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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 584, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 584

षट्षष्टितमोऽध्यायः ५६५ यन्मे केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्द्धनि । ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद्घ्नन्तु वो नमः ॥३६॥ आयुरारोग्यमैश्वर्यमरिक्षयं शुभम् । सन्तोषः शांतिरास्तिक्यं विद्या भवतु वो नमः ॥३८॥ विप्रपादोदकं पीत्वा शालग्रामशिलाजलम् । पिबेद्विरुद्धं नो कुर्यादेषां तु नियतो विधिः ॥४०॥ पृथिव्यां यानि तीर्थानि दक्षांघ्रौ तानि भूसुरे । स्वेष्टदेवं समुद्ध्रास्य मन्त्री मार्तण्डमण्डले ॥४१॥ ततस्तीरं समागत्य वस्त्रं संक्षाल्य यत्नतः । वाससी परिधायाथ कुर्यात्सन्ध्यादिकं सुधीः ॥४२॥ रोगाद्यशक्तो मनुजः कुर्यात्तवाघमर्षणम् । अथवा भस्मना स्नातो रजोभिश्चैव वाऽक्षमः ॥४३॥ अथ सन्ध्यादिकं कुर्यात् स्थित्वा चैवासने शुभे । केशवेन तथा नारायणेन माधवेन च ॥४४॥ संप्राश्य तोयं गोविन्दविष्णुभ्यां क्षालयेत्करौ । मधुसूदनत्रिविक्रमाभ्यामोष्ठौ च मार्जयेत् ॥४५॥ वामनश्रीधराभ्यां च मुखं हस्तौ स्पृशेत्ततः । हृषीकेशपद्मनाभाभ्यां स्पृशेच्चरणौ ततः ॥४६॥ दामोदरेण मूर्द्धानं मुखं संकर्षणेन च । वासुदेवेन प्रद्युम्नेन स्पृशेन्नासिके ततः ॥४७॥ अनिरुद्धपुरुषोत्तमाभ्यां नेत्रे स्पृशेत्ततः । अधोक्षजनृसिंहाभ्यां श्रवणे संस्पृशेत्तथा ॥४८॥ नाभिं स्पृशेदच्युतेन जनार्दनेन वक्षसि । हरिणा विष्णुनांसौ च वैष्णवाचमनं त्विदम् ॥४९॥ प्रणवाद्यैर्ङेऽन्तैर्नमोऽन्तः केशवादिकनामभिः । मुखे नसोः प्रदेशिन्याऽनामया नेत्रकर्णयोः ॥५०॥ कनिष्ठया नाभिदेशं सर्वांगुष्ठयोजनम् । आत्मविद्याशिवस्तत्त्वैःस्वाहांतैः शिवमरीरितम् ॥५१॥ से धो देते हैं, ऐसे जल देव मुझको पवित्र करें। तीसरा-मेरे केशों में, सीमन्त में, मूर्द्धा, ललाट, कानों और आँखों में जो दुर्भाग्य है उसको शीघ्र नष्ट कर दें । आपको नमस्कार है ॥३७-३८॥ चौथा-मुझको आपकी कृपा से आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, शत्रुनाश, कल्याण, संतोष, शान्ति, आस्तिक भाव और विद्या प्राप्त हो । फिर ब्राह्मणों का चरणोदक तथा शालग्राम शिला का जल पान करे । कभी इसके विरुद्ध आचरण न करे । यह शास्त्र का नियत विधान है । पृथवी पर जितने तीर्थ हैं वे सब तीर्थ ब्राह्मणों के दाहिने चरण में रहते हैं। सूर्य मण्डल में अपने इष्ट देव को स्थापन और उसका पूजन करने के अनन्तर वह मन्त्री तीर पर आकर अपने वस्त्र को भली भाँति धो डाले । स्वयं नवीन वस्त्र पहन कर सन्ध्या वंदन आदि करे । ॥३६-४२॥ यदि कोई व्यक्ति रोग आदि के कारण इस प्रकार स्नान और सन्ध्यावन्दन आदि करने में असमर्थ हो तो वह केवल अघमर्षण करे। अथवा भस्म या रेणु से स्नान कर शुभ आसन पर बैठकर सन्ध्या आदि करे । सन्ध्योपासन विधि--केशवाय नमः, नारायणाय नमः, माधवाय नमः कह कर तीन बार आचमन कर गोविन्द- विष्णुभ्यां नमः कह कर दोनों हाथों को धो डाले । मधुसूदनत्रिविक्रमाभ्यां नमः कहकर दोनों ओठों को धो दे। तदनन्तर वामनश्रीधाराभ्यां नमः कहकर मुँह और दोनों हाथो का स्पर्श करे । हृषिकेशपद्मनाभाभ्यां नमः कहकर दोनों चरणों को छुवे ॥४३-४६॥ दामोदराय नमः से मूर्द्धा का और संकर्षणाय नमः से मुख का, वासुदेवाय नमः, प्रद्युम्नाय नमः कहकर दोनों नासिका-छिद्रों का स्पर्श करे ॥४७॥ अनिरुद्धपुरुषोत्तमाभ्यां नमः कहकर दोनों नेत्रों को, अधोक्षजनृसिंहाभ्यां नमः मन्त्र से दोनों कानों का, अच्युताय नमः कहकर नाभि का और जनार्दनाय नमः कहकर वक्षःस्थल का स्पर्श करे । हरये नमः, विष्णवे नमः कहकर दोनों कन्धों का स्पर्श करे । पुनः वैष्णवाय नमः कहकर आचमन करे। इस प्रकार अङ्ग स्पर्श करने के अनन्तर केशव आदि नामों के आदि में ओम् और अन्त में चतुर्थी विभक्ति और नमः जोड़कर अर्थात् ओम् केशवाय नमः आदि कहकर अंगूठा और प्रदेशिनी से मुख और नासिका का, अंगुष्ठा और अनामिका से आंखों और कानों का और कनिष्ठिका से नाभिदेश का स्पर्श करे । आत्मविद्या और शिवतत्त्व को स्वाहा से संयुक्त कर देने पर शैव मन्त्र कहा जाता है ॥४८-५१॥