बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
५८६ अष्टषष्टितमोऽध्यायः विकीर्य धान्यप्रकरैस्तत्र संस्थापयेद्घटम्। शुद्धोदकेन संपूर्यं तस्योपरि निधापयेत् ॥८६॥ कपिलाज्येन संपूर्णं शरावं नूतनं शुभम्। षडष्टाक्षरमंत्राभ्यां दीपमारोपयेच्छुभम् ॥८७॥ दीपे देवं समावाह्य गंधपुष्पादिभिर्यजेत्। स्नातां कुमारीमथवा कुमारं पूजयेत्सुधीः ॥८८॥ दीपस्य पुरतः स्थाप्य ध्यात्वा देवं जपेन्मनुम्। प्रदीपे स्थापिते पश्येद्विजरूपं गणेश्वरम् ॥८९॥ पृष्टस्ततः संपदि वा नष्टं चैवाप्यनागतम्। सकलं प्रवदेद्देवं कुमारी वा कुमारकः ॥९०॥ षडक्षरो हृदंतश्चेद्भवेदष्टाक्षरो मनुः। अन्येऽपि संता देवर्षे सन्ति तंत्रे गणेशितुः ॥९१॥ किंत्वत्र यन्न साध्यं स्यात्त्रिषु लोकेषु साधकैः। अष्टाविंशरसागर्भाभ्यां तन्न पश्येदपि क्वचित् ॥९२॥ एतद्गणेशमंत्राणां विधानं ते मयोदितम्। शठेभ्यः परशिष्येभ्यो वंचकेभ्योऽपि मा वद ॥९३॥ एवं यो भजते देवं गणेशं सर्वसिद्धिदम्। प्राप्येह सकलान्भोगानंते मुक्तिपदं व्रजेत् ॥९४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे गणेशमन्त्रविधाननिरूपणं नामाष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥६८॥ लीपकर वहाँ धान छींटकर उस पर घट-स्थापन करे। उस घट को शुद्ध जल से भर कर उस पर रख दे। कपिला गौ के घी से एक नये पवित्र मृत्पात्र को भरकर उसमें दीपक जलाकर षडक्षर तथा अष्टाक्षर मन्त्रों से उसको घट पर रख दे। उस दीप में (गणपति) देव का आवाहन करके गंध, पुष्प आदि से उनका पूजन करे ॥५८-८७॥ अनन्तर विद्वान् व्यक्ति स्नान किये हुई कुमारी या कुमार का पूजन करे। फिर उस दीप को सामने रखकर गणेश का ध्यान करके मंत्र-जप करे। दीपक की स्थापना करने के बाद गणपति को ब्राह्मण के रूप में देखे। ऐसा करने के बाद उस कुमार या कुमारी से किसी के बारे में जो कुछ भी पूछा जाएगा-कि वह बहुत विलंब से आएगा या शीघ्र आएगा या नष्ट हो गया या नहीं आएगा-वह सब वे बता देंगे। षडक्षर मंत्र में 'नमः' जोड़ देने पर वह अष्टाक्षर मंत्र बन जाता है। देवर्षि ! तंत्र में गणेश के दूसरे मंत्र भी विद्यमान हैं ॥८८-९१॥ किन्तु तीनों लोक में जिस मंत्र की साधना नहीं की जा सकती, ऐसे अट्ठाईस और छह अक्षर वाले मंत्रों को कहीं भी न देखे (अर्थात् उनको सिद्ध करने का प्रयत्न न करे)। यह गणेश-मंत्रों का विधान मैंने तुमसे बता दिया। यह दुष्टों, दूसरे के शिष्यों तथा वंचकों को कभी नहीं बताना चाहिए। इस प्रकार जो सकल-सिद्धिदायक भगवान् गणेश की आराधना करता है, वह यहाँ सकल भोगों को प्राप्त करता है ॥६२-९४॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग में गणेश-मन्त्र विधि-निरूपण नामक अड़सठवाँ अध्याय समाप्त ॥६८॥
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अथ वक्ष्ये त्रयीमूर्तेर्विधानं त्वब्जिनोपतेः । मन्त्राणां यत्समाराध्य सर्वेष्टं प्राप्नुयाद्भुवि ॥१॥ तारो रेचिकया युक्तो मेधानेत्रयुता रतिः । ससर्गा वामकर्णढिचो भृगुर्वढचासनो मरुत् ॥२॥ शेषोदित्य इति प्रोक्तो वस्वर्णो भुक्तिमुक्तिदः । देवभागो मुनिश्चन्दो गायत्री देवता रविः ॥३॥ माया बीजं रमा शक्तिदृष्टादृष्टे नियोगकः । सत्याय हृदयं पश्चाद्ब्रह्मणे शिर ईरितम् ॥४॥ विष्णवे तु शिखावर्मं रुद्राय परिकीर्तितम् । नेत्रं स्यादग्नये पश्चाच्छर्वायास्वमुदाहृतम् ॥५॥ नेत्रो ज्वाला मनो हूं फट् स्वाहांता मनवो गणाः । पुनः षडंगैर्ह्रीं लक्ष्म्याः कृत्वांतःस्थैः षडंगकम् ॥६॥ शिष्टारौजठरे पृष्ठे तयोर्डेन्ताख्यया न्यसेत् । आदित्यं च रविं पश्चाद्भानुं भास्करमेव च ॥७॥ सूर्य च मूर्ध्नि वदने हृदि गुह्ये च पादयोः । सद्यादिपञ्च ह्रस्वाद्यान् न्यसेन्ङे हृदयोंऽतिमान् ॥८॥ ह्रीं रमामध्यगामष्टौ वर्णांस्तारादिकान्न्यसेत् । मूर्द्धास्यकंठहृत्कुक्षिनाभिलिंगगुदेषु च ॥९॥ सचंद्रस्वरपूर्वं तु ङेतं शीतांशुमण्डलम् । मूर्द्धादिकंठपर्यंतं न्यसेच्चांद्रिमनुस्मरन् ॥१०॥ स्पर्शान्सेंदून्समुच्चार्य ङेतं भास्करमण्डलम् । न्यसेत्कंठादिनाभ्यंतं ध्यायन्प्रद्योतनं हृदि ॥११॥ यादोन्सचंद्रानुच्चार्य ङेतं च वह्निमण्डलम् । नाभ्यादिपादपर्यन्तं न्यसेद्वह्निमनुस्मरन् ॥१२॥ प्रोक्तोऽयं मण्डलन्यासो महातेजोविधायकः । आदिठांतार्णपूर्वं ङेनमोंतं सोममण्डलम् ॥१३॥
सनत्कुमार बोले—अब मैं वेदमूर्ति अब्जिनीपति (सूर्य) के पूजन का विधान बताऊंगा, जिनके मन्त्रों की आराधना करके मनुष्य पृथ्वी पर सकल कामनाओं को प्राप्त करता है । तारोरेचिकया......यह सूर्य का मन्त्र है । इसका मुनि देवभाग, छंद गायत्री और देवता सूर्य है, मायाबीज है (ह्रीं), रमा शक्ति (श्रीं) और दृष्ट तथा अदृष्ट फल में इसका नियोग किया जाता है । (मन्त्र बनेगा—ह्रीं श्रीं सत्याय नमः, ब्रह्मणे स्वाहा, विष्णवे वषट्, रुद्राय हुं, अग्नये वौषट्, शर्वाय फट्) । नेत्र (इ), ज्वाला, (रं) मनु (औ), हुँ फट् स्वाहा-इनको जोड़कर मन्त्र बनाये जाते हैं । पुनः अन्तःस्थ छह वर्णों के साथ ह्रीं और श्रीं को जोड़कर षडंग मन्त्र की रचना करनी चाहिए । शिष्ट और अरि में नमः जोड़कर पेट और पीठ पर उनका न्यास करना चाहिए ॥१-६॥ पश्चात् आदित्य, रवि, भानु, भास्कर तथा सूर्य का मस्तक, मुख, हृदय, गुह्य स्थान तथा दोनों चरणों में न्यास करे । सद्य (ओ) आदि पांच वर्णों से पहले एक ह्रस्व वर्ण हो, अन्त में नमः हो अथवा श्रीं के बाद ह्रीं को रखकर उक्त आठ वर्णों का मस्तक, मुख, कंठ, पेट, नाभि, लिंग तथा गुदा में न्यास करे । पूर्व में चन्द्रस्वर और अंत में चतुर्थी विभक्ति से युक्त चन्द्र-मण्डल का मस्तक से कंठ तक न्यास करे और चन्द्रमा के मन्त्र का स्मरण करे ॥७-१०॥ अनुस्वार युक्त स्पर्श वर्णों का उच्चारण करके अन्त में चतुर्थी विभक्ति से युक्त सूर्यमण्डल का कंठ से नाभि तक न्यास करे और हृदय में सूर्य का ध्यान करे । फिर आदि में य से युक्त तथा अनुस्वार सहित वर्णों का उच्चारण करके अन्त में चतुर्थी विभक्ति से युक्त अग्निमण्डल का नाभि से पैर तक न्यास करे और अग्नि-मन्त्र का स्मरण करे ॥११-१२॥ यह महातेज बढ़ाने वाला मण्डलन्यास मैंने बता दिया । उत्तम साधक आदि में ठ ओर त वर्णों से युक्त
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ५६१ मूर्द्धादिहृदयांतं तु विन्यसेत्साधकोत्तमः । डकारादिक्षकारांतवर्णायं वह्निमण्डलम् ॥१४॥ ङंतं हृदादिपादांतं विन्यसेत्सुसमाहितः । अग्नीषोमात्मको न्यासः कथितः सर्वसिद्धिदः ॥१५॥ न्यसेत्सेन्दून्मातृकार्णाञ्जयांतपुरुषामने । नमोऽन्तेव्यापकं मंत्री हंसन्यासोऽयमीरितः ॥१६॥ अष्टावष्टौ स्वराञ्शेषांन्पंचपंच मितान्पुनः । उक्तादित्यमुखानेतान्विन्यसेच्च नवग्रहान् ॥१७॥ आधारलिंगयोर्नाभौ हृदि कण्ठे मुखांतरे । भ्रूमध्ये च तथा भाले ब्रह्मरंध्रे न्यसेत्क्रमात् ॥१८॥ हंसाख्यमग्नीषोमाख्यं मंडलत्रयमेव च । पुनर्न्यासत्रयं कुर्यान्मूलेन व्यापकं चरेत् ॥१९॥ एवं न्यासविधिं कृत्वा ध्यायेत्सूर्यं हृदंबुजे । दानाभयाब्जयुगलं धारयंतं करै रविम् ॥२०॥ कुंडलांगदकेयूरहारिणं च त्रयोतनुम् । ध्यात्वैवं प्रजपेन्मंत्रौ वसुलक्षं दशांशतः ॥२१॥ रक्तांभोजैस्तिलैर्वापि जुहुयाद्विधिवद्वसौ । प्रथमं पीठयजने धर्मादीनां स्थले यजेत् ॥२२॥ प्रभूतं विमलं शारं समाराध्यमनंतरम् । परमादिमुखं मध्ये खर्बिवातं प्रपूजयेत् ॥२३॥ सोमाग्निमंडलं पूज्य रविमंडलमर्चयेत् । दीप्ता सूक्ष्मा जया भद्रा विभूतिर्विमला तथा ॥२४॥ अमोघा विद्युता सर्वतोमुखी पीठशक्तयः । ह्रस्वत्रयोक्तिजाः क्लीवहीना वह्नींदुसंयुताः ॥२५॥ स्वरा बीजानि शक्तीनां तदाद्या पूजयेत्तु ताः । ब्रह्माविष्णुशिवात्मा ते सृष्टिः शेषान्विताप्यसौ ॥२६॥ एवं चान्ते योगपीठात्मने हृदयमोरयेत् । ताराद्योऽयं पीठमंत्रस्त्वनेनासनमादिशेत् ॥२७॥ ध्रुवो विर्याद्बिन्दुयुतं खं खखोल्काय हृन्मनुः । नवार्णाय च मनवे मूर्ति संकल्ययेत्सुधीः ॥२८॥ तथा अन्त में नमः शब्द से समन्वित चन्द्रमण्डल का मस्तक से लेकर हृदय तक न्यास करे । अग्निमण्डल से पहले डकार से लेकर क्षकार तक वर्णों को जोड़कर और अन्त में चतुर्थी विभक्ति लगाकर हृदय से पैर तक सावधानी से उसका विन्यास करे । अग्नि और चन्द्रमा के मन्त्रों का न्यास सकल सिद्धिदायक है ॥१३-१५॥ अनुस्वार सहित मातृक वर्णों का न्यास करके अन्त में 'जपान्तपुरुषात्मने नमः' कहकर मन्त्रसाधक व्यापक न्यास करे, यही हंस न्यास कहा गया है ॥१६॥ आठ-आठ स्वर वर्णों तथा शेष पाँच-पाँच अन्य वर्णों के साथ सूर्य आदि नवग्रहों का आधार लिंग, नाभि, हृदय, कंठ, मुख के भीतर, भौंहों के बीच, ललाट तथा ब्रह्मरंध्र (मस्तक के मध्य में माना जाने वाला एक छेद) में क्रमशः न्यास करे । हंस, अग्नि तथा चन्द्र नामक तीन मण्डल को रचना करके पुनः तीन न्यास करे, और फिर मूल मन्त्र से व्यापक न्यास करे ॥१७-१९॥ इस प्रकार न्यास को विधि सम्पन्न करके हृदयार- विन्द में सूर्य का ध्यान करे कि वे हाथों में दान तथा अभय की मुद्रा और दो कमल धारण किये हुए हैं; कुंडल, अंगद तथा केयूर से उनका वेद रूप शरीर विभूषित है। ऐसा ध्यान करके साधक आठ लाख मन्त्र-जप करे । और उसका दशांश लालकमल या तिल से विधिवत् हवन करे । पहले पीठस्थल पर पश्चात् धर्म आदि के स्थान पर प्रभूत, विमल, शार तथा समाराध्य का पूजन करे । अनन्तर मध्य में परमादिमुख तथा अंत में खर्बिब की पूजा करे ॥२०-२३॥ फिर चन्द्र-मण्डल तथा अग्नि-मण्डल की पूजा करके सूर्यमण्डल की अर्चना करे। दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता तथा सर्वतोमुखी--ये पीठ-शक्तियाँ हैं। इनमें तीन ह्रस्व- मात्रा तथा वह्नि (र्) और इन्दु (अनुस्वार) लगाकर नपुंसकता से रहित करे । फिर शत्रुओं के नाश के लिए उक्त मन्त्र से पीठशक्तियों का पूजन करे । वे शक्तियां ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव रूप हैं और यह सृष्टि भी शेष से युक्त है ॥२४-२६॥ इनके पूजन के अन्त में 'योगपीठात्मने नमः' का उच्चारण करना चाहिए । इस मन्त्र के आदि में ओम् जोड़ देना चाहिए । इससे यह पीठ मंत्र बनता है । इससे देवता को आसन समर्पित करना चाहिए । 'गं हं स्वं स्वं स्योल्काय नमः' यह नो अक्षरों का मंत्र है । विद्वान् इसके लिए प्रतिमा बनवाये । उस प्रतिमा में संसार
