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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 596, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 596

सप्तषष्टितमोऽध्यायः ५७७ यमाश्रित्य महामाया जगत्संमोहिनी सदा । तस्मै ते परमेशाय कल्पयाम्युत्तरीयकम् ॥५५॥ रक्तं शक्त्यर्कविघ्नेषु पीतं विष्णौ सितं शिवे । तैलादिदूषितं जीर्णं सच्छिद्रं मलिनं त्यजेत् ॥५६॥ यस्य शक्तित्रयेणेदं संप्रीतमखिलं जगत् । यज्ञसूत्राय तस्मै ते यज्ञसूत्रं प्रकल्पये ॥५७॥ स्वभावसुंदरांगाय नानाशक्त्याश्रयाय ते । भूषणानि विचित्राणि कल्पयाम्यमराचित ॥५८॥ परमानन्दसौरभ्यपरिपूर्णदिगंतरम । गृहाण परमं गंधं कृपया परमेश्वर ॥५६॥ तुरीयवनसंभूतं नानागुणमनोहरम् । अमंदसौरभं पुष्पं गृह्यतामिदमुत्तमम् । जपाक्षतार्कधत्त्रान्विष्णौ नैवार्पयेत्क्वचित् ॥६०॥ केतकी कुटजं कुंदं बंधूकं केसरं जपाम् । मालतीपुष्पकं चैव नार्पयेत्तु महेश्वरे ॥६१॥ मातुलिंगं च तगरं रवौ नैवार्पयेत्क्वचित् । शक्तौ दूर्वार्कमंदारान् गणेशेतुलसीं त्यजेत् ॥६२॥ सरोजिनीदमनकौ तथा मरुबकः कुशः । विष्णुकान्ता नागवल्ली दूर्वापामार्गदाडिमो ॥६३॥ धात्री मुनियुतानां च पत्रैर्देवार्चनं चरेत् । कदली बदरी धात्री तितिणी बीजपुरकम् ॥६४॥ आम्रदाडिमजंबोरजंबूवनसन्नूहाः । एतेषां तु फलैः कुर्याद्देवतापूजनं बुधः ॥६५॥ शुष्कैस्तु नार्चयेद्देवं पत्रैः पुष्पैः फलैरपि ॥६६॥ धात्रीखदिरबिल्वानां तमालस्य दलानि च । छिन्नभिन्नान्यपि मुने न दूष्याणि जगुर्बुधाः ॥६७'। पद्ममामलकं तिष्ठेच्छुद्धं चैव दिनत्रयम् । सर्वदा तुलसी शुद्धा बिल्वपत्राणि वै तथा ॥६८॥ पलाशकाशकुसुमैस्तमालतुलसीदलैः । धात्रोदलैश्च दूर्वाभिर्नार्चयेज्जगदंबिकाम् ॥६६॥

जिस मायेश के आश्रय में रहकर महामाया सदा संसार को विमुग्ध रखती है उस परमेश के लिये उत्तरीय वस्त्र प्रदान कर रहा हूँ ॥५३-५५॥ शक्ति, सूर्य और गणेश को रक्त वर्ण का, विष्णु को पीले वर्ण का और शिव को श्वेत वर्ण का वस्त्र प्रदान करना चाहिये । तेल आदि से मलिन, पुराना, फटा और गन्दा वस्त्र नहीं देना चाहिये । जिसकी तीनों शक्ति से सारा संसार प्रसन्न रहता है उस यज्ञ के आधार आप के लिये यज्ञोपवीत प्रदान कर रहा हूँ ॥५६-५७॥ देव पूजित, सहज सुन्दर और नाना प्रकार की शक्तियों के आधार आपको विचित्र भूषण प्रदान कर रहा हूँ । परमेश्वर ! अपने परम आनन्ददायक सुगन्ध से दिग्-दिगन्तर को सुगन्धित करने वाले इस परम उत्कृष्ट गन्ध को स्वीकार कीजिये ॥५८-५९॥ नन्दन वन में उत्पन्न अपनी विशेषता से मनोहर और उत्कृष्ट सुगन्ध वाले इस पुष्प को स्वीकार करें । जपाकुसुम (अड़उल), अक्षत, अर्क और धतूरे के फूल को विष्णु प्रतिमा पर नहीं चढ़ाना चाहिये । केतकी, कुटज, कुंद, बन्धूक, केसर, जपा और मालती पुष्प को महेश्वर पर नहीं चढ़ाना चाहिये । मातुलिंग और तगर का उपयोग सूर्य पूजन में नहीं करना चाहिये । शक्ति पर दूर्वा, अर्क और मन्दार पुष्प और गणेश पर तुलसी पत्र नहीं चढ़ाना चाहिये । सरोजिनी, दमनक, मरुबक, कुश, विष्णुक्रान्ता, नागवल्ली, दूर्वा, अपामार्ग (चिचड़ा), अनार, आंवला और मुनियुत की पत्तियों से देवार्चन करना चाहिये ॥६०-६३३॥ विद्वान् व्यक्ति केला, बेर, आँवला, इमली, बीजपूरक, आम, अनार, जंबीर नीबू, जामुन, कटहल आदि के फलों से देवता पूजन करें । सूखे पत्र, पुष्प या फल से देव पूजन नहीं करना चाहिये । मुने, पंडितों ने आंवला, खैर, विल्व और तमाल की पत्तियां को यदि कटी हुई या टूटी हुई भी हों तो भी पूजा के लिये प्रशस्त माना है । कमल और आँवला तीन दिन तक शुद्ध रहते हैं । विल्व पत्र और तुलसीदल सर्वदा शुद्ध रहते हैं ॥६४-६९॥ पलाश, राड़ो के फूल, ७३ ना० पु०