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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 587

५६८ नारदीयपुराणम् विधातारं शंखपद्मनिधींश्च वामदक्षयोः । द्वारपालांस्ततोऽभ्यर्चेत्तत्तत्कल्पोदितान्सुधीः ॥७९॥ नंदः सुनंदश्चंडश्चप्रचंडः प्रचलोबलः । भद्रः सुभद्रश्चेत्याद्या वैष्णवा द्वारपालकाः ॥८२॥ नंदी भृंगी रिटी स्कंदो गणेशोमामहेश्वराः । वृषभश्च महाकालः शैवा वै द्वारपालकाः ॥८३॥ ब्राह्मयाद्या मातरोऽष्टौ तु शक्तयो द्वारस्थिताः स्वयम् । सेंदुः स्वनामाद्यर्णाद्या ङेन्तोक्ता इमे स्मृताः ॥८४॥ ततः स्थित्वासने धीमानाचम्य प्रयततः शुचिः । दिव्यांतरिक्षभौमांश्च विघ्नानुत्सार्य यत्नतः ॥८५॥ केशवाद्यां मातृकां तु न्यसेद्वैष्णवसत्तमः । केशवः कीर्तिसंयुक्तः कांत्या नारायणस्तथा ॥८६॥ माधवस्तुष्टिसहितो गोविन्दः पुष्टिसंयुतः । विष्णुस्तु धृतिसंयुक्तः शांतियुङ्मधुसूदनः ॥८७॥ त्रिविक्रमः क्रियायुक्तो वामनो दयितायुतः । श्रीधरो मेधया युक्तो हृषीकेशश्च हर्षया ॥८८॥ पद्मनाभयुता श्रद्धा लज्जा दामोदरान्विता । वासुदेवश्च लक्ष्मीयुक् संकर्षणसरस्वती ॥८९॥ प्रद्युम्नः प्रीतिसंयुक्तोऽनिरुद्धो रतिसंयुतः । चक्री जयायुतः पश्चाद्गदी दुर्गासमन्वितः ॥९०॥ शार्ङ्गी तु प्रभया युक्तः खड्गी युक्तस्तु सत्यया । शंखी चंडासमायुक्तो हली वाणीसमायुतः ॥९१॥ मुसली च विलासिन्या शूली विजयान्वितः । पाशी विरजया युक्तो कुशी विश्वासमन्वितः ॥९२॥ मुकुंदो विनतायुक्तो नंदजश्च सुनंदया । नंदी स्मृत्या समायुक्तो नरो वृद्ध्या समन्वितः ॥९३॥ समृद्धियुङ्नरकजिच्छुद्धियुक्तश्च हरिः स्मृतः । कृष्णो बुद्ध्या युतः सत्यो भुक्त्या मुक्त्याथ सात्वतः ॥९४॥ भाग में धाता और फिर बायें भाग में विधाता की, बायें और दाहिने भाग में शंख और पद्मनिधि की और तदनन्तर अपने कल्प के अनुसार विधिवत् द्वारपालों की पूजा करे। नन्द, सुनन्द, चण्ड, प्रचण्ड, प्रचल, बल, भद्र, सुभद्र ये वैष्णव द्वारपाल हैं ॥७९-८२॥ नन्दी, भृंगी, रिरि, स्कन्द, गणेश, उमा, महेश्वर, वृषभ (नन्दी) महाकाल इतने शैव द्वार पाल हैं। ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी आदि जो आठ मातृका शक्तियाँ हैं वे स्वयं ही द्वारपालिका हैं। इन सब के नाम के आदि अक्षर में अनुस्वार लगाकर उसे नाम के पहले बोलना चाहिए। नाम के चतुर्थी विभक्त्यन्त रूप के बाद नमः लगाना चाहिए। यथा- 'नं नन्दाय नमः' इत्यादि। इन्हीं नाम मन्त्रों से इन सब की पूजा करनी चाहिए। इतनी क्रिया कर लेने के उपरान्त वह धीमान् आसन पर बैठकर आचमन कर पवित्र हो सावधानी से दिव्य, अन्तरिक्षचारी और भौम (भूमि पर रहने वाले) विघ्नों को दूर कर केशव और आद्य मातृकाओं का न्यास करे ॥८३-८५॥ केशव को कीर्ति के सहित, नारायण को कान्ति, माधव को तुष्टि, गोविन्द को पुष्टि, विष्णु को धृति, मधु- सूदन को शान्ति, त्रिविक्रम को क्रिया, वामन को दयिता, श्रीधर को मेधा, हृषीकेश को हर्षा, पद्मनाभ को श्रद्धा, दामोदर को लज्जा, वासुदेव को लक्ष्मी, संकर्षण को सरस्वती, प्रद्युम्न को प्रीति, अनिरुद्ध को रति, चक्री को जया, गदी को दुर्गा, शार्ङ्गी को प्रभा, खड्गी को सत्या, शंखी को चण्डा, हली को वाणी, मुसली को विलासिनी, शूली को विजया, पाशी को विरजा, कुशी को विश्वा के साथ तथा इसी प्रकार मुकुन्द को विनता के साथ, नन्दज को सुनन्दा, नन्दी को स्मृति, नर को वृद्धि, नरकजित् को समृद्धि के सहित, हरि को शुद्धि, कृष्ण को बुद्धि, सत्य को भुक्ति, सात्वत को मुक्ति के सहित न्यस्त करे । ॥८६-६४॥ सौरि को क्षमा, शूर को रमा और जनार्दन को उमा