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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 592

षट्षष्टितमोऽध्यायः ५७३ ॥१५१॥ न्यस्यांगषट्कं तन्मूर्त्तौ ततः पूजनमारभेत् इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे संध्यादिनिरूपणं नाम षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥६६॥ सप्तषष्टितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ वक्ष्ये देवपूजां साधकाभीष्टसिद्धिदाम् । त्रिकोणं चतुरस्रं वा वामभागे प्रकल्प्य च ॥१॥ सम्पूज्यास्त्रेण संक्षाल्य हृदाधारं निधाय च । तत्राग्निसण्डलं चेद्वा पात्रं संक्षाल्य चास्त्रतः ॥२॥ आधारे नमसं स्थाप्य तत्र चेद्रविमंडलम् । विलोममातृका मूलमुच्चरन्पूरयेज्जलैः ॥३॥ तवैंदुमंडलं प्रार्च्य तीर्थान्यावाह्य पूर्ववत् । गोमुद्रयाऽमृतीकृत्य कवचेनावगुंठयेत् ॥४॥ संक्षाल्यास्त्रेण प्रणवं तदुपर्यष्टधा जपेत् । सामान्यार्घमिदं प्रोक्तं सर्वसिद्धिकरं नृणाम् ॥५॥ तज्जलं किंचिदुद्धृत्य प्रोक्षण्या साधकोत्तमः । आत्मानं यागवस्तूनि तेन संप्रोक्षयेत्पृथक् ॥६॥ आत्मवामाग्रतः कुर्यात्षट्कोणांतस्त्रिकोणकम् । चतुरस्रेण संवेष्ट्य संक्षाल्यार्घोदकेन च ॥७॥ ततस्तु साधकश्रेष्ठः स्तंभयेच्छंखमुद्रया । आग्नेयादिषु कोणेषु हृदाद्यंगचतुष्टयम् ॥८॥ फट्--इस प्रकार संयोजना करे) । तत्पश्चात् आयुध और आभूषणों सहित इष्टदेव का ध्यान करके उनकी मूर्ति में छह अंगों का न्यास करने के पश्चात् पूजन प्रारंभ करे । ॥१४६-१५१॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में संध्यादि-निरूपण नामक छाठवां अध्याय समाप्त ॥६६॥ अध्याय ६७ देव पूजन की विधि सनत्कुमार बोले-इसके अनन्तर साधकों को अभीष्ट सिद्धि देने वाले देवपूजन की विधि बतला रहा हूँ। सब से पहले बायें भाग में चौकोर या तिकोना मण्डल स्थापित कर उसको अस्त्र (मन्त्र) से सींच कर उसमें हृदाधार बनाये ॥१॥ यदि अग्नि स्थापना करनी हो तो अग्नि मण्डल बनाये और पात्र को अस्त्र से धोकर आधार स्थान में चमस रखकर सूर्य मण्डल की भावना करे। विलोम-मातृकामूल का उच्चारण करते हुए उस पात्र को जल से भरे । फिर उसमें चन्द्र-मण्डल की पूजा करके पूर्व वत् उसमें तीर्थों का आवाहन करे। उसको गोमुद्रा से अमृतमय बनाकर कवच से उसको ढक दे ॥२-४॥ अस्त्र (मन्त्र) से उस पर जल छिड़क कर, प्रणव का आठ बार जप करे। यह मनुष्यों को सब प्रकार की सिद्धियां देने वाला सामान्य अर्घ कहा गया है। उत्तम साधक प्रोक्षणी में से थोड़ा सा जल लेकर अपने और यज्ञिय वस्तुओं पर छिड़के। अपनी बाईं ओर उससे आगे षट् कोणान्त त्रिभुज बनावे । उसको चतुर्भुज से घेर कर अर्घ-जल से सींचे ॥५-७॥ इतनी क्रिया के अनन्तर वह श्रेष्ठ साधक शंख मुद्रा से स्तम्भन करे। आग्नेय आदि कोणों में हृदय आदि अंगों की स्थापना करे। सब दिशाओं के