बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८० नारदीयपुराणम् देवमुद्वास्य मूर्तिस्थं पुनस्तत्रैव योजयेत् । नैवेद्यं च ततो दद्यात्तदुच्छिष्टभोजिने ॥९८॥ महेश्वरस्य चंडेशो विष्वक्सेनस्तथा हरेः । चंडांशुस्तरर्णोर्वक्रतुंडश्चापि गणेशितुः ॥ शक्तेरुच्छिष्टचांडाली प्रोक्ता उच्छिष्टभोजिनः ॥१००॥ ततो ऋष्यादिकं स्मृत्वा कृत्वा मूलषडंगकम् । जप्त्वा मंत्रं यथाशक्ति देवतायै निवेदयेत् ॥१०१॥ गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात्त्वयि स्थिता ॥१०२॥ ततः पराङ्मुखं चार्घं कृत्वां पुष्पैः प्रपूजयेत् । दोर्भ्यां पद्भ्यां च जानुभ्यामुरसा शिरसा दृशा । मनसा वचसा चेति प्रणामोऽष्टांग ईरितः ॥१०३॥ बाहुभ्यां च सजानुभ्यां शिरसा वचसापि वा । पंचांगकः प्रणामः स्यात्पूजायां प्रवरावुभौ ॥१०४॥ नत्वा च दंडवन्मंत्री ततः कुर्यात्प्रदक्षिणाः । विष्णुसोमार्कविघ्नानां वेदार्द्धेद्रिवह्निभिः ॥१०५॥ ततः स्तोत्रादिकं मंत्री प्रपठेद्भक्तिपूर्वकम् । इतः पूर्णं प्राणबुद्धिदेहधर्माधिकारतः ॥१०६॥ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यंतेऽवस्थासु मनसा वदेत् । वाचा हस्ताभ्यां च पद्भ्यामुदरेण ततः परम् ॥१०७॥ शिष्णांते यत्स्मृतं पश्चाद्यदुक्तं यत्कृतं ततः । तत्सर्वं च ततो बह्मार्पणं भवतु ठद्वयम् ॥१०८॥ मां मदीयं च सकलं विष्णवे च समर्पये । तारं तत्सदतो ब्रह्मार्पणमस्तु मनुर्मतः ॥१०८॥ प्रणवाद्योऽष्टवस्वर्णो ह्यनेनात्मानमर्पयेत् । अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा वैकल्यात्साधनस्य च ॥११०॥ यन्न्यूनमतिरिक्तं वा तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि । द्रव्यहीनं क्रियाहीनं मन्त्रहीनं मयान्यथा ॥१११॥
के 'चण्डेश' भगवान् विष्णु के विष्वक्सेन, सूर्य के चण्डांशु, गणेशजी के वक्रतुण्ड और भगवती दुर्गा को उच्छिष्ट चाण्डाली - ये सब उच्छिष्टभोजी कहे गये हैं ॥९८-९९३॥ तदनन्तर मूलमन्त्र के ऋषि आदि का स्मरण करके मूल से ही षडङ्गन्यास करे और यथाशक्ति मन्त्र का जप करके देवता को अर्पित करे—'देव ! आप गुह्य से अतिगुह्य वस्तु की भो रक्षा करने वाले हैं। आप मेरे द्वारा किये गये इस जप को ग्रहण करें । आपके प्रसाद से आपके भीतर रहने वाली सिद्धि मुझे प्राप्त हो ॥१००-१०२॥ इसके बाद पराङ्मुख अर्घ्य देकर फूलों से पूजा करे। पूजन के पश्चात् प्रणाम करना चाहिए। दोनों हाथों से, दोनों पैरों से, दोनों घुटनों से, छाती से, मस्तक से, नेत्रों से, मन से और वाणी से जो नमस्कार किया जाता है, उसे अष्टांग प्रणाम कहा गया है। दोनों बाहुओं से, घुटनों से, छाती से मस्तक और वाणी से जो प्रणाम किया जाता है, वह पञ्चाङ्ग प्रणाम है। पूजा में ये दोनों अष्टाङ्ग और पञ्चाङ्ग प्रणाम श्रेष्ठ माने गये हैं। मन्त्र का साधक दण्डवत् प्रणाम करके भगवान् की परिक्रमा करे ॥१०३-१०४३॥ भगवान् विष्णु की चार बार, भगवान् शंकर को आधो बार, भगवती दुर्गा को एक बार, सूर्य को सात बार और गणेश को तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए। तत्पश्चात् मन्त्रोपासक भक्तिपूर्वक स्तोत्र-पाठ करे। इसके बाद इस प्रकार कहे—'ओं इतः पूर्वं प्राणबुद्धिदेहधर्माधिकारतो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थासु मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्नेन यत् स्मृतं यदुक्तं यत्कृतं तत्सर्वं ब्रह्मार्पणं भवतु स्वाहा । मां मदीयं च सकलं विष्णवे ते समर्पये ओं तत्सत् ।' इसे विद्वानों ने 'ब्रह्मार्पण मन्त्र' कहा है ॥१०५-१०६॥ इसके आदि में प्रणव है, उसके बाद बयासी अक्षरों का यह मन्त्र है, इसी से भगवान् को आत्मसमर्पण करना चाहिए। इसके बाद नीचे लिखे अनुसार क्षमा-प्रार्थना करे-- 'भगवन् ! अज्ञान से, प्रमाद से तथा साधन की कमी से मेरे द्वारा जो न्यूनता या अधिकता का दोष बन