भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 552

एकषष्टितमोऽध्यायः ५३३ ते चापि विविधा वैद्याः कुशला संमतौषधाः । व्याधिभिः परिकृष्यंते मृगा व्याघ्रै रिवादिताः ॥५९॥ ते पिबंति कषायांश्च सर्पींषि विविधानि च । दृश्यंते जरया भग्ना नागैर्नागा इवोत्समाः ॥६०॥ कैर्वा भुवि चिकित्स्यंते रोगार्ता मृगपक्षिणः । श्वापदाश्च दरिद्राश्च प्रायो नार्ता भवंति ते ॥६१॥ घोरानपि दुराधर्षान्नृपतीनुग्रतेजसः । आक्रम्य रोग आदत्ते पशून्पशुपचो यथा ॥६२॥ इति लोकमनाक्रन्दं मोहशोकपरिप्लुतम् । स्रोतसा महता क्षिप्र ह्रियमाणं बलीयसा ॥६३॥ न धनेन न राज्येन नोग्रेण तपसा तथा । स्वभावा ह्यतिवर्तन्ते ये निर्मुक्ताः शरीरिषु ॥६४॥ उपर्युपरि लोकस्य सर्वो भवितुमिच्छति । यतते च यथाशक्ति न च तद्वर्तते तथा ॥६५॥ न म्रियेरन्नजीर्येरन्सर्वे स्युः सार्वकामिकाः । नाप्रियं प्रतिपद्येरन्नुत्थानस्य फलं प्रति ॥६६॥ ऐश्वर्यमदमत्ताश्च मानान्मथमदेन च । अप्रमत्ताः शठाः क्रूरा विक्रांताः पर्युपासते ॥६७॥ शोकाः प्रतिनिवर्तंते केषांचिदसमीक्षताम् । स्वं स्वं च पुनरन्येषां न कंचिदतिगच्छति ॥६८॥ महच्च फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसंधिषु । वहंति शिविकामन्ये यांत्यन्ये शिविकारुहाः ॥६९॥ सर्वैषामृद्धिकामानामन्ये रथपुरःसराः । मनुजाश्च गतश्रीकाः शतशो विविधाः स्त्रियः ॥७०॥ द्वंद्वा रामेषु भूतेषु गच्छन्त्येकैकशो नराः । इदमन्यत्परं पश्य नात्र मोहं करिष्यसि ॥७१॥ धर्मं चापि त्यजाधर्मं त्यज सत्यानृतां धियम् । सर्वं त्यक्त्वा स्वरूपस्थः सुखी भव निरामयः ॥७२॥

वे वैद्य भी जो ओषधि प्रयोग में अत्यन्त कुशल होते हैं—रोगों के उसी प्रकार शिकार बन जाते हैं जिस प्रकार मृग बाघ के शिकार बनते हैं । वे विभिन्न प्रकार की कसैली ओषधियाँ, घी आदि पीते हैं परन्तु बुढ़ापे के द्वारा उसी प्रकार मरोड़ दिये जाते हैं जिस प्रकार बली हाथी निर्बल हाथी को मरोड़ देता है ॥५९-६०॥ इस लोक में रोगपीड़ित मृग, पक्षी, कुत्ते आदि हिंसक जीव और दरिद्रों की कौन चिकित्सा करता है, परन्तु वे दुःखी नहीं होते ॥६१॥ घोर, प्रचण्ड तेजस्वी राजाओं पर भी रोग आक्रमण कर (उन्हें) इस प्रकार मार डालते हैं जिस प्रकार बधिक पशुओं को ॥६२॥ इस प्रकार मोह-शोक से व्याप्त, अपने शीघ्रगामी, शक्तिशाली प्रवाह में हठात् सब को बहा ले जाने वाले और पार न पाने योग्य संसार से कोई धन, राज्य या उग्र तपस्या के द्वारा पार नहीं जा सकता; परन्तु जो मुक्त पुरुष हैं वे सहज ही में उसको पार कर जाते हैं ॥६३-६४॥ सभी इस संसार में अपने को सर्वोपरि बनाने के लिये इच्छुक रहते हैं और यथाशक्ति प्रयत्न भी करते हैं, परन्तु वे उस स्थिति में पहुँच नहीं पाते ॥६५॥ सब अपनी मृत्यु और बुढ़ापे की संभावना नहीं करते, वे अपने को अमर और चिर युवक समझ कर सब प्रकार की इच्छायें करते रहते हैं और अपने प्रारम्भ किये हुए कर्म फल के प्रति अप्रिय भावना नहीं रखते ॥६६॥ जो ऐश्वर्य के मद से मत्त, गर्वी, प्रमादी, शठ, क्रूर और पराक्रमी पुरुष कर्म की उपासना करते हैं, उन्हें शोक प्राप्त होते हैं; किन्तु ज्ञानमार्गियों को शोक नहीं होते फिर इस लोक में कर्म संधियों (अर्थात् कर्म के मार्गों) में फल के विषयों में बहुत बड़ी विषमता देखी जाती है। कोई तो पालकी को कन्धे पर रखकर ढोता है और कोई उस पर चढ़कर चलता है ॥६७-६९॥ विभव चाहने वाले सब पुरुषों में कोई-कोई तो रथ आदि पर चढ़ कर चलते हैं और अधिक संख्या में दरिद्र होते हैं, इसी प्रकार अधिकांश स्त्रियों की भी यही दशा है ॥७०॥ प्रायः प्राणी सुख-दुःख के चक्कर में एक-एक कर के पड़ ही जाते हैं। तुम इनसे अतिरिक्त विषयों को ही देखो अर्थात् सुखःदुख की भावना से अपने को ऊपर उठाओ । इस प्रकार तुम मोह में नहीं पड़ोगे ॥७१॥ तुम धर्म, अधर्म, सत्य और असत्य की भावना को छोड़ो इस प्रकार सब प्रकार को द्वन्द्व भावना का परित्याग कर अपने स्वरूप