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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 607, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 607

५८८ नारदीयपुराणम् निधिप्रदीपां पापघ्नीं पुण्यां पश्चाच्छशिप्रभाम्। दलाग्रेषु वक्रतुंड एकदंष्ट्रमहोदरौ ॥७१॥ गजास्यलंबोदरकौ विकटौ विघ्नराट् तथा। धूम्रवर्णस्ततो बाह्ये लोकेशान्‌हेतिसंयुतान् ॥७२॥ एवमावरणैरिष्ट्वा पञ्चभिर्गणनायकम्। साधयेदखिलान्कामान्वक्रतुंडप्रसादतः ॥७३॥ लब्ध्वा गुरुमुखान्मंत्रं दीक्षासंस्कारपूर्वकम्। ब्रह्मचारी हविष्याशी सत्यवाक् च जितेंद्रियः ॥७४॥ जपेदर्कसहस्रं तु षण्मासं होमसंयुतम् । दारिद्र्यं तु पराभूय जायते धनदोपमः ॥७५॥ चतुर्थ्यादि चतुर्थ्यन्तं जपेदयुतमादरात् । अष्टोत्तरशतं नित्यं हुत्वा प्राग्वत्फलं लभेत् ॥७६॥ पक्षयोरुभयोर्मंत्री चतुर्थ्यां जुहुयाच्छतम्। अपूपैर्वत्सरे स स्यात्समृद्धेः परमं पदम् ॥७७॥ अङ्गारकचतुर्थ्यां तु देवमिष्ट्वा विधानतः। हविषा पायसान्नेन नैवेद्यं परिकल्पयेत् ॥७८॥ ततो गुरुं समभ्यर्च्य भोजयेद्विधिवत्सुधीः। निवेदितेन जुहुयात्सहस्रं विधिवदसौ ॥७९॥ एवं संवत्सरं कृत्वा महतीं श्रियमाप्नुयात्। अथान्यत्साधनं वक्ष्ये लोकानां हितकाम्यया ॥८०॥ इष्ट्वा गणेशं पृथुकैः पायसापूपमोदकैः। नानाफलैस्ततोमंत्री हरिद्रामथ सैन्धवम् ॥८१॥ वचां निष्कार्द्धभागं च तदर्द्धं वा मनुं जपेत्। विशोध्य चूर्णं प्रसृतौ गवां मूत्रे विनिक्षिपेत् ॥८२॥ सहस्रकृत्वो मनुना मंत्रयित्वा प्रयत्नतः। स्नातामृतुदिने शुद्धां शुक्लांबरधरां शुभाम् ॥८३॥ देवस्य पुरतः स्थाप्य पाययेदौषधं सुधीः। सर्वलक्षणसंपन्नं वंध्यापि लभते सुतम् ॥८४॥ अथान्यत्सं प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम्। गोचमंमात्रां धरणीमुपलिप्य प्रयत्नतः ॥८५॥ पत्रों के अग्रभाग में वक्रतुण्ड, एकदंष्ट्र, महोदर, गजास्य, लंबोदर, विकट, विघ्नराट् तथा धूम्रवर्ण को पूजा करके बाह्यभाग में आयुध सहित लोकपालों का पूजन करे। इस प्रकार पाँच आवरणों से गणेश की आराधना करके मनुष्य उनकी कृपा से अखिल कामनाओं की सिद्धि प्राप्त करता है ॥६८-७३॥ दीक्षा-संस्कार के साथ गुरुमुख से मन्त्र प्राप्त करके ब्रह्मचारी, हविष्यभोजी, सत्यवक्ता तथा जितेन्द्रिय हो कर (यदि कोई) छह मास तक बारह हजार मन्त्र-जप तथा हवन करे तो वह दरिद्रता को जीत कर कुबेर के समान (धनवान्) हो जाय। जो (एक पक्ष की) चतुर्थी (तिथि) से लेकर (दूसरे पक्ष की) चतुर्थी (तिथि) तक नित्य एक सौ आठ बार गणेश-मन्त्र का जप तथा हवन करता है, उसे भी उक्त फल का लाभ होता है। दोनों पक्षों की चतुर्थी (तिथि) में जो एक वर्ष तक सौ बार (उक्त-मन्त्र से) पूओं से हवन करता है, वह परम समृद्धि को प्राप्त करता है। जब मङ्गल दिन चतुर्थी तिथि पड़े तब विधिपूर्वक गणेश का पूजन करके घी और खीर का नैवेद्य चढ़ाये। तदनन्तर सुधी जन गुरु की अर्चना करके उन्हें विधिपूर्वक भोजन कराये। फिर नैवेद्य-सामग्री से एक हजार बार विधिवत् हवन करे। इस प्रकार एक वर्ष तक करने से महती श्री की प्राप्ति होती है ॥७४-७९ १/२॥ लोगों के कल्याण के लिए मैं और भी साधना-विधि बताता हूँ। चिउरा, पूआ तथा अनेक प्रकार के फलों से गणेश का पूजन करके साधक मन्त्र-जप करे और फिर हलदी, नमक तथा आधा निष्क (माशे के बराबर) बच के चूर्ण को गौ के मूत्र में डालकर उसे हजार बार मन्त्र से अभिमन्त्रित करके उसे देवता (गणेश) के आगे रखे। फिर विद्वान् व्यक्ति वह ओषधि ऋतुस्नान करके शुद्ध होकर शुभ वस्त्र धारण किये हुई स्त्री को पिला दे। ऐसा करने से वंध्या स्त्री भी सभी शुभ लक्षणों से सम्पन्न पुत्र को उत्पन्न करती है ॥८०-८४॥ अब मैं परम अद्भुत रहस्य का वर्णन करता हूँ। गोचर्म (एक चरसे की नाप की) भूमि को अच्छी तरह,

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