५६२ नारदीयपुराणम्
साक्षिणं जगतां तस्यामावाह्य विधिवद्यजेत् । ततः षडंगावाराध्य दिक्ष्वष्टांगं प्रपूजयेत् ॥२८॥ संपूज्य मध्ये वाऽदित्यं रविं भानुं च भास्करम् । सूर्य दिशासु सूर्यादिपंच ह्रस्वातिकानिमान् ॥३०॥ स्वस्वनामादिदीर्घाद्याः शक्तयोऽर्च्य विविक्षु च । ऊर्जा प्रज्ञां प्रभां संध्यां ततो ब्रह्मादिकान्यजेत् ॥३१॥ पुरतोऽरुणमभ्यर्च्य सोमं ज्ञं च गुरुं भृगुम् । दिक्ष्वर्यमादिकानिष्ट्वा भूमिजं च शनैश्चरम् ॥३२॥ राहुं केतुं च कोणेषु पूर्ववत्परिपूजयेत् । इंद्राद्यानपि वज्राद्यान्पूजयेत्पूर्ववत्सुधीः ॥३३॥ इत्थं संपूज्य विधिवद्भास्करं भक्तवत्सलम् । समाहितो दिने शाय दद्यादर्घ्य दिने दिने ॥३४॥ प्राणानायम्य सद्भूमौ न्यासान्कृत्वा पुरोदितान् । विधाय मंडलं भानोः पीठं पूर्ववदर्चयेत् ॥३५॥ ध्यात्वार्कं प्रयजेद्दिव्यैर्मान सैरुपचारकैः । पात्रं ताम्रमयं प्रस्थतोयग्राहि सुशोभनम् ॥३६॥ निधाय मंडले रक्तचंदनादिविनिर्मिते । विलोममातृकामूलमुच्चरन्पूरयेज्जलैः ॥३७॥ सूर्यबिंब विनिर्गच्छत्सुधांबुधिविभावितैः । कुंकुमं रोचनां राजों चंदलं रक्तचंदनम् ॥३८॥ करवीरं जपामारिकुशश्यामाकतंडुलान् । तिलवेणुयवांश्चैव निक्षिपेत्सलिले शुभे ॥३६॥ सांगं सावरणं तत्रावाह्यार्कं पूर्ववद्यजेत् । गंधपुष्पधूपदीपनैवेद्याद्यैर्विधानतः ॥४०॥ प्राणायामत्रयं कृत्वा कुर्यादंगानि पूर्ववत् । सुधाबीजं चंदनेन दक्षे करतले लिखेत् ॥४१॥ तेनाच्छाद्यार्घ्यपात्रं च जपेन्मनुमनन्यधीः । अष्टोत्तरशतावृत्त्या पुनः संपूज्य भास्करम् ॥४२॥ हस्ताभ्यां पात्रमादाय जानुभ्यामवनौ गतः । आमूर्ध्न पात्रमुद्धृत्यांबरेण वरणे रवेः ॥४३॥
के साक्षी (सूर्य) का आवाहन करके विधिवत् पूजन करे। तदनन्तर उनके छह अंगों की आराधना करके दिशाओं में आठ अंगों का भी पूजन करे ॥२७-२९॥ अथवा मध्य में आदित्य, रवि, भानु, भास्कर तथा सूर्य की और दिशाओं में सद्य (ओ) आदि तथा ह्रस्व (वर्ण) आदि के साथ इन पाँचों (नामों) की पूजा करनी चाहिए। फिर विदिशाओं (कोणों) में शक्तियों की पूजा करे। वे शक्तियाँ हैं- उषा, प्रज्ञा, प्रभा तथा सन्ध्या । इसके बाद ब्रह्मा आदि की पूजा करे। आगे अरुण, सोम, बुध, बृहस्पति तथा शुक्र की अर्चना करके दिशाओं में अर्यमा आदि की पूजा करे। फिर मंगल, शनैश्चर, राहु तथा केतु का पूजन पूर्ववत् कोणों में करे। विद्वान् इन्द्र आदि देवों तथा (उनके) वज्र आदि आयुधों का भो पूजन करे ॥३०-३३॥
इस प्रकार विधिपूर्वक भक्तवत्सल सूर्य की आराधना करके एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य दिया करे। प्राणायाम करने के उपरान्त पवित्र भूमि पर पूर्वोक्त न्यासों को करके मण्डल की रचना करने के बाद पूर्ववत् सूर्य के पीठ की अर्चना करे। सूर्य का ध्यान करके दिव्य मानस उपचारों से उनका पूजन करे। एक तांबे के सुन्दर पात्र को रक्तमंत्र आदि के बनाये हुए मण्डल पर रखकर विलोममातृका के मूलमंत्र का उच्चारण करते हुए उस पात्र को जल से भर दे। उसमें भावना करे कि सूर्य-बिम्ब से निकलते हुए अमृत-समुद्र से वह पात्र भरा जा रहा है, ॥३४-३७॥ इसके बाद उस पवित्र जल में कुंकुम, रोचना, सर्षप, चन्दन, रक्तचन्दन, करवीर, जपाकुसुम,जड़हन चावल, कुश, साँवाँ चावल, (सामान्य) चावल, तिल, वेणु (बांस ?) और यव डाले। वहीं अंगों तथा आवरणों सहित सूर्य का आवाहन करके पूर्ववत् गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से उनका विधिपूर्वक पूजन करे। (पूरक, कुंभक, रेचक) तीनों प्राणायाम करके पूर्ववत् अंगन्यास करे। फिर दाहिनी हथेली पर चंदन से सुधाबीज (वं) लिखे । ॥३८-४१॥ उससे अर्घ्यपात्र को आच्छादित करके एकाग्रचित्त से मन्त्र का जप करे। एक सौ आठ बार जप करने के बाद सूर्य का पुनः पूजन करे। फिर दोनों हाथों से पात्र उठाकर धरती पर घुटनों के बल बैठकर पात्र को मस्तक तक उठाकर वस्त्र की आड़ से सूर्य पर दृष्टि डाले । फिर मन में सूर्य
दृष्टिं चाधाय मनसा पूजयित्वा रविं पुनः । साधकेन स्वकैक्येन मूलमंत्रं धिया जपन् ॥४४॥ आर्घ्यं दद्याद्रविं ध्यायन्रक्तचंदनमंडले । दत्त्वा पुष्पांजलिं भूयो जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥४५॥ नित्यं वा तद्दिनेऽप्येवमर्घ्यं दद्याद्विवस्वते । तेन तुष्टो दिनेशोऽस्मै दद्याद्वित्तं यशः सुखम् ॥४६॥ पुत्रांश्पौत्रानभीष्टं च यद्यत्सर्वं प्रयच्छति । अर्घ्यदानमिदं प्रोक्तमायुरारोग्यवर्धनम् ॥४७॥ धनधान्यपशुक्षेमक्षेत्रमित्रकलत्रदम् । तेजोवीर्ययशःकीर्तिविद्याविभवभोगदम् ॥४८॥ गायत्र्याराधनासक्तः संध्यावंदनतत्परः । एवं मनुं जपन्विप्रो दुःखं नैवाप्नुयात्क्वचित् ॥४८॥ विकर्तनाय निर्माल्यमेवं संपूज्य दापयेत् । वियद्वह्निमरुत्साद्यांतार्वीसेंदुसमन्वितम् ॥५०॥ मातंडभैरवाख्यं हि बीजं त्रैलोक्यमोहनम् । बिंबबीजेन पुटितं सर्वकामफलप्रदम् ॥५१॥ पूर्ववत्सकलं चान्यदत्र ज्ञेयं मनीषिभिः । भृगुर्जलेन्दुमन्वाढ्यः सोमाय हृदयांतिमः ॥५२॥ षडक्षरो मंत्रराजो मुनिरस्य भृगुर्मतः । छंदः पंक्तिस्तु सोमोऽस्य देवता परिकीर्तिता ॥५३॥ आद्यं बीजं नमः शक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये । षड्दीर्घेण स्वबीजेन षडंगानि समाचरेत् ॥५४॥ पूर्णेन्दास्यं स्फटिकभं नीलाकलकसंमुखम् । बिभ्राणमिष्टं कुमुदं ध्यायेन्मुक्ताल्रजं विधुम् ॥५५॥ ऋतुलक्षं जपेन्मंत्रं पायसेन ससर्पिषा । जुहुयात्तद्दशांशेन पीठे सोमांतपूजिते ॥५६॥ मतिमूलेन संकल्प्य पुजयद्विधिवद्विधुम् । केसरेष्वंगपूजा स्यात्पत्रेष्वेताश्च शक्तयः ॥५७॥ रोहिणी कृत्तिका चैव रेवती भरणी पुरः । रात्रिरार्द्रा ततो ज्योत्स्ना कला हारसमप्रभा ॥५८॥
की पूजा करके साधक अपने को उनसे अभिन्न समझकर मन में मूल मन्त्र का जप करे । रवि का ध्यान करते हुए रक्तचंदनमण्डल पर उन्हें अर्घ्य प्रदान करे । फिर पुष्पांजलि देकर एक सौ आठ बार मन्त्र-जप करे ॥४२-४५। उस दिन भी इसी प्रकार सूर्य को अर्घ्य दे । इससे प्रसन्न होकर सूर्य उस (साधक) को धन, यश, सुख, पुत्र, पौत्र तथा वह जो-जो चाहता है, वह सब उसे प्रदान करते हैं । यह सूर्य-पूजन आयु तथा आरोग्य का वर्धक है । यह धन, धान्य, पशु, कल्याण, क्षेत्र, मित्र तथा पत्नी दिलाने वाला है । इससे तेज, वीर्य, यश, कीर्ति, विद्या, विभव तथा भोग भी मिलता है । जो विप्र गायत्री की आराधना एवं संध्यावंदन करने में तत्पर रह कर सूर्य-मंत्र का जप करता है, उसे कहीं भी दुःख नहीं होता है । इस प्रकार सूर्य का सम्पूजन कर नैवेद्य वितरण कर दे ॥४६-४९३॥ आकाश (ह), वह्नि (र), मरुत् (य), आदि में स और अंत में अनुस्वारयुक्त आवीं—यह मार्तण्डभैरव नामक बीज मन्त्र है, जो तीनों लोक को मोहित करने वाला है । इस मन्त्र को बिम्ब-बीज से सम्पुटित कर देने पर यह सकल कामनादायक हो जाता है । इस मन्त्र के संबंध में भी विद्वान् लोग पूर्ववत् ही सब कुछ समझें । भृगु (स्), जल (व्), इन्द्र (अनुस्वार), मनु (ओ) से युक्त 'ओं सोमाय नमः' यह षडक्षर मन्त्र मन्त्रराज कहलाता है । इसका मुनि भृगु है, छंद पंक्ति है, देवता सोम है, आद्य बीज है, नमः शक्ति है और सकल वस्तुओं की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग किया जाता है । छह दीर्घ मात्राओं से युक्त अपने बीजमन्त्र से षडंगन्यास करे ॥५०-५४॥ तदनन्तर ऐसा ध्यान करे कि सोम का मुख पूर्ण कलाओं से युक्त है, स्फटिक के समान उसकी कान्ति है, काले घुंघराले बालों से उसका मुख शोभित हो रहा है और वह अपने प्रिय कुमुदपुष्प को धारण किये हुए है । ध्यानोंपरान्त छह लाख मन्त्र-जप करे और उसका दशांश घी सहित खीर से चन्द्र-पीठ पर हवन करे ॥५५-५६॥ मूर्ति के मूल भाग या मूलमन्त्र से विधिपूर्वक चन्द्रमा की पूजा करे। केसों पर चन्द्रमा के अंगदेवताओं और पत्रों पर इन शक्तियों का पूजन करे—रोहिणी, कृत्तिका, रेवती, भरणी, रात्रि, आर्द्रा, ज्योत्स्ना और कला । इन शक्तियों की कान्ति हार के समान है ॥५७-५८॥ सब शक्तियाँ शुभ्र माला एवं वस्त्र धारण ७५ ना० पृ०
