बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५७८ नारदीयपुराणम् नार्पयेत्कुसुमं पत्रं फलं देवे ह्यधोमुखम् । पुष्पपत्रादिकं विप्र यथोत्पन्नं तथापयेत् ॥७०॥ वनस्पतिरसं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् । आत्रेयं देवदेवेश धूपं भक्त्या गृहाण मे ॥७१॥ सप्रकाशं महादीपं सर्वदा तिमिरापहम् । घृतवर्तिसमायुक्तं गृहाण मम सत्कृतम् ॥७२॥ अन्नं चतुर्विधं स्वादु रसैः षड्भिः समन्वितम् । भक्त्या गृहाण मे देव नैवेद्यं तुष्टिदं सदा ॥७३॥ नागवल्लीदलं श्रेष्ठं पूगखदिरचूर्णयुक् । कर्पूरादिसुगंधाढ्यं यद्दत्तं तद्गृहाण मे ॥७४॥ दद्यात्पुष्पाञ्जलिं पश्चात्कुर्यादावरणार्चनम् ॥७५॥ यदाशाभिमुखो भूत्वा पूजनं तु समाचरेत् । सैव प्राची तु विज्ञेया ततोऽन्या विदिशो दश ॥७६॥ केशरेष्वग्निकोणादिहृदयादीनि पूजयेत् । नेत्रमग्ने दिक्षु चास्त्रं अंगमंत्रैर्यथाक्रमम् ॥७७॥ शुक्लश्वेतसितश्यामकृष्णरक्तार्चिषः क्रमात् । वराभयकरा ध्येयाः स्वस्वदिक्ष्वंगशक्तयः ॥७८॥ अमुकावरणांते तु देवता इति संवदेत् । सालंकारास्ततः पश्चात्सान्गाः सपरिवारिकाः ॥७९॥ सवाहनाः सायुधाश्च ततः सर्वोपचारकैः । संपूजितास्तर्पिताश्च वरदाः संत्विदं पठेत् ॥८०॥ मूलांते च समुच्चार्य देवतायै निवेदयेत् । अभीष्टसिद्धि मे देहि शरणागतवत्सल ॥८१॥ भक्त्या समर्पये तुभ्यममुकावरणार्चनम् । इत्युच्चार्य क्षिपेत्पुष्पाञ्जलिं देवस्य मस्तके ॥८२॥ ततस्त्वभ्यर्चनीयाःस्युः कल्पोक्ताश्चावृतोः क्रमात् । सायुधांस्तत इंद्राद्यान्स्वस्वदिक्षु प्रपूजयेत् ॥८३॥
तमाल और तुलसीदल, आंवले की पत्तियों और दूब से जगदम्बा का पूजन नहीं करना चाहिये । किसी देवता पर फूल-पत्तियां और फल को उलटा करके नहीं चढ़ाना चाहिये । विप्र ! वे जिस प्रकार उत्पन्न होते हैं उनको उसी प्रकार चढ़ाना चाहिये । देवदेवेश, सुमनोहर, दिव्य, अत्यन्त सुगन्धित वनस्पति रूप सूँघने योग्य धूप को ग्रहण करें, इस मन्त्र से धूप देना चाहिये। सुप्रकाश, सदा अन्धकार को नष्ट करने वाले, घी की वृत्तियों से युक्त इस महादीप को मैं आदरपूर्वक अर्पित करता हूँ, आप ग्रहण करें ॥६९-७२॥ देव, स्वादिष्ट, षड्रस से युक्त चार प्रकार के भोज्य पदार्थ और तुष्टि प्रदान करने वाले नैवेद्य को मैं अर्पित कर रहा हूँ, आप ग्रहण करें। 'सुपारी और खैर से युक्त श्रेष्ठ ताम्बूल पत्र जिसमें सुगन्धित द्रव्य केसर आदि पड़े हुए हैं, इसको मैं अर्पित कर रहा हूँ स्वीकार करें, इस मन्त्र से ताम्बूल अर्पित करे। ताम्बूल अर्पण के अनन्तर पुष्पांजलि दे और आवरण पूजा करे ॥७३-७५॥ जिस दिशा की ओर मुख करके पूजन किया जाता है उसको पूर्व दिशा कहते हैं। अन्य दश दिशायें विदिशा हैं। अग्नि कोण में केशरों के ऊपर हृदय आदि का पूजन करे। इसी प्रकार अन्य कोणों में क्रमशः नेत्र और अस्त्र आदि का अंग मन्त्र से पूजन करे ॥७६॥ इसके अनन्तर शुक्ल, श्वेत, कृष्ण, श्याम, असित (नील) और रक्त वर्ण की प्रभा से पूर्ण, वर और अभय प्रदान करने वाली अंग शक्तियों को क्रमशः उनकी दिशाओं में ध्यान करना चाहिये । अमुक देव का वरण करता हूँ इस कथन के अन्त में देवता का नाम अवश्य रखना चाहिये । तत्पश्चात् उन देवताओं को अलंकार, अंग, उनके सेवक, वाहन और अस्त्रों के सहित षोडशोपचार से पूजे । भली-भांति उनका पूजन और तर्पण करने के अन्त में 'वरदाः सन्तु' अवश्य कहे। पूजा के अन्त में ऊँचे स्वर से देवता से निवेदन करे ॥७७-८०३॥ शरणागत वत्सल, मेरे मनोरथों को पूर्ण करें, भक्तिपूर्वक मैं तुमको आवरणार्चन अर्पित कर रहा हूँ, इस मन्त्र का उच्चारण कर देवता के मस्तक पर पुष्पांजलि छोड़ दे ॥८१-८२॥ तत्पश्चात् कल्पोक्त देवताओं का क्रमशः पूजन करना चाहिये। आयुधों के सहित इन्द्र आदि देवताओं को उनकी दिशाओं में पूजे। इन्द्र, अग्नि, यम, कुबेर, वरुण, पवन, चन्द्रमा,