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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 606, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 606

५८७ अष्टषष्टितमोऽध्यायः

चन्द्रोदयांतं पूर्वोक्तविधिना व्रतमाचरेत् । एवं कृतेऽपि पूर्वोक्तं फलमाप्नोति निश्चितम् ॥५५॥ गणेशप्रतिमां दंतिदंतेन कपिनापि वा । गजभग्नेन निम्बेन सितार्केणाथवा पुनः ॥५६॥ कृत्वा तस्यां समावाह्य प्राणस्थापनपूर्वकम् । अभ्यर्च्य विधिवन्मन्त्रो राहुग्रस्ते निशाकरे ॥५७॥ स्पृष्ट्वा चैव निराहारस्तां शिखायां समुद्वहन् । द्यूते विवादे संमरे व्यवहारे जयं लभेत् ॥५८॥ बीजं वराहो बिंढ्राढ्यौ मन्वित्द्वान्नौ कलौ ततः । स्मृतिर्मा सेंदुमन्वाप्ता कर्णोच्छिष्टगणे वदेत् ॥५९॥ बकः सदीर्घपवनो महायक्षाय यं बलिः । बलिमंत्रोऽयमाख्यातो न चेद्वर्णोऽखिलेष्टदः ॥६०॥ प्रणवो भुवनेश्वानीस्वबीजांते नवार्णकः । हस्तीति च पिशाचीति लिखेच्चैवाग्निसुंदरी ॥६१॥ नवार्णोऽयं समुद्दिष्टो भजतां सर्वसिद्धिदः । पदैः सर्वेण मंत्रेण पञ्चांगानि प्रकल्पयेत् ॥६२॥ अन्यत्सर्वं समानं स्यात्पूर्वमंत्रेण नारद । अथाभिधास्ये विधिवद्वक्रतुंडमनुत्तमम् ॥६३॥ तोयं विधिवन्हियुक्तकर्णेढ्राढचो हरिस्तथा । सदीर्घो दारको वायुर्वर्मा तोड्यं रसाणंकः ॥६४॥ भार्गवोऽस्य मुनिश्चन्दोऽनुष्टुब्दवो गणाधिपः । वक्रतुण्डाभिधो बीजं वं शक्तिः कवचं पुनः ॥६५॥ तारहृन्मध्यगेमंत्रवर्णैश्चंद्रविभूषितैः । कृत्वा षडंगमन्त्राणान्भ्रू मध्ये च गले हृदि ॥६६॥ नाभौ लिंगे पदे न्यस्याखिलेन व्यापकं चरेत् । उद्यदर्कद्युति हस्तैः पाशांकुशवराभयान् ॥६७॥ दधतं गजवक्त्रं च रक्तभूषांबरं भजेत् । ध्यात्वैवं प्रजपेत्तर्कलक्षं द्रव्यैर्दशांशतः ॥६८॥ अष्टभिर्जुहुयात्पीठे तीव्रादिसहितेऽर्चयेत् । मूर्ति मूर्तेन संकल्प्य तस्यामावाह्य पूजयेत् ॥६९॥ षट्कोणेषु षडंगानि पत्रेष्वष्टौ तु शक्तयः । यजेद्विद्यां विधात्रीं च भोगदां विप्रघातिनीम् ॥७०॥

पूर्वोक्त विधि से व्रत का अनुष्ठान करे । ऐसा करने पर भी वह निश्चित रूप से पूर्वोक्त फल को प्राप्त करता है । हाथी के दांत या वानर के दांत, हाथो द्वारा तोड़ी गई नीम की लकड़ी या सफेद आक की लकड़ी की गणेशमूर्ति बनाकर चन्द्र-ग्रहण के समय उसमें आवाहन तथा प्राण-प्रतिष्ठा करके साधक उस (मूर्ति) का पूजन करे । फिर निराहार रहते हुए उसका स्पर्श करके शिखा में बांध ले । ऐसा करने से द्यूत (जुआ), विवाद, युद्ध और मुकदमे में उसकी विजय होती है ॥५४-५९॥ 'बीज......बलिः, यह अखिलकामनादायक बलिमन्त्र है। भुवनेशानी को अपने बीज के अन्त में प्रणव के साथ जोड़कर नवार्ण मन्त्र बनाया जाता है। 'ओं हस्तिने पिशाच्यै स्वाहा' यह भी नवार्ण मन्त्र है, जो साधकों के लिए सर्वसिद्धिदायक है। नारद ! पदों द्वारा संपूर्ण मन्त्र से पंचांगों की कल्पना करे ॥५९-६२॥ अन्य सभी बातें पूर्व मन्त्र के समान हो होंगी। अब अत्युत्तम वक्रतुण्ड मन्त्र की वर्णना करूँगा । 'तोयं विधि......' यह छह अक्षरों का मन्त्र है । इसके मुनि भार्गव, छंद अनुष्टुप् और देवता वक्रतुण्ड नामक गणपति हैं। इसका बीज वं और शक्ति कवच है ॥६३-६५॥ ओम् तथा नमः के मध्य में स्थित और अनुस्वार से विभूषित मन्त्र-वर्णों से षडंग मन्त्र के अक्षरों को युक्त करके भौंह के मध्य, कंठ, हृदय, नाभि, लिंग तथा चरण में न्यास करके सम्पूर्ण मन्त्र से व्यापक न्यास करे । अनन्तर उदित होते हुए सूर्य की कान्ति जैसी कान्ति वाले, हाथों में पाश, अंकुश, वर तथा अभय अस्त्रों को धारण करने वाले, हाथी का मुख और रक्त आभूषण तथा वस्त्र धारण करने वाले गणेश का ध्यान करे ॥६६-७२॥ इस प्रकार ध्यान करके छह लाख मन्त्रजप करे और उसका दशांश अष्ट द्रव्यों से तीव्रा आदि सहित पीठ पर उनकी अर्चना करे। फिर गणेश की मूर्ति की रचना करके उसमें उनका आवाहन तथा पूजन करे । षट्कोणों में षडंगों की पूजा करने के उपरान्त पत्तों पर आठ शक्तियों की पूजा करें । वे आठ शक्तियाँ ये हैं--विद्या, विधात्री, भोगदा, विप्रघातिनी, निधिप्रदीपा, पापघ्नी, पुण्या और शशिप्रभा ।