बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्षष्टितमोऽध्यायः ५६७ एतद्धि सर्वपापघ्नं प्रोक्तं चैवाघमर्षणम् । ततश्च हस्तौ प्रक्षाल्य प्राग्वदाचम्य मंत्रवित् ॥६६॥ समुत्थाय च मंत्रज्ञस्ताम्रपात्रे सुमादिकम् । प्रक्षिप्यार्घ्यं प्रदद्याद्वै मूलांतैर्मंत्रमुच्चरन् ॥६७॥ रविमंडलसंस्थाय देवायार्घ्यं प्रकल्पयेत् । दत्वार्घं त्रिरनेनाथ देवं रविगतं स्मरेत् ॥६८॥ स्वकल्पोक्तां च गायत्रीं जपेदष्टोत्तरं शतम् । अष्टविंशतिवारं वा गुह्यातिमत्तुनार्पयेत् ॥६९॥ उदयदादित्यसंकाशां पुस्तकाक्षकरांबुजाम् । कृष्णाजिनांबरां ब्राह्मीं ध्यायेत्तारांकितेऽम्बरे ॥७०॥ मध्याह्नवरदां देवीं पार्वतीं संस्मरेत्पराम् । शुक्लांबरां वृषारूढां त्रिनेत्रां रविबिम्बगाम् ॥७१॥ वरं पाशं च शूलं च दधानां नृकरोटिकाम् । सायाह्ने रत्नसद्भूषां पीतकौशेयवाससाम् ॥७२॥ श्यामवर्णां चतुर्हस्तां शंखचक्रलसत्कराम् । गदापद्मधरां देवीं सूर्य्यासनकृताश्रयाम् ॥७३॥ ततो देवानृषींश्चैव पितृंश्चापि विधानवित् । तर्पयित्वा स्वेष्टदेवं तर्पयेत्कल्पमार्गतः ॥७४॥ गुरुपंक्ति च संतर्प्य सांगं सावरणं तथा । सायुधं वैनतेयं संतर्पयामीति तर्पयेत् ॥७५॥ नारदं पर्वतं विष्णुं निशठोद्धवदारुकान् । विष्वक्सेनं च शैलेयं वैष्णवः परितर्पयेत् ॥७६॥ एवं संतर्प्य विप्रेन्द्र दत्वार्घ्यं च विवस्वते । पूजागारं समागत्य प्रक्षाल्ययांघ्री उपस्पृशेत् ॥७७॥ अग्निहोत्रस्थितानग्नीन् हुत्वोपस्थाय यत्नतः । पूजास्थलं समागत्य द्वारपूजां समाचरेत् ॥७८॥ गणेशं चोर्ध्वशाखायां महालक्ष्मीं च दक्षिणे । सरस्वतीं वामभागे दक्षे विघ्नेश्वरं पुनः ॥७९॥ क्षेत्रपालं तथा वामे दक्षे गंगां प्रपूजयेत् । वामे च यमुनां दक्षे धातारं वामतस्तथा ॥८०॥ आचमन करे। तत्पश्चात् वह मन्त्री (मन्त्रज्ञ) उठकर ताम्रपात्र में फूल, चन्दन मिश्रित जल रखकर मूलान्त मन्त्र का उच्चारण करते हुये अर्घ्य प्रदान करे। यह अर्घ्य सूर्यमण्डलस्थ देव को दिया जाता है। उक्त मूलान्त मन्त्र से तीन अर्घ्य देकर रविमण्डलस्थ देवता का स्मरण करना चाहिये ॥६६-६८॥ सन्ध्या के अन्त में अपने कल्प के अनुसार गायत्री का एक सौ आठ बार या अट्ठाईस बार जप करना चाहिये और इस जप को 'गुह्यातिगुह्य...... मन्त्र के द्वारा अर्पण कर देना चाहिये । प्रातःकाल जब कि नभोमण्डल में तारा गण दिखाई देते हों—उदय कालीन सूर्य के समान तेजस्वी, कमल के समान हाथों में पुस्तक और रुद्राक्ष माला धारण करने वाली और कृष्ण मृगचर्म को धारण करने वाली ब्राह्मी का ध्यान करना चाहिये ॥६९-७०॥ मध्याह्न काल में शुक्ल वस्त्र धारण की हुई त्रिनेत्र, वृषारूढ़, सूर्यमण्डल में स्थित, वरदायिनी, पाश, शूल, और नृकरोटिका हाथ में धारण किये हुई श्रेष्ठ पार्वती का स्मरण करना चाहिये । सायंकाल पीले रंग के रेशमी वस्त्र को धारण करने वाली, रत्नाभूषणों से आभूषित, श्यामाङ्गी, चार हाथों वाली, शंख, चक्र, गदा, पद्म से सुशोभित और सूर्य मण्डल में स्थित रहने वाली देवी का ध्यान करना चाहिये ॥७१-७३॥ तदनन्तर कल्पों के अनुसार वह विधान-कुशल देव, ऋषि, पितर और अपने इष्टदेव का तर्पण करे विधि के अनुसार 'सांगोपांग और वस्त्र आदि से गुरुओं और शस्त्र सहित गरुड़ को तर्पण करता हूँ' इस मन्त्र से तर्पण करे ॥७४-७५॥ वैष्णव भक्त नारद, पर्वत, विष्णु, भक्त उद्धव, दारुक, विष्वक्सेन और शैलेय को तर्पण से तृप्त करे । विप्रेन्द्र, इस प्रकार तर्पण कर और सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा-गृह में आकर पैर धो ले और आचमन कर पवित्र [हो जाय । अग्निहोत्र गृह में स्थित अग्नि में हवन कर, विधिपूर्वक उपस्थान करे । पुनः पूजा स्थान पर आकर द्वार पूजा करे ॥७६-७८॥ द्वार की ऊपरी शाखा पर गणेश की, दक्षिण भाग मे महालक्ष्मी की, बायें भाग में सरस्वती की, फिर दक्षिण में विघ्नेश्वर की, वाम में क्षेत्रपाल की, दक्षिण में गंगा की पूजा करे। पुनः बाईं ओर यमुना की, दक्षिण