बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५३२ नारदीयपुराणम्
नोपभोगात्परं किंचिद्धनिनो वाऽधनस्य वा । प्राक्सं प्रयोगाद्भूतानां नास्ति दुःखमनामयम् ॥४३॥ विप्रयोगश्च सर्वस्य न वाचा न च विद्यया । प्रणयं परिसंहृत्य संस्तुतेष्वितरेषु च ॥४४॥ विचरेदसमुन्नद्ध स सुखी स च पंडितः । अध्यात्मगतमालीनो निरपेक्षो निरामिषः ॥४५॥ आत्मनैव सहायेन यश्चरेत्स सुखी भवेत् । सुखदुःखविपर्यासो यदा समुपपद्यते ॥४६॥ चैनं प्रज्ञा सुनियतं त्रायते नापि पौरुषम् । स्वभावाद्यस्तमातिष्ठेद्यत्नवान्नावसीदति ॥४७॥ उपद्रव इवानिष्टो योनि गर्भः प्रपद्यते । तानि पूर्वशरीराणि नित्यमेकं शरीरिणम् ॥४८॥ प्राणिनां प्राणसंरोधे मांसश्लेष्मविचेष्टितम् । निर्दग्धं परदेहेन परदेहं बलाबलम् ॥४९॥ विनश्यति विनाशांते नावि नावमिवाचलाम् । संगत्या जठरे न्यस्तं रेतोविंदुमचेतनम् ॥५०॥ केन यत्नेन जीवंतं गर्भं त्वमिह पश्यसि । अन्नपानानि जीर्यंते यत्र भक्ष्याश्च भक्षिताः ॥५१॥ तस्मिन्नेवोदरे गर्भः किं नान्नभिव जीर्यति । गर्भे मूत्रपुरीषाणां स्वभावनियता गतिः ॥५२॥ धारणे वा विसर्गं च न कर्तुं विद्यतेऽवशः । प्रभवंत्युदरे गर्भा जायमानास्तथापरे ॥५३॥ आगमेन सहान्येषां विनाश उपपद्यते । एतस्माद्योनिसंबंधाद्यो जीवनपरिमुच्यते ॥५४॥ पूजां न लभते कांचिद्द्वन्द्वेषु मज्जति । गर्भस्थ सह जातस्य सप्तमीमीदृशों दशाम् ॥५५॥ प्राप्नुवंति ततः पंच न भवंति शतायुषः । नाभ्युत्थाने मनुष्याणां योगाः स्युर्नात्र संशयः ॥५६॥ व्याधिभिश्च विवर्ध्यंते व्याघ्रैः क्षुद्रमृगा इव । व्याधिभिर्भक्ष्यमाणानां त्यजतां विपुलं धनम् ॥५७॥ वेदना नापकर्षन्ति यतमानाश्चिकित्सकाः । ॥५८॥
॥४२॥ प्राणियों को एक-दूसरे से संयोग होने के पहले कोई दुःख नहीं होता । जब संयोग के बाद प्रिय का वियोग होता है तभी सब को दुःख हुआ करता है । अतः परिचित और अपरिचित सभी के प्रति आसक्ति का त्याग कर निरभिमानपूर्वक जो विचरण करता है, वही सुखी और पण्डित है ॥४३-४४॥ जो अपने स्वरूप में स्थित, निरपेक्ष, निर्द्वन्द्व तथा अकेला होकर विचरण करता है, वही सुखी है ॥४५॥ जब सुख और दुःख में वैपरीत्य दिखाई पड़ता है तब न तो प्रज्ञा और न पुरुषार्थ हो उसको बचा पाता है जो स्वाभाविक रूप से सुख-दुःख का उपभोग करता है तथा प्रयत्नशील रहता है, वह दुःखी नहीं होता ॥४६-४७॥ शरीर छूटने पर वही फिर दूसरे प्राणी के गर्भ में प्रवेश करता है । तब उसको पूर्व शरीर का स्मरण नहीं रहता है । पुनः प्राण वायु के अवरुद्ध हो जाने पर मांस, कफ आदि से युक्त इस शरीर को जला दिया जाता है । विनाश के बाद फिर यह जीव किसी स्त्री-पुरुष के समागम द्वारा अचेतन शुक्र-बिन्दु के रूप में उदर में पहुँचा दिया जाता है तथा वहां वह उसी प्रकार अचल हो जाता है, जैसे एक अचल नाव में बंधी हुई दूसरी नाव ॥४८-५०॥ गर्भ में वह कैसे जीवन धारण कर लेता है? जब उदर में अन्न, पान तथा भक्षित सभी पदार्थ जीर्ण हो जाते हैं तब यह गर्भ अन्न की ही तरह क्यों नहीं जीर्ण होता है ? ॥५१॥ गर्भ में मूत्र और विष्ठा की गति स्वाभाविक है । उनके धारण और त्याग करने में कोई स्वतन्त्र नहीं हो सकता ॥५२॥ कुछ गर्भ उदर में रहते हैं और कुछ उत्पन्न होते हैं जो आगमन के साथ ही विनाश भो लिये रहते हैं ॥५३॥ जो व्यक्ति इस योनि-से मुक्त हो जाता है, वह किसी प्रकार की प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त करता है, वह पुनः (सुख दुःख आदि) द्वन्द्वों में निमग्न हो जाता है ॥५४॥ गर्भ से निकलने पर जीव १२५ वर्ष की परमायु प्राप्त करता है । मनुष्यों के उत्थान में योग उतने साधक नहीं होंगे जितना ज्ञानमार्ग, यह निश्चित है। जिस प्रकार बाघ क्षुद्र जीवों का वध कर देता है उसी प्रकार रोग व्याधि उन मनुष्यों को पीड़ित कर देते हैं ॥५५-५६॥ मनुष्यों के रोगी हो जाने पर अत्यधिक धन खर्च करने पर भी उनकी वेदना को चिकित्सक प्रयत्न करने पर दूर नहीं कर पाते हैं ॥५७-५८॥ यहाँ तक कि