष्णुर्मे प्रीयतामिति ॥९४॥ अस्याः संकल्पमात्रेण महापापैः प्रमुच्यते । ब्रह्म वाहं न संसारी नित्यमुक्तो न शोकभाक् ॥९५॥ सच्चिदानंदरूपोऽहमात्मानमिति भावयेत् । ततः समाचरेद्दे हकृत्यं देवार्चनं तथा ॥९६॥ तद्विधानं प्रवक्ष्यामि सदाचारस्य लक्षणम् । इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥६५॥ उसकी प्रभा बिजली से युक्त मेघ के समान है। उसमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले विष्णु लक्ष्मी सहित विराजमान हैं, उन्हें छः हजार जप अर्पण करना चाहिए ॥८४-८६॥ अनाहत चक्र में द्वादशदल कमल विद्यमान है। इसके प्रत्येक दल पर क्रमशः क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ अक्षर अंकित हैं। इसका वर्ण शुभ्र है। उसमें शूल, अभय, वर और अमृत कलश धारण करने वाले वृषभारूढ भगवान् रुद्र विराज रहे हैं। उनके वामाङ्ग भाग में शक्ति पार्वती विद्यमान हैं। ये विद्या के अधिपति हैं। साधक रुद्रदेव को छः हजार जप अर्पण करे ॥८७-८८॥ विशुद्ध चक्र षोडश दल कमल से युक्त है। उसके प्रत्येक दल पर क्रमशः स्वर वर्ण (अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः) अंकित हैं। यह चक्र शुक्ल वर्ण का है। उसमें महा ज्योति से प्रकाशित होने वाले इन्द्रियाधिपति ईश्वर विराजमान हैं, जो प्राण शक्ति से युक्त हैं। उन्हें एक सहस्र जप अर्पण करे। आज्ञाचक्र दो दलों वाला है। उसके दलों में क्रमशः ह और क्ष अंकित हैं। उसमें महाशक्ति न युक्त गुरु सदाशिव विराज- मान हैं। उन्हें एक सहस्र जप अर्पण करे। सहस्रार चक्र में सहस्र दलों से युक्त महापद्म विद्यमान है। उसमें नादविन्दु सहित समस्त मातृकावर्ग विराजमान हैं। उनमें वर और अभययुक्त हाथों वाले परम आदिगुरु को एक सहस्र जप अर्पण करे ॥८९-९२॥ फिर चुल्लू में जल लेकर इस प्रकार कहे- 'स्वभावतः होते रहने वाले इक्कीस हजार छह सौ अजपा जप का पूर्वोक्त रूप से विभागपूर्वक संकल्प करने के कारण मोक्षदाता भगवान् विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।' इस अजपा गायत्री के संकल्प मात्र से मनुष्य बड़े-बड़े पापों से मुक्त हो जाता है। मैं ब्रह्म ही हूँ, संसारी जीव नहीं हूँ। नित्यमुक्त हूँ, शोक मेरा स्पर्श नहीं कर सकता। मैं सच्चिदानन्दस्वरूप हूँ।' इस प्रकार अपने विषय में चिन्तन करे। इसके अनन्तर अपना शारीरिक कार्य और देवार्चन करे। उस देवार्चन को विधि और सदा- चार का लक्षण कहूँगा ॥९३-९७॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग में दीक्षा-दान तथा शिष्य-धर्म-निरूपण नामक पैंसठवां अध्याय समाप्त ॥६५॥ ७१ ना० पु०

षट्षष्टितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच ततः श्वासानुसारेण दत्त्वा पादं महीतले । समुद्रमेखले देवि पर्वतस्तनमण्डले ॥१॥ विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे । इति भूमिं तु संप्रार्थ्य निहरेच्च यथाविधि ॥२॥ रक्षःकोणे ततो ग्रामाद्गत्वा संत्यनुदीरयेत् । उत्तिष्ठन्तु मनुष्या देवाः पिशाचा ये च गुह्यकाः ॥३॥ पितृभूतगणाः सर्वे करिष्ये मलमोचनम् । इति तालत्रयं दत्त्वा शिरः प्रावृत्य वाससा ॥४॥ दक्षिणाभिमुखं रात्रौ दिवा स्थित्वा ह्युदङ्मुखः । जलं विसृज्य शौचं तु मृदाद्भिः समाचरेत् ॥५॥ एका लिङ्गे गुदे तिस्रो दश वामकरे मृदः । करयोः सप्त वैः दद्यात्त्रित्रिवारं च पादयोः ॥६॥ एवं शौचं विधायाथ गण्डूषांद्वादशैव तु । कृत्वा वनस्पतिं चाथ प्रार्थयेन्मनुनामुना ॥७॥ आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च । श्रियं प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते ॥८॥ संप्रार्थ्यैवं दन्तकाष्ठं द्वादशांगुलसंमितम् । गृहीत्वा काममंत्रेण कुर्यान्मंती समाहितः ॥६॥ कामदेवपदं ङेन्तं तथा सर्वजनप्रियम् । हृदंतः कामबीजाढ्यं दन्तांश्चानेन शोधयेत् ॥१०॥

अध्याय ६६ शौचाचार, स्नान, संध्या, तर्पण आदि का निरूपण सनत्कुमार बोले-प्रातःकाल जो श्वास चलता हो उसी के अनुसार पृथ्वी पर अपना पैर रखें। और हे समुद्ररूपी मेखलावाली देवि, पर्वतरूपी स्तन मण्डल वाली विष्णु-पत्नी, तुमको नमस्कार है, तुम मेरे चरण से स्पर्श करने के अपराध को क्षमा करो ॥१॥ इस प्रकार पृथ्वी की प्रार्थना कर शास्त्रानुकूल दिनचर्या प्रारम्भ करें ॥२॥ शास्त्र ने आचार पालन के विषय में इस प्रकार बतलाया है कि सबसे पहले ग्राम से नैर्ऋत्य कोण की ओर जाकर किसी एकान्त स्थान पर मलत्याग (शौच) करे। मलत्याग के पूर्व यह मन्त्र पढ़े, 'जो ऋषि, देव, पिशाच, गुह्यक, पितृगण या भूतगण हों वे सब यहाँ से अन्यत्र चले जायें। मैं यहाँ मलत्याग करूँगा। इस मन्त्र को पढ़कर तीन तालियां बजावे और वस्त्र से शिर बांध ले ॥३-४॥ रात में दक्षिण ओर और दिन में उत्तर की ओर मुँह करके शौच होना चाहिए। शौच के अनन्तर मिट्टी और जल से मलद्वार स्वच्छ कर लेना चाहिए ॥५॥ लिङ्ग में एक बार, गुदा में तीन बार, बायें हाथ में दश बार और दोनों हाथ में सात बार और दोनों पैरों में तीन बार मिट्टी लगानी चाहिये। इस भाँति पवित्र होकर बारह बार कुल्ला करे और आगे के कहे हुये मन्त्र से वनस्पति की प्रार्थना करे-प्रार्थना मन्त्र, 'वनस्पते, तुम हमको आयु, विद्या, बल, यश, तेज, सन्तति, पशु, धन, श्री, प्रज्ञा और मेधा को प्रदान करो, इस प्रकार मन्त्र पढ़कर बारह अंगुल की दतुअन को काम मन्त्र को पढ़कर सावधानी से करे । (काम मन्त्र-काम देवाय सर्वजन प्रियाय......) इस मन्त्र से दांतों को स्वच्छ करे ॥६-१०॥

षट्षष्टितमोऽध्यायः ५६३

जिह्वोल्लेखो वाग्भवेन मूलेन क्षालयेन्मुखम् । देवागारं ततो गत्वा निर्माल्यमपसार्य च ॥११॥ परिधायाम्बरं शुद्धं मंगलात्तिकं चरेत् । अस्त्रेण पात्रं संप्रोक्ष्य मूलेन ज्वालयेच्च तम् ॥१२॥ संपूज्य पात्राणादायापोत्थाय घंटां च वादयेत् । सुगोघृतप्रदीपेन भ्रामितेन समंततः ॥१३॥ वाद्यैर्गीतैर्मनोज्ञैश्च देवस्यारातिकं भवेत् । इति नीराजनं कृत्वा प्रार्थयित्वा निजेश्वरम् ॥१४॥ स्नातुं यायान्निम्नगादौ कीर्तयन्देवतागुणान् । गत्वा तीर्थं नमस्कृत्य स्नानीयं च निधाय वै ॥१५॥ मूलाभिमंत्रितमृदमादाय कटिदेशतः । विलिप्य पादपर्यंतं क्षालयेत्तीर्थवारिणा ॥१६॥ ततश्च पञ्चभिः पादौ प्रक्षाल्यांतर्जले पुनः । प्रविश्य नाभिमात्रे तु मृदं वामकरस्य च ॥१७॥ मणिबन्धे हस्ततले तदग्रे च तथा पुनः । कृत्वांगुल्या गांगमृदमादायास्त्रेण तत्पुनः ॥१८॥ निजोपरि च मंत्रज्ञो भ्रामयित्वा त्यजेत्सुधीः । तलस्थां च षडंगेषु तन्मंत्रैः प्रविलेपयेत् ॥१९॥ निमज्ज्य क्षालयेत्सम्यग् मलस्नानमितीरितम् । विभाव्येष्टमयं सर्वमेतन्मत्रं स्नानमाचरेत् ॥२०॥ अनंतादित्यसंकाशं निजभूषायुधैर्युतम् । मंत्रमूर्तिं प्रभुं स्मृत्वा तत्पादोदकसंभवाम् ॥२१॥ धारां च ब्रह्मरंध्रेण प्रविशंतीं निजां तनुम् । तथा संक्षालयेत्सर्वमंतर्देहगतं मलम् ॥२२॥ तत्क्षणाद्विरजा मंत्री जायते स्फटिकोपमः । ततः श्रौतोक्तविधिना स्नात्वा मन्त्री समाहितः ॥२३॥

जीभ को वाग्भव मन्त्र से और मूल मन्त्र से मुंह को धोये। स्वयं इस प्रकार शुद्ध होकर देव मन्दिर में जाय और पहले की चढ़ी हुई पूजा सामग्री (फूल, अक्षत आदि) को दूर हटा दे। फिर स्वच्छ वस्त्र पहन कर मंगला' आरती करे। मंगला आरती की विधि—अस्त्राय फट् कह कर पात्र पर जल छिड़के, मूल मन्त्र से उस दीपक को जला दे। पात्र को पूजा कर उसको हाथ में ले ले और घंटी बजाने लगे या दूसरों को बजाने के लिए कहें। शुद्ध गोघृत के दीपक को चारों ओर घुमा कर देव की आरती करे। उस समय मनोहर गीत और बाजे बजने चाहिए। आरती के अनन्तर नीराजन कर अपने इष्ट देव की प्रार्थना कर देवता के गुणों का कीर्तन करते हुये नदी या सरोवर आदि की ओर जावे। स्नान तीर्थ (नदी तट) पर जाकर तीर्थ को नमस्कार कर स्नानीय सामग्री को भूमि पर रख दें ॥११-१५॥ मूल मन्त्र से अभिमन्त्रित की हुई मिट्टी को हाथ में लेकर कमर से नीचे पैर तक लगावें फिर उसको जल से धो दें। तदनन्तर पाँच वार पैरों को धोकर कमर तक जल में घुस जाय और बायें हाथ के मणिवन्ध (कलाई), हाथ के तलवे और अंगुलियों पर मिट्टी लगा दें। अपनी अंगुलियों से जल के नीचे की मिट्टी निकाल कर 'अस्त्राय फट्' कह कर उसको अपने चारों ओर घुमाकर उस मिट्टी को स्नान करने वाला वह व्यक्ति फेंक दे। बायें हाथ की मिट्टी को 'अस्त्राय फट्' एवं अन्य मन्त्रों से अपने छहों अंगों में लगावें। फिर जल में डुबकी लगाकर अपने अंगों को मल मल कर धो डालें। स्नान के समय उस जल में सब इष्ट माताओं का ध्यान अवश्य करना चाहिए। यही स्नान की विधि है ॥१६-२०॥

अनन्त सूर्य के समान कान्तिमान्, अपने आभूषण और अस्त्रों से युक्त मन्त्र मूर्ति प्रभु का स्मरण कर उनके चरणोदक से निकली हुई गंगा के जल को नाक के छेदों से अपने शरीर में ले जाकर इससे शरीर के भीतर के मल को बाहर निकाल दें। इस प्रकार अन्तःशुद्धि करने वाला साधक तत्काल रजोगुण से रहित होकर स्फटिक के समान दिव्य देह हो जाता है। इस प्रकार शास्त्र विधि के अनुसार स्नान करने के उपरान्त वह मन्त्री सावधानी से मन्त्र स्नान करे। मन्त्रस्नान की विधि निम्नलिखित है ॥२१-२३½॥

