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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 608, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 608

५८६ अष्टषष्टितमोऽध्यायः विकीर्य धान्यप्रकरैस्तत्र संस्थापयेद्घटम्। शुद्धोदकेन संपूर्यं तस्योपरि निधापयेत् ॥८६॥ कपिलाज्येन संपूर्णं शरावं नूतनं शुभम्। षडष्टाक्षरमंत्राभ्यां दीपमारोपयेच्छुभम् ॥८७॥ दीपे देवं समावाह्य गंधपुष्पादिभिर्यजेत्। स्नातां कुमारीमथवा कुमारं पूजयेत्सुधीः ॥८८॥ दीपस्य पुरतः स्थाप्य ध्यात्वा देवं जपेन्मनुम्। प्रदीपे स्थापिते पश्येद्विजरूपं गणेश्वरम् ॥८९॥ पृष्टस्ततः संपदि वा नष्टं चैवाप्यनागतम्। सकलं प्रवदेद्देवं कुमारी वा कुमारकः ॥९०॥ षडक्षरो हृदंतश्चेद्भवेदष्टाक्षरो मनुः। अन्येऽपि संता देवर्षे सन्ति तंत्रे गणेशितुः ॥९१॥ किंत्वत्र यन्न साध्यं स्यात्त्रिषु लोकेषु साधकैः। अष्टाविंशरसागर्भाभ्यां तन्न पश्येदपि क्वचित् ॥९२॥ एतद्गणेशमंत्राणां विधानं ते मयोदितम्। शठेभ्यः परशिष्येभ्यो वंचकेभ्योऽपि मा वद ॥९३॥ एवं यो भजते देवं गणेशं सर्वसिद्धिदम्। प्राप्येह सकलान्भोगानंते मुक्तिपदं व्रजेत् ॥९४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे गणेशमन्त्रविधाननिरूपणं नामाष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥६८॥ लीपकर वहाँ धान छींटकर उस पर घट-स्थापन करे। उस घट को शुद्ध जल से भर कर उस पर रख दे। कपिला गौ के घी से एक नये पवित्र मृत्पात्र को भरकर उसमें दीपक जलाकर षडक्षर तथा अष्टाक्षर मन्त्रों से उसको घट पर रख दे। उस दीप में (गणपति) देव का आवाहन करके गंध, पुष्प आदि से उनका पूजन करे ॥५८-८७॥ अनन्तर विद्वान् व्यक्ति स्नान किये हुई कुमारी या कुमार का पूजन करे। फिर उस दीप को सामने रखकर गणेश का ध्यान करके मंत्र-जप करे। दीपक की स्थापना करने के बाद गणपति को ब्राह्मण के रूप में देखे। ऐसा करने के बाद उस कुमार या कुमारी से किसी के बारे में जो कुछ भी पूछा जाएगा-कि वह बहुत विलंब से आएगा या शीघ्र आएगा या नष्ट हो गया या नहीं आएगा-वह सब वे बता देंगे। षडक्षर मंत्र में 'नमः' जोड़ देने पर वह अष्टाक्षर मंत्र बन जाता है। देवर्षि ! तंत्र में गणेश के दूसरे मंत्र भी विद्यमान हैं ॥८८-९१॥ किन्तु तीनों लोक में जिस मंत्र की साधना नहीं की जा सकती, ऐसे अट्ठाईस और छह अक्षर वाले मंत्रों को कहीं भी न देखे (अर्थात् उनको सिद्ध करने का प्रयत्न न करे)। यह गणेश-मंत्रों का विधान मैंने तुमसे बता दिया। यह दुष्टों, दूसरे के शिष्यों तथा वंचकों को कभी नहीं बताना चाहिए। इस प्रकार जो सकल-सिद्धिदायक भगवान् गणेश की आराधना करता है, वह यहाँ सकल भोगों को प्राप्त करता है ॥६२-९४॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग में गणेश-मन्त्र विधि-निरूपण नामक अड़सठवाँ अध्याय समाप्त ॥६८॥