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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 583, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 583

५६४ नारदीयपुराणम् मंत्रस्नानं ततः कुर्यात्तद्विधानमथोच्यते । देशकालौ च संकीर्त्य प्राणायामषडंगकैः ॥२४॥ कृत्वार्कमंडलात्तीर्थान्याह्वयेन्मुष्टिमुद्रया । ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि ते रखेः ॥२५॥ तेन सत्येन मे देव देहि तीर्थं दिवाकर ॥२६॥ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिंधुकावेरि जलेऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ॥२७॥ इत्यावाह्य जले तानि सुधाबीजेन योजयेत् । गोमुद्रयाऽमृतीकृत्य कवचेनावगुंठ्य च ॥२८॥ संरक्ष्यास्त्रेण तत्पश्चाच्चक्रमुद्रां प्रदर्शयेत् । वह््न्यर्केंदुमण्डलानि तत्र साचतयेद्बुधः ॥२९॥ मंत्रयेदर्कमन्त्रेण सुधाबीजेन तज्जलम् । मूलेन चैकादशधा तत्र संमंथ्य भावयेत् ॥३०॥ पूजायंत्रं च तन्मध्ये स्वांतादावाह्य देवताम् । स्नापयित्वार्चयेत्तां च मानसेरुपचारकैः ॥३१॥ सिंहासनस्थां तां नत्वा तज्जलं प्रणमेत्सुधीः । आधारः सर्वभूतानां विष्णोरतलतेजसः ॥३२॥ तद्रूपाश्च ततो जाता आपस्ताः प्रणमाम्यहम् । इति नत्वा समारुन्ध्य सप्तच्छिद्राणि साधकः ॥३३॥ निमज्ज्य सलिलेऽतस्मिन्मूलं देवाकृतिं स्मरेत् । निमज्ज्योन्मज्ज्य त्रिश्चैवं सिंचेत्कं कुंभमुद्रया ॥३४॥ त्रिमूलेन चतुर्मंत्रैरभिषिंचेन्निजां तनुम् । चत्वारो मनवस्तेऽत्र कथ्यन्ते तांत्रिका मुने ॥३५॥ सिसृक्षोर्निखिलं विश्वं मुहुः शुक्रं प्रजापतेः । मातरः सर्वभूतानामापो देव्यः पुनंतु माम् ॥३६॥ अलक्ष्मीर्मलरूपा या सर्वभूतेषु संस्थिता । क्षालयंति च तां स्पर्शादापो देव्यः पुनंतु माम् ॥३७॥

पहले देशकाल का नामोल्लेख कर संकल्प करे और षडङ्ग प्राणायाम करे फिर मुष्टि मुद्रा करके सूर्य मण्डल से तीर्थों का आवाहन करे । आवाहन मन्त्र - देव, तुम्हारी किरणें सारे ब्रह्माण्ड और तीर्थों (नदीजल या जल) का स्पर्श करती हैं । दिवाकर, उस सत्य के आधार पर आप मेरे लिये समस्त तीर्थों को मेरे समीप लावें । गंगे, यमुने, गोदावरि, सरस्वति, नर्मदे, सिन्धु, कावेरि ! इस जल में आकर आप निवास करें । इस प्रकार सबका आवाहन कर उनको सुधाबीज से उस जल में स्थापित करें ॥२४-२७$\frac{१}{२}$॥ गोमुद्रा से उसको अमृतमय बनाकर कवच से अवगुं- ठित कर अस्त्र से उसकी रक्षा कर चक्र मुद्रा का प्रदर्शन करे । बुध जन इस प्रकार जल को मुद्राओं द्वारा प्रभावित कर अग्नि, सूर्य और चन्द्र मण्डल का ध्यान करे । सूर्य के मन्त्र से उस जल को अभिमन्त्रित कर सुधाबीज से उसको पुनः अभिमन्त्रित करे । फिर ग्यारह बार मूल मन्त्र को पढ़कर उस जल को भावना- भावित करे ॥२८-३०॥ पूजा यन्त्र को उस भावित जल में स्थापित कर उसमें अपने हृदयस्थ देवता को स्थापित कर उस देवता को मानसिक (भावनामय) उपचारों से पूजा करे । इस भाँति पूजन करने के अनन्तर वह विद्वान् व्यक्ति सिहास- नस्थ उस देवता को प्रणाम कर उस जल को भी प्रणाम करे । प्रणाम मन्त्र - 'तुम (जल) सब प्राणियों के और अतुल तेजस्वी विष्णु के आधार हो, तदनन्तर तुम्हीं विष्णु के रूप भी बन गये इसलिये ऐसे जल को प्रणाम करता हूँ ॥३१-३२$\frac{१}{२}$॥ इस मन्त्र से नमस्कार कर साधक शरीर के सात छेदों (नाक, कान, आँख और मुँह) को मूंद कर उस जल में डुबकी लगावे और डूबे ही मूल देवाकृति का स्मरण करे । इस प्रकार तीन बार जल में डुबकी लगाये और ऊपर आये । पुनः कुम्भ मुद्रा से जल को सींच कर उसी जल से तीन बार और मन्त्र से चार बार अपने शरीर को सींचे । मुने, इस विषय के चार मन्त्र मुनियों ने बताये हैं । पहला -- बार-बार निखिल विश्व सृष्टि की इच्छा करने वाले प्रजापति के तुम शुक्र हो, और सब प्राणियों के एकमात्र जनक हो, जलदेव आपको नमस्कार है। आप मुझको पवित्र करें ॥३३-३६॥ दूसरा -- आप सब प्राणियों में मलरूपी जो अलक्ष्मी है उसको अपने स्पर्श