१. रात में चार बजे भगवान् को उठाकर जो आरती की जाती है ।

५६४ नारदीयपुराणम् मंत्रस्नानं ततः कुर्यात्तद्विधानमथोच्यते । देशकालौ च संकीर्त्य प्राणायामषडंगकैः ॥२४॥ कृत्वार्कमंडलात्तीर्थान्याह्वयेन्मुष्टिमुद्रया । ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि ते रखेः ॥२५॥ तेन सत्येन मे देव देहि तीर्थं दिवाकर ॥२६॥ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिंधुकावेरि जलेऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ॥२७॥ इत्यावाह्य जले तानि सुधाबीजेन योजयेत् । गोमुद्रयाऽमृतीकृत्य कवचेनावगुंठ्य च ॥२८॥ संरक्ष्यास्त्रेण तत्पश्चाच्चक्रमुद्रां प्रदर्शयेत् । वह््न्यर्केंदुमण्डलानि तत्र साचतयेद्बुधः ॥२९॥ मंत्रयेदर्कमन्त्रेण सुधाबीजेन तज्जलम् । मूलेन चैकादशधा तत्र संमंथ्य भावयेत् ॥३०॥ पूजायंत्रं च तन्मध्ये स्वांतादावाह्य देवताम् । स्नापयित्वार्चयेत्तां च मानसेरुपचारकैः ॥३१॥ सिंहासनस्थां तां नत्वा तज्जलं प्रणमेत्सुधीः । आधारः सर्वभूतानां विष्णोरतलतेजसः ॥३२॥ तद्रूपाश्च ततो जाता आपस्ताः प्रणमाम्यहम् । इति नत्वा समारुन्ध्य सप्तच्छिद्राणि साधकः ॥३३॥ निमज्ज्य सलिलेऽतस्मिन्मूलं देवाकृतिं स्मरेत् । निमज्ज्योन्मज्ज्य त्रिश्चैवं सिंचेत्कं कुंभमुद्रया ॥३४॥ त्रिमूलेन चतुर्मंत्रैरभिषिंचेन्निजां तनुम् । चत्वारो मनवस्तेऽत्र कथ्यन्ते तांत्रिका मुने ॥३५॥ सिसृक्षोर्निखिलं विश्वं मुहुः शुक्रं प्रजापतेः । मातरः सर्वभूतानामापो देव्यः पुनंतु माम् ॥३६॥ अलक्ष्मीर्मलरूपा या सर्वभूतेषु संस्थिता । क्षालयंति च तां स्पर्शादापो देव्यः पुनंतु माम् ॥३७॥

पहले देशकाल का नामोल्लेख कर संकल्प करे और षडङ्ग प्राणायाम करे फिर मुष्टि मुद्रा करके सूर्य मण्डल से तीर्थों का आवाहन करे । आवाहन मन्त्र - देव, तुम्हारी किरणें सारे ब्रह्माण्ड और तीर्थों (नदीजल या जल) का स्पर्श करती हैं । दिवाकर, उस सत्य के आधार पर आप मेरे लिये समस्त तीर्थों को मेरे समीप लावें । गंगे, यमुने, गोदावरि, सरस्वति, नर्मदे, सिन्धु, कावेरि ! इस जल में आकर आप निवास करें । इस प्रकार सबका आवाहन कर उनको सुधाबीज से उस जल में स्थापित करें ॥२४-२७$\frac{१}{२}$॥ गोमुद्रा से उसको अमृतमय बनाकर कवच से अवगुं- ठित कर अस्त्र से उसकी रक्षा कर चक्र मुद्रा का प्रदर्शन करे । बुध जन इस प्रकार जल को मुद्राओं द्वारा प्रभावित कर अग्नि, सूर्य और चन्द्र मण्डल का ध्यान करे । सूर्य के मन्त्र से उस जल को अभिमन्त्रित कर सुधाबीज से उसको पुनः अभिमन्त्रित करे । फिर ग्यारह बार मूल मन्त्र को पढ़कर उस जल को भावना- भावित करे ॥२८-३०॥ पूजा यन्त्र को उस भावित जल में स्थापित कर उसमें अपने हृदयस्थ देवता को स्थापित कर उस देवता को मानसिक (भावनामय) उपचारों से पूजा करे । इस भाँति पूजन करने के अनन्तर वह विद्वान् व्यक्ति सिहास- नस्थ उस देवता को प्रणाम कर उस जल को भी प्रणाम करे । प्रणाम मन्त्र - 'तुम (जल) सब प्राणियों के और अतुल तेजस्वी विष्णु के आधार हो, तदनन्तर तुम्हीं विष्णु के रूप भी बन गये इसलिये ऐसे जल को प्रणाम करता हूँ ॥३१-३२$\frac{१}{२}$॥ इस मन्त्र से नमस्कार कर साधक शरीर के सात छेदों (नाक, कान, आँख और मुँह) को मूंद कर उस जल में डुबकी लगावे और डूबे ही मूल देवाकृति का स्मरण करे । इस प्रकार तीन बार जल में डुबकी लगाये और ऊपर आये । पुनः कुम्भ मुद्रा से जल को सींच कर उसी जल से तीन बार और मन्त्र से चार बार अपने शरीर को सींचे । मुने, इस विषय के चार मन्त्र मुनियों ने बताये हैं । पहला -- बार-बार निखिल विश्व सृष्टि की इच्छा करने वाले प्रजापति के तुम शुक्र हो, और सब प्राणियों के एकमात्र जनक हो, जलदेव आपको नमस्कार है। आप मुझको पवित्र करें ॥३३-३६॥ दूसरा -- आप सब प्राणियों में मलरूपी जो अलक्ष्मी है उसको अपने स्पर्श

षट्षष्टितमोऽध्यायः ५६५ यन्मे केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्द्धनि । ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद्घ्नन्तु वो नमः ॥३६॥ आयुरारोग्यमैश्वर्यमरिक्षयं शुभम् । सन्तोषः शांतिरास्तिक्यं विद्या भवतु वो नमः ॥३८॥ विप्रपादोदकं पीत्वा शालग्रामशिलाजलम् । पिबेद्विरुद्धं नो कुर्यादेषां तु नियतो विधिः ॥४०॥ पृथिव्यां यानि तीर्थानि दक्षांघ्रौ तानि भूसुरे । स्वेष्टदेवं समुद्ध्रास्य मन्त्री मार्तण्डमण्डले ॥४१॥ ततस्तीरं समागत्य वस्त्रं संक्षाल्य यत्नतः । वाससी परिधायाथ कुर्यात्सन्ध्यादिकं सुधीः ॥४२॥ रोगाद्यशक्तो मनुजः कुर्यात्तवाघमर्षणम् । अथवा भस्मना स्नातो रजोभिश्चैव वाऽक्षमः ॥४३॥ अथ सन्ध्यादिकं कुर्यात् स्थित्वा चैवासने शुभे । केशवेन तथा नारायणेन माधवेन च ॥४४॥ संप्राश्य तोयं गोविन्दविष्णुभ्यां क्षालयेत्करौ । मधुसूदनत्रिविक्रमाभ्यामोष्ठौ च मार्जयेत् ॥४५॥ वामनश्रीधराभ्यां च मुखं हस्तौ स्पृशेत्ततः । हृषीकेशपद्मनाभाभ्यां स्पृशेच्चरणौ ततः ॥४६॥ दामोदरेण मूर्द्धानं मुखं संकर्षणेन च । वासुदेवेन प्रद्युम्नेन स्पृशेन्नासिके ततः ॥४७॥ अनिरुद्धपुरुषोत्तमाभ्यां नेत्रे स्पृशेत्ततः । अधोक्षजनृसिंहाभ्यां श्रवणे संस्पृशेत्तथा ॥४८॥ नाभिं स्पृशेदच्युतेन जनार्दनेन वक्षसि । हरिणा विष्णुनांसौ च वैष्णवाचमनं त्विदम् ॥४९॥ प्रणवाद्यैर्ङेऽन्तैर्नमोऽन्तः केशवादिकनामभिः । मुखे नसोः प्रदेशिन्याऽनामया नेत्रकर्णयोः ॥५०॥ कनिष्ठया नाभिदेशं सर्वांगुष्ठयोजनम् । आत्मविद्याशिवस्तत्त्वैःस्वाहांतैः शिवमरीरितम् ॥५१॥ से धो देते हैं, ऐसे जल देव मुझको पवित्र करें। तीसरा-मेरे केशों में, सीमन्त में, मूर्द्धा, ललाट, कानों और आँखों में जो दुर्भाग्य है उसको शीघ्र नष्ट कर दें । आपको नमस्कार है ॥३७-३८॥ चौथा-मुझको आपकी कृपा से आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, शत्रुनाश, कल्याण, संतोष, शान्ति, आस्तिक भाव और विद्या प्राप्त हो । फिर ब्राह्मणों का चरणोदक तथा शालग्राम शिला का जल पान करे । कभी इसके विरुद्ध आचरण न करे । यह शास्त्र का नियत विधान है । पृथवी पर जितने तीर्थ हैं वे सब तीर्थ ब्राह्मणों के दाहिने चरण में रहते हैं। सूर्य मण्डल में अपने इष्ट देव को स्थापन और उसका पूजन करने के अनन्तर वह मन्त्री तीर पर आकर अपने वस्त्र को भली भाँति धो डाले । स्वयं नवीन वस्त्र पहन कर सन्ध्या वंदन आदि करे । ॥३६-४२॥ यदि कोई व्यक्ति रोग आदि के कारण इस प्रकार स्नान और सन्ध्यावन्दन आदि करने में असमर्थ हो तो वह केवल अघमर्षण करे। अथवा भस्म या रेणु से स्नान कर शुभ आसन पर बैठकर सन्ध्या आदि करे । सन्ध्योपासन विधि--केशवाय नमः, नारायणाय नमः, माधवाय नमः कह कर तीन बार आचमन कर गोविन्द- विष्णुभ्यां नमः कह कर दोनों हाथों को धो डाले । मधुसूदनत्रिविक्रमाभ्यां नमः कहकर दोनों ओठों को धो दे। तदनन्तर वामनश्रीधाराभ्यां नमः कहकर मुँह और दोनों हाथो का स्पर्श करे । हृषिकेशपद्मनाभाभ्यां नमः कहकर दोनों चरणों को छुवे ॥४३-४६॥ दामोदराय नमः से मूर्द्धा का और संकर्षणाय नमः से मुख का, वासुदेवाय नमः, प्रद्युम्नाय नमः कहकर दोनों नासिका-छिद्रों का स्पर्श करे ॥४७॥ अनिरुद्धपुरुषोत्तमाभ्यां नमः कहकर दोनों नेत्रों को, अधोक्षजनृसिंहाभ्यां नमः मन्त्र से दोनों कानों का, अच्युताय नमः कहकर नाभि का और जनार्दनाय नमः कहकर वक्षःस्थल का स्पर्श करे । हरये नमः, विष्णवे नमः कहकर दोनों कन्धों का स्पर्श करे । पुनः वैष्णवाय नमः कहकर आचमन करे। इस प्रकार अङ्ग स्पर्श करने के अनन्तर केशव आदि नामों के आदि में ओम् और अन्त में चतुर्थी विभक्ति और नमः जोड़कर अर्थात् ओम् केशवाय नमः आदि कहकर अंगूठा और प्रदेशिनी से मुख और नासिका का, अंगुष्ठा और अनामिका से आंखों और कानों का और कनिष्ठिका से नाभिदेश का स्पर्श करे । आत्मविद्या और शिवतत्त्व को स्वाहा से संयुक्त कर देने पर शैव मन्त्र कहा जाता है ॥४८-५१॥