५६४ नारदायपुराणम् सुशुक्लमाल्यवसनामुक्ताहारविभूषिताः । सर्वास्स्तनभराक्रांता रचितांजलयः शुभाः ॥५९॥ स्वप्रियासक्तमनसो मदविभ्रममंथराः । समभ्यर्च्यः सरोजाक्ष्यः पूर्णेन्दुसदृशाननाः ॥६०॥ दलाग्रेषु समभ्यर्च्यस्त्वष्टौ सूर्यादिका ग्रहाः । आदित्यभूसुतबुधमंददेवेज्यराहवः ॥६१॥ शुक्रकेतुयुता ह्येते पूज्याःपत्राग्रगाग्रहाः । रक्तारुणश्वेतनीलपीतधूम्रसिताऽसिताः ॥६२॥ वामोरुन्यस्ततद्धस्ता दक्षिणेन धृताभयाः । लोकपालांस्तदस्त्राणि तद्बाह्ये पूजयेत्सुधीः ॥६३॥ एवं संसाधितो मंत्रः प्रयच्छेदिष्टमात्मनः । पौर्णमास्यां जिताहारो दद्यादर्घ्यं विधूदये ॥६४॥ मंडलत्रितयं कुर्यात्प्राक्प्रत्यगायतं भुवि । पश्चिमे मंडले स्थित्वा पूजाद्रव्यं च मध्यमे ॥६५॥ संस्थाप्य सोममन्यस्मिन्मंडलेऽब्जसमन्विते । समभ्यर्च्य विधानेन पीठपूजनपूर्वकम् ॥६६॥ स्थापयेद्राजतं पात्रं पुरतस्तत्र मंत्रवित् । सुरभीपयसापूर्य तं स्पृशन्प्रजपेन्मनुम् ॥६७॥ अष्टोत्तरशतं पश्चाद्विद्यामंत्रेण मंत्रवित् । दद्यान्निशाकरायार्घ्यं सर्वाभीष्टार्थसिद्धये ॥६८॥ कुर्यादनेन विधिना प्रतिमासमतंत्रितः । वर्षान्तरेण सर्वेष्टं प्राप्नोति भुवि मानवः ॥६९॥ विद्ये विद्यामालिनि स्यादंते चंद्रिणि संवदेत् । चंद्रमुखि द्विठांतोऽयं विद्यामंत्र उदाहृतः ॥७०॥ एवं कुमुदिनोनाथमंत्रं यो जपति ध्रुवम् । धनं धान्यं सुतान्पौत्रान्सौभाग्यं लभतेऽचिरात् ॥७१॥ अथांगारकमंत्रं तु वक्ष्ये धनसुतप्रदम् । तारो दीर्घेंदुयुग्व्योम तदेवेंदुयुतः पुनः ॥७२॥ षांतः सर्गी च चंडीशो क्रमाद्विंदुविसर्गिणौ । षडर्णोऽयं महामंत्रो मंगलस्याखिलेष्टदः ॥७३॥
किये हुई हैं, मुक्ताहार से विभूषित हैं, कुचों के भार से आक्रांत हैं, अंजलि बाँधे हुई हैं, अपने प्रिय में मन को लगाये हुई हैं ओर मद से मस्त होने के कारण सुस्त हैं। कमल के समान नयनों वाली और पूर्ण चन्द्र के समान मुख वाली इन शक्तियों की भली भाँति पूजा करनी चाहिए। इसके बाद पत्रों के अग्रभाग में सूर्य आदि आठ ग्रहों की पूजा करनी चाहिए ॥५९-६०१/२॥ सूर्य, मंगल, बुध, शनि, बृहस्पति, राहु, शुक्र और केतु ग्रह पत्र के अग्रभाग में पूजे जाने चाहिए। इन ग्रहों के रंग क्रमशः रक्त, अरुण, श्वेत, नील, पीत, धूसर, श्वेत और कृष्ण हैं। इनके ऐसे रूपों का ध्यान करे कि इनके बायें हाथ बायीं जांघों पर स्थित हैं और दाहिने हाथ में ये अभय अस्त्र धारण किये हुए हैं। इन ग्रहों के बाद लोकपालों तथा उनके अस्त्रों का पूजन करना चाहिए ॥६१-६३॥ इस प्रकार सिद्ध किया हुआ मन्त्र मनचाही वस्तु प्रदान करता है। पूर्णिमा के दिन उपवास रखकर चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करे। तीन मण्डल बनाये, जिनमें पूर्व और पश्चिम के मण्डल कुछ लंबे हों। पश्चिम मण्डल में स्वयं बैठकर पूजा की सामग्री को मण्डल में रखे। तीसरे मण्डल में कमल-पुष्पों पर चन्द्रमा की (प्रतिमा को) स्थापना करे। पीठ को पूजा कर लेने के बाद विधिपूर्वक चन्द्र-पूजन करे। मन्त्रसाधक वहाँ अपने आगे एक चांदी का पात्र रखे। उस पात्र को गाय के दूध से भरकर उसका स्पर्श करते हुए एक सौ आठ बार मन्त्र-जप करे पश्चात् विद्या-मन्त्र से सकल कामनाओं की सिद्धि के लिए चन्द्रमा को अर्घ्य दे ॥६४-६८॥ इस विधि से प्रत्येक मास में आलस्यरहित होकर चन्द्र-पूजन करे। ऐसा करने से एक वर्ष के भीतर मानव की मनःकामना पूर्ण हो जाती है। 'विद्ये विद्यामालिनि चंद्रिणि चंद्रमुखि स्वाहा' यह विद्यामन्त्र है। इस प्रकार जो व्यक्ति चन्द्रमा के मन्त्र की साधना करता है, उसे शीघ्र ही धन, धान्य, पुत्र, पौत्र तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है ॥६९-७१॥ अब मैं धन एवं पुत्र देने वाला मंगल का मन्त्र बताऊंगा। तारः.......यह मंगल का षडक्षर महामन्त्र अखिल कामनादायक है। इसके मुनि विरूपाक्ष, छंद गायत्री और देवता मंगल है। छह मन्त्राक्षरों से षडंगन्यास
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५६५ एकोनसप्ततितमोऽध्यायः विरूपाक्षो मुनिश्च्छंदोगायत्रं देवता कुजः । मंत्राणैः षड्भिरंगानि कुर्वन्ध्यायेद्धरात्मजम् ॥७४॥ मेषस्थं रक्तवस्त्रांगं शूलशक्तिगदावरान् । करैर्बिभ्राणमीशानस्वेदजं भूसुतं स्मरेत् ॥७५॥ रसलक्षं जपेन्मंत्रं दशांशं खदिरोद्भवैः । समिद्भिर्जुहुयादग्नौ शैवे पीठे यजेत्कुजम् ॥७६॥ प्रागंगानि समाराध्य ह्येर्काविंशतिकोष्ठकम् । मंगलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः ॥७७॥ स्थिरासनो महाकायः सर्वकर्मावरोधकः । लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः ॥७८॥ धरात्मजः कुजो भौमो भूमिदो भूमिनंदनः । अंगारको महीसूनुः सर्वरोगापहारकः ॥७९॥ वृष्टिकर्ता वृष्टिहर्ता सर्वकार्यार्थसिद्धिदः । इत्येकविंशतिः प्रोक्ता मूर्तयो भूसुतस्य वै ॥८०॥ मंगलादीन्यजेन्मंत्री स्वस्वस्थानस्थितान्क्रमात् । इंद्राद्यानपि वज्रादीनेवं सिद्धो भवेन्मनुः ॥८१॥ सुतकामा कुरंगाक्षी भौमव्रतमुपाचरेत् । मार्गशीर्षेऽथ वैशाखे व्रतारंभः प्रशस्यते ॥८२॥ अरुणोदयवेलायामुत्थायावश्यकं पुनः । विनिर्वर्त्य रदन्धावेदपामार्गेण वाग्यता ॥८३॥ स्नात्वा रक्तांबरधरा रक्तमाल्यविलेपना । नैवेद्यादींश्च संभारान्रक्तान्सर्वान्प्रकल्पयेत् ॥८४॥ योग्यं विप्रं समाहूय कुजमर्चेत्तदाज्ञया । रक्तगोगोमयालिप्तभूमौ रक्तासने विशेत् ॥८५॥ आचम्य देशकालौ च स्मृत्वाकाम्य समुच्चरन् । मङ्गलादीनि नामानि स्वकीयांगेषु विन्यसेत् ॥८६॥ मुखे प्रविन्सेत्साध्वी सामगानां कृपाकरम् । धरात्मजं नासोरन्ध्रोः कुजं भौमं ललाटके ॥८७॥ भूमिदं तु भ्रुवोर्मध्ये मस्तके भूमिनन्दनम् । अङ्गारकं शिखायां च सर्वाङ्गे च महीसुतम् ॥८८॥ बाहुद्वये न्यसेत्पश्चात्सर्वरोगापहारकम् । मूर्द्धादि वृष्टिकर्त्तारमापादांतं न्यसेत्सुधीः ॥८९॥ करके मंगल का इस प्रकार ध्यान करे कि वे भेड़े पर विराजमान है, लाल वस्त्र से उनके अंग आच्छादित हैं और वे हाथों में त्रिशूल, शक्ति (सांग) तथा उत्तम गदा धारण किये हुए हैं। इस प्रकार शंकर के पसीने से उत्पन्न मंगल का स्मरण करके छह लाख मन्त्र-जप करे और उसका दशांश खैर की समिधा से अग्नि में हवन करे। अनन्तर शैव पीठ पर मंगल की पूजा करे। पहले अंगदेवताओं की आराधना करके इक्कीस कोष्ठों में मंगल की इक्कीस मूर्तियों का पूजन करे। मंगल, भूमिपुत्र, ऋणहर्ता, धनप्रद, स्थिरासन, महाकाय, सर्वकर्मावरोधक, लोहित, लोहिताक्ष, सामगकृपाकर (सामगान करने वालों पर दयालु), धरात्मज, कुज, भौम, भूमिद, भूमिनंदन, अंगारक, महीसुत, सर्वरोगापहारक, वृष्टिकर्ता, वृष्टिहर्ता और सर्वकार्यसिद्धिदायक—ये मंगल की इक्कीस मूर्तियां कही गई हैं। मन्त्र-साधक अपने-अपने स्थान में स्थित मंगल आदि ग्रहों का क्रमशः पूजन करे। अनन्तर इन्द्र आदि देवों तथा (उनके आयुध) वज्र आदि का भी पूजन करे। ऐसा करने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है ॥७२-८१॥ पुत्र की इच्छुक रमणी मंगल का व्रत करे। अगहन या वैशाख में व्रत का आरंभ करना प्रशस्त माना गया है। अरुणोदय के समय उठकर आवश्यक (शौचादि) कार्य से निबटकर मौन होकर अपामार्ग (चिचिड़े) से दांतों को माँजे। (दन्तधावन के बाद) स्नान करके लाल वस्त्र, लाल पुष्प तथा लाल चन्दन धारण करे। नैवेद्य आदि का समायोजन भी करे, किन्तु सभी वस्तुएँ लाल होनी चाहिए। योग्य ब्राह्मण को बुलाकर उसकी आज्ञा से मङ्गल का पूजन करे। लाल गाय के गोबर से लिपी हुई भूमि पर लाल आसन पर (व्रती स्त्री) बैठे। आचमन तथा देश-काल का स्मरण करके अपनी कामना का उच्चारण करते हुए मङ्गल आदि नामों का अपने अंगों में न्यास करे। साध्वी स्त्री अपने मुख में सामगकृपाकर का न्यास करे। दोनों नासिकापुटों में धरात्मज का, दोनों नेत्रों में कुज का ललाट में भौम का, भौहों के बीच भूमिद का, मस्तक में भूमिनन्दन का, शिखा में अंगारक का और सर्वांग में महीसुत का न्यास करे। पश्चात् दोनों बाहों में सर्वरोगापहारक का न्यास करे। मस्तक से लेकर पैर के अन्त
५८६ नारदीयपुराणम् विन्यसेदृष्टिहर्तारं मूर्द्धां तं चरणादितः । न्यसेदंते ततो दिक्षु सर्वकार्यार्थसिद्धिदम् ॥८०॥ नाभौ हृदि शिरस्यारं वक्त्रे भूमिजमेव च । विन्यस्यैवं निजे देहे ध्यायेत्प्राग्वद्धरात्मजम् ॥८१॥ मानसेरुष्चारैश्च संपूज्यार्घ्यं निधापयेत् । एकविंशतिकोष्ठाढ्ये त्रिकोणे ताम्रपत्रगे ॥८२॥ आवाह्याङ्गारकं तत्र रक्तपुष्पादिभिर्यजेत् । अङ्गानि पूर्वमाराध्य मङ्गलादीन्प्रपूजयेत् ॥८३॥ एकविंशतिकोष्ठेषु चक्रमशारं च भूमिजम् । त्रिकोणेषु च सम्पूज्य बहिरष्टौ च मातृकाः ॥८४॥ इंद्रादीनथ वज्रादीन्बाह्ये संपूजयेत्पुनः । धूपदीपौ समर्प्याथ गोधूमान्नं निवेदयेत् ॥८५॥ ताम्रपात्रे शुद्धतोयपूरिते रक्तचंदनम् । रक्तपुष्पाक्षतफलान्याक्षिप्यार्घ्यं समर्पयेत् ॥ मंगलाय ततो मंत्री इमं मंत्रद्वयं पठेत् ॥८६॥ भूमिपुत्र महातेजः स्वेदोद्भवपिनाकिनः । सुतार्थिनी प्रपन्ना त्वां गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥८७॥ रक्तप्रवालसंकाशं जपाकुसुमसंन्निभ । महीसुत महाभाग गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥८८॥ एकविंशतिपूर्वोक्तैर्ङेऽन्तैर्नमोंऽतैश्च नामभिः । ताराद्यैः प्रणमेत्पश्चात्तावत्यश्च प्रदक्षिणाः ॥८९॥ धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्तेजः समप्रभम् । कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥१००॥ ततो रेखात्रयं कुर्यात्खदिरांगारकेण च । मार्जयेद्वामपादेन मंत्राभ्यां च समाहिता ॥१०१॥ दुःखदौर्भाग्यनाशाय पुत्रसंतानहेतवे । कृतरेखात्रयं वामपादेनैतत्प्रमार्जयम् ॥१०२॥ तक वृष्टिकर्त्ता का न्यास करे ॥८२-८९॥ फिर चरण से मस्तक तक दृष्टिहर्ता का न्यास करे । तदनन्तर दिशाओं में सर्वकामार्थसिद्धिदायक का न्यास करे। नाभि, हृदय तथा मस्तक में आर का और मुख में भूमिज का न्यास करे। इस प्रकार अपनी देह में न्यास करके पहले की तरह भूमि-पुत्र (मङ्गल) का ध्यान करे। फिर मानस उपचारों (कल्पित द्रव्यों) से पूजन करके अर्घ्य प्रदान करे। एक त्रिकोण ताम्रपत्र पर, जिसमें इक्कीस कोष्ठक बने हों, मङ्गल ग्रह का आवाहन करके लाल पुष्प आदि से उनकी पूजा करे। पहले अंगों की आराधना करके मङ्गल आदि की पूजा करनी चाहिए ॥