बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 590, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्षष्टितमोऽध्यायः ५७१ अर्धेन्दुशेखरं त्र्यक्षं देवदेवं विचिन्तयेत् । ध्यात्वैवं शिवशक्तीश्च चतुर्थी हृदयांतिमे ॥१२३॥ सौबीजसातका पूर्वे विन्यसेन्मातृकास्थले । विघ्नेशश्च ह्रिया युक्तो विघ्नराजः श्रिया युतः ॥१२४॥ विनायकस्तथा पुष्ट्या शांतियुक्तः शिवोत्तमः । विघ्नकृत्स्वस्तिसंयुक्तो विघ्नहर्ता सरस्वती ॥१२५॥ स्वाहया गणनायश्च एकदंतः सुमेधया । कांत्या युक्तो द्विदंतस्तु कामिन्या गजवक्त्रकः ॥१२६॥ निरंजनो मोहिनीयुक्तकपर्दी नटीयुतः । दीर्घजिह्वः पार्वतीयुग्ज्वालिन्या शंकुकर्णकः ॥१२७॥ वृषध्वजो नन्दया च सुरेशा गणनायकः । गजेन्द्रः कामरूपिण्या शूर्पकर्णस्तथोमया ॥१२८॥ विरोचनस्तेजोवत्या सत्यालम्बोदरेण च । महानंदश्च विघ्नेश्या चतुर्मूतिस्वरूपिणी ॥१२९॥ सदाशिवः कामदयाह्ला आमोदो मदजिह्वया । दुर्मुखो भूतिसंयुक्तः सुमुखो भुकुटीयुतः ॥१३०॥ प्रमोदः सितया युक्त एकपादो रज़ायुतः । द्विजिह्वो महिषीयुक्तो जंभिन्या शूरनामकः ॥१३१॥ वीरो विकर्णया युक्तः षण्मुखो भुकुटीयुतः । वरदो लज्जया वामदेवेशो दीर्घघोणया ॥१३२॥ धनुर्द्धर्धा वक्रतुंडो द्विरंडो यामिनी युतः । सेनानी रात्रिसंयुक्तः कामांधो ग्रामणीयुतः ॥१३३॥ मत्तश्चशशिप्रभायुक्तो विमलो लोलनेत्रया । मत्तवाहश्चंचलया जटी दीप्तिसमन्वितः ॥१३४॥ मुंडो सुभगया युक्तः खङ्गी दुर्गया युतः । वरेण्यश्च शिवायक्तो भगया वृषकेतनः ॥१३५॥ भक्तप्रियो भोगन्या च गणेशो योगिनीयुतः । मेघनादः सुभगया व्यापी स्यात्कालरात्रियुक् ॥१३६॥ गणेश्वरः कालिकया प्रोक्ता विघ्नेशमातृकाः । गणेशमातृकायास्तु गणो मुनिभिरीरितः ॥१३७॥ त्रिवृद्गायत्रिकाछन्दो देवः शक्तिगणेश्वरः । षड्दीर्घाढ्येन बीजेन कृत्यांगानि ततः स्मरेत् ॥१३८॥
इस प्रकार शिवशक्ति का ध्यान करके अन्त में चतुर्थी विभक्ति और नमः पद जोड़कर तथा आदि में गणेशजी का अपना बीज लगाकर मातृकास्थल में एक-एक मातृकावर्ण के साथ शक्ति सहित गणेशजी का न्यास करे। ह्री के साथ विघ्नेश तथा श्री के साथ विघ्नराज का न्यास करे। पुष्टि के के साथ विनायक, शान्ति के साथ शिवोत्तम, स्वस्ति सहित विघ्नकृत्, सरस्वती सहित विघ्नहर्ता, स्वाहा सहित गणनाय, सुमेधासहित एकदन्त, कान्तिसहित द्विदन्त, कामिनीसहित गजमुख, मोहिनीसहित निरञ्जन, नटी सहित कपर्दी, पार्वतीसहित दीर्घजिह्व, ज्वालिनोसहित शंकुकर्ण, नन्दासहित वृषध्वज, सुरेशासहित गणनायक, कामरूपिणी के साथ गजेन्द्र, उमा के साथ शूर्पकर्ण, तेजोवती के साथ विरोचन, सती के साथ लम्बोदर, विघ्नेशी के साथ महानन्द, सुरूपिणीसहित चतुर्मूति ।।१२३-१२९।। कामदासहित सदाशिव, मदजिह्वा सहित आमोद, भूतिसहित दुर्मुख, भौतिकी के साथ सुमुख, सिता के साथ प्रमोद, रमा के साथ एकपाद, महिषी के साथ द्विजिह्व, जम्भिनी के साथ शूर, विकर्णा के साथ वीर, भुकुटीसहित षण्मुख, लज्जा के साथ वरद, दीर्घघोणा के साथ वामदेवेश, धनुर्धरो के साथ वक्रतुण्ड, यामिनी के साथ द्विरण्ड, रात्रि सहित सेनानी, ग्रामणी सहित कामान्ध, शशिप्रभा के साथ मत्त, लोलनेत्रा के साथ विमत्त, चंचला के साथ मत्तवाह, दीप्ति के साथ जटो, सुभगा के साथ मुण्डी, दुर्भगा के साथ खङ्गी, शिवा के साथ वरेण्य, भगा के साथ वृषकेतन, ।।१३०-१३५।। भगिनी के साथ भक्तप्रिय, भोगिनी के साथ गणेश, सुभगा के साथ मेघनाद, कालरात्रिसहित व्यापी तथा कालिका के साथ गणेश का अपने अंगों में न्यास करना चाहिए। इस प्रकार विघ्नेश मातृका का वर्णन किया गया है। गणेश मातृका के गण ऋषि कहे गये हैं। निवृद् गायत्री छन्द है तथा सहित गणेश्वर देवता हैं। छह दीर्घ स्वरों से युक्त गणेशबीज (गां गीं गूं गं गौं गः) के द्वारा अंग न्यास करके उनका इस प्रकार ध्यान करे-गणेशजी अपनी चारों भुजाओं में क्रमशः पाश, अंकुश, अभय और वर धारण किये हुए हैं, उनकी पत्नी सिद्धि हाथ में कमल ले उनसे सटकर बैठी हैं। उनका शरीर रक्त वर्ग का