५६६ नारदीयपुराणम् दीर्घत्रयेन्दुयुग्व्योमपूर्वकेणैव पिबेज्जलम् । आत्मविद्याशिवैरेव शैवं स्वाहावसानिकैः ॥५२॥ वाग्लज्जाश्रीमुखैः प्रोक्तं शाक्तं स्वाहावसानिकैः । वाग्लज्जाश्रीमुखैः प्रोक्तं द्विजाचमनमर्थदम् ॥५३॥ तिलकं च ततः कुर्याद्भाले सुष्ठु गदाकृति । नंदकं हृदये शंखचक्रे चैव भुजद्वये ॥५४॥ शार्ङ्गबाणं मस्तके च विन्यसेत्क्रमशः सुधीः । कर्णमूले पार्श्वयोश्च पृष्ठे नाभौ ककुद्यपि ॥५५॥ एवं तु वैष्णवः कुर्यान्मृद्भिस्तीर्थोद्भववादिभिः । अग्निहोत्रोद्भवं भस्म गृहीत्वा त्र्यंबकेन तु ॥५६॥ किंवाग्निरिति मंत्रेणाभिमंत्र्य पञ्चमन्त्रकैः । क्रमात्तत्पुरुषाघोरसद्योजातादिनामभिः ॥५७॥ पञ्च कुर्यात्त्रिपुण्ड्राणि भालांसोदरहृत्सु च । शैवः शाक्तस्त्रिकोणाभं नारीवद्वा समाचरेत् ॥५८॥ कृत्वा तु वैदिकीं संध्यां तांत्रिकीं च समाचरेत् । आचम्य विधिवन्मन्त्री तीर्थान्यावाह्य पूर्ववत् ॥५९॥ ततस्त्रिवारं दर्भेण भूमौ तोयं विनिःक्षिपेत् । सप्तधा तज्जलेनाथ मूर्द्धानमभिषेचयेत् ॥६०॥ ततश्च प्राणानायम्य कृत्वा न्यासं षडंगकम् । आदाय वामहस्तेंऽबु दक्षिणेनाच्छाद्य पाणिना ॥६१॥ वियद्वातवह्नितोयक्ष्माबीजैः संम॑ध्य मंत्रवित् । मूलेन तस्मात् श्चोतद्भिर्बिन्दुभिस्तत्त्वमुद्रया ॥६२॥ स्वशिरः सप्तधा प्रोक्ष्यावशिष्टं तत्पुनर्जलम् । कृत्वा तदक्षरं मंत्री नासिकांतिकमानयेत् ॥६३॥ जलं तेजोमयं तच्चाकृष्यांतश्चेढया पुनः । प्रक्षाल्यांतर्गतं तेन कल्मषं तज्जलं पुनः ॥६४॥ कृष्णवर्णं पिंगलया रेचयेत्स्वाग्रतस्तथा । क्षिपेदस्त्रेण तत्पश्चात्कल्पिते कुलिशोपले ॥६५॥ दीर्घत्रय, इन्दु और व्योम से युक्त मन्त्र से जल पीना चाहिये । आत्मविद्या और शिव के नामों के अन्त में स्वाहा जोड़ देने से शैव मन्त्र बनता है। वाक्, लज्जा, श्री के साथ स्वाहा जोड़ देने से जो मन्त्र बनते हैं, उन मन्त्रों से अर्थात् "वाचे स्वाहा, लज्जायै स्वाहा, श्रियै स्वाहा" से आचमन करने पर अर्थ सिद्धि होती है ॥५२-५३॥ इसके अनन्तर वह सुधी गदा के आकार का ललाट में तिलक लगाये, हृदय में नन्दक के आकार का और दोनों भुजाओं पर शंख चक्र के आकार का और मस्तक पर धनुष-बाण के आकार का, कर्ण मूल, दोनों पसलियों पर, पीठ पर नाभि तथा ककुद (गर्दन के पीछे) पर क्रमशः चन्दन लगाये । इस प्रकार वैष्णव तीर्थ की मिट्टी या गोपी चन्दन का चन्दन सर्वाङ्गों में लगावे । इसके विपरीत शैव अग्निहोत्र के भस्म को लेकर त्र्यम्बकं यजामहे ॰॰॰॰॰॰ इस मन्त्र से या अग्निरिति भस्म ॰॰॰॰॰॰॰॰ इस मन्त्र से अभिमन्त्रित कर पंच मन्त्रकों से अर्थात् क्रमशः पुरुष, अघोर, सद्योजात आदि नामों से ललाट, अंस (कन्धे के ऊपर,) उदर और हृदय पर पांच त्रिपुण्ड्र लगाये । शाक्त त्रिकोणाकार या नारी जैसे वेंदी लगाती है उस तरह का तिलक धारण करें । इस विधि से वैदिकी सन्ध्या करने के बाद तान्त्रिकी सन्ध्या करे ॥५४-५८॥ तान्त्रिक विधि— मन्त्री (उपासक) विधिपूर्वक आचमन कर और पहले की भांति तीर्थों का आवाहन कर तीन वार कुश से पृथ्वी पर जल छिड़के । इसी कुश से सात वार मस्तक पर भी जल छिड़के । अभिषेक के अनन्तर प्राणायाम कर षडङ्गन्यास करे । बायें हाथ में जल रखकर दाहिने से उसको ढँक दे । फिर वह मन्त्रज्ञ आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के बीज से अभिमन्त्रित कर मूल मन्त्र से अपने हाथ से नीचे टपकते हुये जलबिन्दु से तत्त्व मुद्रा से अपने शिर को सात वार सींचे । बचे हुये जल को वह मन्त्री अपनी नासिका के पास लावे ॥५९-६३॥ उस तेजोमय जल को इड़ा नाड़ी द्वारा भीतर आकृष्ट करे और उसके द्वारा अपने अन्तः के पापों को धोकर कृष्णवर्ण के उस जल को बाईं नासिका (पिंगला) से बाहर निकाल दे । और उस जल को अपने आगे कल्पित कुलिश पत्थर (वज्र) पर फेंक दे । अर्थात् अपने आगे अपनी भावना के द्वारा कल्पित वज्र पर फेंक दे । यह सब प्रकार के पापों को नष्ट करने वाला अघमर्षण है ॥६४-६५॥ इसके अनन्तर हाथों को जल से धोकर पहले की भांति

षट्षष्टितमोऽध्यायः ५६७ एतद्धि सर्वपापघ्नं प्रोक्तं चैवाघमर्षणम् । ततश्च हस्तौ प्रक्षाल्य प्राग्वदाचम्य मंत्रवित् ॥६६॥ समुत्थाय च मंत्रज्ञस्ताम्रपात्रे सुमादिकम् । प्रक्षिप्यार्घ्यं प्रदद्याद्वै मूलांतैर्मंत्रमुच्चरन् ॥६७॥ रविमंडलसंस्थाय देवायार्घ्यं प्रकल्पयेत् । दत्वार्घं त्रिरनेनाथ देवं रविगतं स्मरेत् ॥६८॥ स्वकल्पोक्तां च गायत्रीं जपेदष्टोत्तरं शतम् । अष्टविंशतिवारं वा गुह्यातिमत्तुनार्पयेत् ॥६९॥ उदयदादित्यसंकाशां पुस्तकाक्षकरांबुजाम् । कृष्णाजिनांबरां ब्राह्मीं ध्यायेत्तारांकितेऽम्बरे ॥७०॥ मध्याह्नवरदां देवीं पार्वतीं संस्मरेत्पराम् । शुक्लांबरां वृषारूढां त्रिनेत्रां रविबिम्बगाम् ॥७१॥ वरं पाशं च शूलं च दधानां नृकरोटिकाम् । सायाह्ने रत्नसद्भूषां पीतकौशेयवाससाम् ॥७२॥ श्यामवर्णां चतुर्हस्तां शंखचक्रलसत्कराम् । गदापद्मधरां देवीं सूर्य्यासनकृताश्रयाम् ॥७३॥ ततो देवानृषींश्चैव पितृंश्चापि विधानवित् । तर्पयित्वा स्वेष्टदेवं तर्पयेत्कल्पमार्गतः ॥७४॥ गुरुपंक्ति च संतर्प्य सांगं सावरणं तथा । सायुधं वैनतेयं संतर्पयामीति तर्पयेत् ॥७५॥ नारदं पर्वतं विष्णुं निशठोद्धवदारुकान् । विष्वक्सेनं च शैलेयं वैष्णवः परितर्पयेत् ॥७६॥ एवं संतर्प्य विप्रेन्द्र दत्वार्घ्यं च विवस्वते । पूजागारं समागत्य प्रक्षाल्ययांघ्री उपस्पृशेत् ॥७७॥ अग्निहोत्रस्थितानग्नीन् हुत्वोपस्थाय यत्नतः । पूजास्थलं समागत्य द्वारपूजां समाचरेत् ॥७८॥ गणेशं चोर्ध्वशाखायां महालक्ष्मीं च दक्षिणे । सरस्वतीं वामभागे दक्षे विघ्नेश्वरं पुनः ॥७९॥ क्षेत्रपालं तथा वामे दक्षे गंगां प्रपूजयेत् । वामे च यमुनां दक्षे धातारं वामतस्तथा ॥८०॥ आचमन करे। तत्पश्चात् वह मन्त्री (मन्त्रज्ञ) उठकर ताम्रपात्र में फूल, चन्दन मिश्रित जल रखकर मूलान्त मन्त्र का उच्चारण करते हुये अर्घ्य प्रदान करे। यह अर्घ्य सूर्यमण्डलस्थ देव को दिया जाता है। उक्त मूलान्त मन्त्र से तीन अर्घ्य देकर रविमण्डलस्थ देवता का स्मरण करना चाहिये ॥६६-६८॥ सन्ध्या के अन्त में अपने कल्प के अनुसार गायत्री का एक सौ आठ बार या अट्ठाईस बार जप करना चाहिये और इस जप को 'गुह्यातिगुह्य...... मन्त्र के द्वारा अर्पण कर देना चाहिये । प्रातःकाल जब कि नभोमण्डल में तारा गण दिखाई देते हों—उदय कालीन सूर्य के समान तेजस्वी, कमल के समान हाथों में पुस्तक और रुद्राक्ष माला धारण करने वाली और कृष्ण मृगचर्म को धारण करने वाली ब्राह्मी का ध्यान करना चाहिये ॥६९-७०॥ मध्याह्न काल में शुक्ल वस्त्र धारण की हुई त्रिनेत्र, वृषारूढ़, सूर्यमण्डल में स्थित, वरदायिनी, पाश, शूल, और नृकरोटिका हाथ में धारण किये हुई श्रेष्ठ पार्वती का स्मरण करना चाहिये । सायंकाल पीले रंग के रेशमी वस्त्र को धारण करने वाली, रत्नाभूषणों से आभूषित, श्यामाङ्गी, चार हाथों वाली, शंख, चक्र, गदा, पद्म से सुशोभित और सूर्य मण्डल में स्थित रहने वाली देवी का ध्यान करना चाहिये ॥७१-७३॥ तदनन्तर कल्पों के अनुसार वह विधान-कुशल देव, ऋषि, पितर और अपने इष्टदेव का तर्पण करे विधि के अनुसार 'सांगोपांग और वस्त्र आदि से गुरुओं और शस्त्र सहित गरुड़ को तर्पण करता हूँ' इस मन्त्र से तर्पण करे ॥७४-७५॥ वैष्णव भक्त नारद, पर्वत, विष्णु, भक्त उद्धव, दारुक, विष्वक्सेन और शैलेय को तर्पण से तृप्त करे । विप्रेन्द्र, इस प्रकार तर्पण कर और सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा-गृह में आकर पैर धो ले और आचमन कर पवित्र [हो जाय । अग्निहोत्र गृह में स्थित अग्नि में हवन कर, विधिपूर्वक उपस्थान करे । पुनः पूजा स्थान पर आकर द्वार पूजा करे ॥७६-७८॥ द्वार की ऊपरी शाखा पर गणेश की, दक्षिण भाग मे महालक्ष्मी की, बायें भाग में सरस्वती की, फिर दक्षिण में विघ्नेश्वर की, वाम में क्षेत्रपाल की, दक्षिण में गंगा की पूजा करे। पुनः बाईं ओर यमुना की, दक्षिण

