सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 588, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 588

षट्षष्टितमोऽध्यायः ५६६ सौरिक्षमे सुररमे उमायुक्तो जनार्दनः । भूधरः क्लेदिनीयुक्तो विश्वमूर्तिश्च क्लिन्नया ॥६५॥ वैकुण्ठो वसुधायुक्तो वसुदः पुरुषोत्तमः । बली तु परया युक्तो बलानुजपरायणे ॥६६॥ बालसूक्ष्मे वृषघ्नस्तु संध्यायुक् प्रज्ञया वृषः । हंसः प्रभासमायुक्तो वराहो निशया युतः ॥६७॥ विमलो धारया युक्तो नृसिंहो विद्युता युतः । केशवादिमातृकाया मुनिर्नारायणो मतः ॥६८॥ अमृताद्या च गायत्री छंदो विष्णुश्च देवता । चक्राद्यायुधसंयुक्तं कुंभादर्शधरं हरिम् ॥६६॥ लक्ष्मीयुतं विद्युदाभं बहुभूषावृतं भजेत् । एवं ध्यात्वा न्यसेच्छक्तिं श्रीकामपुटिताक्षरम् ॥१००॥ वदेत्तद्विष्णुशक्तिभ्यां हृदयं प्रणवादिकम् । त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राण्यसून्वदेत् ॥१०१॥ प्राणं क्रोधं तथा मभ्यामान्तान्यादिदशस्वपि । एकं मौलौ मुखे चैकं द्विकं नेत्रे द्विकं श्रुतौ ॥१०२॥ नसोर्द्वयं कपोले च द्वयं द्वे द्विरदच्छदे । एकं तु रसनामूले ग्रीवायामेकमेव च ॥१०३॥ कवर्गं दक्षिणे बाहौ चवर्गं वामबाहुके । टतवर्गौ पादयोस्तु पफौ कुक्षिद्वये न्यसेत् ॥१०४॥ पृष्ठवंशे वमित्युक्तं नाभौ भं हृदये तु मम् । यादिसप्तापि धातुस्था हं प्राणे लं तथात्मनि ॥१०५॥ क्षं क्रोधे क्रमतो न्यस्य विष्णु पूजाक्षमो भवेत् । पूर्णोदर्या तु श्रीकंठो ह्यनंतो विजरान्वितः ॥१०६॥ सूक्ष्मेशः शाल्मलीयुक्तो लोलाक्षीयुत्रिमूर्तिकः । महेश्वरो वर्तुलाक्ष्याधोशो वै दीर्घघोणया ॥१०७॥ के सहित, भूधर को क्लेदिनी, विश्व मूर्ति को क्लिन्ना, वैकुण्ठ को वसुधा और पुरुषोत्तम को वसुदा के सहित न्यस्त करे । परा को बली, परायणा के साथ बलानुज, सूक्ष्मा के साथ बाल, संध्या के साथ वृषहन्ता, प्रज्ञा के साथ वृष, प्रभा के साथ हंस, निशा के साथ वाराह, धारा के साथ विमल और विद्युता के साथ नृसिंह न्यास करना चाहिये । केशव आदि मातृका के मुनि नारायण हैं, अमृताद्या और गायत्री छन्द और देवता विष्णु हैं ॥९६-९८½॥ चक्र आदि आयुध से युक्त, लक्ष्मी के सहित हरि को जो कि अनेकों प्रकार के आभूषणों और विद्युत् प्रभा के समान प्रभावशाली, कुंभ और आदर्श (दर्पण) को धारण करने वाले हरि की उपासना करनी चाहिये । इस प्रकार ध्यान करके शक्ति 'ह्रीं', श्री (श्रीं) तथा काम 'क्लीं' बीज से सम्पुटित 'अ' एक-एक अक्षर का ललाट आदि में न्यास करे । उसके साथ आदि में प्रणव लगा कर श्री विष्णु और उनकी शक्ति के चतुर्थ्यन्त नाम बोल कर अन्त में नमः पद जोड़ कर बोले । त्वचा, शोणित, मांस, मेदस्, अस्थि, मज्जा, शुक्र, असु, प्राण तथा क्रोध का उच्चारण करे और इन्हें आदि-अंत में 'म' से संपुटित करके दस अंगों में न्यस्त करे । ॥९९-१०१½॥ एक अक्षर 'अ' का ललाट में, फिर एक अक्षर 'आ' का मुख में, दो अक्षर 'इ' और 'ई' का क्रमशः दाहिने और बायें कान में न्यास करे । दो अक्षर 'ऋ' 'ॠ' का दायीं-बायीं नासिका में, दो अक्षर 'ऌ' 'ॡ' का दायें-बायें कपोल में, दो अक्षर 'ए' 'ऐ' का ऊपर-नीचे के ओष्ठ में, दो अक्षर 'ओ' 'औ' का ऊपर-नीचे की दन्त-पंक्ति में, एक अक्षर 'अं' का जिह्वामूल में तथा एक अक्षर 'अः' का ग्रीवा में न्यास करे ॥१०२-१०३॥ दाहिनी बांह में क वर्ग का और बायीं बांह में च वर्ग का न्यास करे । ट वर्ग और त वर्ग का दोनों पैरों में तथा 'प' और 'फ' का दोनों कुक्षियों में न्यास करे । पृष्ठ वंश में 'ब' का, नाभि में 'भ' का और हृदय में 'म' का न्यास करे । 'य' आदि सात अक्षरों का शरीर की सात धातुओं में, 'ह' का प्राण में तथा 'ल' का आत्मा में न्यास करे । 'क्ष' का क्रोध में न्यास करना चाहिए । इस प्रकार क्रम से मातृका वर्णों का न्यास करके मनुष्य भगवान् विष्णु की पूजा में समर्थ होता है । ॥१०४-१०५½॥ पूर्णोदरी के साथ श्रीकण्ठेश का, विरजा के साथ अनन्तेश का, शाल्मली के साथ सूक्ष्मेश का, लोलाक्षी के साथ त्रिमूर्तीश का, वर्तुलाक्षी के साथ महेश का और दीर्घघोणा के साथ अधोश का न्यास करे । दीर्घमुखी के साथ भारभूतीश का, गोमुखी के साथ तिथिश का, दीर्घजिह्वा के साथ स्थाण्वीश का, कुण्डोदरी के साथ हरेश का, ७२ मा० पु०