९०-६३॥ इक्कीस कोष्ठों तथा त्रिकोणों में चक्र, आर और भूमिज की पूजा करके बाहर आठ मातृकाओं का पूजन करे । पुनः बाहर इन्द्र आदि देवों तथा उनके वज्र आदि आयुधों की पूजा करे और उनको धूप, दीप तथा पंजीरी समर्पित करे। शुद्ध जल से भरे हुए ताम्रपात्र में रक्तचन्दन, रक्तपुष्प, अक्षत और फल डालकर मङ्गल ग्रह को अर्घ्यं प्रदान करे । अर्घ्य मन्त्र यह है- 'भूमिपुत्र ! महातेजस्वी ! शंकर के स्वेद (पसीने) से उत्पन्न ! मैं पुत्र की कामना से आपकी शरण में आयी हूँ, यह अर्घ्य स्वीकार कीजिए, आपको नमस्कार है। लाल मूंगे के समान ! जपाकुसुम (अड़हुल) के सदृश ! भूमिपुत्र ! महाभाग ! अर्घ्यं ग्रहण कीजिए ! आपको नमस्कार है' ॥९४-६८॥ पूर्वोक्त इक्कीस नामों के आदि में ओं तथा अन्त में चतुर्थी विभक्ति और नमः शब्द जोड़कर (अर्थात् ओं मङ्गलाय नमः' इत्यादि कहकर) प्रणाम करे और इक्कीस बार प्रदक्षिणा करे (प्रदक्षिणा का मन्त्र-)'पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न, बिजली के तेज के समान प्रभा वाले, कुमार और हाथ में शक्ति (नामक अस्त्र) धारण करने वाले मङ्गल को प्रणाम करती हूँ' ॥६६-१००॥ तदनन्तर खैर की लकड़ी से तीन रेखायें खींचे और उनको एकाग्र होकर दो मन्त्र पढते हुए बायें पैर से मिटा दे (दोनों मन्त्र ये हैं-) दुःख और दौर्भाग्य के विनाश के लिए तथा पुत्र और संतान की प्राप्ति के लिए इन तीनों रेखाओं को मैं बायें पैर से मिटा रही हूँ। ऋण तथा दुःख को नष्ट करने के लिए और मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए मैं तीन जन्मों में उत्पन्न इन तीन काली रेखाओं
५६७ एकोनषष्टितमोऽध्यायः ऋणदुःखविनाशाय मनोभीष्टार्थसिद्धये । मार्जयाम्यसिता रेखास्तिस्रो जन्मतयोद्भवः ॥१०३॥ स्तुवीत धरणीपुत्रं पुष्पांजलिकरस्ततः । ध्यायंतौ तत्पदाम्भोजं पूजासांगत्वसिद्धये ॥१०४॥ ऋणहर्त्रे नमस्तुभ्यं दुःखदारिद्र्यनाशिने । सौभाग्यसुखदो नित्यं भव मे धरणीसुत ॥१०५॥ तप्तकांचनसंकाश तरुणारुणसमप्रभ । सुखसौभाग्यधनद ऋणदारिद्र्यनाशक ॥१०६॥ ग्रहराज नमस्तेऽस्तु सर्वकल्याणकारक । प्रसादं कुरु देवेश सर्वकल्याणभाजन ॥१०७। देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः । आप्नुवन्ति शिवं सर्वं सदा पूर्णमनोरथाः ॥१०८॥ आचिरादेव लोकेऽस्मिन्यस्याराधनतो जनाः । प्राप्नुवन्ति सुखं तस्मै नमो धरनिसूनवे ॥१०८॥ यो वक्रगतिमापन्नो नृणां दुखं प्रयच्छति । पूजितः सुखसौभाग्यं तस्मै क्ष्मासूनवे नमः ॥११०॥ नमसि द्योतमानाय सर्वकल्याणहेतवे । मङ्गलाय नमस्तुभ्यं धनसंतानहेतवे ॥१११॥ प्रसादं कुरु मे भौम मंगलप्रद मंगल । मेषवाहन रुद्रात्मन्देहि पुत्रान्धनं यशः ॥११२॥ एवं स्तुत्वा प्रणम्याथ विसृज्य धरणीसुतम् । यथाशक्त्या प्रदाय स्वं गृह्णीद्ब्राह्मणाशिषः ॥११३॥ गुरवे दक्षिणां दत्त्वा भुञ्जीयात्तन्निवेदितम् ॥११४॥ एवमावत्सरं कुर्यात्प्रतिमंगलवासरम् । तिलैर्होमं विधायाथशताद्धं भोजयेद्विजान् ॥११५॥ भौममूर्ति स्वण॔मपीमाचार्य्याय समर्पयेत् । मंडलस्थे घटेऽभ्यर्च्येतत्त्सौभाग्यसिद्धये ॥११६॥ एवं व्रतपरा नारी प्राप्नुयात्सुभगान्सुतान् । ऋणनाशाय वित्तार्थं व्रतं कुर्यात्पुमानपि ॥११७॥ ब्राह्मणः प्रजपेन्मन्त्रमग्निर्मूद्धेति वैदिकम् । अंगारकस्य गायत्रीं वक्ष्ये यजनसिद्धये ॥११८॥
को मिटा रही हूँ। तदनन्तर अंजलि में पुष्प लेकर सांगोपांग पूजन की फल-प्राप्ति के लिए मङ्गलग्रह के चरणारविन्द का ध्यान करते हुए उनकी स्तुति करे—'ऋण का हरण करने वाले ! तुम्हें नमस्कार है। दुःख और दरिद्रता नाश करने वाले ! तुम्हें नमस्कार है ! भूमिपुत्र ! मुझे नित्य सौभाग्य और सुख प्रदान कीजिए ॥१०१-१०५॥ तपे हुए सुवर्ण के समान ! तरुण सूर्य के समान ! सुख, सौभाग्य तथा धन देने वाले ! ऋण तथा दरिद्रता का नाश करने वाले ! ग्रहराज ! सबका कल्याण करने वाले ! आपको नमस्कार है। देवों के ईश ! समस्त कल्याणों के पात्र ! मुझपर कृपा कीजिए। आपकी आराधना से देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा सर्प पूर्णमनोरथ होकर कल्याण प्राप्त करते हैं। इस लोक में मनुष्य आपकी आराधना से शीघ्र ही सुख प्राप्त कर लेते हैं ॥१०६-१०८½॥ हे धरती के पुत्र ! आपको नमस्कार है। जो (किसी की कुण्डली में अपनी दशा आने पर) वक्र गति को प्राप्त करने पर मनुष्यों को दुःख प्रदान करते हैं और पूजित होने पर सुख-सौभाग्य देते हैं, उस पृथ्वीपुत्र (मङ्गल) को नमस्कार है। आकाश में चमकने वाले और सकल कल्याणों तथा धन-सन्तानों के कारण रूप मङ्गल को नमस्कार है। हे भूमि-पुत्र ! मङ्गलदाता ! मङ्गल ! मुझ पर कृपा कीजिए। मेषवाहन (भेड़े की सवारी करने वाले) रुद्ररूप ! मुझे पुत्र, धन और यश प्रदान कीजिए ॥१०९-११२॥ इस प्रकार स्तुति करने के उपरान्त प्रणाम करके मङ्गल का विसर्जन करे और यथाशक्ति धन प्रदान कर ब्राह्मण से आशीर्वाद ले । फिर गुरु को दक्षिणा देकर उनकी आज्ञा से स्वयं भोजन करे। पुत्र एवं सौभाग्य की प्राप्ति के लिए मण्डल पर घटस्थापन तथा उस पर मङ्गल की अर्चना करे। इस प्रकार व्रतपरायण होने से नारी सुन्दर पुत्रों को प्राप्त करती है। ऋण चुकाने के लिए वित्त के वास्ते पुरुष भी व्रत करे। ब्राह्मण 'अग्निर्मूर्धा'— इस वैदिक मन्त्र का जप करे। अब मैं पूजन की सिद्धि के लिए मङ्गल का गायत्री-मन्त्र बताऊँगा ॥११३-११८॥
५६८ नारदीयपुराणम् अङ्गारकाय शब्दान्ते विद्महे पदमीरयेत् । शक्तिहस्ताय वर्णां ते धीमहीति समुच्चरेत् ॥११९॥ तन्नो भौमः प्रचोवर्णान्दयादिति च संवदेत् । भौमस्यैषा तु गायत्री जप्तः सर्वेष्टसिद्धिदा ॥१२०॥ भौमोपासनमेतद्धि बुधमन्त्रमथोच्यते । फांतः कर्णेन्दुसंयुक्तो बुधो ऽन्ते हृदंतिमः ॥१२१॥ रसार्णो बुधमन्त्रोऽयं मुनिर्ब्रह्मास्य कीर्तितः । पंक्तिश्छंदो देवता तु बुधः सर्वेष्टदो नृणाम् ॥१२२॥ आद्यं बीजं नमः शक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये । वन्दे बुधं सदा भक्त्या पीताम्बरविभूषणम् ॥१२३॥ जानुस्थवामहस्ताढ्यं साभयेतरपाणिकम् । ध्यात्वैवं प्रजपेत्सहस्रं विजितेंद्रियः ॥१२४॥ दशांशं जुहुयादाज्यैः पीठे पूर्वोदितेऽर्चयेत् । अङ्गमातृदिशापालहेतिभिर्बुधमर्चयेत् ॥१२५॥ एवं सिद्धे मनौ मंत्री साधयेत्स्वमनोरथान् । सहस्रं प्रजपेन्मंत्रं नित्यं दशदिनावधि ॥१२६॥ तस्याशु प्रहजा पीडा नश्यत्येव न संशयः । बुधस्याराधनं प्रोक्तं गुरोराधनं शृणु ॥१२७॥ बृहस्पतिपदं ङेऽतं सेंद्राद्यर्णाममंडितम् । नमोऽतोवसुवर्णोऽयं मुनिर्ब्रह्मास्य संमतः ॥१२८॥ छन्दोऽनुष्टुप्सुराचार्यो देवता बीजमादिमम् । हृच्छक्तिर्दीर्घवह्नींदुयुगलेनांगकल्पना ॥१२९॥ न्यस्तवामकरं राशौ रत्नानां दक्षिणात्करात् । किरंतं पीतपुष्पालंकारालेपांशुकाचितम् ॥१३०॥ सर्वविद्यानिधि देवगुरुं स्वर्णद्युति स्मरेत् । लक्षं जपो दशांशेन घृतेनान्नेन वा हुनेत् ॥१३१॥
'अंगारकाय' शब्द के अन्त में 'विद्महे' पद का उच्चारण करे । फिर 'शक्तिहस्ताय' शब्द के अंत में 'धीमहि' जोड़कर 'तन्नो भौमः प्रचोदयात्' भी बोले । यह भौम-गायत्री मन्त्र जप करने वाले की सकल कामनाओं को सिद्ध करता है । यह मङ्गल की उपासना का विधान बताया गया है । अब बुध का मन्त्र बताऊंगा । 'कान्तः......' (ओं बुधाय नमः) यह छह अक्षरों का बुध-मन्त्र है । इसके ऋषि ब्रह्मा हैं, छंद पंक्ति है और देवता बुध हैं। यह मनुष्यों की सकल कामनाओं को पूर्ण करता है ॥११९-१२२॥ इसका आद्य अक्षर बीज है, नमः शक्ति है और सभी वस्तुओं की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग किया जाता है । 'पीत वस्त्र से सुशोभित, जांघ पर बायां हाथ रखे हुए और दाहिने हाथ में अभयमुद्रा धारण किये हुए बुध की वंदना मैं सदा भक्तिभाव से किया करता हूँ।' इस प्रकार ध्यान करके इन्द्रियसयंमपूर्वक छह हजार मन्त्र-जप करे ॥१२३-१२४॥ उसके दशांश घी से पूर्वोक्त पीठ पर हवन करे । अंगदेवता, मातृगण, दिक्पाल तथा उनके आयुधों के साथ बुध की अर्चना करनी चाहिए । इस प्रकार मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधक अपने सकल मनोरथों को प्राप्त करता है । जो दस दिन तक नित्य एक सहस्र बुध-मन्त्र का जप करता है, उसकी ग्रहजन्य पीड़ा निःसन्देह नष्ट हो जाती है । बुध की आराधना का प्रकार बता दिया । अब बृहस्पति की आराधना के बारे में सुनो ॥१२५-१२७॥ बृहस्पति पद में चतुर्थी विभक्ति लगाये, आदिम वर्ण को अनुस्वार से युक्त करे और अन्त में नमः शब्द रखे इस प्रकार यह आठ अक्षरों का मन्त्र बनता है (अर्थात् 'बृं बृहस्पतये नमः') । इसके मुनि ब्रह्मा हैं, छन्द अनुष्टुप् है, देवता बृहस्पति है, आदिम अक्षर बीज है और नमः शक्ति है । दीर्घ (स्वर), वह्नि (र) तथा दो इन्द्र (अनुस्वार) से अंगों की कल्पना करनी चाहिए । अनन्तर बृहस्पति का इस प्रकार ध्यान करे कि वे रत्नों के ढेर पर अपना बायां हाथ रखे हुए हैं और दाहिने हाथ से रत्न बिखेर रहे हैं ॥१२८-१२९॥ पीत पुष्प, आभूषण, लेप (चन्दन) तथा वस्त्र से उनकी पूजा की गई है । देवगुरु सकल विद्याओं की निधि हैं और उनकी कान्ति सुवर्ण की-सी है । ध्यानोपरान्त एक लाख मन्त्र-जप करे और उसका दशांश घी अथवा अन्न से हवन करे । पश्चात् दपीठ पर अङ्ग-देवता, दिक्पाल तथा उनके आयुधों के साथ सुरगुरु की अर्चना करे । इस प्रकार मन्त्र के