५६८ नारदीयपुराणम् विधातारं शंखपद्मनिधींश्च वामदक्षयोः । द्वारपालांस्ततोऽभ्यर्चेत्तत्तत्कल्पोदितान्सुधीः ॥७९॥ नंदः सुनंदश्चंडश्चप्रचंडः प्रचलोबलः । भद्रः सुभद्रश्चेत्याद्या वैष्णवा द्वारपालकाः ॥८२॥ नंदी भृंगी रिटी स्कंदो गणेशोमामहेश्वराः । वृषभश्च महाकालः शैवा वै द्वारपालकाः ॥८३॥ ब्राह्मयाद्या मातरोऽष्टौ तु शक्तयो द्वारस्थिताः स्वयम् । सेंदुः स्वनामाद्यर्णाद्या ङेन्तोक्ता इमे स्मृताः ॥८४॥ ततः स्थित्वासने धीमानाचम्य प्रयततः शुचिः । दिव्यांतरिक्षभौमांश्च विघ्नानुत्सार्य यत्नतः ॥८५॥ केशवाद्यां मातृकां तु न्यसेद्वैष्णवसत्तमः । केशवः कीर्तिसंयुक्तः कांत्या नारायणस्तथा ॥८६॥ माधवस्तुष्टिसहितो गोविन्दः पुष्टिसंयुतः । विष्णुस्तु धृतिसंयुक्तः शांतियुङ्मधुसूदनः ॥८७॥ त्रिविक्रमः क्रियायुक्तो वामनो दयितायुतः । श्रीधरो मेधया युक्तो हृषीकेशश्च हर्षया ॥८८॥ पद्मनाभयुता श्रद्धा लज्जा दामोदरान्विता । वासुदेवश्च लक्ष्मीयुक् संकर्षणसरस्वती ॥८९॥ प्रद्युम्नः प्रीतिसंयुक्तोऽनिरुद्धो रतिसंयुतः । चक्री जयायुतः पश्चाद्गदी दुर्गासमन्वितः ॥९०॥ शार्ङ्गी तु प्रभया युक्तः खड्गी युक्तस्तु सत्यया । शंखी चंडासमायुक्तो हली वाणीसमायुतः ॥९१॥ मुसली च विलासिन्या शूली विजयान्वितः । पाशी विरजया युक्तो कुशी विश्वासमन्वितः ॥९२॥ मुकुंदो विनतायुक्तो नंदजश्च सुनंदया । नंदी स्मृत्या समायुक्तो नरो वृद्ध्या समन्वितः ॥९३॥ समृद्धियुङ्नरकजिच्छुद्धियुक्तश्च हरिः स्मृतः । कृष्णो बुद्ध्या युतः सत्यो भुक्त्या मुक्त्याथ सात्वतः ॥९४॥ भाग में धाता और फिर बायें भाग में विधाता की, बायें और दाहिने भाग में शंख और पद्मनिधि की और तदनन्तर अपने कल्प के अनुसार विधिवत् द्वारपालों की पूजा करे। नन्द, सुनन्द, चण्ड, प्रचण्ड, प्रचल, बल, भद्र, सुभद्र ये वैष्णव द्वारपाल हैं ॥७९-८२॥ नन्दी, भृंगी, रिरि, स्कन्द, गणेश, उमा, महेश्वर, वृषभ (नन्दी) महाकाल इतने शैव द्वार पाल हैं। ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी आदि जो आठ मातृका शक्तियाँ हैं वे स्वयं ही द्वारपालिका हैं। इन सब के नाम के आदि अक्षर में अनुस्वार लगाकर उसे नाम के पहले बोलना चाहिए। नाम के चतुर्थी विभक्त्यन्त रूप के बाद नमः लगाना चाहिए। यथा- 'नं नन्दाय नमः' इत्यादि। इन्हीं नाम मन्त्रों से इन सब की पूजा करनी चाहिए। इतनी क्रिया कर लेने के उपरान्त वह धीमान् आसन पर बैठकर आचमन कर पवित्र हो सावधानी से दिव्य, अन्तरिक्षचारी और भौम (भूमि पर रहने वाले) विघ्नों को दूर कर केशव और आद्य मातृकाओं का न्यास करे ॥८३-८५॥ केशव को कीर्ति के सहित, नारायण को कान्ति, माधव को तुष्टि, गोविन्द को पुष्टि, विष्णु को धृति, मधु- सूदन को शान्ति, त्रिविक्रम को क्रिया, वामन को दयिता, श्रीधर को मेधा, हृषीकेश को हर्षा, पद्मनाभ को श्रद्धा, दामोदर को लज्जा, वासुदेव को लक्ष्मी, संकर्षण को सरस्वती, प्रद्युम्न को प्रीति, अनिरुद्ध को रति, चक्री को जया, गदी को दुर्गा, शार्ङ्गी को प्रभा, खड्गी को सत्या, शंखी को चण्डा, हली को वाणी, मुसली को विलासिनी, शूली को विजया, पाशी को विरजा, कुशी को विश्वा के साथ तथा इसी प्रकार मुकुन्द को विनता के साथ, नन्दज को सुनन्दा, नन्दी को स्मृति, नर को वृद्धि, नरकजित् को समृद्धि के सहित, हरि को शुद्धि, कृष्ण को बुद्धि, सत्य को भुक्ति, सात्वत को मुक्ति के सहित न्यस्त करे । ॥८६-६४॥ सौरि को क्षमा, शूर को रमा और जनार्दन को उमा

षट्षष्टितमोऽध्यायः ५६६ सौरिक्षमे सुररमे उमायुक्तो जनार्दनः । भूधरः क्लेदिनीयुक्तो विश्वमूर्तिश्च क्लिन्नया ॥६५॥ वैकुण्ठो वसुधायुक्तो वसुदः पुरुषोत्तमः । बली तु परया युक्तो बलानुजपरायणे ॥६६॥ बालसूक्ष्मे वृषघ्नस्तु संध्यायुक् प्रज्ञया वृषः । हंसः प्रभासमायुक्तो वराहो निशया युतः ॥६७॥ विमलो धारया युक्तो नृसिंहो विद्युता युतः । केशवादिमातृकाया मुनिर्नारायणो मतः ॥६८॥ अमृताद्या च गायत्री छंदो विष्णुश्च देवता । चक्राद्यायुधसंयुक्तं कुंभादर्शधरं हरिम् ॥६६॥ लक्ष्मीयुतं विद्युदाभं बहुभूषावृतं भजेत् । एवं ध्यात्वा न्यसेच्छक्तिं श्रीकामपुटिताक्षरम् ॥१००॥ वदेत्तद्विष्णुशक्तिभ्यां हृदयं प्रणवादिकम् । त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राण्यसून्वदेत् ॥१०१॥ प्राणं क्रोधं तथा मभ्यामान्तान्यादिदशस्वपि । एकं मौलौ मुखे चैकं द्विकं नेत्रे द्विकं श्रुतौ ॥१०२॥ नसोर्द्वयं कपोले च द्वयं द्वे द्विरदच्छदे । एकं तु रसनामूले ग्रीवायामेकमेव च ॥१०३॥ कवर्गं दक्षिणे बाहौ चवर्गं वामबाहुके । टतवर्गौ पादयोस्तु पफौ कुक्षिद्वये न्यसेत् ॥१०४॥ पृष्ठवंशे वमित्युक्तं नाभौ भं हृदये तु मम् । यादिसप्तापि धातुस्था हं प्राणे लं तथात्मनि ॥१०५॥ क्षं क्रोधे क्रमतो न्यस्य विष्णु पूजाक्षमो भवेत् । पूर्णोदर्या तु श्रीकंठो ह्यनंतो विजरान्वितः ॥१०६॥ सूक्ष्मेशः शाल्मलीयुक्तो लोलाक्षीयुत्रिमूर्तिकः । महेश्वरो वर्तुलाक्ष्याधोशो वै दीर्घघोणया ॥१०७॥ के सहित, भूधर को क्लेदिनी, विश्व मूर्ति को क्लिन्ना, वैकुण्ठ को वसुधा और पुरुषोत्तम को वसुदा के सहित न्यस्त करे । परा को बली, परायणा के साथ बलानुज, सूक्ष्मा के साथ बाल, संध्या के साथ वृषहन्ता, प्रज्ञा के साथ वृष, प्रभा के साथ हंस, निशा के साथ वाराह, धारा के साथ विमल और विद्युता के साथ नृसिंह न्यास करना चाहिये । केशव आदि मातृका के मुनि नारायण हैं, अमृताद्या और गायत्री छन्द और देवता विष्णु हैं ॥९६-९८½॥ चक्र आदि आयुध से युक्त, लक्ष्मी के सहित हरि को जो कि अनेकों प्रकार के आभूषणों और विद्युत् प्रभा के समान प्रभावशाली, कुंभ और आदर्श (दर्पण) को धारण करने वाले हरि की उपासना करनी चाहिये । इस प्रकार ध्यान करके शक्ति 'ह्रीं', श्री (श्रीं) तथा काम 'क्लीं' बीज से सम्पुटित 'अ' एक-एक अक्षर का ललाट आदि में न्यास करे । उसके साथ आदि में प्रणव लगा कर श्री विष्णु और उनकी शक्ति के चतुर्थ्यन्त नाम बोल कर अन्त में नमः पद जोड़ कर बोले । त्वचा, शोणित, मांस, मेदस्, अस्थि, मज्जा, शुक्र, असु, प्राण तथा क्रोध का उच्चारण करे और इन्हें आदि-अंत में 'म' से संपुटित करके दस अंगों में न्यस्त करे । ॥९९-१०१½॥ एक अक्षर 'अ' का ललाट में, फिर एक अक्षर 'आ' का मुख में, दो अक्षर 'इ' और 'ई' का क्रमशः दाहिने और बायें कान में न्यास करे । दो अक्षर 'ऋ' 'ॠ' का दायीं-बायीं नासिका में, दो अक्षर 'ऌ' 'ॡ' का दायें-बायें कपोल में, दो अक्षर 'ए' 'ऐ' का ऊपर-नीचे के ओष्ठ में, दो अक्षर 'ओ' 'औ' का ऊपर-नीचे की दन्त-पंक्ति में, एक अक्षर 'अं' का जिह्वामूल में तथा एक अक्षर 'अः' का ग्रीवा में न्यास करे ॥१०२-१०३॥ दाहिनी बांह में क वर्ग का और बायीं बांह में च वर्ग का न्यास करे । ट वर्ग और त वर्ग का दोनों पैरों में तथा 'प' और 'फ' का दोनों कुक्षियों में न्यास करे । पृष्ठ वंश में 'ब' का, नाभि में 'भ' का और हृदय में 'म' का न्यास करे । 'य' आदि सात अक्षरों का शरीर की सात धातुओं में, 'ह' का प्राण में तथा 'ल' का आत्मा में न्यास करे । 'क्ष' का क्रोध में न्यास करना चाहिए । इस प्रकार क्रम से मातृका वर्णों का न्यास करके मनुष्य भगवान् विष्णु की पूजा में समर्थ होता है । ॥१०४-१०५½॥ पूर्णोदरी के साथ श्रीकण्ठेश का, विरजा के साथ अनन्तेश का, शाल्मली के साथ सूक्ष्मेश का, लोलाक्षी के साथ त्रिमूर्तीश का, वर्तुलाक्षी के साथ महेश का और दीर्घघोणा के साथ अधोश का न्यास करे । दीर्घमुखी के साथ भारभूतीश का, गोमुखी के साथ तिथिश का, दीर्घजिह्वा के साथ स्थाण्वीश का, कुण्डोदरी के साथ हरेश का, ७२ मा० पु०

५७० अग्निपुराणम् दीर्घमुख्या भारभूतस्तस्थीशो गोमुखोयुतः । स्थाणुनेत्रो दीर्घजिह्वा हुङ्कारः कुण्डोदरीयुतः ॥१०८॥ ऊर्ध्वकेश्या तु भृण्टीशो भौतिको विकृतास्यया । ज्वालामुख्या सद्योजातोऽनुग्रहो युतः ॥१०६॥ अक्रूर आस्थाया युतः सहविद्यो महासेन युतः । उमाविद्यया चण्डेशः पश्चिमेन सरस्वती ॥११०॥ पञ्चान्तकः सिद्धगौरी कुर्मेशश्च शिखस्तनः । त्रैलोक्यविद्यायुतस्तु शिवोत्तमेकवक्त्रकः ॥१११॥ कर्मेशः कमठीयुक्तो भूतधात्र्येकनेत्रकः । लम्बोदर्या चतुर्वक्त्रो द्राविणीयुतः ॥११२॥ सर्वेशो नगरायुक्तः सोमेशः खेचरीयुतः । मर्यादा लाङ्गलीशे दारुकेशेन रूपिणी ॥११३॥ वारुण्या त्वर्द्धनारीशो उमाकान्तो युनीश्वरः । काकोदरी ह्याषाढो पूतनासंयुतो मतः ॥११४॥ दंडीशो भद्रकाल्याऽत्रीशो योगिनीयुतः । मीनेशः शंखिनीयुक्तो मेषस्तर्जनीयुतः ॥११५॥ लोहितः कालरात्र्या च शिखीशः कुब्जनीयुतः । छलगण्डः कपर्दिन्या द्विरण्डेश्च वज्रया ॥११६॥ महाबलो जयायुक्तो बलेशः सुमुखेश्वरी । भुजङ्गेशो रेवतीयुक्तः पिनाकी माधवीयुतः ॥११७॥ खड्गीशो वारुणीयुक्तो बकेशो वायवीयुतः । श्वेतोऽरस्को विदारण्या भृगुः सह्जया युतः ॥११८॥ लकुलीशश्च लक्ष्म्यायुक्तः शिवेशा व्यापिनीयुतः । संवर्तको महामाया प्रोक्ता श्रीकण्ठमातृका ॥११९॥ यत्र स्वोशपदं नोक्तं तत्र सर्वत्र योजयेत् । मुनिस्तस्यादक्षिणामूर्तिर्गायत्रीच्छन्द ईरितम् ॥१२०॥ देवता चार्द्धनारीशो विनियोगोऽखिलाप्तये । हलो बीजानि चाख्यानि स्वराः शक्तय ईरिताः ॥१२१॥ कुर्याद्भृगुस्थाकाशेन षड्दीर्घाढ्येन चांगकम् । बन्धूकस्वर्णवर्णांगं वराक्षांकुशपाशिनम् ॥१२२॥

