बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 594, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तषष्टितमोऽध्यायः ५७५ अथवा मूलगायत्र्या पूजाद्रव्याणि प्रोक्षयेत् । पाद्यार्घ्याचमनीयार्थं मधुपर्कार्थमप्युत ॥२५॥ पात्राण्याधारयुक्तानि स्थापयेद्विधिना पुनः । पाद्यं श्यामाकदूर्वाब्जविष्णुक्रांतजलैः स्मृतम् ॥२६॥ अर्घ्यं पुष्पाक्षतयवैः कुशाग्रतिलसर्षपैः । गंधदूर्वादलैः प्रोक्तं ततश्चाचमनीयकम् ॥२७॥ जातीफलं च कंकोलं लवंगं च जलान्वितम् । क्षौद्राज्यदधिसंमिश्रं मधुपर्कत्समीरितम् ॥२८॥ एकस्मिन्नथवापात्रे पाद्यादीनि प्रकल्पयेत् । शंकराकार्चने शंखमयैर्नैव प्रशस्यते ॥२९॥ श्वेताकृष्णाऽरुणापीताश्यामारक्तासितासिताः । रक्तांबराञ्जयकरा ध्येयास्स्युः पीठशक्तयः ॥३०॥ स्वर्णादिलिखिते यंत्रे शालग्रामे मणौ तथा । विधिना स्थापितायां वा प्रतिमायां प्रपूजयेत् ॥३१॥ अंगुष्ठादिवितस्त्यंतमाना स्वर्णादिधातुभिः । निर्मिता शुभदा गेहे पूजनाय दिने दिने ॥३२॥ वक्रां दग्धां खंडितां च भिन्नमूर्द्धवदृशं पुनः । स्पृष्टां वाध्यन्त्यजाद्यैश्च प्रतिमां नैव पूजयेत् ॥३३॥ बाणादिलिंगे वाप्यर्च्यत्सर्वलक्षणलक्ष्तेि । मूलेन मूर्तिसंकल्प्य ध्यात्वा देवं यथोदितम् ॥३४॥ आवाह्य पूजयेत्तस्यां परिवारगणैः सह । शालग्रामे स्थापिताया नावाहनविसर्जने ॥३५॥ पुष्पांजलिं समादाय ध्यात्वा मंत्रमुदरियेत् । ॥३६॥ आत्मसंस्थमजं शुद्धं त्वामहं परमेश्वर । अरण्यामिव हव्याशं मूर्तावावाहयाम्यहम् ॥३७॥ तवेयं हि महामूर्तितस्तस्यां त्वां सर्वगं प्रभो । भक्तितस्नेहसमाकृष्टं दीपवत्स्थापयाम्यहम् ॥३८॥ सर्वान्तर्यामिणे देवं सर्वबीजमयं शुभम् । स्वात्मस्थाय परं शुद्धमासनं कल्पयाम्यहम् ॥३६॥ को सींचे । अथवा मूल गायत्री से पूजा सामग्री पर विधिपूर्वक जल छिड़के। पहले अपने आगे कुछ आधार रख कर उस पर पुष्प, अक्षत, यव, कुश, तिल, सरसों, गन्ध, और दूर्वा आदि से भरा पात्र रखे : पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय और मधुपर्क के लिये पात्र रखे । सांवा, दूब, कमल और विष्णुक्रान्ता से मिले जल से पाद्य दिया जाता है ॥२२-२६॥ फूल, अक्षत, यव, कुशाग्र, तिल, सरसों, गन्ध और दूर्वादल से युक्त जल का अर्घ्य दिया जाता है। पाद्य और अर्घ्य के अनन्तर आचमनीय जल देना चाहिये । जाती फल, कंकोल, लवंग, मधु, घी, दही मिलाकर मधुपर्क बनाया जाता है । अथवा पाद्य अर्घ्य के लिये पृथक्-पृथक् पात्र न रखकर एक ही में पाद्य आदि दे । शंकर और सूर्य की पूजा में शंख ही श्रेष्ठ पात्र है । ॥२७-२९॥ श्वेत, नील, अरुण, पीत, श्याम, कुछ रक्त वर्ण की, काली, और धवल वर्ण की पीठ शक्तियों का स्मरण करना चाहिये । सोना आदि धातुओं से लिखे हुए यन्त्र में शालग्राम पर मणि या विधिपूर्वक स्थापित प्रतिमा की पूजा प्रशस्त है । अंगूठे से लेकर एक वित्ते परिमाण की सुवर्ण आदि धातु की बनी प्रतिमा प्रति दिन घर में पूजने के लिये शुभ मानी गई है । टेढ़ी, जली, टूटी-फूटी, नेत्र हीन, शिर जिसका टूट गया हो अथवा चाण्डालों से छू गई हो ऐसी प्रतिमा की पूजा नहीं करनी चाहिये । सब लक्षणों से युक्त वाण आदि शिवलिंगों की भी पूजा शुभ मानी गई है ॥३०-३३३॥ मूल मन्त्र से मूर्तिपूजन का संकल्प कर इष्ट देवता का ध्यान कर परिवार के सहित आवाहन कर उस मूर्ति में पूजन करना चाहिये । शालग्राम में स्थापित मूर्ति का आवाहन और विसर्जन नहीं होता है । सब से पहले पुष्पांजलि हाथ में लेकर ध्यानपूर्वक आगे के मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये । परमेश्वर, आत्म- स्थ, अज, शुद्ध, तुमको मैं अरणी में प्रतिष्ठित अग्नि के समान इस मूर्ति में स्थापित करता हूँ । यह तुम्हारी महिमा मूर्ति है । प्रभो, सर्व व्यापक, भक्ति और स्नेह से आकृष्ट होने वाले सर्वान्तर्यामी, शुभ, सर्वबीजमयं तुमको इसमें दीपक की भाँति स्थापित करता हूँ । प्रभो, देवेश, आत्माराम तुमको इस शुद्ध आसन को अर्पित