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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 618, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 618

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एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ५६६ धर्मादिपीठे प्रयजेदंगदिक्पालहेतिभिः । एवं सिद्धे मनौ मंत्री साधयेदिष्टमात्मनः ॥१३२॥ विषरोगादिपीडासु कलहे स्वजनोद्भवे । पिप्पलोत्थसमिद्भिश्च जुहुयात्तन्निवृत्तये ॥१३३॥ हुत्वा दिनत्रयं मन्त्री निशापुष्पैर्घृतप्लुतैः । स विंशतिशतं शीघ्रं वासांसि लभते महीम् ॥१३४॥ गुरोराराधनं प्रोक्तं शृणु शुक्रस्य सांप्रतम् । वस्त्रं मे देहि शुक्राय ठद्वयांतो ध्रुवादिकः ॥१३५॥ रुद्राणोऽयं मनुर्ब्रह्मा मुनिश्चन्दो विराडुत । दैत्येज्यो देवता बीजं ध्रुवः शक्तिर्वसुप्रिया ॥१३६॥ भूर्नेत्रचन्द्रनेत्राग्निनेत्रार्णैः स्यात्षडंगकम् । शुक्लांबरालेपभूषं करेण ददतं धनम् ॥१३७॥ वामेन शुक्रं व्याख्यानमुद्रादोषं स्मरेत्सुधीः । अयुतं प्रजपेन्मन्त्रं दशांशं जुहुयाद् घृतैः ॥१३८॥ धर्मादिपीठे प्रयजेदंगेंद्र्रादितदायुधैः । श्वेतपुष्पैः सुगंधैश्च जुहुयाद् भृगुवासरे ॥१३९॥ एकविंशतिवारं यो लभते सोऽंशुकं मणीन् । मनवोऽमी सदा गोप्या न देया यस्य कस्यचित् ॥१४०॥ भक्तियुक्ताय शिष्याय देया वा निजसूनवे ॥१४१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे मन्त्रविधाननिरूपणं नामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥६९॥ सिद्ध हो जाने पर साधक अपनी कामना पूर्ण करे । विष एवं रोग आदि की पीडा और भाई-बंधुओं से कलह उपस्थित होने पर उसके निवारण के लिए पीपल की समिधा से हवन करना चाहिए ॥१३०-१३३॥ घी में डुबोये हुए कुमुद पुष्पों से तीन दिन तक दो हजार वार हवन करने से साधक शीघ्र ही वस्त्र एवं भूमि को प्राप्त करता है । इस प्रकार गुरु का आराधना-क्रम बता दिया, अब शुक्र की पूजा-विधि बताता हूँ। आदि में ध्रुव (ॐ) जोड़कर 'वस्त्रं मे देहि शुक्राय स्वाहा' — यह ग्यारह अक्षरों का मन्त्र है । इसके मुनि ब्रह्मा, छन्द विराट्, शुक्र देवता, ध्रुव (ॐ) बीज और वसुप्रिया (स्वाहा) शक्ति है ॥१३४-१३६॥ भू (ल्), नेत्र (इ), चन्द्र (—) नेत्र (इ), अग्नि (र्) तथा (हं) — इन वर्णों से षडंगन्यास करे । अनन्तर विद्वान् साधक उज्ज्वल वस्त्र, लेप तथा आभूषण से युक्त, बायें हाथ से धन देते हुए तथा व्याख्यान देने की मुद्रा में अवस्थित शुक्र का ध्यान करे ॥१३७॥ तत्पश्चात् दस हजार मन्त्र-जप करे और उसका दशांश हवन करे । फिर धर्मादि पीठ पर श्वेत पुष्पों तथा द्रव्यों, से अङ्गदेवता, इन्द्र आदि देवता और उनके आयुधों के साथ शुक्र का पूजन करे । शुक्र के दिन इक्कीस बार हवन करे । ऐसा करने से मनुष्य वस्त्र एवं मणि प्राप्त करता है। ये (उपयुक्त) मन्त्र गुप्त रखने चाहिए, जिस किसी को नहीं देने चाहिए । ये केवल भक्त शिष्य अथवा अपने पुत्र को देने चाहिए ॥१३८-१४१॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वभाग में मन्त्र-विधान-निरूपण नामक उनहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥६९॥

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