बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८२ नारदीयपुराणम् आतुरी सौतिकी त्रासी साधना भाविनी तथा । दौर्बोधी च क्रमादासां लक्षणानि शृणुष्व मे ॥१२५॥ रोगादियुक्तो न स्नायान्न जपेन्न च पूजयेत् । विलोक्य पूजां देवस्य मूर्ति वा सूर्यमण्डलम् ॥१२६॥ प्रणम्यथ स्मरन्मन्त्रमर्पयेत्कुसुमांजलिम् । रोगे निवृत्ते स्नात्वाथ नत्वा संपूजयेद्गुरुम् ॥१२७॥ त्वत्प्रसादाज्जगन्नाथ जगत्पूज्य दयानिधे । पूजाविच्छेददोषो मे मास्त्विति प्रार्थयेच्च तम् ॥१२८॥ द्विजानपि च संपूज्य यथाशक्त्या प्रतोष्य च । तेभ्यश्चाशिषमादाय देवं प्राग्वत्ततोऽर्चयेत् ॥१२६॥ आतुरी कथिता ह्येषा सौतिक्यथ निगद्यते । सूतकं द्विविधं प्रोक्तं जाताख्यं मृतसंज्ञकम् ॥१३०॥ तत्र स्नात्वा मानसीं तु कृत्वा संध्यां समाहितः । मनसैव यजेद्देवं मनसैव जपेन्मनुम् ॥१३१॥ निवृत्ते सूतके प्राग्वत्सम्पूज्य च गुरुं द्विजान् । तेभ्यश्चाशिषमादाय ततो नित्यक्रमं चरेत् ॥१३२॥ एषा तु सौतिकी प्रोक्ता त्रासी चाथ निगद्यते । दुष्टेभ्यस्त्रासमापन्नो यथालब्धोपचारकैः ॥१३३॥ मानसेर्वाप्यजेद्देवं त्रासी सा परिकीर्तिता । पूजासाधनवस्तनामसामर्थ्ये तु सर्वतः ॥१३४॥ पुष्पैः पत्रैः फलैर्वापि मनसा वा यजेद्विभुम् । साधनाभाविनी ह्येषा दौर्बोधीं शृणु नारद ॥१३५॥ स्त्रियो वृद्धास्तथा बाला मूर्खास्तेस्तु यथाक्रमम् । यथाज्ञानकृता सा तु दौर्बोधीति प्रकीर्तिता ॥१३६॥ एवं यथाकथंचित्तु पूजां कुर्याद्धि साधकः । देवपूजाविहीनो यः स गच्छेन्नरकं ध्रुवम् ॥१३७॥ वैश्वदेवाधिकं कृत्वा भोजयेद्विजसत्तमान् । देवे निवेदितं पश्चाद्भुञ्जीत स्वगणैः स्वयम् ॥१३८॥ आचम्य ननशुद्धिं च कृत्वा तिष्ठेत् कियत्क्षणम् । पुराणमितिहासं च शृणुयात्स्वजनैः सह ॥१३६॥
इनके लक्षणों का मुझसे क्रमशः वर्णन सुनो--रोग आदि से युक्त मनुष्य न स्नान करे, न जप करे और न पूजन ही करे । आराध्य देव की पूजा, प्रतिमा अथवा सूर्यमण्डल का दर्शन एवं प्रणाम करके मन्त्र-स्मरणपूर्वक उनके लिए पुष्पाञ्जलि दे । फिर जब रोग-निवृत्त हो जाय, तो स्नान और नमस्कार करके गुरु की पूजा करे और उनसे प्रार्थना करे--'जगन्नाथ ! जगत्पूज्य ! दयानिधे ! आपके प्रसाद से मुझे पूजा छोड़ने का दोष न लगे।' तत्पश्चात् यथाशक्ति ब्राह्मणों का भी पूजन करके उन्हें दक्षिणा आदि से सन्तुष्ट करे और उनसे आशीर्वाद लेकर पूर्ववत् भगवान् की पूजा करे। यह आतुरी पूजा कही गई है। अब सौतिकी पूजा बतायी जाती है ॥१२४-१२९॥ सूतक दो प्रकार का कहा गया है-जातसूतक और मृतसूतक । दोनों ही सूतकों में एकाग्रचित्त हो मानसी संध्या करके मन से ही भगवान् का पूजन और मन से ही मन्त्र का जप करे । फिर सूतक बीत जाने पर पूर्ववत् गुरु और ब्राह्मणों का पूजन करके उनसे आशीर्वाद लेकर सदा की भाँति पूजा का क्रम प्रारंभ कर दे। यह 'सौतिकी पूजा' कही गई है। अब त्रासी पूजा बतायी जाती है ॥१३०-१३३३॥ दुष्टों से त्रास को प्राप्त हुआ मनुष्य यथाप्राप्त उपचारों से अथवा मानसिक उपचारों से भगवान् की पूजा करे। यह 'त्रासी पूजा' कही गई है। पूजा साधनसामग्री जुटाने की शक्ति न होने पर यथाप्राप्त पत्र, पुष्प और फल का संग्रह करके उन्हीं के द्वारा या मानसोपचार से भगवान् का पूजन करे । यह 'साधना-भाविनी पूजा कही गई है। नारद ! अब 'दौर्बोधी' पूजा का परिचय सुनो--स्त्री, वृद्ध, बालक और मूर्ख मनुष्य अपने स्वल्पज्ञान के अनुसार जिस किसी क्रम से जो भी पूजा करते हैं, उसे 'दौर्बोधी' पूजा कहते हैं ॥१३४-१३६॥ इस प्रकार साधक को जिस-किसी तरह भी संभव हो, देव-पूजा करनी चाहिए । देव-पूजा के बाद बलिवैश्वदेव आदि करके श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराये । तत्पश्चात् भगवान् को अर्पित किया हुआ प्रसाद स्वयं स्वजनों के साथ भोजन करे । फिर आचमन एवं मुख-शुद्धि करके कुछ देर विश्राम करे। फिर स्वजनों के साथ बैठकर पुराण तथा इतिहास सुने । जो सब कल्पों (सम्पूर्ण पूजा-विधियों) के सम्पादन में समर्थ