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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 593, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 593

५७४ नारदीयपुराणम् नेत्रं मध्ये दिक्षु चास्त्रं त्रिकोणे पूजयेत्ततः । मूलखंडत्रयेणाथा धारशक्तिं तु मध्यगाम् ॥८॥ एवं सम्पूज्य विधिनाऽस्त्रसंक्षालितं हृदा । प्रतिष्ठाप्य त्रिपदिकां पूजयेन्मनुनामुना ॥९॥ मं वह्निमण्डलायेति ततो दशकलालने । अमुकार्घ्येति पात्रांते सनापहृदयोँतिमे ॥११॥ चतुर्विंशतिवर्णोऽयमाधारस्यार्चने मनुः । स्वमंत्रक्षालितं शंखं संस्थाप्याथ समर्पयेत् ॥१२॥ तारः काम्मर्महांस्ते तु ततो जलचराय च । वर्म फट् हृदयं पांचजन्याय हृदयं मनुः ॥१३॥ तवार्कमण्डलायेति द्वादशांते कलात्मने । अमुकार्घ्येति पात्रांते नमोन्तस्त्वक्षिवर्णवान् ॥१४॥ सम्पूज्य तेन तत्राचेद्द्वादशार्ककलाः क्रमात् । ततः शुद्धजलैर्मलं विलोममातृकां पठन् ॥१५॥ शङ्खमापूरयेत्तस्मिन्पूजयेन्मनुनामुना । ओं सोममण्डलायेति षोडशांते कलात्मने ॥१६॥ अमुकार्घ्यामृतायेति हृन्मनुश्चार्घ्यपूजने । तत्र षोडशसंख्याका यजेच्चंद्रमसः कलाः ॥१७॥ ततस्तु तीर्थान्यावाह्य गङ्गे चेत्यादिपूर्वकत् । गोमुद्रयाऽमृतीकृत्याच्छादयेन्मत्स्यमुद्रया ॥१८॥ कवचेनावगुंठ्याथ रक्षेद्रस्त्रेण तत्पुनः । चिंतयित्वाष्टदेवं च ततो मुद्राः प्रदर्शयेत् ॥१९॥ शङ्ख मौशलचक्राख्याः परमीकरणं ततः । महामुद्रां योनिमुद्रां दर्शयेत्क्रमतः सुधीः ॥२०॥ गारुडी गालिनी चैव मुख्ये मुद्रे प्रकीर्तिते । गन्धपुष्पादिभिस्तत्र पूजयेद्देवतां स्मरन् ॥२१॥ अष्टकृत्वो जपेन्मूलं प्रणवं चाष्टधा तथा । शंखाद्दक्षिणदिग्भागे प्रोक्षणीपात्रनादिशेत् ॥२२॥ प्रोक्षण्यां तज्जलं किंचित्कृत्वात्मानं त्रिधा ततः । आत्मतत्त्वात्मने हृच्च विद्यातत्त्वात्मने नमः ॥२३॥ शिवतत्त्वात्मने हृच्च इत्येतैर्मनुभिस्त्रिभिः । प्रोक्षेत्पुष्पाक्षतैश्चापि मण्डलं विधिवत्सुधीः ॥२४॥ मध्य में नेत्र की और त्रिकोण में अस्त्र की पूजा करे । मूल के तीन खण्डों से मध्य-गामिनी आधार शक्ति की पूजा करे ॥८-९॥ इस प्रकार भली-भांति पूजा करके अस्त्र से उसको सींचकर हृदय से त्रिपदिका (तीन पैर वालो) की स्थापना कर 'मं वह्निमण्डलाय' मन्त्र से उसकी पूजा करे । तत्पश्चात् दश कलात्मा को 'अमुक कार्घ्येति पात्रान्ते सनाप हृदयान्तिमे, इस मन्त्र से पूजे । यह चौबीस अक्षरों का मन्त्र है जिसका प्रयोग आधार के पूजन में किया जाता है। अपने मन्त्र से क्षालित (धोये हुए) शंख को स्थापित कर उस शंख की पूजा करे । शंख पूजन मन्त्र 'तारःकार्म्म महांस्तेतु ततो जलचराय च वर्म फट् हृदयं पांचजन्याय हृदयम्' । उस चक्र में अर्कमण्डल के निमित्त बारह कलावाले सूर्य की पूजा करे । मन्त्र - अमुकार्घ्येति पात्रान्ते नमोऽन्तस्त्वक्षिवर्णवान्' इस मन्त्र से सूर्य को पूजा कर उसी मण्डल में बारह कलाओं की क्रमशः पूजा करे ॥१०-१४६॥ सूर्य पूजन के अनन्तर विलोम मातृका का उच्चार नकरते हुए शुद्ध जल से शंख को भर दे । 'ओं सोममण्डलायषोडशान्त कलात्मने अमुकार्थ्या- मृताय' इस मन्त्र से अर्घ्य पूजन करे । उस सोम मण्डल में चन्द्रमा को सोलह कलाओं की पूजा करे ॥१५-१६॥ गंगे च यमुने.....'इस मन्त्र से तीर्थों का आवाहन कर गोमुद्रा से अमृतीकरण करे, मत्स्य मुद्रा से उसको आच्छादित कर कवच से उसको पुनः ढक दे । अस्त्र से उसकी रक्षा कर इष्ट देव का चिन्तन कर मुद्रा दिखलावे । चतुर साधक शंख, मौशल, चक्र, परमीकरण, महामुद्रा और योनि मुद्रा का प्रदर्शन करे । गारुडी और गालिनी को मुख्य मुद्रा कहते हैं । उस स्थान पर देवता का स्मरण करते हुए गन्ध-पुष्प आदि से पूजा करे ॥१७-२१॥ उस समय आठ बार मूल मन्त्र को और आठ बार प्रणव का जप करे । शंख के दक्षिण भाग में प्रोक्षणी पात्र को रखे । प्रोक्षणी में थोड़ा सा जल रख कर उसको अपने ऊपर तीन बार छिड़के । तदनन्तर 'आत्मतत्त्वात्मने हृच्च विद्यातत्त्वात्मने नमः शिवतत्त्वात्मने हृच्च शिवतत्त्वात्मने नमः इन तीन मन्त्रों से पुष्प अक्षत से विधिवूवर्क मण्डल