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एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ५६६ धर्मादिपीठे प्रयजेदंगदिक्पालहेतिभिः । एवं सिद्धे मनौ मंत्री साधयेदिष्टमात्मनः ॥१३२॥ विषरोगादिपीडासु कलहे स्वजनोद्भवे । पिप्पलोत्थसमिद्भिश्च जुहुयात्तन्निवृत्तये ॥१३३॥ हुत्वा दिनत्रयं मन्त्री निशापुष्पैर्घृतप्लुतैः । स विंशतिशतं शीघ्रं वासांसि लभते महीम् ॥१३४॥ गुरोराराधनं प्रोक्तं शृणु शुक्रस्य सांप्रतम् । वस्त्रं मे देहि शुक्राय ठद्वयांतो ध्रुवादिकः ॥१३५॥ रुद्राणोऽयं मनुर्ब्रह्मा मुनिश्चन्दो विराडुत । दैत्येज्यो देवता बीजं ध्रुवः शक्तिर्वसुप्रिया ॥१३६॥ भूर्नेत्रचन्द्रनेत्राग्निनेत्रार्णैः स्यात्षडंगकम् । शुक्लांबरालेपभूषं करेण ददतं धनम् ॥१३७॥ वामेन शुक्रं व्याख्यानमुद्रादोषं स्मरेत्सुधीः । अयुतं प्रजपेन्मन्त्रं दशांशं जुहुयाद् घृतैः ॥१३८॥ धर्मादिपीठे प्रयजेदंगेंद्र्रादितदायुधैः । श्वेतपुष्पैः सुगंधैश्च जुहुयाद् भृगुवासरे ॥१३९॥ एकविंशतिवारं यो लभते सोऽंशुकं मणीन् । मनवोऽमी सदा गोप्या न देया यस्य कस्यचित् ॥१४०॥ भक्तियुक्ताय शिष्याय देया वा निजसूनवे ॥१४१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे मन्त्रविधाननिरूपणं नामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥६९॥ सिद्ध हो जाने पर साधक अपनी कामना पूर्ण करे । विष एवं रोग आदि की पीडा और भाई-बंधुओं से कलह उपस्थित होने पर उसके निवारण के लिए पीपल की समिधा से हवन करना चाहिए ॥१३०-१३३॥ घी में डुबोये हुए कुमुद पुष्पों से तीन दिन तक दो हजार वार हवन करने से साधक शीघ्र ही वस्त्र एवं भूमि को प्राप्त करता है । इस प्रकार गुरु का आराधना-क्रम बता दिया, अब शुक्र की पूजा-विधि बताता हूँ। आदि में ध्रुव (ॐ) जोड़कर 'वस्त्रं मे देहि शुक्राय स्वाहा' — यह ग्यारह अक्षरों का मन्त्र है । इसके मुनि ब्रह्मा, छन्द विराट्, शुक्र देवता, ध्रुव (ॐ) बीज और वसुप्रिया (स्वाहा) शक्ति है ॥१३४-१३६॥ भू (ल्), नेत्र (इ), चन्द्र (—) नेत्र (इ), अग्नि (र्) तथा (हं) — इन वर्णों से षडंगन्यास करे । अनन्तर विद्वान् साधक उज्ज्वल वस्त्र, लेप तथा आभूषण से युक्त, बायें हाथ से धन देते हुए तथा व्याख्यान देने की मुद्रा में अवस्थित शुक्र का ध्यान करे ॥१३७॥ तत्पश्चात् दस हजार मन्त्र-जप करे और उसका दशांश हवन करे । फिर धर्मादि पीठ पर श्वेत पुष्पों तथा द्रव्यों, से अङ्गदेवता, इन्द्र आदि देवता और उनके आयुधों के साथ शुक्र का पूजन करे । शुक्र के दिन इक्कीस बार हवन करे । ऐसा करने से मनुष्य वस्त्र एवं मणि प्राप्त करता है। ये (उपयुक्त) मन्त्र गुप्त रखने चाहिए, जिस किसी को नहीं देने चाहिए । ये केवल भक्त शिष्य अथवा अपने पुत्र को देने चाहिए ॥१३८-१४१॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वभाग में मन्त्र-विधान-निरूपण नामक उनहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥६९॥
अथ सप्ततितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ वक्ष्ये महाविष्णोर्मन्त्रान् लोकेषु दुर्लभान् । यान्प्राप्य मानवास्तूर्णं प्राप्नुवन्ति निजेप्सितम् ॥१॥ येषामुच्चारणेनैव पापसंघः प्रलीयते । ब्रह्मादयोऽपि याञ्ज्ञात्वा समर्थाः स्युर्जगत्कृतौ ॥२॥ तारहृत्पूर्वकं ङेन्तं नारायणपदं भवेत् । अष्टाक्षरो मनुश्चास्य साध्यो नारायणो मुनिः ॥३॥ छन्दः प्रोक्तं च गायत्री देवता विष्णुरव्ययः । ओं बीजं यं च तथा शक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये ॥४॥ क्रुद्धोल्काय हृदयाख्यातं महोल्काय शिरः स्मृतम् । वीरोल्काय शिखा प्रोक्ता द्युल्काय कवचं मतम् ॥५॥ महोल्कायेति चास्त्रं स्यादित्थं पंचांगकल्पना । पुनः षडंगमंत्रोत्थैः षड्वर्णैश्च समाचरेत् ॥६॥ अवशिष्टौ न्यसेत्कुक्षिपृष्ठयोर्मंत्रवर्णकौ । सुदर्शनस्य मंत्रेण कुर्याद्दिग्बन्धनं ततः ॥७॥ तारो नमश्चतुर्थ्यन्तं सुदर्शनपदं वदेत् । अस्त्रायफडिति प्रोक्तो मंत्रो द्वादशवर्णवान् ॥८॥ दशावृत्तिमयं न्यासं वक्ष्ये विभूतिपञ्जरम् । मूलार्णांस्त्वतनौ न्यस्येदाधारे हृदये मुखे ॥६॥ अध्याय ७० विष्णु के अष्टाक्षर आदि विविध मंत्रों के अनुष्ठान की विधि सनत्कुमार बोले-नारद ! अब मैं महाविष्णु के मन्त्रों का वर्णन करता हूँ, जो लोक में अत्यन्त दुर्लभ हैं, जिन्हें पाकर मनुष्य शीघ्र ही अपनी अभीष्ट वस्तुओं को प्राप्त कर लेते हैं, जिनके उच्चारण-मात्र से ही राशि-राशि पाप नष्ट हो जाते हैं । ब्रह्मा आदि भी जिन मन्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके ही संसार की सृष्टि में समर्थ होते हैं। प्रणव और नमः पूर्वक ङे विभक्त्यन्त 'नारायण' पद हो तो 'ओं नमो नारायणाय' यह अष्टाक्षर मन्त्र होता है। साध्य नारायण इसके ऋषि हैं, गायत्री छन्द है, अविनाशी भगवान् विष्णु देवता हैं, ओं बीज है, नमः शक्ति तथा सम्पूर्ण मनोरथों की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग किया जाता है ॥१-४॥ इसका पंचांग-न्यास इस प्रकार है--क्रुद्धोल्काय हृदयाय नमः, महोल्काय शिरसे स्वाहा, वीरोल्काय शिखायै वषट, अत्युल्काय कवचाय हुँ, सहस्रोल्काय अस्त्राय फट् । इस प्रकार पंचांग की कल्पना करनी चाहिए । फिर मन्त्र के छह वर्णों से षडंग न्यास करके शेष दो मन्त्राक्षरों का कुक्षि तथा पृष्ठभाग में न्यास करे । इसके बाद सुदर्शन-मन्त्र से दिग्बन्ध करना चाहिए । 'ओं नमः सुदर्शनाय अस्त्राय फट्' यह बारह अक्षरों का मन्त्र 'सुदर्शन-मन्त्र' कहा गया है ॥५-८॥ अब मैं विभूतिपञ्जर नामक दशावृत्तिमय न्यास का वर्णन करता हूँ। मूल मन्त्र के अक्षरों का अपने शरीर के मूलाधार हृदय, मुख, दोनों भुजा तथा दोनों चरणों के मूलभाग तथा नासिका में न्यास करे । यह प्रथम आवृत्ति कही गई है। कंठ, नाभि, हृदय, दोनों स्तन, दोनों पार्श्वभाग तथा पृष्ठभाग में पुनः मन्त्राक्षरों का न्यास करे ।
सप्ततितमोऽध्यायः ६०१ दोःपन्मलेषु नासायां प्रथमावृत्तिरीरिता । गले नाभौ हृदि कुचपार्श्वपृष्ठेषु तत्पराः ॥१०॥ मूर्ध्वास्यनेत्रश्रवणघ्राणेषु च तृतीयकाः । दोःपादसंध्यंगुलिषु वेदावृत्त्या च विन्यसेत् ॥११॥ धातुप्राणेषु हृदये विन्यसेत्तदनन्तरम् । शिरोनेत्रास्यहृत्कुक्षिसोरुजंघापदद्वये ॥१२॥ एकैकशो न्यसेद्वर्णान्संत्रस्य क्रमशः सुधीः । न्यसेद्धृदंसोरुपदेष्वर्णान्वेदमितार्मन्तोः ॥१३॥ चक्रशंखगदांभोजपदेषु स्वस्वमुद्रया । शेषांश्च न्यासवयोऽयं विभूतिपञ्जरामिधः ॥१४॥ न्यसेन्मूलार्णमेकैकं सचंद्रं तारसम्पुटम् । अथवा वे नमोन्तेन न्यसेदित्यपरे जगुः ॥१५॥ तत्त्वन्यासं ततः कुर्याद्विष्णुभावप्रसिद्धये । अष्टाणॊऽष्टप्रकृत्यात्मा गदितः पूर्वसूरिभिः ॥१६॥ पृथिव्यादीनि भूतानि ततोऽहंकारमेव च । महांश्च प्रकृतिश्चैवेत्यष्टौ प्रकृतयो मताः ॥१७॥ पादे लिंगे हृदि मुखे मूर्ध्नि वक्षसि हृत्स्थले । सर्वांगे व्यापकं कुर्यादेकेन साधकात्तमः ॥१८॥ मंत्वारंणहृत्परायाद्यमात्मने हृदयांतिकम् । तत्तन्नाम समुच्चार्य्य न्यसेत्तत्तत्स्थले बुधः ॥१९॥ अयं तत्त्वाभिधो न्यासः सर्वंन्यासोत्तमोत्तमः । मूर्तीर्न्यसेद्द्वादश वै द्वादशादित्यसंयुताः ॥२०॥ द्वादशाक्षरवर्णांया द्वादशादित्यसंयुताः । अष्टाणोऽयं मनुश्चाष्टप्रकृत्यात्मा समीरतः ॥२१॥ तासामात्मचतुष्कस्य योगादकार्क्षरी भवेत् । ललाटकुक्षिहृत्कंठदक्षपार्श्वां सकेषु च ॥२२॥ गले च वामपाश्वां सगलपृष्ठेण्वनन्तरम् । ककुद्यपि न्यसेन्मती मूर्तीद्वादश वै क्रमात् ॥२३॥ यह द्वितीय आवृत्ति बताई गई है । मूर्धा, मुख, दोनों नेत्र, दोनों श्रवण तथा नासिका छिद्रों में मन्त्राक्षरों का न्यास करे । यह तृतीय आवृत्ति है ॥९-१०॥ दोनों भुजाओं और पैरों को सटी हुई अंगुलियों में चौथी आवृत्ति का न्यास करे । धातु, प्राण और हृदय में पांचवीं आवृत्ति का न्यास करे । सिर, नेत्र, मुख और हृदय, कुक्षि, ऊरु, जंघा तथा दोनों पैरों में विद्वान् पुरुष एक-एक करके क्रमशः मन्त्र-वर्णों का न्यास करे । (यह छठी, सातवीं, आठवीं आवृत्ति है) हृदय, कंधा, ऊरु तथा चरणों में मन्त्र के चार वर्गों का न्यास करे शेष वर्णों का चक्र, शंख, गदा ओर कमल की मुद्रा बनाकर उनमें न्यास करे (यह नवम, दशम आवृत्ति है) ॥११-१३३॥ यह सर्वश्रेष्ठ न्यास विभूति-पञ्जर नाम से विख्यात है । मूल के एक-एक अक्षर को अनुस्वार से युक्त करके उसके दोनों ओर प्रणव का सम्पुट लगा कर न्यास करे अथवा आदि में प्रणव और अन्त में नमः लगाकर मन्त्राक्षरों का न्यास करे । ऐसा दूसरे विद्वानों का कथन है ॥१४-१५॥ तत्पश्चात् विष्णुभाव की सिद्धि के लिए तत्त्वन्यास करे । पहले के विद्वानों ने अष्टाक्षर मन्त्र और आठ प्रकृतियों को इसका स्वरूप बताया है । पृथिवी, जल, वायु, आकाश, अग्नि, अहंकार, महत् तथा प्रकृति - ये आठ प्रकृतियां कहलाती हैं । पैर, लिंग, हृदय, मुख, मस्तक, वक्ष, हृदयस्थल और सर्वाङ्ग में एक हो अष्टाक्षर मन्त्र से साधक व्यापक न्यास करे । विद्वान् व्यक्ति मन्त्राक्षर, नमः परापाद्य और आत्मने नमः के साथ तत्तत् नामों का उच्चारण करके तत्तत् स्थानों में न्यास करे । यह तत्त्व नामक न्यास सभा न्यासों में श्रेष्ठ है ॥१६-१९३॥ तदनन्तर बारह आदित्यों सहित द्वादश मूर्तियों का न्यास करे । ये बारह मूर्तियाँ आदि में द्वादशाक्षर के एक-एक मन्त्र से युक्त होती हैं और इनके साथ बारह आदित्यों का संयोग होता है । यह अष्टाक्षर-मन्त्र अष्टप्रकृतिरूप बताया गया है ॥२०-२१॥ इनके साथ चार आत्मा (आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा तथा ज्ञानात्मा) का योग होने से द्वादशाक्षर होता है । ललाट, कुक्षि, हृदय, कण्ठ, दक्षिण पाश्वं, दक्षिण अंस, गलदक्षिणभाग, वाम पार्श्व, वाम अंस, गल-वामभाग, पृष्ठभाग तथा ककुद्-इन बारह अंगों में मन्त्रसाधक क्रमशः बारह मूर्तियों ७६ ना० पु०
