बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८१ सप्तषष्टितमोऽध्यायः कृतं यत्तत्क्षमस्वेश कृपया त्वं दयानिधे । यन्मया क्रियते कर्म जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ॥११२॥ तत्सर्वं तावकी पूजा भूयाद्भूतये च मे प्रभो । भूमौ स्खलितपादानां भूमरेवावलंबनम् ॥११३॥ त्वयि जातापराधानां त्वमेव शरणं प्रभो । अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ॥११४॥ तस्मात्कारुण्यभावेन क्षमस्व परमेश्वर । अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ॥११५॥ दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व जगतां पते । आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ॥११६॥ पूजां चैव न जानामि त्वं गतिः परमेश्वर । संप्रार्थ्यैवं ततो मन्त्री मूलांते श्लोकमुच्चरेत् ॥११७॥ गच्छ गच्छ परं स्थानं जगदीश जगन्मय । यत्र ब्रह्मादयो देवा जानंति त्वं सदाशिवः ॥११८॥ इति पुष्पांजलिं दत्त्वा ततः संहारमुद्रया । निधाय देवं सांगं च स्वीयं हृत्सरसीरुहे ॥११९॥ सुषुम्णावर्त्मना पुष्पमाघ्राथोद्वासयेद् बुधः । शंखचक्रशिलार्सिलगविघ्नसूर्यद्वयं तथा ॥१२०॥ शक्तित्रयं न चैकत्र पूजयेद्दुःखकारणम् । अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् ॥१२१॥ सर्वपापक्षयकरं विष्णुपादोदकं शुभम् ॥१२२॥ तत्तद्भक्तैर्ग्रहीतव्यं तत्तद्देयनिवेदितम् । अग्राह्यं शिवनिर्माल्यं पत्रं पुष्पं फलं जलम् ॥१२३॥ शालग्रामशिलास्पर्शात्सर्वं याति पवित्रताम् । पूजा पंचविधा तत्र कथिता नारदाखिलैः ॥१२४॥ गया हो, उसे आप कृपा पूर्वक क्षमा करें । प्रभो ! मैंने जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थाओं में जो कर्म किया है, वह सब आपकी पूजा रूप हो जाय और मेरे लिए कल्याणकारी हो । धरती पर जो लड़खड़ा कर गिरते हैं, उनको सहारा देने वाली भी धरती ही है, उसी प्रकार आपके प्रति अपराध करने वाले मनुष्यों के लिए भी आप ही शरणदाता हैं । परमेश्वर ! आपके सिवा दूसरा कोई शरण नहीं है । आप ही मेरे शरणदाता हैं ॥११०-११४॥ अतः करुणापूर्वक मेरी त्रुटियों को क्षमा करें । जगत्पते ! मेरे द्वारा रात-दिन सहस्रों अपराध बनते हैं । अतः 'यह मेरा दास है' ऐसा समझकर क्षमा करें । परमेश्वर ! मैं आवाहन करना नहीं जानता, विसर्जन भी नहीं जानता और पूजा करना भी अच्छी तरह नहीं जानता, अब आप ही मेरी गति हैं-सहारे हैं।' ॥११५-११६॥ इस प्रकार प्रार्थना करके मन्त्र का साधक मूलमन्त्र पढ़कर विसर्जन के लिए नीचे लिखे श्लोक का पाठ करे और पुष्पाञ्जलि दे- 'जगदीश ! जगन्मय ! आप अपने उस परम धाम को पधारिये, जिसे ब्रह्मा आदि देवता तथा भगवान् शिव भी नहीं जानते हैं।' ॥११७-११८॥ इस प्रकार पुष्पाञ्जलि देकर संहार-मुद्रा के द्वारा भगवान् को उनके अंगभूत पार्षदों सहित सुषुम्णा नाडी के मार्ग से अपने हृदय कमल में स्थापित करके पुष्प सूंघकर विद्वान् पुरुष भगवान् का विसर्जन करे ॥११९॥ दो शंख, दो चक्रशिला (गोमती चक्र), दो शिवलिंग, दो गणेशमूर्ति, दो सूर्य प्रतिमा और दुर्गाजी की तीन प्रतिमाओ का पूजन एक घर में नहीं करना चाहिए; अन्यथा दुःख की प्राप्ति होती है । इसके बाद निम्नांकित मन्त्र पढ़कर भगवान् का चरणामृत पान करे- 'भगवान् विष्णु का शुभ चरणामृत अकालमृत्यु का अपहरण, सम्पूर्ण व्याधियों का नाश तथा समस्त पापों का संहार करने वाला है' ॥१२०-१२२॥ भिन्न-भिन्न देवताओं के भक्तों को चाहिए कि वे अपने आराध्य देव को निवेदित किये हुए नैवेद्य-प्रसाद को ग्रहण करें । भगवान् शिव को निवेदित निर्माल्य-पत्र, पुष्प, फल और जल ग्रहण करने योग्य नहीं है, किन्तु शालग्राम-शिला का स्पर्श होने से वह सब पवित्र (ग्राह्य) हो जाता है ॥१२३॥ नारद ! सब ने पाँच प्रकार को पूजा बताया है--आतुरी, सौतिको, त्रासी, साधनाभाविनी तथा दौर्बाधी ।