ऊर्ध्वकेशी के साथ भृण्टीश का, विकृतास्या के साथ भौतिक का, ज्वालामुखी के साथ सद्यो का, उल्कामुखी के साथ अनुग्रहेश का, आस्था के साथ अक्रूर का, विद्या के साथ महासेन का, महाकाली के साथ क्रोधीश का, सरस्वती के साथ चण्डेश का, सिद्धगौरी के साथ पञ्चान्तकेश का, त्रैलोक्यविद्या के साथ शिवोत्तभेश का, मन्त्र शक्ति के साथ एकरुद्र का, कमठी के साथ कूर्मेश का, भूतमाता के साथ एकनेत्र का, लम्बोदरी के साथ चतु- र्वक्त्र का, द्राविणी के साथ अजेश का, नागरा के साथ सर्वेश का, खेचरी के साथ सोमेश का, मर्यादा के साथ लांगलीश का, दारुकेश के साथ रूपिणी का तथा वारिणी के साथ अर्धनारीश का न्यास करना चाहिए ॥१०६-१०३॥ काकोदरी के साथ उमाकान्त का और पूतना के साथ आषाढीश का न्यास करे । भद्रकाली के साथ दण्डीश का, योगिनी के साथ अत्रीश का, शंखिनी के साथ मीनेश का, तर्जनी के साथ मेषेश का, कालरात्रि के साथ लोहितेश का, कुब्जनी के साथ शिखीश का, कपर्दिनी के साथ छलगण्डेश का, वज्रा के साथ द्विरण्डेश का, जया के साथ महाबलेश का, सुमुखेश्वरी के साथ बलेश का, रेवती के साथ भुजंगेश का, माध्वी के साथ पिनाकीश का, वारुणी के साथ खड्गीश का, वायवी के साथ बकेश का, विदारणी के साथ श्वेतोतरश्केश का, सहजा के साथ भृगीश का, लक्ष्मी के साथ लकुलीश का, व्यापिनी के साथ शिवेश का तथा महामाया के साथ संवर्तश का न्यास करे । यह श्रीकण्ठमातृका कही गई है ॥११४-११९॥ जहाँ ईश पद न कह गया हो वहाँ सर्वत्र उसकी योजना कर लेनी चाहिए । इस श्रीकण्ठमातृका न्यास के दक्षिणामूर्ति ऋषि और गायत्री छन्द कहा गया है । अर्धनारीश्वर देवता है और सम्पूर्ण मनोरथों की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग कहा गया है । इसके हल् बीज और स्वर शक्तियाँ हैं ॥१२०-१२१॥ भृगु (स) में स्थित आकाश (ह) को छह दीर्घों से युक्त करके उसके द्वारा अंग न्यास करे । इसके बाद भगवान् शंकर का इस प्रकार ध्यान करे - उनका श्रीविग्रह बन्धूक पुष्प एवं सुवर्ण के समान है । वे अपने हाथों में वर, अक्षमाला, अंकुश और पाश धारण करते हैं । उनके मस्तक पर अर्धचन्द्र का मुकुट सुशोभित है । उनके तीन नेत्र हैं तथा सम्पूर्ण देवता उनके चरणों की वंदना करते हैं । ॥१२२३॥

षट्षष्टितमोऽध्यायः ५७१ अर्धेन्दुशेखरं त्र्यक्षं देवदेवं विचिन्तयेत् । ध्यात्वैवं शिवशक्तीश्च चतुर्थी हृदयांतिमे ॥१२३॥ सौबीजसातका पूर्वे विन्यसेन्मातृकास्थले । विघ्नेशश्च ह्रिया युक्तो विघ्नराजः श्रिया युतः ॥१२४॥ विनायकस्तथा पुष्ट्या शांतियुक्तः शिवोत्तमः । विघ्नकृत्स्वस्तिसंयुक्तो विघ्नहर्ता सरस्वती ॥१२५॥ स्वाहया गणनायश्च एकदंतः सुमेधया । कांत्या युक्तो द्विदंतस्तु कामिन्या गजवक्त्रकः ॥१२६॥ निरंजनो मोहिनीयुक्तकपर्दी नटीयुतः । दीर्घजिह्वः पार्वतीयुग्ज्वालिन्या शंकुकर्णकः ॥१२७॥ वृषध्वजो नन्दया च सुरेशा गणनायकः । गजेन्द्रः कामरूपिण्या शूर्पकर्णस्तथोमया ॥१२८॥ विरोचनस्तेजोवत्या सत्यालम्बोदरेण च । महानंदश्च विघ्नेश्या चतुर्मूतिस्वरूपिणी ॥१२९॥ सदाशिवः कामदयाह्ला आमोदो मदजिह्वया । दुर्मुखो भूतिसंयुक्तः सुमुखो भुकुटीयुतः ॥१३०॥ प्रमोदः सितया युक्त एकपादो रज़ायुतः । द्विजिह्वो महिषीयुक्तो जंभिन्या शूरनामकः ॥१३१॥ वीरो विकर्णया युक्तः षण्मुखो भुकुटीयुतः । वरदो लज्जया वामदेवेशो दीर्घघोणया ॥१३२॥ धनुर्द्धर्धा वक्रतुंडो द्विरंडो यामिनी युतः । सेनानी रात्रिसंयुक्तः कामांधो ग्रामणीयुतः ॥१३३॥ मत्तश्चशशिप्रभायुक्तो विमलो लोलनेत्रया । मत्तवाहश्चंचलया जटी दीप्तिसमन्वितः ॥१३४॥ मुंडो सुभगया युक्तः खङ्गी दुर्गया युतः । वरेण्यश्च शिवायक्तो भगया वृषकेतनः ॥१३५॥ भक्तप्रियो भोगन्या च गणेशो योगिनीयुतः । मेघनादः सुभगया व्यापी स्यात्कालरात्रियुक् ॥१३६॥ गणेश्वरः कालिकया प्रोक्ता विघ्नेशमातृकाः । गणेशमातृकायास्तु गणो मुनिभिरीरितः ॥१३७॥ त्रिवृद्गायत्रिकाछन्दो देवः शक्तिगणेश्वरः । षड्दीर्घाढ्येन बीजेन कृत्यांगानि ततः स्मरेत् ॥१३८॥

इस प्रकार शिवशक्ति का ध्यान करके अन्त में चतुर्थी विभक्ति और नमः पद जोड़कर तथा आदि में गणेशजी का अपना बीज लगाकर मातृकास्थल में एक-एक मातृकावर्ण के साथ शक्ति सहित गणेशजी का न्यास करे। ह्री के साथ विघ्नेश तथा श्री के साथ विघ्नराज का न्यास करे। पुष्टि के के साथ विनायक, शान्ति के साथ शिवोत्तम, स्वस्ति सहित विघ्नकृत्, सरस्वती सहित विघ्नहर्ता, स्वाहा सहित गणनाय, सुमेधासहित एकदन्त, कान्तिसहित द्विदन्त, कामिनीसहित गजमुख, मोहिनीसहित निरञ्जन, नटी सहित कपर्दी, पार्वतीसहित दीर्घजिह्व, ज्वालिनोसहित शंकुकर्ण, नन्दासहित वृषध्वज, सुरेशासहित गणनायक, कामरूपिणी के साथ गजेन्द्र, उमा के साथ शूर्पकर्ण, तेजोवती के साथ विरोचन, सती के साथ लम्बोदर, विघ्नेशी के साथ महानन्द, सुरूपिणीसहित चतुर्मूति ।।१२३-१२९।। कामदासहित सदाशिव, मदजिह्वा सहित आमोद, भूतिसहित दुर्मुख, भौतिकी के साथ सुमुख, सिता के साथ प्रमोद, रमा के साथ एकपाद, महिषी के साथ द्विजिह्व, जम्भिनी के साथ शूर, विकर्णा के साथ वीर, भुकुटीसहित षण्मुख, लज्जा के साथ वरद, दीर्घघोणा के साथ वामदेवेश, धनुर्धरो के साथ वक्रतुण्ड, यामिनी के साथ द्विरण्ड, रात्रि सहित सेनानी, ग्रामणी सहित कामान्ध, शशिप्रभा के साथ मत्त, लोलनेत्रा के साथ विमत्त, चंचला के साथ मत्तवाह, दीप्ति के साथ जटो, सुभगा के साथ मुण्डी, दुर्भगा के साथ खङ्गी, शिवा के साथ वरेण्य, भगा के साथ वृषकेतन, ।।१३०-१३५।। भगिनी के साथ भक्तप्रिय, भोगिनी के साथ गणेश, सुभगा के साथ मेघनाद, कालरात्रिसहित व्यापी तथा कालिका के साथ गणेश का अपने अंगों में न्यास करना चाहिए। इस प्रकार विघ्नेश मातृका का वर्णन किया गया है। गणेश मातृका के गण ऋषि कहे गये हैं। निवृद् गायत्री छन्द है तथा सहित गणेश्वर देवता हैं। छह दीर्घ स्वरों से युक्त गणेशबीज (गां गीं गूं गं गौं गः) के द्वारा अंग न्यास करके उनका इस प्रकार ध्यान करे-गणेशजी अपनी चारों भुजाओं में क्रमशः पाश, अंकुश, अभय और वर धारण किये हुए हैं, उनकी पत्नी सिद्धि हाथ में कमल ले उनसे सटकर बैठी हैं। उनका शरीर रक्त वर्ग का

५७२ नारदीयपुराणम् पांशांकुशाभयवरान्दधानं कंजहस्तया । पत्न्याश्लिष्टं रक्ततनुं त्रिनेत्रं गणपं भजेत् ॥१३६॥ एवं ध्यात्वा न्यसेत्स्वीयबीजपूर्वाक्षरान्वितम् । निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्या शांतिस्तथेंधिका ॥१४०॥ दीपिका रेचिका चापि मोचिका च पराभिधा । सूक्ष्मासूक्ष्मामृता ज्ञानामृता चाप्यायिनी तथा ॥१४१॥ व्यापिनी व्योमरूपा चानंता सृष्टिः समृद्धिका । स्मृतिर्मेधा ततः कांतिर्लक्ष्मीर्धृतिः स्थिरा स्थितिः ॥१४२॥ सिद्धिर्जरा पालिनी च क्षांतिरीश्वरिका रतिः । कामिका वरदा वाथा ह्लादिनी प्रीतिसंयुता ॥१४३॥ दीर्घा तीक्ष्णा तथा रौद्रा प्रोक्ता निद्रा च तंद्रिका । क्षुधा च क्रोधिनी पश्चात्क्रियाकारी स्मृत्युका ॥१४४॥ पीता श्वेतारुणा पश्चादसितानंतया युता । उक्ता कलामातृकैवं तत्तद्भक्तः समाचरेत् ॥१४५॥ कलायुक्तमातृकायास्तु मुनिः प्रोक्तः प्रजापतिः । गायत्रीछन्द आख्यातं देवता शारदाभिधा ॥१४६॥ ह्रस्वदीर्घान्तरस्थैश्च तारैः कुर्यात्षडंगकम् । पद्मचक्रगुणैणांश्च दधतीं च त्रिलोचनाम् ॥१४७॥ पञ्चवक्त्रां भारतीं तां मुक्ताभूषां भजेत्सुधीः । ध्यात्वैवं तारपूर्वां तां न्यसेन्डेन्तकलान्विताम् ॥१४८॥ ततश्च मूलमन्त्रस्य षडंगानि समाचरेत् । हृदयादिचतुर्थ्यन्ते जातीः संयोज्य विन्यसेत् ॥१४६॥ नमः स्वाहा वषट् हुं वो षट् फट् जातय ईरिताः । ततो ध्यात्वेष्टदेवं तं भूषायुधसमन्वितम् ॥१५०॥

है तथा उनके तीन नेत्र हैं, ऐसे गणपति का मैं भजन करता हूँ । इस प्रकार ध्यान करके स्वकीय बीज को पूर्वाक्षर के रूप में रखकर उक्त मातृका न्यास करना चाहिए । ॥१३६-१३९॥ निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति, इन्धिका, दीपिका, रोचिका, मोचिका, सूक्ष्मा, असूक्ष्मा, अमृता, ज्ञाना- मृता, आप्यायिनी, व्यापिनी, व्योमरूपा, अनन्ता, सृष्टि, समृद्धिका, स्मृति, मेधा, कान्ति, लक्ष्मी, धृति, स्थिरा, स्थिति, सिद्धि, जरा, पालिनी, क्षान्ति, ईश्वरी, रति, कामिका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति, दीर्घा, तीक्ष्णा, रौद्रा, निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा, क्रोधिनी, क्रियाकरी, मृत्यु, पीता, श्वेता, अरुणा, असिता और अनन्ता--इस प्रकार कला मातृका कही गई है। भक्त पुरुष उन-उन मातृकाओं का न्यास करे ॥१४०-१४५॥ इस कलामातृका के प्रजापति ऋषि कहे गये हैं। इसका छन्द गायत्री और देवता शारदा हैं। ह्रस्व और दीर्घस्वर के बीच में प्रणव रखकर उसी के द्वारा षडंगन्यास करे। यथा--अं ओम् आं हृदयाय नमः, इं ओम् ईं शिरसे स्वाहा, उं ओम् ऊँ शिखायै वषट्, एं ओम् ऐं कवचाय हुम्, ओ ओम् औं नेत्रत्रयाय वौषट्, अं ओम् अः अस्त्राय फट्) । विद्वान् पुरुष मोतियों के आभूषणों से विभूषित पञ्चमुखी शारदा देवी का भजन (ध्यान) करे। उनके तीन नेत्र हैं तथा वे अपने हाथों में पद्म, चक्र, गुण (त्रिशूल अथवा पाश) तथा एण (मृगचर्म) धारण करती हैं। इस प्रकार ध्यान करके ओम् पूर्वक चतुर्थ्यन्त कलायुक्त मातृका का न्यास करे (यथा--ओम् अं निवृत्यै नमः ललाटे, ओम् आं प्रतिष्ठायै नमः मुखवृत्ते इत्यादि)। तदनन्तर मूलमन्त्र के छहों अंगों का न्यास करना चाहिए। 'हृदय' आदि चतुर्थ्यन्त पद में अंगन्यास-सम्बन्धी जातियों का संयोग करके न्यास करे। नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् और फट्-ये छह जातियाँ कही गई हैं (अर्थात् हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट् कवचाय हुम्, नेत्रत्रयाय वौषट्, अस्त्राय