६०२ नारदीयपुराणम् धात्रा तु केशवं न्यस्येदर्थम्णं नारायणं पुनः । मित्रेण माधवं न्यस्य गोविन्दं वरुणेन च ॥२४॥ विष्णुं चेशौंगुना युक्तं भगेन मधुसूदनम् । न्यसेद्विवस्वता युक्तं त्रिविक्रममतः परम् ॥२५॥ वामनं च तथैन्द्रेण पूष्णा श्रीधरमेव च । हृषीकेशं न्यसेत्पर्जन्यकिरीटमनुना सुधीः ॥२६॥ त्वष्ट्रा युतं पद्मनाभं दामोदरं च विष्णुना । द्वादशार्णं ततो मंत्रं समस्ते शिरसि न्यसेत् ॥२७॥ व्यापकं विन्यसेत्पश्चात्किरीटमनुना सुधीः । ध्रुवःकिरीटकेयूरहारांते मकरेति च ॥२८॥ कुंडलांते चक्रशंखगदांतेऽम्भोजहस्ततः । पीतांबरांते श्रीवत्सांकितवक्षःस्थलेति च ॥२९॥ श्रीभूमिसहितस्वात्मज्योतिर्मयमतः परम् । वदेद्दीप्तकरायति सहस्रादित्यतेजसे ॥३०॥ नमोन्तो वाणषड्वर्णः किरीटमनुरीरितः । एवं न्यासविधिं कृत्वा ध्यायेन्नारायणं विभुम् ॥३१॥ उदयत्कोट्यर्कसदृशं शंखं चक्रं गदांबुजम् । दधतं च करैर्लक्ष्मीभ्यां पार्श्वद्वयांचितम् ॥३२॥ श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभामुक्तकन्धरम् । हारकेयूरवलयांगदं पीतांबरं स्मरेत् ॥३३॥ वर्णलक्षं जपेन्मंत्रं विधिवन्नियतेन्द्रियः । प्रथमेन तु लक्षेण स्वात्मशुद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ॥३४॥ लक्षद्वयजपेनाय मंत्रशुद्धिमवाप्नुयात् । लक्षत्रयेण जप्तेन स्वर्लोकमधिगच्छति ॥३५॥ विष्णोः समीपमाप्नोति वेदलक्षजपान्तरः । तथा च निर्मलं ज्ञानं पंचलक्षजपाद्भवेत् ॥३६॥ लक्षषष्ठेन चाप्नोति मंत्री विष्णौ स्थिरां मतिम् । सप्तलक्षजपान्मंत्रो विष्णोःसारूप्यमाप्नुयात् ॥३७॥ अष्टलक्षं जपेन्मंत्री निर्वाणमधिगच्छति । एवं जप्त्वा ततः प्राज्ञो दशांशं सरसीरुहैः ॥३८॥ का न्यास करे । केशव का धाता के साथ ललाट में न्यास करके, नारायण का अर्यमा के साथ कुक्षि में, माधव का मित्र के साथ हृदय में तथा गोविन्द का वरुण के साथ कण्ठकूप में न्यास करे ॥२२-२४॥ विष्णु का अंश के साथ, मधुसूदन का भग के साथ, त्रिविक्रम का विवस्वान् के साथ, वामन का इन्द्र के साथ, श्रीधर का पूषा के साथ और हृषीकेश का पर्जन्य के साथ न्यास करे । पद्मनाभ का त्वष्टा के साथ तथा दामोदर का विष्णु के साथ न्यास करे ॥२५-२६½॥ तत्पश्चात् द्वादशाक्षर मन्त्र का सम्पूर्ण सिर में न्यास करे । इसके बाद विद्वान् पुरुष किरीट मन्त्र के द्वारा व्यापक न्यास करे । किरीट मन्त्र प्रणव के अतिरिक्त पैंसठ अक्षर का बताया गया है--'ओं किरीटकेयूरहारमकरकुण्डलशंखचक्रगदाम्भोजहस्तपीताम्बरधरश्रीवत्साङ्कितवक्षःस्थलश्रीभूमिसहितस्वात्म- ज्योतिर्मयदीप्तकराय सहस्रादित्यतेजसे नमः ।' इस प्रकार न्यासविधि करके सर्वव्यापी भगवान् नारायण का ध्यान करे— जिनकी दिव्य कान्ति उदय-काल के कोटि-कोटि सूर्यों के सदृश है, जो अपनी चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और कमल धारण करते हैं, भूदेवी तथा श्रीदेवी जिनके उभय पार्श्व की शोभा बढ़ा रही हैं, जिनका वक्षः स्थल श्रीवत्सचिह्न से सुशोभित है, जो अपने गले में चमकीली कौस्तुभमणि धारण करते हैं और हार, केयूर, वलय तथा अंगद आदि दिव्य आभूषण जिनके श्रीअंगों में पड़कर धन्य हो रहे हैं, उन पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु का चिन्तन करना चाहिए ॥२७-३३॥ इन्द्रियों को वश में रखकर मन्त्र में जितने वर्ण हैं, उतने लाख मन्त्र का विधिवत् जप करे । प्रथम लाख मन्त्र के जप से निश्चय ही आत्मशुद्धि होती है । दो लाख जप पूर्ण होने पर साधक को मन्त्र-शुद्धि प्राप्त होती है । तीन लाख के जप से साधक स्वर्गलोग प्राप्त कर लेता है । चार लाख के जप से मनुष्य भगवान् विष्णु के समीप जाता है । पाँच लाख के जप से निर्मल ज्ञान प्राप्त होता है ॥३४-३६॥ छठे लाख के जप से मन्त्र-साधक की बुद्धि भगवान् विष्णु में स्थिर हो जाती है । सात लाख के जप से मन्त्रोपासक श्रीविष्णु का सारूप्य प्राप्त करता है । आठ लाख का जप पूर्ण कर लेने पर मन्त्र-जप करने वाला पुरुष निर्वाण (परम शान्ति एवं मोक्ष)
मधुराक्तैः प्रजुहुयात्संसकृते हव्यवाहने । मंडूकात्परतत्त्वांत् पीठे संपुज्य यत्नतः ॥३८॥ विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगा ततः परा । प्रह्वी सत्या तथेशानानुग्रहा नवमी मता ॥४०॥ तारो नमो भगवते विष्णवे सर्वभू ततः । तात्मने वासुदेवाय सर्वात्मिति पदं वदेत् ॥४१॥ संयोगयोगपद्मांते पीठाय हृदयांतिमः । षड्विंशदक्षरः पीठमंत्रोऽनेनासनं दिशेत् ॥४२॥ मूर्ति संकल्प्य मूलेन तस्यामावाह्य पूजयेत् । आदौ चांगानि संपूर्ज्य मंत्राणां केशरेषु च ॥४३॥ प्रागादिदिग्दले वासुदेवं संकर्षणं तथा । प्रद्युम्नमनिरुद्धं च शक्तीः कोणेष्वथाच॑येत् ॥४४॥ शांति श्रियं सरस्वत्या रति संपूजयेत्क्रमात् । हेमपोततमालेंद्रनीलामाः पीतवाससः ॥४५॥ चतुर्भुजाः शंखचक्रगदांभोजधरा इमे । सितकांचनगोगुग्धदूर्वावर्णश्च शक्तयः ॥४६॥ दलाग्रेषु चक्रशंखगदापंकजकौस्तुभान् । पूजयेन्मुसलं खङ्गं वनमालां यथाक्रमात् ॥४७॥ रक्ताजपीतकनकश्यामकृष्णसितार्जुनान् । कुंकुमाभं समभ्यर्चेद्बहिरग्रे खगेश्वरम् ॥४८॥ पार्श्वयोः पूजयेत्पश्चाच्छंखपद्मनिधी क्रमात् । मुक्तामाणिक्यसंकाशौ पश्चिमे ध्वजमर्चयेत् ॥४९॥ रक्तं विघ्नं तथाग्नये श्याममार्यं च राक्षसे । दुर्गां श्यामां वायुकोणे सेनान्यं पीतमेश्वरे ॥५०॥ को प्राप्त होता है। इस प्रकार जप करके विद्वान् पुरुष मधुराक्त कमलों द्वारा मन्त्रसंस्कृत अग्नि में दशांश होम करे । मण्डूक से लेकर परतत्त्व पर्यन्त सब का पीठ पर यत्नपूर्वक पूजन करे ॥३७-३९॥ विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशान तथा नवीं अनुग्रहा—ये नौ पीठशक्तियाँ हैं ॥४०॥ (इन सबका पूजन करना चाहिए)। इसके बाद 'ओं नमो भगवते विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगपद्मपीठाय नमः' यह छत्तीस अक्षर का पीठमन्त्र है, इससे भगवान् को आसन देना चाहिए। मूल-मन्त्र से मूर्तिनिर्माण कर के उसमें भगवान् का आवाहन करके पूजा करे। पहले कमल के केसरों में मन्त्र सम्बन्धी छह अंगों का पूजन करना चाहिए। इसके बाद अष्टदल कमल के पूर्व आदि दलों में क्रमशः वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध का और आग्नेय आदि कोणों में क्रमशः उनकी शक्तियों का पूजन करे ॥४१-४४॥ उनके नाम इस प्रकार हैं—शान्ति, श्री, रति तथा सरस्वती । इनकी क्रमशः पूजा करनी चाहिए। वासुदेव की अंगकान्ति सुवर्ण के समान है। संकर्षण पीत वर्ण के हैं। प्रद्युम्न तमाल के समान श्याम और अनिरुद्ध इन्द्रनील मणि के सदृश हैं। ये सबके सब पीताम्बर धारण करते हैं। इनके चार भुजायें हैं। ये शंख, चक्र, गदा और कमल धारण करने वाले हैं। शान्ति का वर्ण श्वेत, श्री का वर्ण सुवर्ण-गौर, सरस्वती का रंग गोदुग्ध के समान उज्ज्वल तथा रति का वर्ण दूर्वादल के समान श्याम है। इस प्रकार ये सब शक्तियां हैं। कमल-दलों के अग्रभाग में चक्र, शंख, गदा, कमल, कौस्तुभमणि, मुसल, खड्ग और वनमाला का क्रमशः पूजन करे ॥४५-४७॥ चक्र का रंग लाल, शंख का रंग चन्द्रमा के समान श्वेत, गदा का पीला, कमल का सुवर्ण के समान, कौस्तुभ का श्याम, मुसल का काला, तलवार का श्वेत और वनमाला का उज्ज्वल है। इनके बाह्यभाग में भगवान् के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े हुए कुंकुम वर्ण वाले पक्षिराज गरुड़ का पूजन करे। तत्पश्चात् क्रमशः दक्षिण पार्श्व में शंख-निधि और वाम पार्श्व में पद्मनिधि की पूजा करे। इनका वर्ण क्रमशः मोती और माणिक्य के समान है। पश्चिम में ध्वज की पूजा करे ॥४८-४९॥ अग्निकोण में रक्तवर्ण के विघ्न (गणेश) का, नैर्ऋत्यकोण में श्याम वर्ण वाले आर्य का, वायव्यकोण में श्याम वर्ण दुर्गा का तथा ईशानकोण में पीतवर्ण के सेनानी का पूजन करना चाहिए। इनके बाह्यभाग में विद्वान् पुरुष इन्द्र आदि लोकपालों का उनके आयुधों सहित पूजन करे। जो इस प्रकार आवरणों सहित अविनाशी भगवान् विष्णु का पूजन करता है, वह इस
