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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 619, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 619

अथ सप्ततितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ वक्ष्ये महाविष्णोर्मन्त्रान् लोकेषु दुर्लभान् । यान्प्राप्य मानवास्तूर्णं प्राप्नुवन्ति निजेप्सितम् ॥१॥ येषामुच्चारणेनैव पापसंघः प्रलीयते । ब्रह्मादयोऽपि याञ्ज्ञात्वा समर्थाः स्युर्जगत्कृतौ ॥२॥ तारहृत्पूर्वकं ङेन्तं नारायणपदं भवेत् । अष्टाक्षरो मनुश्चास्य साध्यो नारायणो मुनिः ॥३॥ छन्दः प्रोक्तं च गायत्री देवता विष्णुरव्ययः । ओं बीजं यं च तथा शक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये ॥४॥ क्रुद्धोल्काय हृदयाख्यातं महोल्काय शिरः स्मृतम् । वीरोल्काय शिखा प्रोक्ता द्युल्काय कवचं मतम् ॥५॥ महोल्कायेति चास्त्रं स्यादित्थं पंचांगकल्पना । पुनः षडंगमंत्रोत्थैः षड्वर्णैश्च समाचरेत् ॥६॥ अवशिष्टौ न्यसेत्कुक्षिपृष्ठयोर्मंत्रवर्णकौ । सुदर्शनस्य मंत्रेण कुर्याद्दिग्बन्धनं ततः ॥७॥ तारो नमश्चतुर्थ्यन्तं सुदर्शनपदं वदेत् । अस्त्रायफडिति प्रोक्तो मंत्रो द्वादशवर्णवान् ॥८॥ दशावृत्तिमयं न्यासं वक्ष्ये विभूतिपञ्जरम् । मूलार्णांस्त्वतनौ न्यस्येदाधारे हृदये मुखे ॥६॥ अध्याय ७० विष्णु के अष्टाक्षर आदि विविध मंत्रों के अनुष्ठान की विधि सनत्कुमार बोले-नारद ! अब मैं महाविष्णु के मन्त्रों का वर्णन करता हूँ, जो लोक में अत्यन्त दुर्लभ हैं, जिन्हें पाकर मनुष्य शीघ्र ही अपनी अभीष्ट वस्तुओं को प्राप्त कर लेते हैं, जिनके उच्चारण-मात्र से ही राशि-राशि पाप नष्ट हो जाते हैं । ब्रह्मा आदि भी जिन मन्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके ही संसार की सृष्टि में समर्थ होते हैं। प्रणव और नमः पूर्वक ङे विभक्त्यन्त 'नारायण' पद हो तो 'ओं नमो नारायणाय' यह अष्टाक्षर मन्त्र होता है। साध्य नारायण इसके ऋषि हैं, गायत्री छन्द है, अविनाशी भगवान् विष्णु देवता हैं, ओं बीज है, नमः शक्ति तथा सम्पूर्ण मनोरथों की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग किया जाता है ॥१-४॥ इसका पंचांग-न्यास इस प्रकार है--क्रुद्धोल्काय हृदयाय नमः, महोल्काय शिरसे स्वाहा, वीरोल्काय शिखायै वषट, अत्युल्काय कवचाय हुँ, सहस्रोल्काय अस्त्राय फट् । इस प्रकार पंचांग की कल्पना करनी चाहिए । फिर मन्त्र के छह वर्णों से षडंग न्यास करके शेष दो मन्त्राक्षरों का कुक्षि तथा पृष्ठभाग में न्यास करे । इसके बाद सुदर्शन-मन्त्र से दिग्बन्ध करना चाहिए । 'ओं नमः सुदर्शनाय अस्त्राय फट्' यह बारह अक्षरों का मन्त्र 'सुदर्शन-मन्त्र' कहा गया है ॥५-८॥ अब मैं विभूतिपञ्जर नामक दशावृत्तिमय न्यास का वर्णन करता हूँ। मूल मन्त्र के अक्षरों का अपने शरीर के मूलाधार हृदय, मुख, दोनों भुजा तथा दोनों चरणों के मूलभाग तथा नासिका में न्यास करे । यह प्रथम आवृत्ति कही गई है। कंठ, नाभि, हृदय, दोनों स्तन, दोनों पार्श्वभाग तथा पृष्ठभाग में पुनः मन्त्राक्षरों का न्यास करे ।