षट्षष्टितमोऽध्यायः ५७३ ॥१५१॥ न्यस्यांगषट्कं तन्मूर्त्तौ ततः पूजनमारभेत् इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे संध्यादिनिरूपणं नाम षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥६६॥ सप्तषष्टितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ वक्ष्ये देवपूजां साधकाभीष्टसिद्धिदाम् । त्रिकोणं चतुरस्रं वा वामभागे प्रकल्प्य च ॥१॥ सम्पूज्यास्त्रेण संक्षाल्य हृदाधारं निधाय च । तत्राग्निसण्डलं चेद्वा पात्रं संक्षाल्य चास्त्रतः ॥२॥ आधारे नमसं स्थाप्य तत्र चेद्रविमंडलम् । विलोममातृका मूलमुच्चरन्पूरयेज्जलैः ॥३॥ तवैंदुमंडलं प्रार्च्य तीर्थान्यावाह्य पूर्ववत् । गोमुद्रयाऽमृतीकृत्य कवचेनावगुंठयेत् ॥४॥ संक्षाल्यास्त्रेण प्रणवं तदुपर्यष्टधा जपेत् । सामान्यार्घमिदं प्रोक्तं सर्वसिद्धिकरं नृणाम् ॥५॥ तज्जलं किंचिदुद्धृत्य प्रोक्षण्या साधकोत्तमः । आत्मानं यागवस्तूनि तेन संप्रोक्षयेत्पृथक् ॥६॥ आत्मवामाग्रतः कुर्यात्षट्कोणांतस्त्रिकोणकम् । चतुरस्रेण संवेष्ट्य संक्षाल्यार्घोदकेन च ॥७॥ ततस्तु साधकश्रेष्ठः स्तंभयेच्छंखमुद्रया । आग्नेयादिषु कोणेषु हृदाद्यंगचतुष्टयम् ॥८॥ फट्--इस प्रकार संयोजना करे) । तत्पश्चात् आयुध और आभूषणों सहित इष्टदेव का ध्यान करके उनकी मूर्ति में छह अंगों का न्यास करने के पश्चात् पूजन प्रारंभ करे । ॥१४६-१५१॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में संध्यादि-निरूपण नामक छाठवां अध्याय समाप्त ॥६६॥ अध्याय ६७ देव पूजन की विधि सनत्कुमार बोले-इसके अनन्तर साधकों को अभीष्ट सिद्धि देने वाले देवपूजन की विधि बतला रहा हूँ। सब से पहले बायें भाग में चौकोर या तिकोना मण्डल स्थापित कर उसको अस्त्र (मन्त्र) से सींच कर उसमें हृदाधार बनाये ॥१॥ यदि अग्नि स्थापना करनी हो तो अग्नि मण्डल बनाये और पात्र को अस्त्र से धोकर आधार स्थान में चमस रखकर सूर्य मण्डल की भावना करे। विलोम-मातृकामूल का उच्चारण करते हुए उस पात्र को जल से भरे । फिर उसमें चन्द्र-मण्डल की पूजा करके पूर्व वत् उसमें तीर्थों का आवाहन करे। उसको गोमुद्रा से अमृतमय बनाकर कवच से उसको ढक दे ॥२-४॥ अस्त्र (मन्त्र) से उस पर जल छिड़क कर, प्रणव का आठ बार जप करे। यह मनुष्यों को सब प्रकार की सिद्धियां देने वाला सामान्य अर्घ कहा गया है। उत्तम साधक प्रोक्षणी में से थोड़ा सा जल लेकर अपने और यज्ञिय वस्तुओं पर छिड़के। अपनी बाईं ओर उससे आगे षट् कोणान्त त्रिभुज बनावे । उसको चतुर्भुज से घेर कर अर्घ-जल से सींचे ॥५-७॥ इतनी क्रिया के अनन्तर वह श्रेष्ठ साधक शंख मुद्रा से स्तम्भन करे। आग्नेय आदि कोणों में हृदय आदि अंगों की स्थापना करे। सब दिशाओं के

५७४ नारदीयपुराणम् नेत्रं मध्ये दिक्षु चास्त्रं त्रिकोणे पूजयेत्ततः । मूलखंडत्रयेणाथा धारशक्तिं तु मध्यगाम् ॥८॥ एवं सम्पूज्य विधिनाऽस्त्रसंक्षालितं हृदा । प्रतिष्ठाप्य त्रिपदिकां पूजयेन्मनुनामुना ॥९॥ मं वह्निमण्डलायेति ततो दशकलालने । अमुकार्घ्येति पात्रांते सनापहृदयोँतिमे ॥११॥ चतुर्विंशतिवर्णोऽयमाधारस्यार्चने मनुः । स्वमंत्रक्षालितं शंखं संस्थाप्याथ समर्पयेत् ॥१२॥ तारः काम्मर्महांस्ते तु ततो जलचराय च । वर्म फट् हृदयं पांचजन्याय हृदयं मनुः ॥१३॥ तवार्कमण्डलायेति द्वादशांते कलात्मने । अमुकार्घ्येति पात्रांते नमोन्तस्त्वक्षिवर्णवान् ॥१४॥ सम्पूज्य तेन तत्राचेद्द्वादशार्ककलाः क्रमात् । ततः शुद्धजलैर्मलं विलोममातृकां पठन् ॥१५॥ शङ्खमापूरयेत्तस्मिन्पूजयेन्मनुनामुना । ओं सोममण्डलायेति षोडशांते कलात्मने ॥१६॥ अमुकार्घ्यामृतायेति हृन्मनुश्चार्घ्यपूजने । तत्र षोडशसंख्याका यजेच्चंद्रमसः कलाः ॥१७॥ ततस्तु तीर्थान्यावाह्य गङ्गे चेत्यादिपूर्वकत् । गोमुद्रयाऽमृतीकृत्याच्छादयेन्मत्स्यमुद्रया ॥१८॥ कवचेनावगुंठ्याथ रक्षेद्रस्त्रेण तत्पुनः । चिंतयित्वाष्टदेवं च ततो मुद्राः प्रदर्शयेत् ॥१९॥ शङ्ख मौशलचक्राख्याः परमीकरणं ततः । महामुद्रां योनिमुद्रां दर्शयेत्क्रमतः सुधीः ॥२०॥ गारुडी गालिनी चैव मुख्ये मुद्रे प्रकीर्तिते । गन्धपुष्पादिभिस्तत्र पूजयेद्देवतां स्मरन् ॥२१॥ अष्टकृत्वो जपेन्मूलं प्रणवं चाष्टधा तथा । शंखाद्दक्षिणदिग्भागे प्रोक्षणीपात्रनादिशेत् ॥२२॥ प्रोक्षण्यां तज्जलं किंचित्कृत्वात्मानं त्रिधा ततः । आत्मतत्त्वात्मने हृच्च विद्यातत्त्वात्मने नमः ॥२३॥ शिवतत्त्वात्मने हृच्च इत्येतैर्मनुभिस्त्रिभिः । प्रोक्षेत्पुष्पाक्षतैश्चापि मण्डलं विधिवत्सुधीः ॥२४॥ मध्य में नेत्र की और त्रिकोण में अस्त्र की पूजा करे । मूल के तीन खण्डों से मध्य-गामिनी आधार शक्ति की पूजा करे ॥८-९॥ इस प्रकार भली-भांति पूजा करके अस्त्र से उसको सींचकर हृदय से त्रिपदिका (तीन पैर वालो) की स्थापना कर 'मं वह्निमण्डलाय' मन्त्र से उसकी पूजा करे । तत्पश्चात् दश कलात्मा को 'अमुक कार्घ्येति पात्रान्ते सनाप हृदयान्तिमे, इस मन्त्र से पूजे । यह चौबीस अक्षरों का मन्त्र है जिसका प्रयोग आधार के पूजन में किया जाता है। अपने मन्त्र से क्षालित (धोये हुए) शंख को स्थापित कर उस शंख की पूजा करे । शंख पूजन मन्त्र 'तारःकार्म्म महांस्तेतु ततो जलचराय च वर्म फट् हृदयं पांचजन्याय हृदयम्' । उस चक्र में अर्कमण्डल के निमित्त बारह कलावाले सूर्य की पूजा करे । मन्त्र - अमुकार्घ्येति पात्रान्ते नमोऽन्तस्त्वक्षिवर्णवान्' इस मन्त्र से सूर्य को पूजा कर उसी मण्डल में बारह कलाओं की क्रमशः पूजा करे ॥१०-१४६॥ सूर्य पूजन के अनन्तर विलोम मातृका का उच्चार नकरते हुए शुद्ध जल से शंख को भर दे । 'ओं सोममण्डलायषोडशान्त कलात्मने अमुकार्थ्या- मृताय' इस मन्त्र से अर्घ्य पूजन करे । उस सोम मण्डल में चन्द्रमा को सोलह कलाओं की पूजा करे ॥१५-१६॥ गंगे च यमुने.....'इस मन्त्र से तीर्थों का आवाहन कर गोमुद्रा से अमृतीकरण करे, मत्स्य मुद्रा से उसको आच्छादित कर कवच से उसको पुनः ढक दे । अस्त्र से उसकी रक्षा कर इष्ट देव का चिन्तन कर मुद्रा दिखलावे । चतुर साधक शंख, मौशल, चक्र, परमीकरण, महामुद्रा और योनि मुद्रा का प्रदर्शन करे । गारुडी और गालिनी को मुख्य मुद्रा कहते हैं । उस स्थान पर देवता का स्मरण करते हुए गन्ध-पुष्प आदि से पूजा करे ॥१७-२१॥ उस समय आठ बार मूल मन्त्र को और आठ बार प्रणव का जप करे । शंख के दक्षिण भाग में प्रोक्षणी पात्र को रखे । प्रोक्षणी में थोड़ा सा जल रख कर उसको अपने ऊपर तीन बार छिड़के । तदनन्तर 'आत्मतत्त्वात्मने हृच्च विद्यातत्त्वात्मने नमः शिवतत्त्वात्मने हृच्च शिवतत्त्वात्मने नमः इन तीन मन्त्रों से पुष्प अक्षत से विधिवूवर्क मण्डल