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६०४ नारदीयपुराणम् लोकेशानायुधैर्युक्तान्बहिः संपूजयेत्सुधीः । एवमावरणैर्युकतं योऽर्चयेद्विष्णुमव्ययम् ॥५१॥ भुङ्क्त्वेह सकलान्भोगानंते विष्णुपदं व्रजेत् । क्षेत्रधान्यसुवर्णानां प्राप्तये धरणीं स्मरेत् ॥५२॥ देवीं दूर्वादलश्यामां दधानां शालिमंजरीम् । चिंतयेद्भारतीं देवीं वीणापुस्तकधारिणीम् ॥५३॥ दक्षिणे देवदेवस्य पूर्णचंद्रनिभाननाम् । क्षीराब्धिफेनपुंजामे वसानां श्वेतवाससी ॥५४॥ भारत्या सहितं यो वै ध्यायेद्देवं परात्परम् । वेदवेदार्थतत्त्वज्ञो जायते सर्ववित्तमः ॥५५॥ नारसिंहमिवात्मानं देवं ध्यात्वातिभैरवम् । शस्त्रं संमंथ्य मंत्रेण शत्रून्हत्वा निवर्तते ॥५६॥ नारसिंहेन बीजेन मंत्रं संयोज्य साधकः । शतमष्टोत्तरं जप्त्वा वामहस्ताभिमंत्रिताः ॥५७॥ पुनः पुनरपः सिंचेत्सर्पदष्टोऽपि जीवति । गारुडेन च संयोज्यपंचार्णेन जपेत्तदा ॥५८॥ निर्विषीकरणे ध्यायेद्विष्णुं गरुडवाहनम् । अशोकफलके तार्क्ष्यमालिख्याशोकसंहतौ ॥५९॥ अशोकपुष्पैःसंपूज्य भगवंतं तदग्रतः । जुहुयात्तानि पुष्पाणि त्रिसंध्यं सप्तपत्रकम् ॥६०॥ प्रत्यक्षो जायते पक्षी वरमिष्टं प्रयच्छति । गाणपत्येन संयोज्य जपेल्लक्षं पयोव्रतः ॥६१॥ महागणपतिं देवं प्रत्यक्षमिव पश्यति । दाणीबीजेन संयुक्तं षण्मासं योजयेन्नरः ॥६२॥ महाकविवरो भूत्वा मोहयेत्सकलं जगत् । हुत्वा गुडूचीशकलान्यर्द्धांगुलमितानि च ॥६३॥ दधिमध्वाज्ययुक्तानि मृत्युं जयति साधकः । शनैश्चरदिने सम्यक् स्पृष्ट्वाश्वत्थं च पाणिना ॥६४॥ जप्त्वा चाष्टशतं युद्धे ह्यपमृत्युं जयत्यसौ । पञ्चविंशतिधा जप्त्वा नित्यं प्रातः पिवेज्जलम् ॥६५॥ लोक में सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करके अन्त में भगवान् विष्णु के धाम को जाता है ॥५०-५११/२॥ खेत, धान्य और सुवर्ण की प्राप्ति के लिए धरणी देवी का चिन्तन करे। उनकी कान्ति दूर्वादल के समान श्याम है और वे अपने हाथों में धान की बाल लिए रहती हैं। देवाधिदेव भगवान् के दक्षिणभाग में पूर्णचन्द्रमा के समान मुखवाली वीणापुस्तक धारिणी सरस्वती देवी का चिन्तन करे। वे क्षीर सागर के फेनपुञ्ज की भाँति उज्ज्वल दो वस्त्र धारण करती हैं। जो सरस्वती देवी के साथ परात्पर भगवान् विष्णु का ध्यान करता है, वह वेद और वेदांगों का तत्त्वज्ञ तथा सर्वज्ञों में श्रेष्ठ होता है ॥५२-५५॥ आत्मा का अत्यन्त भयानक नरसिंहदेव के रूप में ध्यान करके शस्त्र को (नरसिंह) मन्त्र से अभिमन्त्रित करने वाला व्यक्ति शत्रुओं को मारकर लौट आता है ॥५६॥ साधक नरसिंह बीज से मन्त्र को संयोजित कर के एक सौ आठ बार जप कर बायें हाथ से अभिमंत्रित किये गये जल से बार-बार सिञ्चन करे । ऐसा करने से साँप का डसा हुआ प्राणी भी जी जाता है। उस समय गरुड़ मन्त्र से जोड़कर पंचाक्षर मन्त्र का जप करे ॥५७-५८॥ विष रहित करने में गरुड़वाहन (भगवान्) विष्णु का ध्यान करना चाहिए। अशोक के काष्ठ पर गरुड़ की मूर्ति लिखकर अशोकवन में अशोकपुष्पों से भगवान् का पूजन करके उनके आगे उन पुष्पों से तीनों संध्या सात-सात पत्ते हवन करे ॥५९-६०॥ ऐसा करने से गरुड़ प्रत्यक्ष होकर वर प्रदान करते हैं। नरसिंह मन्त्र को गणपति-मन्त्र से युक्त करके एक लाख जप करे और दुग्धाहार करके रहे। ऐसा करने से साधक महागणेश देव को प्रत्यक्ष देखता है। उक्त मन्त्र को वाणी-बीज से युक्त करके छह मास जप करने पर साधक महान् कवि होकर सम्पूर्ण जगत् को मोहित कर लेता है ॥६१-६२१/२॥ आधे अंगुल के बराबर गुडूच के टुकड़े काटकर दही, मधु और घी में बोरकर हवन करने से साधक मृत्यु को जीत लेता है। शनिवार के दिन हाथ से पीपलवृक्ष का भली भाँति स्पर्श करके आठ सौ बार मन्त्र जपने से युद्ध में साधक अपमृत्यु को जीत लेता है। नित्य प्रातःकाल पचीस बार इस मन्त्र को जपकर जल पीने से साधक सभी पापों से मुक्त होकर नीरोग तथा ज्ञानी होता है ॥६३-६५१/२॥ कलश
१०५ सप्ततितमोऽध्यायः सर्वपापविनिर्मुक्तो ज्ञानवान् रोगवर्जितः । कुम्भं संस्थाप्य विधिवदापूर्यं शुद्धवारिणा ॥६६॥ जप्त्वायुतं ततस्तेनाभिषेकःसर्वरोगनुत् । चन्द्रसूर्यपरागे तु ह्युपोप्याष्टसहस्रकम् ॥६७॥ स्पृष्ट्वा ब्राह्मीघृतं जप्त्वा पिवेत्साधकत्तमः । मेधां कवित्वं वाक्सिद्धिं लभते नात्र संशयः ॥६८॥ जुहुयादयुतं बिल्वैर्महाधनपतिर्भवेत् । नारायणस्य मन्त्रोऽयं सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमः ॥६६॥ आलयः सर्वसिद्धीनां कथितस्तव नारद । नारायणाय शब्दान्ते विद्महे पदमोरयेत् ॥७०॥ वासुदेवपदं ङेन्तं धीमहीति ततो वदेत् । तन्नो विष्णुः प्रचोवर्णान्संवदेच्चोदयादिति । ७१॥ एषोक्ता विष्णुपायत्री सर्वपापप्रणाशिनी । तारो हृद्भगवान् ङेन्तो वासुदेवाय कीर्तितः ॥७२॥ द्वादशार्णो महामन्त्रो मुक्तिमुक्तिप्रदायकः । स्त्रीशूद्राणां वितारोऽयं सतारस्तु द्विजन्मनाम् ॥७३॥ प्रजापतिर्मुनिश्वास्य गायत्री छन्द ईरितः । देवता वासुदेवस्तु बीजं शक्तिश्च वश्च हृत् ॥७४॥ चन्द्राक्षिवेदपञ्चार्णैः समस्तैर्नाङ्गकल्पनम् । मूर्ध्नि भाले दृशोरास्ये गले दोर्हृदये पुनः ॥७५॥ कुक्षौ नाभौ ध्वजे जानुद्वये पादद्वये तथा । न्यसेत्क्रमात् मन्त्रवर्णान्सृष्टिन्यासोऽयमीरितः ॥७६॥ हृदादिमस्तकान्तं तु स्थितिन्यासं प्रचक्षते । पादादारभ्य मूर्द्धानं न्यासं संहारकं विदुः ॥७७॥ तत्त्वन्यासं ततः कुर्यात्सर्वतन्त्रेषु गोपितम् । जीवं प्राणं तथा चित्तं हृत्पद्मं सूर्यमण्डलम् ॥७८॥ चन्द्राग्निमण्डले चैव वासुदेवं ततः परम् । संकर्षणं च प्रद्युम्नमनिरुद्धं ततः परम् ॥७६॥ नारायणं चक्रमतस्तत्त्वानि द्वादशैव तु । मूलार्णहृत्परायाद्यमात्मने हृदयांतिमम् ॥८०॥ स्थापित करके शुद्ध जल से उसे विधिपूर्वक भर दे । वहाँ दश हजार मन्त्र जप करने के उपरान्त उस जल से अभिषेक करने पर सब रोग दूर हो जाते हैं । चन्द्र-सूर्य-ग्रहणों में उपवास करके ब्राह्मीघृत का स्पर्श करने के उपरान्त आठ हजार बार मन्त्र का जप करे । अनन्तर श्रेष्ठ साधक उस घृत को पी ले । ऐसा करने से मेधा (धारणशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाक्सिद्धि प्राप्त होती है, इसमें सन्देह नहीं ॥६६-६८॥ यह नारायण मन्त्र सब मन्त्रों में उत्तम से उत्तम है । नारद ! यह सम्पूर्ण सिद्धियों का घर है । अतः मैंने तुम्हें इसका उपदेश किया है। 'नारायणाय' पद के अन्त में 'विद्महे' पद का उच्चारण करे फिर 'ङे' विभक्त्यन्त 'वासुदेव' पद (वासुदेवाय) का उच्चारण करे । उसके बाद 'धीमहि' पद बोले । अन्त में 'तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्' इन अक्षरों का उच्चारण करे । यह (ओं नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्) विष्णुपायत्री बतायी गई है, जो सब पापों का नाश करने वाली है । तार (ओं), हृदय (नमः), भगवत् शब्द का चतुर्थी विभक्ति में एकवचनान्त रूप (भगवते) तथा (वासुदेवाय) यह द्वादशाक्षर (ओं नमो भगवते वासुदेवाय) महामन्त्र कहा गया है, जो भोग- मोक्ष देने वाला है । स्त्री और शूद्रों को बिना प्रणव के यह मन्त्र जपना चाहिए और द्विजातियों के लिए प्रणव सहित इसके जपने का विधान है ॥६९-७३॥ इस मन्त्र के प्रजापति ऋषि, गायत्री छन्द, वासुदेव देवताओं, बीज और नमः शक्ति है ॥७४॥ इस मन्त्र के एक, दो, चार और पाँच अक्षरों तथा सम्पूर्ण मन्त्र द्वारा पञ्चांग न्यास करना चाहिए । मस्तक, ललाट, नेत्र, मुख, गला, बाँह, हृदय, पेट, नाभि, लिंग, दोनों घुटनों तथा दोनों चरणों में क्रमशः मन्त्रवर्णों का न्यास करे- यह सृष्टिन्यास कहा गया है । हृदय से लेकर मस्तक तक न्यास करना स्थितिन्यास कहलाता है । पैर से लेकर मस्तक तक न्यास करने को संहारक न्यास कहते हैं । तदनन्तर तत्त्वन्यास करना चाहिए, जो सब तन्त्रों में गुप्त है । जीव, प्राण, चित्त, हृदयकमल, सूर्यमण्डल, अग्निमण्डल, चन्द्रमण्डल, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और नारायण- ये बारह तत्त्व हैं ॥७५-७९॥ मूल-मन्त्र के अक्षरों के उच्चारण के साथ 'पराय नमः' और 'हृदाय नमः' कह अपने नाम का उच्चारण करे और तदपश्चात् मस्तक आदि में क्रमशः न्यास करे । यहाँ भी पूर्वोक्त ध्यान ही करना चाहिए ।
६०६ नारदीयपुराणम् तत्त्वे नामसमुच्चार्य न्यसेन्मूर्द्धादिषु क्रमात् । पूर्वोक्तं ध्यानमत्रापि भानुलक्षजपो मनोः ॥८१॥ तद्दशांशं तिलैराज्यलोलितैर्हवनं चरेत् । पीठे पूर्वोदिते मन्त्री मूतिं संकल्प्य मूलतः ॥८२॥ तस्यामावाह्य देवेशं वासुदेवं प्रपूजयेत् । अङ्गानि पूर्वमभ्यर्च्य वासुदेवादिकास्ततः ॥८३॥ शान्त्यादिशक्तयः पूज्याः प्राग्वदिक्षु विदिक्षु च । तृतीयावरणे पूज्याः प्रोक्ता द्वादश मूर्तयः ॥८४॥ इंद्राद्यानायुधैर्युक्तान् पूजयेद्धरणीगृहे । एवमावरणैरिष्ट्वा पञ्चभिर्विष्णुमव्ययम् ॥८५॥ प्राप्नुयात्सकलानर्थानन्ते विष्णुपदे व्रजेत् । पुरुषोत्तमसंज्ञस्य विष्णोर्भेदचतुष्टयम् ॥८६॥ त्रैलोक्यमोहनस्तेषां प्रथमः परिकीर्तितः । श्रीकरश्च हृषीकेशः कृष्णश्चात्र चतुर्थकः ॥८७॥ तारः कामो रमा पश्चाद् ङेन्तः स्यात्पुरुषोत्तमः । वर्मास्त्राण्यग्निप्रियांतो मन्त्रो वह्नीन्दुवर्णवान् ॥८८॥ ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छन्दः प्रोक्तोऽथ देवता । पुरुषोत्तमसंज्ञोऽत्र बीजशक्तोस्मरेदिरे ॥८९॥ भूचंद्रैकरसाध्यक्षिमंत्रवर्णैविभागशः । कृत्वांगानि ततो ध्यायेद्विधिवत्पुरुषोत्तमम् ॥९०॥ समुद्यदादित्यनिभं शंखचक्रगदांबुजैः । लसत्करं पीतवस्त्रं स्मरेच्छ्रीपुरुषोत्तमम् ॥९१॥ महारत्नौघखचितस्फुरत्तोरणमंडपे । मौक्तिकोघशमदमविराजितवितानके ॥९२॥ नृत्यद्देवांगनावृंदक्वणत्किंकिणिनूपूरे । लसन्माणिक्यवेद्यां तु दीप्ताकार्युततेजसि ॥९३॥ वृंदारकव्रातकिरीटाग्ररत्नाभिरर्चिते । नवलक्षं जपेन्मंत्रं जुहुयात्तद्दशांशतः ॥९४॥ उत्फुल्लैः कमलैः पीठे पूर्वोक्ते वैष्णवेऽर्चयेत् । एवमाराध्य देवेशं प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥९५॥ इसके बाद बारह लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश घृताक्त तिल से हवन करे। पूर्ववर्णित पीठ पर साधक मूर्ति की स्थापना कर उसमें मूलमन्त्र से देवों के स्वामी वासुदेव का आवाहन करके पूजन करे। पहले अङ्गदेवताओं की पूजा करे। तदनन्तर वासुदेवादिक तथा शान्त्यादिक शक्तियों की पूजा पूर्ववत् दिशाओं एवं दिशा-कोणों में करे। तीसरे आवरण में पूर्वोक्त बारह मूर्तियों की पूजा करनी चाहिए। भू-गृह में आयुध समेत इन्द्र आदि देवों की पूजा करे। इस प्रकार पाँच आवरणों से अविनाशी विष्णु का पूजन करके मनुष्य सकल पदार्थों को प्राप्त करता है और अन्त में विष्णुलोग को जाता है ॥८०-८५॥ पुरुषोत्तम नामधारी विष्णु के चार भेद हैं। उनमें त्रैलोक्य-मोहन पहला (भेद) है, श्रीकर दूसरा (भेद) हृषीकेश तीसरा (भेद) और कृष्ण चौथा (भेद) है। (इसका मन्त्र यह है—) ओं रं क्लीं श्रीं पुरुषोत्तमाय हुं फट् स्वाहा। इस मन्त्र के मुनि ब्रह्मा हैं, छंद गायत्री है, देवता पुरुषोत्तम हैं और बीज तथा शक्ति इरा है। भू (एक), चन्द्र (एक), एक, रस (छह), अक्षि (दो) और अक्षि (दो)—इन मन्त्र-वर्णों से अङ्गों का विभाग करके विधि- पूर्वक पुरुषोत्तम का ध्यान करे। उगते हुए सूर्य के समान, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए तथा पीत वस्त्र पहने हुए पुरुषोत्तम का स्मरण करे। वे बहुमूल्यक रत्न-समूह से जड़े हुए तथा चमकते हुए तोरणों (बन्दनवारों) से युक्त मण्डल में, जहां मोतियों से शोभायमान चन्दवे लगे हुए हैं और जहां नृत्य करती हुई देवांगनाओं के घुंघरू के शब्द हो रहे हैं, मणियों के चबूतरे पर विराजमान हैं; दस हजार सूर्य के समान उनका तेज है; और देव-समूह के मुकुटों के अग्रभाग में लगे हुए रत्न से (उनके चरणारविन्द) शोभित हैं। ध्यानो- परान्त नौ लाख मन्त्र-जप करे और उसका दशांश हवन करे, फिर पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर लिखे हुए कमलों से वासुदेव की अर्चना करे। इस प्रकार देवेश (वासुदेव) की आराधना करने से मनुष्य को महान् श्री, पुत्र, पौत्र, यश, कांति, भुवित तथा मुक्ति की प्राप्ति होती है। ॥८६—९५॥
