बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६४ नारदायपुराणम् सुशुक्लमाल्यवसनामुक्ताहारविभूषिताः । सर्वास्स्तनभराक्रांता रचितांजलयः शुभाः ॥५९॥ स्वप्रियासक्तमनसो मदविभ्रममंथराः । समभ्यर्च्यः सरोजाक्ष्यः पूर्णेन्दुसदृशाननाः ॥६०॥ दलाग्रेषु समभ्यर्च्यस्त्वष्टौ सूर्यादिका ग्रहाः । आदित्यभूसुतबुधमंददेवेज्यराहवः ॥६१॥ शुक्रकेतुयुता ह्येते पूज्याःपत्राग्रगाग्रहाः । रक्तारुणश्वेतनीलपीतधूम्रसिताऽसिताः ॥६२॥ वामोरुन्यस्ततद्धस्ता दक्षिणेन धृताभयाः । लोकपालांस्तदस्त्राणि तद्बाह्ये पूजयेत्सुधीः ॥६३॥ एवं संसाधितो मंत्रः प्रयच्छेदिष्टमात्मनः । पौर्णमास्यां जिताहारो दद्यादर्घ्यं विधूदये ॥६४॥ मंडलत्रितयं कुर्यात्प्राक्प्रत्यगायतं भुवि । पश्चिमे मंडले स्थित्वा पूजाद्रव्यं च मध्यमे ॥६५॥ संस्थाप्य सोममन्यस्मिन्मंडलेऽब्जसमन्विते । समभ्यर्च्य विधानेन पीठपूजनपूर्वकम् ॥६६॥ स्थापयेद्राजतं पात्रं पुरतस्तत्र मंत्रवित् । सुरभीपयसापूर्य तं स्पृशन्प्रजपेन्मनुम् ॥६७॥ अष्टोत्तरशतं पश्चाद्विद्यामंत्रेण मंत्रवित् । दद्यान्निशाकरायार्घ्यं सर्वाभीष्टार्थसिद्धये ॥६८॥ कुर्यादनेन विधिना प्रतिमासमतंत्रितः । वर्षान्तरेण सर्वेष्टं प्राप्नोति भुवि मानवः ॥६९॥ विद्ये विद्यामालिनि स्यादंते चंद्रिणि संवदेत् । चंद्रमुखि द्विठांतोऽयं विद्यामंत्र उदाहृतः ॥७०॥ एवं कुमुदिनोनाथमंत्रं यो जपति ध्रुवम् । धनं धान्यं सुतान्पौत्रान्सौभाग्यं लभतेऽचिरात् ॥७१॥ अथांगारकमंत्रं तु वक्ष्ये धनसुतप्रदम् । तारो दीर्घेंदुयुग्व्योम तदेवेंदुयुतः पुनः ॥७२॥ षांतः सर्गी च चंडीशो क्रमाद्विंदुविसर्गिणौ । षडर्णोऽयं महामंत्रो मंगलस्याखिलेष्टदः ॥७३॥
किये हुई हैं, मुक्ताहार से विभूषित हैं, कुचों के भार से आक्रांत हैं, अंजलि बाँधे हुई हैं, अपने प्रिय में मन को लगाये हुई हैं ओर मद से मस्त होने के कारण सुस्त हैं। कमल के समान नयनों वाली और पूर्ण चन्द्र के समान मुख वाली इन शक्तियों की भली भाँति पूजा करनी चाहिए। इसके बाद पत्रों के अग्रभाग में सूर्य आदि आठ ग्रहों की पूजा करनी चाहिए ॥५९-६०१/२॥ सूर्य, मंगल, बुध, शनि, बृहस्पति, राहु, शुक्र और केतु ग्रह पत्र के अग्रभाग में पूजे जाने चाहिए। इन ग्रहों के रंग क्रमशः रक्त, अरुण, श्वेत, नील, पीत, धूसर, श्वेत और कृष्ण हैं। इनके ऐसे रूपों का ध्यान करे कि इनके बायें हाथ बायीं जांघों पर स्थित हैं और दाहिने हाथ में ये अभय अस्त्र धारण किये हुए हैं। इन ग्रहों के बाद लोकपालों तथा उनके अस्त्रों का पूजन करना चाहिए ॥६१-६३॥ इस प्रकार सिद्ध किया हुआ मन्त्र मनचाही वस्तु प्रदान करता है। पूर्णिमा के दिन उपवास रखकर चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करे। तीन मण्डल बनाये, जिनमें पूर्व और पश्चिम के मण्डल कुछ लंबे हों। पश्चिम मण्डल में स्वयं बैठकर पूजा की सामग्री को मण्डल में रखे। तीसरे मण्डल में कमल-पुष्पों पर चन्द्रमा की (प्रतिमा को) स्थापना करे। पीठ को पूजा कर लेने के बाद विधिपूर्वक चन्द्र-पूजन करे। मन्त्रसाधक वहाँ अपने आगे एक चांदी का पात्र रखे। उस पात्र को गाय के दूध से भरकर उसका स्पर्श करते हुए एक सौ आठ बार मन्त्र-जप करे पश्चात् विद्या-मन्त्र से सकल कामनाओं की सिद्धि के लिए चन्द्रमा को अर्घ्य दे ॥६४-६८॥ इस विधि से प्रत्येक मास में आलस्यरहित होकर चन्द्र-पूजन करे। ऐसा करने से एक वर्ष के भीतर मानव की मनःकामना पूर्ण हो जाती है। 'विद्ये विद्यामालिनि चंद्रिणि चंद्रमुखि स्वाहा' यह विद्यामन्त्र है। इस प्रकार जो व्यक्ति चन्द्रमा के मन्त्र की साधना करता है, उसे शीघ्र ही धन, धान्य, पुत्र, पौत्र तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है ॥६९-७१॥ अब मैं धन एवं पुत्र देने वाला मंगल का मन्त्र बताऊंगा। तारः.......यह मंगल का षडक्षर महामन्त्र अखिल कामनादायक है। इसके मुनि विरूपाक्ष, छंद गायत्री और देवता मंगल है। छह मन्त्राक्षरों से षडंगन्यास