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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 595, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 595

५७६ नारदीयपुराणम् अनन्या तव देवेश मूर्त्तिशक्तिरियं प्रभो। सांनिध्यं कुरु तस्यां त्वं भक्तानुग्रहकारक ॥४०॥ अज्ञानादुत मत्तत्वाद्वैकल्यात्साधनस्य च। यद्यपूर्णं भवेत्कल्पं तथाप्याभिमुखो भव ॥४१॥ दृशा पीयूषवर्षिण्या पूरयन्‌यज्ञविष्टरे। मूर्त्तौ वा यज्ञसंपूर्त्यै स्थितो भव महेश्वर ॥४२॥ अभक्तवाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रदूरायितद्यते। स्वतेजः पंजरेणाशु वेष्टितो भव सर्वतः ॥४३॥ यस्य दर्शनमिच्छन्ति देवाः स्वाभीष्टसिद्धये। तस्मै ते परमेशाय स्वागतं स्वागतं च मे ॥४४॥ कृतार्थोऽनुगृहीतोऽस्मि सफलं जीवितं मम। आगतो देवदेवेशः सुस्वागतमिदं पुनः ॥४५॥ यद्भक्तिलेशसंस्पर्शात्परमानंदसंभवः। तस्मै ते चरणाम्बजाय पाद्यं शुद्धाय कल्पते ॥४६॥ वेदानामति वेद्याय देवानां देवतात्मने। आचामं कल्पयामीश शुद्धानां शुद्धिहेतवे ॥४७॥ तापत्रयहरं दिव्यं परमानन्दलक्षणम्। तापत्रयविनिर्मुक्त्यै तवार्घ्यं कल्पयाम्यहम् ॥४८॥ सर्वकालुष्यहीनाय परिपूर्णसुखात्मने। मधुपर्कमिदं देव कल्पयामि प्रसीद मे ॥४९॥ उच्छिष्टोऽप्यशुचिर्वापि यस्य स्मरणमात्रतः। शुद्धिमाप्नोति तस्मै ते पुनराचमनीयकम् ॥५०॥ स्नेहं गृहाण स्नेहेन लोकनाथ महाशय। सर्वलोकेषु शुद्धात्मन्ददामि स्नेहमुत्तमम् ॥५१॥ परमानंदबोधाब्धिनिमग्ननिजमूर्तये। सांगोपांगमिदं स्नानं कल्पयाम्यहमोश ते ॥ सहस्रं वा शतं वापि यथाशक्त्यादरेण च ॥५२॥ गन्धपुष्पादिकैरीश मनुना चामिषिञ्चयेत् ॥५३॥ मायाचित्रपटच्छन्ननिजगुह्योद्यत्तेजसे । निरावरणविज्ञान वासस्ते कल्पयाम्यहम् ॥५४॥

कर रहा हूँ ॥३४-३९॥ यह तुम्हारी अनुपम मूर्ति है। भक्तों पर अनुग्रह करने वाले, उस मूर्ति में तुम सर्वदा विराजमान रहो। अज्ञानवश, प्रमादवश अथवा साधक के विकल्प से यदि कोई त्रुटि हो गई हो अथवा हो जाय तो भी तुम सर्वदा इसमें सुशोभित रहना। महेश्वर, अपनी अमृत बरसाने वाली दृष्टि से इस यज्ञ भूमि या मूर्ति में यज्ञ को सफल बनाने के लिये सर्वदा स्थित रहें ॥४०-४२॥ अभक्त जनों की वाणी, मन, चक्षु और श्रोत्र से अपने प्रकाश को दूर हो रखने वाले, आप अपने तेज पुंज से चारों ओर शीघ्र विस्तृत हो जायं। अपने मनोरथ को सिद्ध करने के लिये देवता भी जिसका दर्शन चाहते हैं उस परमेश को मेरा स्वागत है! स्वागत है! मैं कृतार्थ हो गया, अनुगृहीत हो गया है, मेरा जीवन सफल जिस की थोड़ी भक्ति करने से भी परम आनन्द प्राप्त होता है ऐसे देवदेवेश आ गये, आपका स्वागत है ॥४४-४५॥ उन आपके शुद्ध चरण कमल के लिये अर्घ्य प्रदान कर रहा हूँ जो वेदों के वेद्य और देवताओं के भी देवता है। ईश, शुद्ध को भी शुद्ध करने के लिये तीनों तापों को हरने वाले, दिव्य और परमानन्द रूप आचमन प्रदान कर रहा हूँ। सब प्रकार के पापों से रहित, परिपूर्ण सुख रूप आपके लिये तीनों तापों से मुक्त होने के लिये अर्घ्य प्रदान कर रहा हूँ। देव, आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों। आपके लिये यह मधुपर्क अर्पित कर रहा हूँ ॥४६-४९॥ अपवित्र और उच्छिष्ट भी जिसके स्मरण मात्र से पवित्र हो जाते हैं उस भगवान् के लिये पुनःआचमन दे रहा हूँ। लोकनाथ, महाशय, यह जल स्नेहपूर्वक ग्रहण करें। सब लोकों में शुद्धात्मा, परमानन्द ज्ञान रूपी समुद्र में सदा निमग्न रहने वाले आपको यह उत्तम स्नेह (जल) दे रहा हूँ। ईश, तुम्हारे सांगोपांग स्नान के लिये शक्त्यनुसार हजार या सौ बार स्नान जल प्रदान कर रहा हूँ। ॥५०-५२॥ इस मन्त्र से गन्ध और फूल मिश्रित जल से भगवान् को स्नान कराना चाहिये। निरावरण विज्ञान, माया रूपी चित्र पट से अपने गुह्य विपुल तेज को छिपा रखने वाले आपके लिये वास (वस्त्र) प्रदान कर रहा हूँ।