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पुत्रान्पौत्रान्यशः कांतिं भुक्तिं मुक्तिं च विंदति । उत्तिष्ठेति पदं पश्चाच्छ्रीकराग्नित्रियांतितः ॥९६॥ अष्टाणोऽस्य मुनिर्व्यासः पंक्तिश्छंद उदाहृतम् । श्रीकाराख्योहरिः प्रोक्तो देवता सकलेष्टदः ॥९७॥ भीषयद्वितयं हृत्स्यात् त्रासयद्वितयं शिरः । शिखा प्रमर्द्यद्वंद्वं वर्म प्रध्वंसयद्वयम् ॥९८॥ अस्त्रं रक्षद्वयं सर्वे हुमंताः समुदीरिताः । मस्तके नेत्रयोः कंठे हृदये नाभिदेशके ॥९९॥ ऊरुजंघांघ्रियुग्मेषु मंत्रवर्णान्क्रमात् न्यसेत् । ततः पुरुषसूक्तोक्तमंत्रैर्न्यासं समाचरेत् ॥१००॥ मुखे न्यसेद्ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीदिमं मनुम् । बाहुयुग्मे तथा बाहू राजन्य इति विन्यसेत् ॥१०१॥ ऊरू तदस्य यद्वैश्य इममूरुद्वये न्यसेत् । न्यसेत्पादद्वये मंत्री पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥१०२॥ चक्रं शंखं गदां पद्मं कराग्रेष्वथ विन्यसेत् । एवं न्यासविधिं कृत्वा ध्यायेत्पूर्वोक्तमण्डपे ॥१०३॥ अरुणान्जासनस्थस्य तार्क्ष्यस्योपरि संस्थितम् । पूर्वोक्तरूपिणं देवं श्रीकरं लोकमोहनम् ॥१०४॥ ध्यात्वैवं पूजयेदष्टलक्षं मंत्री दशांशतः । रक्तांबुजैः समिद्भिश्च विल्वक्षीरिद्रुमोद्भवैः ॥१०५॥ पयोऽन्नैः सर्पिषा हुत्वा प्रत्येकं सुसमाहितः । अश्वत्थोदुंबरप्लक्षवटाः क्षीरिद्रुमाः स्मृताः ॥१०६॥ पूजयेद्वैष्णवे पीठे मूर्ति संकल्प्य मूलतः । अंगावरणदिक्पालहेतिभिः सहितं विभुम् ॥१०७॥ इत्थं सिद्धे मनौ मंत्री प्रयोगान्पूर्ववच्चरेत् । तारो हृद्भगबान् डेंतो वराहेति ततः परम् ॥१०८॥ रूपाय भूर्भुवः स्वः स्याल्लोहितक्षामिका च ये । भूपतित्वं च मे देहि ददापय शुचिप्रिया ॥१०९॥ रामाग्निवर्णो मंत्रोऽयं भार्गवोऽस्य मुनिर्मतः । छन्दोऽनुष्टुब्देवतादिवराहः समुदीरितः ॥११०॥ एकदंष्ट्राय हृदयं व्योमोल्काय शिरः स्मृतम् । शिखा तेजोऽधिपतये विश्वरूपाय वर्म च ॥१११॥ महादंष्ट्राय चास्त्रं स्यात्पञ्चांगमिति कल्पयेत् । अथवा गिरिवद्वसबाणैर्वसुमिरक्षरैः ॥११२॥
'उत्तिष्ठ श्रीकर स्वाहा'—यह अष्टाक्षर मन्त्र है । इसके मुनि व्यास, छन्द पंक्ति और देवता सकल कामनावदायक श्रीकर हरि हैं । 'भीषय......समुदीरिताः' यह मन्त्र है । इसके अक्षरों का क्रमशः मस्तक, नेत्र, कंठ, हृदय, नाभि, ऊरु, जंघा तथा दोनों चरणों में न्यास करे । तत्पश्चात् पुरुषसूक्त-मन्त्रों से न्यास करे । 'ब्राह्मणो ऽस्य मुखमासीत्' इस मन्त्र का मुख में न्यास करे । 'बाहू राजन्यः' इस मन्त्र का दोनों भुजाओं में न्यास करे । 'ऊरू तदस्य यद्वैश्यः' इस मन्त्र का न्यास दोनों ऊरुओं में करे । और 'पद्भ्यां शूद्रो अजायत' इस मन्त्र का न्यास दोनों चरणों में करे । हाथों के अग्रभाग में चक्र, शंख, गदा और पद्म का न्यास करे ॥९६-१०२॥ इस प्रकार न्यास करके पूर्वोक्त मण्डप में गरुड़ पर लाल रंग के आसन पर विराजमान पूर्वोक्त रूप वाले लोक- मोहन श्रीकर देव का ध्यान करे । ध्यानाेपरान्त एक लाख मंत्र-जप करे । जप के दशांश लाल कमलों, विल्व और क्षीरी (दूध वाले) वृक्षों की समिधाओं, खीर तथा घी से मन की एकाग्रतापूर्वक हवन करे । पीपल, गूलर, पाकर तथा वरगद क्षीरी वृक्ष कहलाते हैं ॥१०३-१०६॥ वैष्णव पीठ पर मूलमंत्र से मूर्ति की स्थापना करके अङ्गदेवता, आवरणदेवता, दिक्पाल और उनके आयुधों के साथ भगवान् की पूजा करे । इस प्रकार मंत्र की सिद्धि हो जाने पर साधक पूर्ववत् (मंत्र का) प्रयोग करे । 'तारो हृत्......शुचिप्रिया' अर्थात् 'ओं नमो भगवते वराहाय रूपाय भूर्भुवः स्वः स्यात् । भूपतित्वं च मे देहि ददापय स्वाहा'—यह तैंतीस अक्षरों का मन्त्र है । इसके ऋषि भार्गव हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता वराह हैं । एकदंष्ट्र के लिए हृदय, व्योमोल्क के लिए शिर, तेजोधिपति के लिए शिखा, विश्वरूप के लिए वर्म और महादंष्ट्र के लिए अस्त्र हो—यह कहकर पंचांगन्यास करे । अथवा इस श्रेष्ठ मन्त्र के विभाग—७,६,७,५ तथा ८ अक्षरों से पंचांग न्यास करे ॥१०७-११२½॥ तदनन्तर आदिवराह
६०८ नारदीयपुराणम् विभक्तेमंत्रवर्यस्य पञ्चांगानि प्रकल्पयेत् । ततो ध्यायेदनेकार्कनिभमादिवराहकम् ॥११३॥ आं ह्रीं स्वर्णनिभं जान्वोर्धो नाभेः सितप्रभम् । इष्टाभीतिगदाशंखचक्रशक्त्यसिखेटकान् ॥११४॥ दधतं च करैर्दंष्ट्राग्रलसद्धरांण स्मरेत् । एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं दशांशं सरसीरुहैः ॥११५॥ मध्वक्तैर्जुहुयात्पीठे पूर्वोक्ते वैष्णवे यजेत् । मूलेन मूर्ति सङ्कल्प्य तस्यां सम्पूजयेद्विभुम् ॥११६॥ अङ्गावरणदिक्पालहेतिक्षेत्राप्तसिद्धये । जपादेवादाति दद्याद्वलं धान्यं महीं श्रियम् ॥११७॥ सिंहार्क सितपक्षस्याष्टम्यां गव्येषु पञ्चसु । शिलां शुद्धां विनिक्षिप्य स्पृष्ट्वा तामयुतं जपेत् ॥११८॥ उदङ्मुखस्ततो मंत्री तां शिलां निखनेद्भुवि । भूतप्रेताहिक्षोरादिकृतां बाधां निवारयेत् ॥११९॥ प्रातर्भृगुदिने साध्यभूतलान्मृद्वथाहरेत् । मन्त्रितां मूलमन्त्रेण विसृजेत्तां त्रिधा पुनः ॥१२०॥ चुल्ल्यामेकं समालिप्यान्यदपरं पाकभाजने । गोदुग्धे परमालोड्य शोधितांस्तंदुलान् क्षिपेत् ॥१२१॥ सम्यक् शुद्धे शुचिः केशे जपन्मन्त्रं पचेच्चरुम् । अवतार्यचरुं पश्चाद्वह्नौ देयं यथाविधि ॥१२२॥ सम्पूज्य धूपदीपाद्यैः पश्चादाज्यप्लुतं चरुम् । जुहुयात्संस्कृते वह्नौ अष्टोत्तरशतं सुधीः ॥१२३॥ एवं प्रजुहुयान्मंत्री कविवारेषु सप्तसु । विरोधो नश्यति क्षेत्रे शत्रुचौराद्युपद्रवाः ॥१२४॥ भानूद्येऽथारवारे साध्यक्षेत्रान्मृदं पुनः । आदाय पूर्वविधिना हविरापाद्य पूर्ववत् ॥१२५॥ जुहुयादेधिते वह्नौ पूर्वसंख्याकमादरात् । एवं स सप्तारवारेषु जुहुयात्क्षेत्रसिद्धये ॥१२६॥ जुहुयाल्लक्षसंख्याकं गव्यैश्चैव सपायसैः । अभीष्टभूम्याधिपत्यं लभते नात्र संशयः ॥१२७॥ का ध्यान करे कि वे अनेको सूर्यों के समान (चमक रहे) हैं, उनका पैर सोने के समान है, नाभि और घुटनों के बीच का भाग उज्ज्वल है, हाथो में इष्ट, अभय, गदा, शंख, शक्ति, तलवार तथा खेटक नामक आयुधों को धारण किये हुए हैं और उनकी दंष्ट्रा के अग्रभाग पर पृथ्वी शोभायमान हो रही है इस प्रकार ध्यान करके एक लाख मंत्र-जप करे, उसका दशांश मधु मिले हुए कमलों से हवन करे । तदनन्तर पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति की स्थापना कर उसमें भगवान् की पूजा करे ॥११३-११६॥ अंगदेवता, आवरणदेवता, दिक्पाल तथा उनके आयुधों की भी पूजा करे । तत्पश्चात् मन्त्र का जप करते ही साधक को भूमि, धन, धान्य, राज्य तथा लक्ष्मी की प्राप्ति होने लगती है । सूर्य के सिंह राशि में जाने पर शुक्लपक्ष को अष्टमी तिथि में शिला को पंचगव्य में डालकर उसका स्पर्श करके दस हजार मन्त्र-जप करे । पश्चात् साधक उत्तर मुंह होकर उस शिला को भूमि में गाड़ दे । ऐसा करने से भूत, प्रेत, सांप, चोर आदि की बाधा शान्त हो जाती है ॥११७-११९॥ शुक्रवार के दिन प्रातःकाल साध्य (जहाँ साधना की जाय) भूमि से मृत्तिका ले आये । मूल मन्त्र पढ़कर उस मृत्तिका का तीन भाग करे । एक भाग को पात्र के ऊपर लेप दे और दूसरे भाग को पाकपात्र में गोदुग्ध और चावल के साथ छोड़ दे । पवित्र होकर मन्त्र-जप करते हुए चरु को पकाये । पश्चात् चरु को उतार कर पश्चात् विधिपूर्वक उसे अग्नि में छोड़े । धूप-दीप आदि से पूजन करने के उपरान्त घृताक्त चरु से संस्कार युक्त अग्नि में एक सौ आठ बार हवन करे ॥१२०-१२३॥ इस प्रकार साधक सात शुक्रवार को हवन करे । ऐसा करने से उसका विरोध नष्ट हो जाता है (अर्थात् कोई उसका विरोध नहीं करता) और क्षेत्र में शत्रु, चोर आदि के उपद्रव शान्त हो जाते हैं । मङ्गल के दिन सूर्योदय होने पर साध्य क्षेत्र से मृत्तिका लाकर पूर्वोक्त प्रकार से हवनसामग्री तैयार करके प्रज्वलित अग्नि में पूर्वोक्त संख्या के अनुसार आदरपूर्वक आहुति डाले । इस प्रकार सात मङ्गलवार को हवन करने से क्षेत्र-सिद्धि होती है । गोघृत मिले हुए खीर से एक लाख बार आहुति डालने से अभीष्ट भूमि का स्वामित्व प्राप्त होता है, इसमें