सप्तषष्टितमोऽध्यायः ५७५ अथवा मूलगायत्र्या पूजाद्रव्याणि प्रोक्षयेत् । पाद्यार्घ्याचमनीयार्थं मधुपर्कार्थमप्युत ॥२५॥ पात्राण्याधारयुक्तानि स्थापयेद्विधिना पुनः । पाद्यं श्यामाकदूर्वाब्जविष्णुक्रांतजलैः स्मृतम् ॥२६॥ अर्घ्यं पुष्पाक्षतयवैः कुशाग्रतिलसर्षपैः । गंधदूर्वादलैः प्रोक्तं ततश्चाचमनीयकम् ॥२७॥ जातीफलं च कंकोलं लवंगं च जलान्वितम् । क्षौद्राज्यदधिसंमिश्रं मधुपर्कत्समीरितम् ॥२८॥ एकस्मिन्नथवापात्रे पाद्यादीनि प्रकल्पयेत् । शंकराकार्चने शंखमयैर्नैव प्रशस्यते ॥२९॥ श्वेताकृष्णाऽरुणापीताश्यामारक्तासितासिताः । रक्तांबराञ्जयकरा ध्येयास्स्युः पीठशक्तयः ॥३०॥ स्वर्णादिलिखिते यंत्रे शालग्रामे मणौ तथा । विधिना स्थापितायां वा प्रतिमायां प्रपूजयेत् ॥३१॥ अंगुष्ठादिवितस्त्यंतमाना स्वर्णादिधातुभिः । निर्मिता शुभदा गेहे पूजनाय दिने दिने ॥३२॥ वक्रां दग्धां खंडितां च भिन्नमूर्द्धवदृशं पुनः । स्पृष्टां वाध्यन्त्यजाद्यैश्च प्रतिमां नैव पूजयेत् ॥३३॥ बाणादिलिंगे वाप्यर्च्यत्सर्वलक्षणलक्ष्तेि । मूलेन मूर्तिसंकल्प्य ध्यात्वा देवं यथोदितम् ॥३४॥ आवाह्य पूजयेत्तस्यां परिवारगणैः सह । शालग्रामे स्थापिताया नावाहनविसर्जने ॥३५॥ पुष्पांजलिं समादाय ध्यात्वा मंत्रमुदरियेत् । ॥३६॥ आत्मसंस्थमजं शुद्धं त्वामहं परमेश्वर । अरण्यामिव हव्याशं मूर्तावावाहयाम्यहम् ॥३७॥ तवेयं हि महामूर्तितस्तस्यां त्वां सर्वगं प्रभो । भक्तितस्नेहसमाकृष्टं दीपवत्स्थापयाम्यहम् ॥३८॥ सर्वान्तर्यामिणे देवं सर्वबीजमयं शुभम् । स्वात्मस्थाय परं शुद्धमासनं कल्पयाम्यहम् ॥३६॥ को सींचे । अथवा मूल गायत्री से पूजा सामग्री पर विधिपूर्वक जल छिड़के। पहले अपने आगे कुछ आधार रख कर उस पर पुष्प, अक्षत, यव, कुश, तिल, सरसों, गन्ध, और दूर्वा आदि से भरा पात्र रखे : पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय और मधुपर्क के लिये पात्र रखे । सांवा, दूब, कमल और विष्णुक्रान्ता से मिले जल से पाद्य दिया जाता है ॥२२-२६॥ फूल, अक्षत, यव, कुशाग्र, तिल, सरसों, गन्ध और दूर्वादल से युक्त जल का अर्घ्य दिया जाता है। पाद्य और अर्घ्य के अनन्तर आचमनीय जल देना चाहिये । जाती फल, कंकोल, लवंग, मधु, घी, दही मिलाकर मधुपर्क बनाया जाता है । अथवा पाद्य अर्घ्य के लिये पृथक्-पृथक् पात्र न रखकर एक ही में पाद्य आदि दे । शंकर और सूर्य की पूजा में शंख ही श्रेष्ठ पात्र है । ॥२७-२९॥ श्वेत, नील, अरुण, पीत, श्याम, कुछ रक्त वर्ण की, काली, और धवल वर्ण की पीठ शक्तियों का स्मरण करना चाहिये । सोना आदि धातुओं से लिखे हुए यन्त्र में शालग्राम पर मणि या विधिपूर्वक स्थापित प्रतिमा की पूजा प्रशस्त है । अंगूठे से लेकर एक वित्ते परिमाण की सुवर्ण आदि धातु की बनी प्रतिमा प्रति दिन घर में पूजने के लिये शुभ मानी गई है । टेढ़ी, जली, टूटी-फूटी, नेत्र हीन, शिर जिसका टूट गया हो अथवा चाण्डालों से छू गई हो ऐसी प्रतिमा की पूजा नहीं करनी चाहिये । सब लक्षणों से युक्त वाण आदि शिवलिंगों की भी पूजा शुभ मानी गई है ॥३०-३३३॥ मूल मन्त्र से मूर्तिपूजन का संकल्प कर इष्ट देवता का ध्यान कर परिवार के सहित आवाहन कर उस मूर्ति में पूजन करना चाहिये । शालग्राम में स्थापित मूर्ति का आवाहन और विसर्जन नहीं होता है । सब से पहले पुष्पांजलि हाथ में लेकर ध्यानपूर्वक आगे के मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये । परमेश्वर, आत्म- स्थ, अज, शुद्ध, तुमको मैं अरणी में प्रतिष्ठित अग्नि के समान इस मूर्ति में स्थापित करता हूँ । यह तुम्हारी महिमा मूर्ति है । प्रभो, सर्व व्यापक, भक्ति और स्नेह से आकृष्ट होने वाले सर्वान्तर्यामी, शुभ, सर्वबीजमयं तुमको इसमें दीपक की भाँति स्थापित करता हूँ । प्रभो, देवेश, आत्माराम तुमको इस शुद्ध आसन को अर्पित

५७६ नारदीयपुराणम् अनन्या तव देवेश मूर्त्तिशक्तिरियं प्रभो। सांनिध्यं कुरु तस्यां त्वं भक्तानुग्रहकारक ॥४०॥ अज्ञानादुत मत्तत्वाद्वैकल्यात्साधनस्य च। यद्यपूर्णं भवेत्कल्पं तथाप्याभिमुखो भव ॥४१॥ दृशा पीयूषवर्षिण्या पूरयन्‌यज्ञविष्टरे। मूर्त्तौ वा यज्ञसंपूर्त्यै स्थितो भव महेश्वर ॥४२॥ अभक्तवाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रदूरायितद्यते। स्वतेजः पंजरेणाशु वेष्टितो भव सर्वतः ॥४३॥ यस्य दर्शनमिच्छन्ति देवाः स्वाभीष्टसिद्धये। तस्मै ते परमेशाय स्वागतं स्वागतं च मे ॥४४॥ कृतार्थोऽनुगृहीतोऽस्मि सफलं जीवितं मम। आगतो देवदेवेशः सुस्वागतमिदं पुनः ॥४५॥ यद्भक्तिलेशसंस्पर्शात्परमानंदसंभवः। तस्मै ते चरणाम्बजाय पाद्यं शुद्धाय कल्पते ॥४६॥ वेदानामति वेद्याय देवानां देवतात्मने। आचामं कल्पयामीश शुद्धानां शुद्धिहेतवे ॥४७॥ तापत्रयहरं दिव्यं परमानन्दलक्षणम्। तापत्रयविनिर्मुक्त्यै तवार्घ्यं कल्पयाम्यहम् ॥४८॥ सर्वकालुष्यहीनाय परिपूर्णसुखात्मने। मधुपर्कमिदं देव कल्पयामि प्रसीद मे ॥४९॥ उच्छिष्टोऽप्यशुचिर्वापि यस्य स्मरणमात्रतः। शुद्धिमाप्नोति तस्मै ते पुनराचमनीयकम् ॥५०॥ स्नेहं गृहाण स्नेहेन लोकनाथ महाशय। सर्वलोकेषु शुद्धात्मन्ददामि स्नेहमुत्तमम् ॥५१॥ परमानंदबोधाब्धिनिमग्ननिजमूर्तये। सांगोपांगमिदं स्नानं कल्पयाम्यहमोश ते ॥ सहस्रं वा शतं वापि यथाशक्त्यादरेण च ॥५२॥ गन्धपुष्पादिकैरीश मनुना चामिषिञ्चयेत् ॥५३॥ मायाचित्रपटच्छन्ननिजगुह्योद्यत्तेजसे । निरावरणविज्ञान वासस्ते कल्पयाम्यहम् ॥५४॥

कर रहा हूँ ॥३४-३९॥ यह तुम्हारी अनुपम मूर्ति है। भक्तों पर अनुग्रह करने वाले, उस मूर्ति में तुम सर्वदा विराजमान रहो। अज्ञानवश, प्रमादवश अथवा साधक के विकल्प से यदि कोई त्रुटि हो गई हो अथवा हो जाय तो भी तुम सर्वदा इसमें सुशोभित रहना। महेश्वर, अपनी अमृत बरसाने वाली दृष्टि से इस यज्ञ भूमि या मूर्ति में यज्ञ को सफल बनाने के लिये सर्वदा स्थित रहें ॥४०-४२॥ अभक्त जनों की वाणी, मन, चक्षु और श्रोत्र से अपने प्रकाश को दूर हो रखने वाले, आप अपने तेज पुंज से चारों ओर शीघ्र विस्तृत हो जायं। अपने मनोरथ को सिद्ध करने के लिये देवता भी जिसका दर्शन चाहते हैं उस परमेश को मेरा स्वागत है! स्वागत है! मैं कृतार्थ हो गया, अनुगृहीत हो गया है, मेरा जीवन सफल जिस की थोड़ी भक्ति करने से भी परम आनन्द प्राप्त होता है ऐसे देवदेवेश आ गये, आपका स्वागत है ॥४४-४५॥ उन आपके शुद्ध चरण कमल के लिये अर्घ्य प्रदान कर रहा हूँ जो वेदों के वेद्य और देवताओं के भी देवता है। ईश, शुद्ध को भी शुद्ध करने के लिये तीनों तापों को हरने वाले, दिव्य और परमानन्द रूप आचमन प्रदान कर रहा हूँ। सब प्रकार के पापों से रहित, परिपूर्ण सुख रूप आपके लिये तीनों तापों से मुक्त होने के लिये अर्घ्य प्रदान कर रहा हूँ। देव, आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों। आपके लिये यह मधुपर्क अर्पित कर रहा हूँ ॥४६-४९॥ अपवित्र और उच्छिष्ट भी जिसके स्मरण मात्र से पवित्र हो जाते हैं उस भगवान् के लिये पुनःआचमन दे रहा हूँ। लोकनाथ, महाशय, यह जल स्नेहपूर्वक ग्रहण करें। सब लोकों में शुद्धात्मा, परमानन्द ज्ञान रूपी समुद्र में सदा निमग्न रहने वाले आपको यह उत्तम स्नेह (जल) दे रहा हूँ। ईश, तुम्हारे सांगोपांग स्नान के लिये शक्त्यनुसार हजार या सौ बार स्नान जल प्रदान कर रहा हूँ। ॥५०-५२॥ इस मन्त्र से गन्ध और फूल मिश्रित जल से भगवान् को स्नान कराना चाहिये। निरावरण विज्ञान, माया रूपी चित्र पट से अपने गुह्य विपुल तेज को छिपा रखने वाले आपके लिये वास (वस्त्र) प्रदान कर रहा हूँ।

सप्तषष्टितमोऽध्यायः ५७७ यमाश्रित्य महामाया जगत्संमोहिनी सदा । तस्मै ते परमेशाय कल्पयाम्युत्तरीयकम् ॥५५॥ रक्तं शक्त्यर्कविघ्नेषु पीतं विष्णौ सितं शिवे । तैलादिदूषितं जीर्णं सच्छिद्रं मलिनं त्यजेत् ॥५६॥ यस्य शक्तित्रयेणेदं संप्रीतमखिलं जगत् । यज्ञसूत्राय तस्मै ते यज्ञसूत्रं प्रकल्पये ॥५७॥ स्वभावसुंदरांगाय नानाशक्त्याश्रयाय ते । भूषणानि विचित्राणि कल्पयाम्यमराचित ॥५८॥ परमानन्दसौरभ्यपरिपूर्णदिगंतरम । गृहाण परमं गंधं कृपया परमेश्वर ॥५६॥ तुरीयवनसंभूतं नानागुणमनोहरम् । अमंदसौरभं पुष्पं गृह्यतामिदमुत्तमम् । जपाक्षतार्कधत्त्रान्विष्णौ नैवार्पयेत्क्वचित् ॥६०॥ केतकी कुटजं कुंदं बंधूकं केसरं जपाम् । मालतीपुष्पकं चैव नार्पयेत्तु महेश्वरे ॥६१॥ मातुलिंगं च तगरं रवौ नैवार्पयेत्क्वचित् । शक्तौ दूर्वार्कमंदारान् गणेशेतुलसीं त्यजेत् ॥६२॥ सरोजिनीदमनकौ तथा मरुबकः कुशः । विष्णुकान्ता नागवल्ली दूर्वापामार्गदाडिमो ॥६३॥ धात्री मुनियुतानां च पत्रैर्देवार्चनं चरेत् । कदली बदरी धात्री तितिणी बीजपुरकम् ॥६४॥ आम्रदाडिमजंबोरजंबूवनसन्नूहाः । एतेषां तु फलैः कुर्याद्देवतापूजनं बुधः ॥६५॥ शुष्कैस्तु नार्चयेद्देवं पत्रैः पुष्पैः फलैरपि ॥६६॥ धात्रीखदिरबिल्वानां तमालस्य दलानि च । छिन्नभिन्नान्यपि मुने न दूष्याणि जगुर्बुधाः ॥६७'। पद्ममामलकं तिष्ठेच्छुद्धं चैव दिनत्रयम् । सर्वदा तुलसी शुद्धा बिल्वपत्राणि वै तथा ॥६८॥ पलाशकाशकुसुमैस्तमालतुलसीदलैः । धात्रोदलैश्च दूर्वाभिर्नार्चयेज्जगदंबिकाम् ॥६६॥

जिस मायेश के आश्रय में रहकर महामाया सदा संसार को विमुग्ध रखती है उस परमेश के लिये उत्तरीय वस्त्र प्रदान कर रहा हूँ ॥५३-५५॥ शक्ति, सूर्य और गणेश को रक्त वर्ण का, विष्णु को पीले वर्ण का और शिव को श्वेत वर्ण का वस्त्र प्रदान करना चाहिये । तेल आदि से मलिन, पुराना, फटा और गन्दा वस्त्र नहीं देना चाहिये । जिसकी तीनों शक्ति से सारा संसार प्रसन्न रहता है उस यज्ञ के आधार आप के लिये यज्ञोपवीत प्रदान कर रहा हूँ ॥५६-५७॥ देव पूजित, सहज सुन्दर और नाना प्रकार की शक्तियों के आधार आपको विचित्र भूषण प्रदान कर रहा हूँ । परमेश्वर ! अपने परम आनन्ददायक सुगन्ध से दिग्-दिगन्तर को सुगन्धित करने वाले इस परम उत्कृष्ट गन्ध को स्वीकार कीजिये ॥५८-५९॥ नन्दन वन में उत्पन्न अपनी विशेषता से मनोहर और उत्कृष्ट सुगन्ध वाले इस पुष्प को स्वीकार करें । जपाकुसुम (अड़उल), अक्षत, अर्क और धतूरे के फूल को विष्णु प्रतिमा पर नहीं चढ़ाना चाहिये । केतकी, कुटज, कुंद, बन्धूक, केसर, जपा और मालती पुष्प को महेश्वर पर नहीं चढ़ाना चाहिये । मातुलिंग और तगर का उपयोग सूर्य पूजन में नहीं करना चाहिये । शक्ति पर दूर्वा, अर्क और मन्दार पुष्प और गणेश पर तुलसी पत्र नहीं चढ़ाना चाहिये । सरोजिनी, दमनक, मरुबक, कुश, विष्णुक्रान्ता, नागवल्ली, दूर्वा, अपामार्ग (चिचड़ा), अनार, आंवला और मुनियुत की पत्तियों से देवार्चन करना चाहिये ॥६०-६३३॥ विद्वान् व्यक्ति केला, बेर, आँवला, इमली, बीजपूरक, आम, अनार, जंबीर नीबू, जामुन, कटहल आदि के फलों से देवता पूजन करें । सूखे पत्र, पुष्प या फल से देव पूजन नहीं करना चाहिये । मुने, पंडितों ने आंवला, खैर, विल्व और तमाल की पत्तियां को यदि कटी हुई या टूटी हुई भी हों तो भी पूजा के लिये प्रशस्त माना है । कमल और आँवला तीन दिन तक शुद्ध रहते हैं । विल्व पत्र और तुलसीदल सर्वदा शुद्ध रहते हैं ॥६४-६९॥ पलाश, राड़ो के फूल, ७३ ना० पु०

