सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 591, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 591

५७२ नारदीयपुराणम् पांशांकुशाभयवरान्दधानं कंजहस्तया । पत्न्याश्लिष्टं रक्ततनुं त्रिनेत्रं गणपं भजेत् ॥१३६॥ एवं ध्यात्वा न्यसेत्स्वीयबीजपूर्वाक्षरान्वितम् । निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्या शांतिस्तथेंधिका ॥१४०॥ दीपिका रेचिका चापि मोचिका च पराभिधा । सूक्ष्मासूक्ष्मामृता ज्ञानामृता चाप्यायिनी तथा ॥१४१॥ व्यापिनी व्योमरूपा चानंता सृष्टिः समृद्धिका । स्मृतिर्मेधा ततः कांतिर्लक्ष्मीर्धृतिः स्थिरा स्थितिः ॥१४२॥ सिद्धिर्जरा पालिनी च क्षांतिरीश्वरिका रतिः । कामिका वरदा वाथा ह्लादिनी प्रीतिसंयुता ॥१४३॥ दीर्घा तीक्ष्णा तथा रौद्रा प्रोक्ता निद्रा च तंद्रिका । क्षुधा च क्रोधिनी पश्चात्क्रियाकारी स्मृत्युका ॥१४४॥ पीता श्वेतारुणा पश्चादसितानंतया युता । उक्ता कलामातृकैवं तत्तद्भक्तः समाचरेत् ॥१४५॥ कलायुक्तमातृकायास्तु मुनिः प्रोक्तः प्रजापतिः । गायत्रीछन्द आख्यातं देवता शारदाभिधा ॥१४६॥ ह्रस्वदीर्घान्तरस्थैश्च तारैः कुर्यात्षडंगकम् । पद्मचक्रगुणैणांश्च दधतीं च त्रिलोचनाम् ॥१४७॥ पञ्चवक्त्रां भारतीं तां मुक्ताभूषां भजेत्सुधीः । ध्यात्वैवं तारपूर्वां तां न्यसेन्डेन्तकलान्विताम् ॥१४८॥ ततश्च मूलमन्त्रस्य षडंगानि समाचरेत् । हृदयादिचतुर्थ्यन्ते जातीः संयोज्य विन्यसेत् ॥१४६॥ नमः स्वाहा वषट् हुं वो षट् फट् जातय ईरिताः । ततो ध्यात्वेष्टदेवं तं भूषायुधसमन्वितम् ॥१५०॥

है तथा उनके तीन नेत्र हैं, ऐसे गणपति का मैं भजन करता हूँ । इस प्रकार ध्यान करके स्वकीय बीज को पूर्वाक्षर के रूप में रखकर उक्त मातृका न्यास करना चाहिए । ॥१३६-१३९॥ निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति, इन्धिका, दीपिका, रोचिका, मोचिका, सूक्ष्मा, असूक्ष्मा, अमृता, ज्ञाना- मृता, आप्यायिनी, व्यापिनी, व्योमरूपा, अनन्ता, सृष्टि, समृद्धिका, स्मृति, मेधा, कान्ति, लक्ष्मी, धृति, स्थिरा, स्थिति, सिद्धि, जरा, पालिनी, क्षान्ति, ईश्वरी, रति, कामिका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति, दीर्घा, तीक्ष्णा, रौद्रा, निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा, क्रोधिनी, क्रियाकरी, मृत्यु, पीता, श्वेता, अरुणा, असिता और अनन्ता--इस प्रकार कला मातृका कही गई है। भक्त पुरुष उन-उन मातृकाओं का न्यास करे ॥१४०-१४५॥ इस कलामातृका के प्रजापति ऋषि कहे गये हैं। इसका छन्द गायत्री और देवता शारदा हैं। ह्रस्व और दीर्घस्वर के बीच में प्रणव रखकर उसी के द्वारा षडंगन्यास करे। यथा--अं ओम् आं हृदयाय नमः, इं ओम् ईं शिरसे स्वाहा, उं ओम् ऊँ शिखायै वषट्, एं ओम् ऐं कवचाय हुम्, ओ ओम् औं नेत्रत्रयाय वौषट्, अं ओम् अः अस्त्राय फट्) । विद्वान् पुरुष मोतियों के आभूषणों से विभूषित पञ्चमुखी शारदा देवी का भजन (ध्यान) करे। उनके तीन नेत्र हैं तथा वे अपने हाथों में पद्म, चक्र, गुण (त्रिशूल अथवा पाश) तथा एण (मृगचर्म) धारण करती हैं। इस प्रकार ध्यान करके ओम् पूर्वक चतुर्थ्यन्त कलायुक्त मातृका का न्यास करे (यथा--ओम् अं निवृत्यै नमः ललाटे, ओम् आं प्रतिष्ठायै नमः मुखवृत्ते इत्यादि)। तदनन्तर मूलमन्त्र के छहों अंगों का न्यास करना चाहिए। 'हृदय' आदि चतुर्थ्यन्त पद में अंगन्यास-सम्बन्धी जातियों का संयोग करके न्यास करे। नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् और फट्-ये छह जातियाँ कही गई हैं (अर्थात् हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट् कवचाय हुम्, नेत्रत्रयाय वौषट्, अस्त्राय