५७८ नारदीयपुराणम् नार्पयेत्कुसुमं पत्रं फलं देवे ह्यधोमुखम् । पुष्पपत्रादिकं विप्र यथोत्पन्नं तथापयेत् ॥७०॥ वनस्पतिरसं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् । आत्रेयं देवदेवेश धूपं भक्त्या गृहाण मे ॥७१॥ सप्रकाशं महादीपं सर्वदा तिमिरापहम् । घृतवर्तिसमायुक्तं गृहाण मम सत्कृतम् ॥७२॥ अन्नं चतुर्विधं स्वादु रसैः षड्भिः समन्वितम् । भक्त्या गृहाण मे देव नैवेद्यं तुष्टिदं सदा ॥७३॥ नागवल्लीदलं श्रेष्ठं पूगखदिरचूर्णयुक् । कर्पूरादिसुगंधाढ्यं यद्दत्तं तद्गृहाण मे ॥७४॥ दद्यात्पुष्पाञ्जलिं पश्चात्कुर्यादावरणार्चनम् ॥७५॥ यदाशाभिमुखो भूत्वा पूजनं तु समाचरेत् । सैव प्राची तु विज्ञेया ततोऽन्या विदिशो दश ॥७६॥ केशरेष्वग्निकोणादिहृदयादीनि पूजयेत् । नेत्रमग्ने दिक्षु चास्त्रं अंगमंत्रैर्यथाक्रमम् ॥७७॥ शुक्लश्वेतसितश्यामकृष्णरक्तार्चिषः क्रमात् । वराभयकरा ध्येयाः स्वस्वदिक्ष्वंगशक्तयः ॥७८॥ अमुकावरणांते तु देवता इति संवदेत् । सालंकारास्ततः पश्चात्सान्गाः सपरिवारिकाः ॥७९॥ सवाहनाः सायुधाश्च ततः सर्वोपचारकैः । संपूजितास्तर्पिताश्च वरदाः संत्विदं पठेत् ॥८०॥ मूलांते च समुच्चार्य देवतायै निवेदयेत् । अभीष्टसिद्धि मे देहि शरणागतवत्सल ॥८१॥ भक्त्या समर्पये तुभ्यममुकावरणार्चनम् । इत्युच्चार्य क्षिपेत्पुष्पाञ्जलिं देवस्य मस्तके ॥८२॥ ततस्त्वभ्यर्चनीयाःस्युः कल्पोक्ताश्चावृतोः क्रमात् । सायुधांस्तत इंद्राद्यान्स्वस्वदिक्षु प्रपूजयेत् ॥८३॥

तमाल और तुलसीदल, आंवले की पत्तियों और दूब से जगदम्बा का पूजन नहीं करना चाहिये । किसी देवता पर फूल-पत्तियां और फल को उलटा करके नहीं चढ़ाना चाहिये । विप्र ! वे जिस प्रकार उत्पन्न होते हैं उनको उसी प्रकार चढ़ाना चाहिये । देवदेवेश, सुमनोहर, दिव्य, अत्यन्त सुगन्धित वनस्पति रूप सूँघने योग्य धूप को ग्रहण करें, इस मन्त्र से धूप देना चाहिये। सुप्रकाश, सदा अन्धकार को नष्ट करने वाले, घी की वृत्तियों से युक्त इस महादीप को मैं आदरपूर्वक अर्पित करता हूँ, आप ग्रहण करें ॥६९-७२॥ देव, स्वादिष्ट, षड्रस से युक्त चार प्रकार के भोज्य पदार्थ और तुष्टि प्रदान करने वाले नैवेद्य को मैं अर्पित कर रहा हूँ, आप ग्रहण करें। 'सुपारी और खैर से युक्त श्रेष्ठ ताम्बूल पत्र जिसमें सुगन्धित द्रव्य केसर आदि पड़े हुए हैं, इसको मैं अर्पित कर रहा हूँ स्वीकार करें, इस मन्त्र से ताम्बूल अर्पित करे। ताम्बूल अर्पण के अनन्तर पुष्पांजलि दे और आवरण पूजा करे ॥७३-७५॥ जिस दिशा की ओर मुख करके पूजन किया जाता है उसको पूर्व दिशा कहते हैं। अन्य दश दिशायें विदिशा हैं। अग्नि कोण में केशरों के ऊपर हृदय आदि का पूजन करे। इसी प्रकार अन्य कोणों में क्रमशः नेत्र और अस्त्र आदि का अंग मन्त्र से पूजन करे ॥७६॥ इसके अनन्तर शुक्ल, श्वेत, कृष्ण, श्याम, असित (नील) और रक्त वर्ण की प्रभा से पूर्ण, वर और अभय प्रदान करने वाली अंग शक्तियों को क्रमशः उनकी दिशाओं में ध्यान करना चाहिये । अमुक देव का वरण करता हूँ इस कथन के अन्त में देवता का नाम अवश्य रखना चाहिये । तत्पश्चात् उन देवताओं को अलंकार, अंग, उनके सेवक, वाहन और अस्त्रों के सहित षोडशोपचार से पूजे । भली-भांति उनका पूजन और तर्पण करने के अन्त में 'वरदाः सन्तु' अवश्य कहे। पूजा के अन्त में ऊँचे स्वर से देवता से निवेदन करे ॥७७-८०३॥ शरणागत वत्सल, मेरे मनोरथों को पूर्ण करें, भक्तिपूर्वक मैं तुमको आवरणार्चन अर्पित कर रहा हूँ, इस मन्त्र का उच्चारण कर देवता के मस्तक पर पुष्पांजलि छोड़ दे ॥८१-८२॥ तत्पश्चात् कल्पोक्त देवताओं का क्रमशः पूजन करना चाहिये। आयुधों के सहित इन्द्र आदि देवताओं को उनकी दिशाओं में पूजे। इन्द्र, अग्नि, यम, कुबेर, वरुण, पवन, चन्द्रमा,

सप्तषष्टितमोऽध्यायः ५७६

इंद्रो वह्निर्यमो रक्षो वरुणः पवनो विधः । ईशानोऽथ विधिश्चैवमधस्तात्पन्नगाधिपः ॥८४॥ ऐरावतस्तथा मेषो महिषः प्रेतस्तिमिरमृगः । वाजी वृषो हंसकूर्मौ वाहनानि विदुर्बुधाः ॥८५॥ वज्रं शक्तिं दण्डखङ्गौ पाशांकुशगदा अपि । त्रिशूलं शंखचक्रे च क्रमाद्विद्रादिहेतयः ॥८६॥ समाप्यावरणार्चां तु देवतारातिकं चरेत् । शंखतोयं परिक्षिप्योद्वाहून्नृत्यन् पतेत्क्षितौ ॥८७॥ दंडवच्चाप्यथोत्थाय प्रार्थयित्वा निजेश्वरम् । दक्षिणे स्थंडिलं कृत्वा तत्र संस्कारमाचरेत् ॥८८॥ मूलेनेक्षणमस्त्रेण प्रोक्षणं ताडनं पुनः । कुशैस्तद्दर्भमाभ्युक्ष्य पूज्य तत्र न्यसेदसूम् ॥८९॥ प्रदाप्य तत्र जुहुयाद्ध्यात्वा चैवेष्टदेवताम् । महाव्याहृतिभिर्यस्तुसमस्ताभिश्चतुष्टयम् ॥९०॥ जुहुयात्सर्पिषा भक्तैस्तिलैर्वा पायसेन वा । सघृतैः साधकश्रेष्ठः पंचविंशतिसंख्यया ॥९१॥ पुनर्ब्याहृतिभिर्हुत्वा गंधाद्यैः पुनरर्चयेत् । देवं संयोजयेन्मूर्ती ततो वह्निं विसर्जयेत् ॥९२॥ भो भो वह्ने महाशक्ते सर्वमंत्रप्रसाधक । कर्मांतरेऽपि संप्राप्ते सान्निध्यं कुरु सादरम् ॥९३॥ विसृज्याग्निदेवतायै दद्यादाचमनीयकम् । अवशिष्टेन हविषा गंधपुष्पाक्षतान्वितम् ॥९४॥ देवताषार्षदेभ्योऽपि पूर्वोक्तेभ्योर्बलिं ददेत् । ये रौद्रा रौद्रकर्माणो रौद्रस्थाननिवासिनः ॥९५॥ योगिन्यो ह्यनुरूपाश्च गणानामधिपाश्च ये । विघ्नभूतास्तथा चान्ये दिग्विdictसुसमाश्रिताः ॥९६॥ सर्वे ते प्रीतम नसः प्रतिगृह्णन्त्विमं बलिम् । इत्यष्टदिक्षु दत्त्वा च पुनर्भूतबलिं चरेत् ॥९७॥ पानीयममृतीकृत्य मुद्रया धेनुसंज्ञया । देवतायाः करे दद्यात्पुनश्चाचमनीयकम् ॥९८॥

ईशान और विधि तथा पाताल के स्वामी शेषनाग क्रमशः दिशाओं के स्वामी हैं। ऐरावत, मेष, भैंसा, प्रेत, तिमि (मछली), मृग, अश्व, बैल, हंस और कछुआ उपर्युक्त देवों के वाहन हैं यह पंडित लोग जानते हैं । ।।८३-८५।। वज्र, शक्ति, दंड, खड्ग, पाश, कुश, गदा, त्रिशूल और यज्ञ तथा चक्र इनके अस्त्र हैं। आवरणार्चन समाप्त करने के अनन्तर आरती करनी चाहिये। शंख जल को पृथ्वी पर गिरा कर दोनों हाथों को ऊपर उठाकर नाचते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े । इस प्रकार दण्डवत् प्रणाम करने के उपरान्त उठ कर अपने इष्ट देव की प्रार्थना कर दक्षिण भाग में एक वेदी बनाकर उस पर संस्कार कर्म प्रारम्भ करे । मूल मन्त्र से उस वेदी का निरीक्षण कर अस्त्र से जल छिड़के और हाथ से पीट कर उसको बराबर करे, कुश से उसको झाड़ कर उस वेदी पर जल छिड़के, पूजा करे और उस पर अग्नि की स्थापना करे । अग्नि को प्रदीप्तकर अपने इष्ट देवता का ध्यान कर हवन करे ।।८६-८६।। साधक पहले समस्त महाव्याहृतियों से चार बार घी का हवन करे । पच्चीस बार घी मिले हुए भात, तिल अथवा पायस की आहुतियां दे । फिर व्याहृतियों से हवन कर गन्ध आदि से अग्नि की पूजा करे । प्रतिष्ठापित प्रतिमा में देव को प्रतिष्ठित कर अग्नि देव का विसर्जन कर दे । हे हे महाशक्ति, सब कार्यों को सम्पन्न करने वाले वह्निदेव, इस हवन कर्म के अतिरिक्त कर्मों में भी आप प्रेमपूर्वक सहायता करें, इस मन्त्र से अग्नि का विसर्जन करे । इस कर्म के अनन्तर उनको आचमन करा दे । बची हुई हवन सामग्री से गन्ध, पुष्प, अक्षत के सहित पूर्वोक्त देव पार्षदों को बलि दे । ।।६०-६४½।। बलि मन्त्र :- 'जो रौद्र' रौद्र कर्म करने वाले, रौद्र स्थान में निवास करने वाले, भयङ्कर रूप वाले, योगिनियाँ, गणों के अधिपति और विभिन्न दिशाओं और दिगन्तरों में रहने वाले विघ्नकारक पार्षद हैं प्रसन्नता पूर्वक इस बलि को ग्रहण करें । इस मन्त्र से आठों दिशाओं में बलि देकर भूत बलि दे ।।९५-९७।। तत्पश्चात् धेनुमुद्रा द्वारा जल का अमृतीकरण करके इष्ट देवता के हाथ में पुनः आचमनीय के लिए जल दे। फिर मूर्ति में स्थित देवता का विसर्जन करके पुनः उस मूर्ति में ही उनको प्रतिष्ठित करे। तत्पश्चात् भगवत्प्रसादभोजी पार्षद को नैवेद्य दे । महादेव जी